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  • parle_g 28s

    मुहाफिज - हिफाजत करने वाला
    जानिबदार - तरफदारी करने वाला
    बादा-ख्वार - शराबी
    फ़नकार - कलाकार

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @anas_saifi ��

    इक़ ग़ज़ल.... बस ऐसे ही.... तवज्जोह दीजियेगा ��

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    ग़ज़ल ( पिलाये जा )

    वज़्न - 2122 2122 2221 1222

    बे-करारी आ लगी है जाम-ए-यार पिलाये जा
    ये मिरे जाँ के मुहाफिज, जानिबदार पिलाये जा

    हम मुहब्बत की हिरासत में नाशाद बैठे है फिर
    हो रहा हूँ दिन ब दिन कोई आजार पिलाये जा

    तुम मिरी आंखों में कोई शबनम से हो मियाँ आदम
    कम्बख्त मैं हो चुका हूँ इक़ बेकार पिलाये जा

    वो मुसव्विर कहता है तुम कोई ताजमहल हो यार
    और मैं कहता हूँ पत्थर है दिल'दार पिलाये जा

    कोई सहरा देखना हो तो मुझ तक आ जाओ ताबिश
    छोड़ आया हूँ खुदा के सर घर'बार पिलाये जा

    तुम जहर मीठा बनाती हो सा'की, सो चली जाओ
    आ मिरी आँखों के तारे, बादा-ख्वार पिलाये जा

    मुझसे नफरत करने वाले, मुझसे हाथ मिलाते हो
    ये भी अच्छा है मिरे दुश्मन-लाचार पिलाये जा

    अब कहीं कोई ग़ज़ल सुनने वाला भी नही वाज़िल
    अब यहीं मर जाते है घुट घुट फ़न'कार पिलाये जा
    ©parle_g

  • parle_g 9h

    आजारी - पीड़ा ,उत्पीड़न
    फ़नकारी - कलाकारी ,कुशलता
    मल - rub

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @iamfirebird @prashant_gazal @anas_saifi

    पता है... इस ग़ज़ल को लिखने में... मेरे हाथ कांप रहे थे और मेरी आँखों मे आँसू गिर रहे थे मोबाइल की स्क्रीन पर...कोई कैफ़ियत तक नसीब नही मुझे यहां
    मां होती तो दुआओं से ही ठीक कर देती मुझे... दवाएं काम नही कर रही मेरे..

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    ग़ज़ल ( जाती है )

    वज़्न - 2122 2122 2222 222

    बैठी रहती हूँ मग़र यक आजारी खल जाती है
    अब मिरे हा'थों से अम्मी हर रोटी जल जाती है

    तुम कब'से बैठे हो चाहत लेकर इस कूचे में
    दाग़ बैठे रहने से अब बीमारी पल जाती है

    मैंने देखा है मुहब्बत में पड़'कर अरसों पहले
    इस मुहब्बत में रजा हर इक़ हसरत ढल जाती है

    ये नही की कोई मुझ'को अपने पहलू में रख ले
    माँ कहाँ हो तुम, मिरे सिर की चो'टी खुल जाती है

    कोई क़ा'तिल अब तिरी तस्वीरें लिखता है मुझपे
    अब याँ कोई ज़िन्दगी, जो बे'वजहा चल जाती है

    इक़ दो पर्दे फिर ग़ज़ल की चौखट पर रखते है हम
    कल सुना था इक़ हवा है, फ़न'कारी मल जाती है
    ©parle_g

  • parle_g 10h

    जुम्बिश - हलचल
    साहिर - जादूगर
    एजाज - जादू
    गम्माज - गुप्तचर, जासूस
    हैदर - शेर
    शहबाज - बाज
    नासाज - नादुरुस्त
    सुख़न-वर - कवि , लेखक

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @ajit___

    इक़ ग़ज़ल.... काफी मुश्किल से लिख पाई हूँ... डेंगू हो गया है सो बैचनी की वजह से... भावपूर्ण शेर नही कह पाउंगी ��

