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  • nityasingh_bhoomi 3d

    थोड़ा मीठा, थोड़ा कड़वा लिक्खा है
    हमने किसको जाने क्या-क्या लिक्खा है,

    हमने अपनी लाख बुराई लिख डाली
    लेकिन तुमको हर दिन अच्छा लिक्खा है,

    कितनी ज़िल्लत, कितनी आफ़त, कितने ग़म
    अब देखेंगे किस्मत में क्या लिक्खा है ।

    ©नित्या सिंह 'भूमि'

  • nityasingh_bhoomi 34w

    सफ़र क्या खूब था वो अजनबी से अजनबी तक का
    मुझे हर रोज़ लगता है, तुम्हें भी लग रहा होगा,

    यही बस सोचकर तुमको कभी message नहीं करती
    तुम उसके साथ में होगे, वहाँ जी लग रहा होगा।

    ©नित्या सिंह 'भूमि'

  • nityasingh_bhoomi 40w

    @kaafir_nama

    पिछले दिनों मैंने एक अदना सा मिसरा पोस्ट करके उसे आप लोगों के जरिये एक ग़ज़ल में तब्दील करने की कोशिश की थी। बहुत लोगों ने उसपर बहुत अच्छे शेर कहे उसके लिए आप सबका शुक्रिया।
    पर हमारे बीच से एक ऐसे शायर निकलकर आए जिन्होंने उस एक मिसरे को एक बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल में ढाल दिया।
    मैं काफ़िर जी का दिल से शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ।

    आप लोगों से गुज़ारिश है कि अपनी मुहब्बत भीड़ में खोये हुए इस शायर तक ज़रूर पहुँचायें।

    Instagram ID- Kaafirnama

    ज़ामिन- जिम्मा लेने वाला
    ग़फ़लत- बेसुधी
    नासेह- उपदेशक, नसीहत देने वाला
    बज़्म- सभा
    देर-पा- स्थाई

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    काफ़िर की ग़ज़ल

    मुख़्तसर हर एक पल है, दास्ताँ आदम नहीं
    ज़िंदगी हर एक पल हो एक सी मुमकिन नहीं,

    एक ऐसी भी जगह, है दफ़्न मेरी रूह जहाँ
    साँस का चलना मिरी, ये जान का ज़ामिन नहीं,

    वायदा है, वो किसी दिन, घर मिरे भी आएगा
    रोज़ ग़फ़लत में जिए, वादे का कोई दिन नहीं,

    काम नासेह आ न पाया, हो गया वो खुद फ़िदा
    था खड़ा हक़ में मिरे, कुछ भी कहा लेकिन नहीं,

    बज़्म से बे आबरू कर, उसने जाने को कहा
    बेशरम बैठा रहा मैं, क्यूँ गया फ़ौरन नहीं,

    बोझ है बस हसरतों का, देर-पा कुछ भी नहीं
    कौन है, जिसको मिली खुशियाँ, मिला मातम नहीं,

    हमसुखन, तुमने दिया मौका, तुम्हारा, शुक्रिया
    मैं तो ठहरा एक "काफ़िर", ज़ौक या मोमिन नहीं।


    ©काफ़िर

  • nityasingh_bhoomi 40w

    एक नई कोशिश, एक ग़ज़ल बनाने की, लेकिन अकेले नहीं,
    आपका साथ जरूरी है, तो सानी और शेर जोड़िये, शायद कुछ खूबसूरत बन जाए ❤

    कुछ अच्छा बन सका तो पूरी ग़ज़ल पोस्ट करेंगे, "हमारी ग़ज़ल" ��

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    ज़िंदगी हर एक दिन हो एक सी मुमकिन नहीं

    ©नित्या सिंह 'भूमि'

  • nityasingh_bhoomi 45w

    कैसे-कैसे ख़्वाब दिखने लग गए
    जब हुए मायूस, लिखने लग गए,

    जिन घरों में आदमी आबाद था
    वो दर-ओ-दीवार बिकने लग गए,

    जिन खिलौनों की हमें ज़िद थी कभी
    आज वो कूड़ों में फिकने लग गए,

    सारे बचपन धूप प्यारी थी हमें
    आज उसमें पाँव सिकने लग गए,

    डाँटकर मम्मी बिठाती थी कभी
    आज हम खुद पढ़ने-लिखने लग गए।

    ©नित्या सिंह 'भूमि'

