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  • nehapriyadarshini 103w

    अभी चुनने दो कुछ विदाई की कलियाँ,
    प्रिय आँसू, तुम फिर कभी आते रहना।

    जरा देख लूँ उनको जाते हुए भी,
    जिन्होंने कहा था विदा तुम न कहना।

    बहुत जानती हूँ ना होओगे मेरे,
    मैं फिर भी चुनूंगी तुम्हें प्यार करना।

    मैं कब से यही सोचती आ रही हूँ,
    है कितना कठिन यूँ सरल होके रहना।

    विधाता, ये दुनिया तुम्हीं को मुबारक,
    जहाँ जीने का अर्थ है मरते रहना।

    ©nehapriyadarshini

  • nehapriyadarshini 106w

    प्रश्नचिन्ह ये रहा विधाता तेरे न्यायी होने पर,
    मेरा जीवन कोरा लिखना था तो रंग गिराया क्यूँ?

    क्यूँ बोये तुमने चंदा के सपने मेरी आँखों में,
    जब तुमको मेरा नाता अँधियारे से तय करना था!
    रच-रचकर तुमने बोलो जीवन का क्यूँ शृंगार किया,
    जब मेरे हाथों में तुमको टूटा दर्पण धरना था!

    असगुन की मृत शैय्या पर स्वप्नों को सती बनाया क्यूँ?
    मेरा जीवन कोरा लिखना था तो रंग गिराया क्यूँ?

    ©nehapriyadarshini

  • nehapriyadarshini 110w

    याद आता है एक बार मैंने उससे कहा था......मैं जानती हूँ कल तुम मुझे भूलने की कोशिश करोगे। और तुम चाहोगे कि मैं भी तुम्हें वहाँ स्थान न दे सकूँ जहाँ तुम्हें होना चाहिए। तुम मुझे दुखी करोगे, मुझे रुलओगे और मैं तुमसे केवल और केवल घृणा करुँ इसके अतिरिक्त कोई विकल्प शेष ना रखोगे।
    उसने कहा था.....ऐसा क्यों कहती हो? मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ और मैं कभी तुमसे अलग होना नहीं चाहूँगा। यदि जोड़ियाँ आसमान में बनती हैं तब भी और नहीं बनती हैं तब भी तुम मेरे लिये परफ़ेक्ट मैच हो।
    मुझे समझ नहीं आता कि आज मुझे खुश होना चाहिए या रोना चाहिए क्योंकि आज वो झूठा और मैं सच्ची सिद्ध हुई।

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    मुझे समझ नहीं आता कि आज मुझे खुश होना चाहिए या रोना चाहिए क्योंकि आज वो झूठा और मैं सच्ची सिद्ध हुई।
    ©nehapriyadarshini

  • nehapriyadarshini 114w

    शोषित, उत्पीड़ित, वंचित, परवश एवम् दीन
    स्त्रियों पर लिखे गए साहित्य
    उन तक कभी पहुँचते ही नहीं।
    ऐसी स्त्रियाँ नहीं जानतीं
    इन शब्दों के अर्थ तक;
    वे खुशियों की प्रतिमाएँ होती हैं
    बिम्ब होती हैं अबोधता का।

    स्वयं पर हुए अत्याचार को वे दिन
    एवम् रात के होने जैसी सामान्य
    घटनाएँ मानती हैं।
    और विरासत में अपनी बेटियों
    और अपने परिवेश को भी देना चाहती हैं।
    ऐसी स्त्रियाँ तिलमिला उठती हैं
    विरोध के स्वर से ही!
    और विरोधी स्त्रियों की सबसे बड़ी शत्रु
    भी ऐसी महिलाएँ ही होती हैं।

    मैं सोचती हूँ फिर स्त्री सशक्तीकरण
    पर लिखने वालों ने किसे सशक्त किया है?
    उन्हें जो स्त्री अंगों पर बनी गालियों को
    पढ़कर स्वयं को सशक्त समझती हैं
    या उन्हें जो पुरुषों के चरित्र की परीक्षा
    के उद्देश्य से बलात्कार की योजना
    बनाती हैं।
    या शायद उन्हें जो बेशर्मी को बेशर्मी
    ना कह कर उसे धारण करना सशक्तीकरण
    की दिशा में अपने पग मानती हैं।

