parle_g

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मेरे हिस्से, माँ आयी !

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Reposts
  • parle_g 1d

    @lafze_aatish @succhiii

    कुछ लफ्ज़...कुछ अनकही बातें... कुछ अनसुनी... बातें
    अभी-अभी दिल की समाअत से निकली है !!

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    मिस्ल-ए-स'फ़ा से पाबंदी-ए-आईना-ए-वफ़ा ना कटी हमसे,
    किसे रोये बैठ'कर ये दिल! कोई एक बद्दु'आ ना कटी हमसे।

    गुल-फिशाँ के फिरदौश रखता है कोई राज'कुमार महलों में,
    हम क'ली तो क्या काट लाते कम-ज़र्फ़ हवा ना कटी हमसे।

    परे'शाँ न हो दिल,उतर आएंगे जोम भी उस सहरा के कभी,
    उम्र ले डूबा यही वसवसा, वो सहरा-ए-सदा ना कटी हमसे।

    तिरी दश्त-ए-निग़ार को छुपाया है अपने ही जिस्म में कहीं,
    एक मंजर गुजर था ऐसा, कोई बंद-ए-क़बा ना कटी हमसे।

    मर गए सारे दिल-फ़ि'गार कूचो में जहर के बा'दाम खाकर,
    कम्बख्त इक़ हम ही थे मय-ख़्वार, कि दवा ना कटी हमसे।
    ©parle_g

  • parle_g 1d

    किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
    मैं घर में सब से छोटी थी मिरे हिस्से में माँ आई
    ©मुन्नवर_राणा

  • parle_g 4d

    मत खोलना !

    मस'अला जो भी रहे फ़िरसे इक़ अर्ज-ए-मुद्दआ मत खोलना,
    हो सके तो माशूक़ मिरी जबीं से खौ'फ़-ए-ख़ु'दा मत खोलना।

    उठा लिए है फिर तकल्लुफ़ से हि'जाब तो कोई आ'फत नही,
    वा'इज मिरे रुमाल की तन्हाईयों से,बंद-ए-क'बा मत खोलना।

    तबी'अत खराब सी रहती है तिरे जाने के बाद कुछ इस'कदर,
    तबीब मुझे जहर दे देना पर उस का'गज से दवा मत खोलना।

    आज खैरात में मिले भी तो जले हुए चिल'मन खिड़कियों के,
    कुछ दिन बचा लो मकाँ को,कुछ दिन और हवा मत खोलना।

    नमाज़ की वज़्अ में है होती है सब जि'हन की तारीकी मियाँ,
    कम्बख्त किसी दर पर जफ़ा खोलना मगर सफ़ा मत खोलना।

    इक़ सुख़न-खोर बनना कोई आसाँ नही है अब दहशतगर्दी में,
    हे गालिब!इक़ कासा-ए-साइल में अब कोई दुआ मत खोलना।
    ©parle_g

  • parle_g 2w

    ��

    मुझे ये पता होता तो मैं जाती ही नही अब्बा��
    22 को आयी थी अजमेर से...कि मिराकी पर सभी इंतज़ार कर रहे है ...
    पर ....

    शायद ही अब कोई लफ्ज़ लिख पाउंगी मैं....मिराकी पर ...
    माफी चाहती हूँ ...

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    आखिर मिरी ही निग़ाहों के घर में है सितम-ईजाद कुछ दिन से,
    जाने क्यों एक पत्थर भी नही तोड़ पा'या फ़र'हाद कुछ दिन से।

    सुनो! ख़ामुशी से तस्लीम करना सीख रहे है गालिबन इन दिनों,
    मिरा चेहरा अश्कों में है,बताओ तो कहां हो नौशाद कुछ दिन से।
    ©parle_g

  • parle_g 5w

    एक मतला .... एक शेर... :)

    #collab_open

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    ये अजि़य्यत कैसी है हबीब, मैं कोई गम बता भी नही सकती,
    अब तुम्हें दिल में नही रख सकती, और मिटा भी नही सकती।

    अपने अहद में था,इक़ दूसरे की याद को जला देना जिहन से,
    और इक़ कम्बख्त मैं हूँ, तिरी इक़ तस्वीर हटा भी नही सकती।
    ©parle_g

  • parle_g 5w

    बहरे : मुतदारिक मुसम्मन सालिम

    :)

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    212 212 212 212

    आज़माती तिरी हम-नवाई मियाँ
    अब नही काम आती दवाई मियाँ

    तू कहे तो जला दूं नमी वरक से
    फिर न कहना इसे बेफ़वाई मियाँ

    आज माहौल गम का न हो पाएगा
    आज हमने भी कसम खाई मियाँ

    मौत कुछ देर का सिलसिला है यहाँ
    ज़िन्दगी को नही इक़ दुहाई मियाँ

    जख्म कितनी दफ़ा काम आता मुझे
    मैं नही लिख सकी फिर रुबाई मियाँ

    उस खुदा का सहारा बनो जाहिलों,
    " माँ " नही, चीज कोई पराई मियाँ
    ©parle_g

  • parle_g 6w

    यूं ही तो नही मेरे ख़्वाब में आ गए हो तुम
    इक़ अरसा बीत गया है तिरी तस्वीर में !

    ~~ ज़िया खान !!

    हैरत-ए-गुलफिशाँ - फूलों की पंखुड़ियों के बिखरने में हैरानी
    पशेमाँ - शर्मित , लज्जित
    गुरेजाँ - बचते रहना

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    कुछ दिन से !

