mrigtrishna

आदाब अर्ज़ है

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  • mrigtrishna 187w

    इतनी तो इज्जत भी नहीं "मृगतृष्णा" जितनी लूट ली है
    बख्श दे भिखारियों को अब कटोरे में चवन्नी भी नहीं है
    ©mrigtrishna

  • mrigtrishna 187w

    जीवन अमृत.१६

    सुंदरता की धूमिल छवि निर्मल स्वभाव से पूरी हो जाती
    हो स्वभाव में गर गंदगी, तो सुंदरता से पूरी न हो पाती
    ©mrigtrishna

  • mrigtrishna 187w

    ऐ उम्रदराज़ मुजरे अब तेरे सुर में साज़ नहीं है
    महफ़िल के क़ाबिल आज तेरी आवाज़ नही है

    थिरकते पाँव को घुँघरूओं पर अब नाज़ नहीं है
    सिर्फ तबलची ही बचे है तेरे ग्राहक आज नहीं है

    जिस अंदाज में तूमने बेहूदा ग़ज़ल आज कही है
    असल पहचाना है हम सबने तेरी तो जात वही है

    वो जिनको हिंदी भी लिखनी आती ही नहीं है
    कहते है हिंदी को नई पहचान देकर वो गयी है
    ©mrigtrishna

  • mrigtrishna 187w

    पूछो न कोई किस तरह वो रूह में समाया था
    बिछड़ा तो दूर हो रहा अब मुझसे मेरा साया था

    एक ख़्वाब था सतरंगी तितलियां भी भरके आया था
    सब गुल चुराके ले गया दिल वीरां ही करने आया था

    कितना लगता था अपना सा आज दिखता फ़क़त पराया था
    दिल की बगिया उजाड़ने में उसको रहम तलक न आया था

    जिनकी की खातिर, कदमों में दिल तलक बिछाया था
    मौसम ए खिज़ा था ओढ़ के बहारों का दुपट्टा आया था

    यादों को सुखाकर जो बिखरेे पत्ते भी उड़ाकर गया था
    इश्क़ का तूफाँ था दिल नगरी आँधी बनकर आया था

    सोचते है आज इन बेदिलों से दिल क्यूँ लगाया था
    दूर तलक दिल में दिल की वीरानियों का साया था
    ©mrigtrishna

  • mrigtrishna 187w

    "मृगतृष्णा" लिख कुछ ऐसा आत्मा झिंझोड़ दे
    नपुंसकता तालियां भी बजाना ही छोड़ दे

    ग़ैरत का थूक ज़िल्लत की कड़वी स्याही को और दे
    कलम का रुख बेज़ा ग़ुरूर ए पर्वत खुद ही छोड़ दे

    पर्वत का फाड़ सीना स्याही दरिया में जोश है
    रोके न तेरा रस्ता सुहूर ए कलम सरफ़रोश दे

    कुकर्म लेखक उस व्यंग्यकार के सीने में कलम घोंप दे
    वो झूठी ज़ुबाँ जलील शौहरत का कोठा झाँकना छोड़ दे

    सूखी स्याही ओ मंदिरा मंथरा सा बन जाना छोड़ दे
    ऐसा न हो कोई चार आने का तेरा, मुँह ही निचोड़ दे

    रफ्तार रौ में बहता चल कलम से भटकना अब छोड़ दे
    ऐ पाक कलम ओ स्याही "मृगतृष्णा" को रफ्तार और दे
    ©mrigtrishna

  • mrigtrishna 187w

    हमारे तंज महँगे हैं तुम्हे जीने दिया हूँ मैं
    चाहूं तो जंग छेड़ दूँ तुम्हें जहर पीने दिया हूँ मैं

    अभी बस दाँव सुनकर यूं हमें ना आज़माओ तुम
    तुम जैसे के होश-ओ-पस्त पहले भी किया हूँ मैं

    जिस जंगल में रहकर तुम दंगल ज़ोर हो भरते
    वहीं के हर क़दम पर ही हुकूमत भी किया हूँ मैं

    हमारे मुरशिदों को यार को मुरीदों को न भड़काओ
    अदने से भी मुँह खाओगे कि गुर इतने दिया हूँ मैं

    ना कोई ताल बाकी है ना कोई चाल है बाकी
    अब मत बाँसुरी रोना ,कि सुर सातों जिया हूँ मैं

    "मृगतृष्णा" शहर भर का तंज-ए-तीर तरकश है
    मुर्दे तुम रहो मुर्दे, कि मुँह जिन्नों के सिया हूं मैं
    ©mrigtrishna