    क्योंकि शोषित, उत्पीड़ित, वंचित, परवश एवम् दीन
    स्त्रियाँ तो आदि काल से अपने स्थान पर ही विद्यमान है।

    #poetry #women #tellmeabout

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    जानना चाहती हूँ

    ©nehapriyadarshini

  • nehapriyadarshini 117w

    इक राजा ने राजधर्म के आँचल में छिप कर,
    फूल से कोमल अपनी प्रिया को वन में भेजा था।
    इक राजा ने धर्मराज की गही उपाधि पर,
    चौसर के भावों में अपनी प्रिया को बेचा था।

    इन राजाओं के घर की तो रीत यही युग से,
    फिर भी दादी जाने क्यूँ सपने में रहती थी!

    सपने में राजा आता है दादी कहती थी।

    ©nehapriyadarshini

  • nehapriyadarshini 118w

    छोटी हथेली में कैसे समाती,
    प्रीति तुम्हारी विरह भी तुम्हारा !
    सो अपने लिए माँगे आँसु के मोती,
    तुम्हारे लिये सुख का उजला सितारा।
    सौभाग्य फूले तुम्हारे ही आँगन,
    भले प्रेम घर मेरे आ न सके।
    हम तो विधाता से अपने लिये,
    अन्तिम विदा भी लिखा न सके।

    ©nehapriyadarshini

  • nehapriyadarshini 136w

    आज देती हूँ तुम्हें अधिकार मुझसे प्रेम कर लो।
    कल तुम्हारे देश में शायद मेरा आना न हो।।

    जब पुकारोगे मुझे तुम प्राण के अन्तिम क्षणों में,
    कर न पाऊँगी उल्लंघन देहरी की अनुमति का।
    प्रार्थना के गीत जब भारी पड़ेंगे नेह पर तब,
    मान रखना ही पड़ेगा माँग की उस स्वीकृति का।

    आज देती हूँ तुम्हें शृंगार मुझ पर ही लुटा लो,
    कल तुम्हारे देश में शायद मेरा आना न हो।।

    छीन ले जब भाग्य हमसे प्रेम का अधिकार भी कल,
    आस के अन्तिम दीये को खुद बुझाना ही पड़ेगा।
    तुम मुझे और मैं तुम्हें भूले से भी कल याद न हों,
    प्रेम को कल विस्मृति के गोद जाना ही पड़ेगा।

    आज स्वप्नों का सुखद संसार तुम मन में बसा लो,
    कल तुम्हारे देश में शायद मेरा आना न हो।।

    ~©️nehapriyadarshini

  • nehapriyadarshini 162w

    घुमड़-घुमड़ दुख घन बन छाये, भादो बरसीं दो अँखियाँ।

    रत्न सरीखे स्वप्न बिक गये जीवन-मूल्य चुकाने में,
    असमय मर गयीं ब्याही कलियाँ अपना स्वत्व लुटाने में।
    इक दीपक की जिम्मेदारी सारा तम हर लेना था,
    रोती रही रैन भर बाती दीपक तले अन्धेरा था।

    पुलक-पुलक कोई दिवस बिताये, अपनी तो बैरन रतिया।
    घुमड़-घुमड़ दुख घन बन छाये, भादो बरसीं दो अँखियाँ।।

    ©nehapriyadarshini

  • nehapriyadarshini 163w

    देवालय के देव तुम्हारे सारे साधक झूठे हैं।
    सच्ची है वह मालिन जो नित फूल चढ़ाया करती है।

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    अब कैसे वह बात पुरानी खत में लिख दूँ, तुम्हीं कहो!
    बेघर चिड़िया कब कुन्जों में गीत सुनाया करती है!

    यादों के सिरहाने रोकर सोने वाले से पूछो;
    कितनी रातें करवट-करवट नींद जगाया करती है!

    मेरे दिल आवाज़ न देना कभी बिछड़ने वाले को;
    मरघट की धूलि कब घर में वापस आया करती है!

    मुझे नहीं बनना बोझिल सी पोथी की कविता कोई,
    मुझे बना दो लोरी वह जो ममता गाया करती है।

    मर-मर कर जीवित रहना भी सच है जीने वालों का,
    जीते-जी कब किसे जिन्दगी गले लगाया करती है!

    ©nehapriyadarshini

  • nehapriyadarshini 172w

    Neha