    तवज्जोह दीजियेगा

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    ग़ज़ल ( नही है)

    वज़्न - 2122 2122 2221 122

    दूर इतने है की सहरा में आवाज नही है
    इक़ परिंदा तक नही कोई परवाज नही है

    सब तिरी आंखों की जुम्बिश के अस्बाब है चाहत
    याँ कोई साहिर नही है यक एजाज़ नही है

    इस मुहब्बत की हिदायत हमको ना दो मियाँ तुम
    इस जमाने में कहीं कोई हमराज़ नही है

    तब हुये थे तुम मिरी आंखों के शाहजहां दाग़
    अब तिरे हिस्से में हज़रत इक़ मुमताज़ नही है

    रे नबीना ये निशानी अपने पास रखो तुम
    कम्बख्त यक आयना भी अफ़राज नही है

    हम जिसे अपने गले की साँसें कहते थे जाहिल
    यार अब क्या ही कहूँ कोई इलआज नही है

    मैं ख़ुदी खिड़की पे आ जाऊंगा छुपके कहीं से
    हाय! शहजादी मिरे अपने गम्माज नही है

    कितने अरसों बाद लौटे है हम दश्त के ज़ानिब
    अब यहां हैदर बड़े है पर शहबाज नही है

    लत लगी सिगरेट की फिर जब तू पास नही था
    अब तिरी हसरत नही है हम नासाज नही है

    है सुख़न-वर इस जमाने के हर घाट पे वाज़िल
    पर जिया तुमसी ग़ज़ल तुमसा अंदाज नही है
    ©parle_g

  • parle_g 1d

    बलायें - समस्या
    रजायें - इच्छाएँ
    हिनायें - मेहन्दी

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @anas_saifi

    हरारत में है.... मगर..ग़ज़ल लिखना बंद कर दे.... ई नही होगा☺️

    तवज्जोह दीजियेगा ��

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    ग़ज़ल - या मृत्यु

    वज़्न - 2122 2122 2122 2122 2

    इतने फ़ाजिल है मगर फिर कुछ सदायें मार देती है
    दाग़ हम कुछ काफि'रों को अब दुआयें मार देती है

    उस दरीचे की गरेबाँ कैद है बस इक़ हिफ़ा'जत में
    अब मिरे इस घर को कुछ क़ा'तिल हवायें मार देती है

    तुम बड़े शायर नही लगते बता'ओ कौन हो तुम याँ
    रे मियाँ अंजान लोगों को बलायें मार देती है

    कोई बीमारी बड़ी कब थी मुहब्बत की न'जऱ में यार
    कम्बख्त इक़ इस मुहब्बत में दवायें मार देती है

    कुछ दिनों हम दश्त की छांवों में रहना चाहते है अब
    जाने किसने ये कहा है की फिजायें मार देती है

    अहद टूटा, मर नही जाऊंगा शिक'वा मत करो जाहिल
    आद'मी को इन दिनों ज्यादा वफा'यें मार देती है

    पीना पड़ता है जो मिल'ता है जहर की उन दुकानों से
    आजकल इस शहर बे-मत'लब रजायें मार देती है

    रंग उड़ता भी कहाँ है इस ग़ज़ल का फिर जिया वाजिल
    ये बुरा है हाथों को अब कुछ हिनायें मार देती है
    ©parle_g

  • parle_g 2d

    तबी'अत खराब होने के कारण
    मैं शायद कुछ दिन मिराकी पर
    नही आ पाउंगी...मुआफ़ी
    ©parle_g

  • parle_g 2d

    हम-नवाई - हमखयाली , इक़ दूसरे से पूर्ण
    तराई - घाटी जहां नमी होती है
    अजयाबघर - म्यूजियम
    कीमिया - सोने चांदी बनाने का यंत्र
    राईं - बहोत कम मात्रा (राई भर नमक दे दो)
    पेशवाई - शासन करना
    ना-रसाई - जो हांसिल नही हो
    आश्नाई - सम्बंध

