• utkarshpandey 145w

    चेतक की वीरता

    चढ़कर चेतक पर घूम–घूम 
    करता मेना–रखवाली था। 
    ले महा मृत्यु को साथ–साथ¸ 
    मानो प्रत्यक्ष कपाली था।।12।। 

    रण–बीच चौकड़ी भर–भरकर 
    चेतक बन गया निराला था। 
    राणा प्रताप के घोड़े से¸ 
    पड़ गया हवा को पाला था।।13।। 

    गिरता न कभी चेतक–तन पर¸ 
    राणा प्रताप का कोड़ा था। 
    वह दोड़ रहा अरि–मस्तक पर¸ 
    या आसमान पर घोड़ा था।।14।। 

    जो तनिक हवा से बाग हिली¸ 
    लेकर सवार उड़ जाता था। 
    राणा की पुतली फिरी नहीं¸ 
    तब तक चेतक मुड़ जाता था।।15।। 

    - श्यामनारायण पाण्डेय