msr_prose

www.instagram.com/just_chill_msr

@kalamsnehi @lafzbaz Loves the slangs of love

Grid View
List View
  • msr_prose 17w

    Word Prompt:

    Write a 8 word short write-up on Nature

    Read More

    Nature has its own beauty, nature itself.

  • msr_prose 33w

    हमें कुछ

    यूं मुस्कुरा के चल दिए, कि जैसे कोई आशियाना न था।
    शिकवा तो बाखुदा था, मगर पक्ष में ज़माना न था।

    सड़कों, बाजारों पे नाम लिखा तो था मुसाफिरों ने हमारा,
    मगर असलियत तो ये थी कि, हमें नाम कमाना न था।

    बड़ी ठोकरें खाई थी हमने इस क़दर की,
    दुनियां छोड़नी चाही, मगर छोड़ने का बहाना न था।

    तन्हा हो गया वो सख्स जिसको हमसे हमनवाई न थी,
    दिल से तो लगाया, मगर दिली रिश्ता निभाना न था।
    ©msr_prose

  • msr_prose 33w

    ???

    चलता हूं इन वासिंदों से दूर,
    जहां जाना निषेध है।
    न जीने की आरज़ू,
    न मौत का मलाल,
    भला फ़िर क्या खेद है?

    कतरा हो आंसुओ का,
    या कतार हो मुसाफिरों की,
    गुज़ारिश हो कभी भी तो,
    शब ओ शाम में क्या भेद है?

    हर कोई है रंगरेज यहां,
    रंगा है बेरंगे, बेमेल वर्ण में,
    हर बशर है दामन-ए-दागी,
    तो क्या काला क्या सफ़ेद है?
    ©msr_prose

  • msr_prose 34w

    इश्क़

    इश्क़ की तौहीन न करो, जीते जी जला देता है।
    ठहरें हुए पानी को नैनों से चला देता है।

    न जाने जब्र है या जबरन , कोई भी न वाबस्ता है,
    कतरे से पैदा आग का सर्प दिल को हरलम्ह डसता है।

    गुमनाम है दीवाना इसमें, बस ये दिल को बहला देता है।
    कालेंजार से पथ को, कोहराम मे टहला देता है।

    बेगानी सी तासीर और, गम भी अनजान है।
    कभी लगे मौत का सामान, तो कभी हैवान है।

    बस इसकी और ताबीर नहीं, क्या पता जबरन हो जाए,
    मुस्कुराते होठों को सैलाब - ए - आंसुओ से धो जाए।
    ©msr_prose

  • msr_prose 34w

    सफ़र

    ज़ख्म दफ़न थे जो दिल में कई,
    आज सांसों से वो बयां हो गए।
    गिरते आंसू भी इश्क़ जान गए,
    और कोरे कागज़ पर स्याह हो गए।

    हवाओं ने भी बुझा दी उम्मीदें कई,
    हसी के पल भी हमसे हया हो गए।
    चुन लिया वो रास्ता, जिसकी मंज़िल न थी,
    बस सफ़र ही सफ़र में हम तबाह हो गए।
    ©msr_prose

  • msr_prose 37w

    ख़ुद से इश्क़।

    इश्क़ है या जुनून, जो खुद से हुआ है।
    धुंधली सी इस फिज़ा में ये उठता धुआं है।

    हर लफ्ज़ है लबरेज़, हैबर है या पिशाच है,
    क़त्ल नहीं हुआ मेरा, बस ख़ून की जांच है।

    जलती हुई शमा, दिल के अंधेरे को तरस गई।
    ख़ुशी में था कि गम में, ये आंखे क्यों बरस गई।

    हल्के हल्के क़दमों से हदफ़ जान लेता हूं,
    ज़िन्दगी को मूर्ख बना, हार मान लेता हूं।

    अकेला हूं इस जहां में, बस ख़ुदा पे विश्वास है।
    तहम्मुल चल रही ज़िन्दगी में, अनोखा अहसास है।

    देखता हूं इस दुनिया को इत्मीनान से ठहर के,
    कभी हलाहल भरे ताने, तो कभी प्याले ज़हर के।

    कभी रुखसत भरी रातें, तो कभी गमनसीब हर पल,
    कभी जंग में था ज़माना मेरा, मगर आज इक बेहतरीन कल।

    हैरत हुई मुझे की यूं, ये किस हवा ने है छुआ।
    ये इश्क़ है या जुनून है, जो मुझे ख़ुद से हुआ।
    ©msr_prose