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @iamfirebird @prashant_gazal @anas_saifi ����

    इक़ ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत में.... तवज्जोह दीजियेगा��

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    ग़ज़ल

    वज़्न - 2122 2122 2122 212

    हम भी तन्हा तुम भी तन्हा हम-न'वाई छोड़कर
    हम किसी सह'रा में बैठे है, तराई छोड़कर

    ये तिरी चाहत, मुहब्बत इक़ अजायब'घर है दाग़
    देखो अच्छे खासे थे हम बे-व'फ़ाई छोड़कर

    दिन ब दिन इस शहर में कोई हवा मर जाती है
    तुम अभी तक जी रहे हो यक दवाई छोड़कर

    अपने दर में कीमिया रखते हो शहजादे जफ़र
    मैं तुझे कुछ भी नही दूँ'गा वो राई छोड़कर

    मकड़ियाँ जाले बनाती थी मिरे मिज'राब पर
    मैं चला आया था घर, पे'शवाई छोड़कर

    सो उसे हसरत का दर्जा दे दिया हमने भी फिर
    वो बड़ा सदमें में था यक ना-रसाई छोड़कर

    सोहरत तुमको पुरखों की नफासत है मियाँ
    राख के पुतले है सब अपनी कमाई छोड़कर

    अब ज़िया कोई ग़ज़ल अप'नी बसारत में नही
    अब ये शायर मर जा'ये'गा, आश्नाई छोड़कर
    ©parle_g

  • parle_g 2d

    ना-ग़वार - जो हमें पसन्द नही
    सहरा - रेगिस्तान, उजाड़
    गर्द-ओ-गुबार - रेत का तूफ़ान
    सिफ़ाल - मिट्टी का प्याला
    मजार - कब्र
    अक़ीदा - विश्वास
    जार-जार - टुकडो में

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @anas_saifi ��

    इक़ ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत में.... आप सभी की निगहबानी चाहती है ��
    तवज्जोह दीजियेगा.... हर शेर पर धड़कने लगी है ��

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    ग़ज़ल ( आ रहा है )

    वज़्न - 2122 2122 2121 2122

    क्या है कुछ कुछ इश्क में जो ना-गवार आ रहा है
    रे मियाँ मुझ'को ये कैसा अब बुखार आ रहा है

    मैं तिरी आंखों में भटका हूँ मिरी ये प्यास लेकर
    अब तिरे सहरा में यक गर्द-ओ-गुबार आ रहा है

    अपने अपने अक्स की कुछ सूरतें सिफाल रखलो
    आ'ज कोई आयना जब्त-ए-दरार आ रहा है

    काट मैं भी सक'ता था गर्दन किसी दिलाशें में फिर
    अब किसी दुश्मन पे मुझ-को, एतिबार आ रहा है

    दाग़ में उन कश्तियों में खू'न भर रहा हूँ अपना
    दाग़ देखो, आज सा'हिल में भी ज्वार आ रहा है

    तुम कहो यक दिल ले लूँ खा'तिर तिरे, तू खेल ले'ना
    कुछ क़दम चलकर दुकाँ कोई बजार आ रहा है

    मौत अपने जिस्म को मह'रू'मियत बनाती है राग
    हर कोई हज़रत मुहब्बत में म'जार आ रहा है

    ये अक़ीदा भी ज़िया अब कोई हादसा है हर दिन
    कुछ तो है जो आज़कल फिर जार-जार आ रहा है
    ©parle_g

  • parle_g 2d

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @anas_saifi आप सभी गुरुजनों को ईद मुबारक़
    अल्लाह पाक... आपकी कलम को और ताकत दे... ताकि हम आपसे और जियादा सीख सके ����

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    Eid-e-Milad

    आप सभी को दिल से ईद मुबारक़
    अल्लाह पाक आप सभी को अच्छी
    सेहत और खुशियों से नवाज़े!
    ©parle_g