  • mrigtrishna 187w

    तारों का दर्द रात भर महताब पढ गया
    रातों का ज़ुल्म जानां जज़्बात उड गया

    पड़ा ज़मीं पे लाश मैं सब घेरकर खड़े
    सहरी ने आँख खोली सब बिगड गया

    रात है नशे में , अजी कुछ ना बोलिये
    बोलना अमावस में क्यूँ मुँह सड़ गया

    वादे के मारे तारे आफ़ताब बन रहे थे
    धोखे से कोई आके रातों में जड़ गया

    कितनी ही घुड़कियाँ हैं आफ़ताब को
    बेवफा दिन नही , पहले ही भिड़ गया

    रातों में दाग होता, चाँद दागी देख लो
    लुगाई लगाई आग हर कोई लड़ गया
    ©mrigtrishna

  • mrigtrishna 187w

    ✍मृगतृष्णा

    मेरे इंद्रधनुष के सतरंगी सपने आवाज लगाते है
    पंख उड़ानें एक ऊँची परवाज़ में उड़ना चाहते है

    मैं भी रोशन उम्मीद का टिमटिमाता हुआ तारा हूँ
    चमका जो शिद्दत से आकाश की चुभन पा रहा हूँ

    जिन्हें चमकना न कभी आया उनको न भा रहा हूँ
    कलम से हूँ सम्पन्न तो चमक लिखता ही जा रहा हूँ
    ©mrigtrishna

  • mrigtrishna 187w

    शायरी

    जागती निग़ाहों में ख़्वाब मचल जाते होंगे
    अक्सर रोटी के संग, हाथ जल जाते होंगे

    दुपट्टा भूल, वो मुझे ओढ़ निकल जाते होंगे
    बेवज़ह के ख़्याल मेरे रुसवा यूँ कर जाते होंगे

    दरीचे चीख कर मुझे, आवाज़ लगाते होंगे
    गली में जब मेरा नामोनिशां नही पाते होंगे

    बहते बहते से नैन राह बंजर रह जाते होंगे
    ख़ुश्क नमक के निशा नमक ही मिटाते होंगे

    बैठे बैठे ख़्वाब, बुतखाने में खो जाते होंगे
    आड़ी तिरछी तस्वीरें दीवारों पे बनाते होंगे

    मुक़द्दस ख़ुदा, ये गुनाह ए अज़ीम कर जाते होंगे
    दुआ में बैठ कर बस मेरा नाम अब दोहराते होंगे

    हसीं वो लब अब मुस्कुराने को तरस जाते होंगे
    ज़हन में रहकर जब हम लबो को तड़पाते होंगे

    कैसे कैसे न जाने अब वो मुझको छुपाते होंगे
    लबो तक लाके मेरा नाम होंठ चबा जाते होंगे

    नींद की करवट, मुझे दीवारों में छुपाते होंगे
    ओढ़कर हिज्र तकिया यादों को बनाते होंगे

    देर तलक वो नींद का नामोनिशां नहीं पाते होंगे
    हसीं आँखों पर वो कितना ज़ुल्म अब ढाते होंगे
    ©mrigtrishna

  • mrigtrishna 188w

    #गुस्ताख़ी माफ़
    पहली बार जिस्मानी हुस्न को सौंदर्य कला से सजाने की कोशिश की है��

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    हुस्न

    नर्म ज़िस्म की तपती रेत पे काँपती रेंगती ये उंगलियां
    संगमरमरी मुजसम्मों पर आयत उकेरती ये उंगलियां

    बिस्तर की सलवट पे करवट बदलती ये मुस्कियां
    गूँजती हुई आवाज़ों में, मुस्कुराहट की ये झड़ियां

    बेवक्त बेमौसम बेक़रार बेचैन ये बिजलियां
    शर्म हया समेटे हुए हुस्न की ये तंग गलियां

    बदन की लहरों पे मन से डोलती ये कश्तिया
    हुस्न के सागर में, हसरत भरी, ये डुबकियां

    सुकूँ की मानिंद लबो को लुभाती ये सिसकियां
    काफ़िर बुत ए लब ख़ुदाई, पढ़ती सी ये दुआ

    हया के झरोखों से झाँकती शरारत ये तल्खियां
    जीवन अमृत सा झलकाती, हुस्न की ये नदियां

    किसी पाक बदन ए रूह इबादत है ये मियां
    काफ़िर को भी ख़ुदाई सीखा जाती है मियां
    ©mrigtrishna