  • nityasingh_bhoomi 45w

    मुझको मानी बना दिया तुमने
    खून पानी बना दिया तुमने,

    औरतें बेंच कर कमाने को
    खानदानी बना दिया तुमने,

    एक मुर्दा, उजाड़ बस्ती को
    राजधानी बना दिया तुमने,

    खुशमिजाज़ी से मेरी सोहबत को
    एक कहानी बना दिया तुमने,

    एक सूरजमुखी सी लड़की को
    रातरानी बना दिया तुमने।

    ©नित्या सिंह 'भूमि'

  • nityasingh_bhoomi 48w

    तुम्हारी ज़िद में जुनून कम है ये दिख रहा है
    तेरे कलेजे में खून कम है ये दिख रहा है,

    हमारी स्वेटर बुनी नहीं जा सकेगी तुमसे
    तुम्हारी तीली में ऊन कम है ये दिख रहा है,

    तुम्हारी क़ुर्बत की जुस्तजू अब बची नहीं है
    मेरे ज़हन को सुकून कम है ये दिख रहा है,

    मैं जून की सिर्फ एक तारीख पढ़ रहा हूँ
    तेरे कलेंडर में जून कम है ये दिख रहा है,

    तुम्हारी तबियत भी पूछने वाले लोग कम हैं
    मेरी तरफ़ भी हुजूम कम है ये दिख रहा है।

    ©नित्या सिंह 'भूमि'

  • nityasingh_bhoomi 48w

    इन गुलों पर आज एक गुलदान भारी पड़ गया
    साथ रहने का वो एक अरमान भारी पड़ गया,

    हमको बंजारों की तरह छोड़ना था सब मगर
    घर का हर छोटा-बड़ा सामान भारी पड़ गया,

    जो किया तूने वही करना था मुझको भी मगर
    बेईमानी पर मेरा ईमान भारी पड़ गया,

    हाँ अंधेरा था, बहुत ज्यादा अंधेरा था मगर
    चारदीवारी पे रोशनदान भारी पड़ गया,

    एक जरा सी कोठारी थी एक बगीचे से लगी
    एक बँगले पर मेरा बाग़ान् भारी पड़ गया,

    सूखे सब तालाब, सारे फूल मुरझाने लगे
    बारिशों पर आज रेगिस्तान भारी पड़ गया।

    ©नित्या सिंह 'भूमि'

  • nityasingh_bhoomi 49w

    तेरे दम से ही रोशनी है क्या
    तुम्हारा नाम चाँदनी है क्या?

    तितलियाँ लब पे बैठ जाती हैं
    तेरे होठों में चाशनी है क्या?

    तेरी आँखों ने बाँध रखा है
    तेरी आँखों में मोहनी है क्या?

    होंठ पर कुछ रुका सा लगता है
    क्या कोई बात बोलनी है क्या?

    बेझिझक हाथ थाम लेती हो
    साथ इक उम्र काटनी है क्या?

    वक़्त के साथ जल रही है ये
    ज़िंदगी मोम की बनी है क्या?

    ©नित्या सिंह 'भूमि'

  • nityasingh_bhoomi 54w

    सोचने को तेरे आने का ख़्याल अच्छा है
    हाल कहने को मेरा, हाल-फिल्हाल अच्छा है,

    पूछता है कि तेरा और मेरा क्या रिश्ता
    दिल दुखाने के लिए ये भी सवाल अच्छा है,

    कितने धागों से पिरोया था तेरा मेरा नाम
    और तुमने कहा कि हाय! रुमाल अच्छा है,

    ढेर रुस्वाइयाँ, कुछ ऐतराज़, सौ झगड़े
    तेरे होने से तो जाने का मलाल अच्छा है,

    साल आया तो क़फ़स और बेबसी लेकर
    सामने आए जो कहता है ये साल अच्छा है।

    ©नित्या सिंह 'भूमि'