  • parle_g 3d

    साहिल-ए-अजबर - वो समन्दर जो अच्छे से हमको याद हो
    ख़ाकसार - अपने अज़ीज
    गिरह - गाँठ
    शगूफे - खिला हुआ फूल

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @anas_saifi ��

    इक़ ग़ज़ल पेश ए ख़िदमत में.... तवज्जोह दीजियेगा ����

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    ग़ज़ल ( देखता हूँ )

    वज़्न - 2122 2122 1222 2122

    इक़ मैं मस्ज़िद से उठूं तो ये ज़ख्म-ए-सर देखता हूँ
    अब रि'फ़ा'क़त मैं तिरे हाथ में पत्थर देखता हूँ

    कोई बैचेनी मिरे दिल को लग जा'ती है, जैसे की
    अप'ने घर से दूर जाता हूँ औ' फिर घर देखता हूँ

    ये तिरी आंखों का दरिया मुझे खलता है बशर अब
    मैं, तिरी या'दों का फिर साहिल-ए-अज'बर देखता हूँ

    देखो वो इम्लाक कितनो के सिर काटा होगा ताबिश
    हाए! ये गुर'बत कटे, हाए! यक खंज़र देखता हूँ

    मुझ'को कोई असर होता नही देखने पर मियाँ जी
    यार मैं उस कम्बख्त को मग़र मुड़कर देखता हूँ

    सोहरत का कोई मसला लगे तो बे-बाक कहना
    मैं तिरी गलियों में जा'हिल कहीं लुट'कर देखता हूँ

    ये मुहब्बत जबसे फुरकत बनी है, बैठा हूँ घर में
    ख़ाक'सारों आयना भी मैं अब अक्सर देखता हूँ

    कोई बंदिश है ग़ज़ल की गिरह खुलती ही नही अब
    मैं शगूफे भी नफासत के कम झुक'कर देखता हूँ
    ©parle_g

  • parle_g 3d

    जबीं - ललाट , फोरहेड
    अहद-ए-वफ़ा - वादा
    ज़ानिब - कोई दिशा
    दो कौड़ी - बहोत ही जियादा निर्धनता को दर्शाता है !

    @vipin_bahar @bal_ram_pandey @prashant_gazal @iamfirebird @anas_saifi ��

    किसी ने कहा.... की... तुम क्या चाहती हो.... खुदा से.... तो मैंने कहा की...

    गौर से पढ़िये.... यक़ीनन हर शेर... दिल के सम्त से है����

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    ग़ज़ल ( नही लूंगा )

    वज़्न - 2122 2122 2212 1222

    कोई वह'शत में मरूँगा पर यक दुआ नही लूंगा
    मैं किसी यक शख्स की अब कोई हया नही लूंगा

    वो बड़े घर की कोई शह'जा'दी है तो रहे फिर वो
    यार मैं इससे जिया'दा अब ये बला नही लूंगा

    देखो कितना खून टप'का है कल मिरी जबीं से याँ
    मैं कभी इन हा'थों में को'ई आयना नही लूंगा

    तू कभी आया नही मुझको देखने भी याँ ताबिश
    अब मुझे कोई ज'हर दे दो, मैं दवा नही लूंगा

    सोचती है आँधियाँ भी दीपक बुझाने से पहले
    मैं बड़ा ख़ुद-ग़र्ज हूँ, मैं दी'पक नया नही लूंगा

    मुझसे तो फिर इश्क करने की शर्त भी यही है इक़
    मैं तिरी कोई जबाँ फिर अहद-ए-वफ़ा नही लूंगा

    कुछ दिनों पहले ही कोई घर'बार लुटा है उस ज़ा'निब
    अब जमीं पर रह लूंगा उस ज़ा'निब मकाँ नही लूंगा

    ये कलेजा कांप'ता है कोई ग़ज़ल सुनाने में
    रे जिया शा'यर हूँ, दो कौड़ी के सिवा नही लूंगा
    ©parle_g