    हम हर्फ़-ए-तमन्ना जाहिर नही करते बंद-ए-जबाँ है कुछ दिन से,
    मिरी साँसों को क्या लगे'गा तबीब, जहर ही दवा है कुछ दिन से।

    आ'ज तुम आये हो तो मिरे आँगन में तितलियाँ आयी है माशूक़,
    किसे मिरी ख़ामुशी रास आए,हैरत-ए-गुल'फिशाँ है कुछ दिन से।

    यक़ीनन उस तसर्रुफ़ पर दाद देने से नही जायगी बदहाली मिरी,
    मुझ पर तिरी निग़ाहों के दफ्तर से कोई निगह'बाँ है कुछ दिन से।

    मालूम है!इं'साफ़-ए-तलब के ख्वाबों की ताबीर नही होती मियाँ,
    तुम भी इसी ख़्वाब में मरोगे, और हम भी पशेमाँ है कुछ दिन से।

    तिरी चाहत की पहेलियाँ बुझाते-बुझाते अब दिन आ गए है मिरे,
    गालि'बन यही मस'अला लगता है, बिन बात हैराँ है कुछ दिन से।

    उन तन्हाई के चरागों में आखिर कब तलक उँगलियाँ जला'ती मैं,
    कहो सितारों की रोशनी से मियाँ, आ'ख़िर गुरेजाँ है कुछ दिन से।

    पाबंध-ए-मोहब्ब्त के सिलसिले नही जाते मिरी जबीं से छूट कर,
    मिरी दुआओं की खा'क देखो, मिरा खुदा,मेहरबाँ है कुछ दिन से।

    उठा'कर पढ़ क्यों नही लेते तुम वा'किअ-ए-तारीखी के हर्फ़ सारे,
    और कम-बख्त इक़ हम ही है बे-ल'गाम, जो इंसाँ है कुछ दिन से।

    मुझ'से यूँ ख़फ़ा है खुदा मिरा, मुझ'से मत मांग हिदायतें जीने की,
    ज़िया ! क्यों कुछ तन्हाईयों के दर'मियाँ, तिरी 'माँ' है कुछ दिन से।

    ©parle_g

  • parle_g 6w

    बहरे ख़फ़ीक मुसद्दस मखबून

    फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन

    ....

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    2122 1212 22

    अब मिरी आँख में नही है तू
    दिल किसी आग में नही है तू

    यूं वफ़ा से न देख अब मुझको
    जख्म, इस दाग़ में नही है तू

    ज़िन्दगी तोड़ कर लुटाता मैं
    ज़िन्दगी, बाग में नही है तू

    भूल जाते कभी तिरी बातें
    आज इक़ बात में नही है तू

    इक़ ख़ुदा जिक्र पे नही लौटा
    माँ, इसी राग में नही है तू
    ©parle_g

  • parle_g 6w

    एक मतला.... एक शेर... @cosines @eunoia__ ❤️❤️
    दोनों की नजर में...

    ग़ज़ल... कल पोस्ट करती हूँ !!

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    हम हर्फ़-ए-तमन्ना जाहिर नही करते बंद-ए-जबाँ है कुछ दिन से,
    मिरी साँसों को क्या लगे'गा तबीब, जहर ही दवा है कुछ दिन से।

    आ'ज तुम आये हो तो मिरे आँगन में तितलियाँ आ'यी है माशूक़,
    किसे मिरी ख़ामोशी रास आए,हैरत-ए-गुल'फिशाँ है कुछ दिन से।
    ©parle_g

  • parle_g 6w

    @cosines tumhare liye...����
    yaar aa jao...kuch der k... liye....��

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    नही खुलती !

    किसे रोये हम हबीब,मुझसे इक़ काकुल-ए-शब-गीर नही खुलती,
    यह कह'ना अच्छा तो नही है मियाँ, कि मिरी तहरीर नही खुलती।

    उन बादलों के जेहन को भला कौन समझ पाया है जमाने भर में,
    कहीं बारिशें खुल जा'ती है कहीं याद-ए-अब्र-ए-पीर नही खुलती।

    आओ शराब निगल लो,कुछ देर तक बे'वफा से बच जाओगे तुम,
    मिरा यकीं कर रफ़ीक,अश्कों से मुहब्बत की तासीर नही खुलती।

    तू क्या सीखाएगा ख़फ़ा रहना,मैं जो खुदसे ही ख़फ़ा हूँ सालों से,
    कम्बख्त इस जमाने में कुछ हाद'सों की अब जंजीर नही खुलती।

    सामने बैठे हो कब'से,इशारों में कोई लफ्ज़ तक नही कहा तुम'ने,
    सुनो मिरी जाँ, तिरे यूं खामोश रहने से कोई तक'रीर नही खुलती।

    हर रोज मिरी अल'मारी में देख-ती हूँ तिरे गुलदस्ते के गुलाबों को,
    यह तोहफा तो अच्छा है म'गर, तिरी सूरत-ए-तस्वीर नही खुलती।

    तिरे बदन को नोंच लेना, इत्तेफाक में ब'दल जाएगा कुछ दिनों में,
    मिरे देश की अदालतों में अब,कोई बाइस-ए-तफ़्सीर नही खुलती।

    आग का दरिया भी हो सकता है, कहीं समंदर के ख़ार भी वाइज,
    किसी बरहमन ने क'हा था, मुझ'से हा'थों की लकीर नही खुलती।

    ये खून किसका है, किस'की निग़ाहों में चुभ रही है बेवफाई तिरी,
    ति'रा निशाना अच्छा है सय्याद, तिरे निशानों से तीर नही खुलती।

    मैं लौट आयी थी घर अप'ने,उन बुतों में अपनी सलामती मांगकर,
    सच तो यही है माँ, तिरी दुआ'ओं के बिना ये तकदीर नही खुलती।
    ©parle_g