  • msr_prose 38w

    इस जहां को मैंने बहुत आज़मा के देखा,
    मगर तुझ जैसा कोई ख़ास न मिला।

    ग्रंथो से भी बहुत ऐतबार रखता हूं मैं,
    मगर ताउम्र पढ़ सकूं, वो इतिहास न मिला।

    मेरी नींद में भी होता है ज़िक्र तेरे होने का,
    मगर जो दिला दे सुकूं वो अहसास न मिला।

    छुपा तो मैं भी सकता था अपनी हक की जमीं,
    मगर जिसको छत बनालूं वो आकाश न मिला।
    ©msr_prose

  • msr_prose 38w

    उम्मीदों का भंवर

    उम्मीदों के भंवर में अभी कई गांव बसाने है,
    थोड़ी कहानियां सच है यहां, बाकी सब फसाने है।

    नीर को नीर से तन्हा कर, चाहतों के बांध कसाने हैं,
    हर बशर इश्क़ की कैद में है, आंसुओं के अफसाने है।

    त्यौंहार नहीं तो क्या हुआ, फ़िर भी दीये चसाने है,
    अ़फसुर्दा हैं चेहरे कई, साथ मिलकर हसानें है।

    तृप्त हो चुका इंसां आज का, हर्षों में हर्फ़ धसाने है,
    दुआ को दवा से रूबरू करा, ख़िज़ा में फ़ूल बरसाने हैं।

    खुली किताब है ज़िन्दगी की, पन्नों में चित्र दर्शाने है,
    जवानी के आगामी कल, मुस्कुराहट से उकसाने है।

    लहरें दिखाती है गुस्सा ज्यादा, लहरों के अभिनय को तमाशों से तरसाने है,
    भंवरा गई है लहरें उम्मीद की, इस उम्मीदों के भंवर में अभी कई गांव बसाने है।
    ©msr_prose

  • msr_prose 40w

    सैनिक!!

    एक सैनिक की ज़िन्दगी भी कितनी बेशुमार है।
    देश की सहादत को लेके उसमे कितना खुमार है।
    हां, अपनों से रिश्तों को तोड़ मुल्क की हिफाज़त में खुद में ही कहीं खो जाता है वो।
    छोड़के मकमले बिस्तर के आंचल को, काटों भरी ज़मीन पर सो जाता है वो।
    जब रखी हो जान हथेली पे , उस दिन को रमजान कहता है वो।
    मिट्टी को अपनी महबूबा और वतन को हिन्दुस्तान कहता है वो।
    हर मुसीबत को ज़र्रा समझ टाल देता है वो।
    उगलते बारूद के ज़हर में इंकलाब की गोली डाल देता है वो।
    चलो आज उन शहीदों को चिराग़ से चमन करते है।
    उनकी रूह की खैरियत के लिए सिर झुका के नमन करते है।
    ©msr_prose

  • msr_prose 41w

    कल वो...

    आज मुलाक़ात मुक्कमल हुई एक ऐसे सख्स से,
    कि अनोखा सा दास्तां-ए-क़िस्सा बन गया।
    मैं फितूर में था अपने इश्क़ की रूबाई में यूंकी,
    कुछ सवालों का संघ,मेरी बंदगी का हिस्सा बन गया।

    न ज़रूरत थी आंसुओं कि, न इल्ज़ाम था वफ़ा पे,
    शब-ओ-शाम उसे यूं याद किया, कि चर्चा बन गया।
    पहले नफ़रत थी गुलाब से मुझे, और फ़िर बैर था कांटों से ,
    मगर इश्क़ की बुनियाद पे, शगुफ्ता गुलाब भी ख़र्चा बन गया।

    रंध रहा है दिल मेरा, और बूझ गई है चिमनी ज़िन्दगी की अब,
    इस अंधेरे में घुटा आशिक़ी का मलबा लबोलुआब आ जाएगा।
    तुम दास्तां सुनो बैठ के उन हसीं लम्हों की एक शर्त पे युंकि,
    उसका नाम मत लेना, नहीं तो बंजर जमीं पे भी सैलाब आ जाएगा।

    चलते रहना है, भटकते भटकते यूहीं इन बाजारों में हमें,
    आज खाली हैं हाथ, तो कल काम आ जाएगा।
    निगाहों में रखते है तस्वीर उसकी, और पलकों पे बैठा के उसको,
    आज नहीं तो कल नीचे उतरेगा वो, और एकरोज़ सामने सरे आम आ जाएगा।
    ©msr_prose