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  • mamtapoet 7h

    शब्द ही शब्दों को समझे ,
    शब्द ही घाव करे गंभीर,
    शब्द हरे शब्दों की पीड़ा,
    रिस रिस शब्द ही बहाये नीर।

  • mamtapoet 1d

    #rachanaprati97
    @alkatripathi79, @anusugandh,@jigna_a @anandbarun, @loveneetam,

    सर्वप्रथम @alkatripathi79जी का हार्दिक आभार उन्होंने मंच संचालन की जिम्मेदारी पुन: एक बार मुझे प्रदान की। मेरा विषय है वो मानव मन की सुप्त इच्छाएं जो उन्हें कभी प्रकृति को देख कर आती हैं तो कभी किसी तितली को देखकर, अपनी कल्पना के पंख फैलाये और अधिक से अधिक रचनाएँ प्रस्तुत करे, जिन्हें tag नहीं किया हो उनका भी अभिनंदन है। ��������

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    उदासियों का वजन जरा ज्यादा होने लगा है
    सोचते हैं ख्वाहिशों को थोड़ा सा हवा में
    बिखेर दे।

    दिल के तहखाने में बिछी थी जो मखमली चादर,
    फटी भी नहीं पर कमजोर हो गई
    सोचते हैं, विचारों के धागे से पैबंद लगा दे।

    खर पतवार से भर गई बंजर जमीं यादों की,
    सोचते हैं, एक एक कर नया हसरतों का गुलिस्ता उगा दे।

    बरस बरस के सब बह गया खारा पानी, खाली हो गई है पलकें,
    सोचते हैं,खुशियों की चमक से आँखों में नये बादल बना दे।

    फूल फूल पर लहराके थक गई तितली
    , सोचते हैं
    पूरी धरती पर रंग बिरंगे कुसुम सजा दे।

    काली रातों में न कोई तारों को निहारे,
    सोचते हैं छोटे छोटे आशियाँ जादू से सब के बना दे।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 2d

    तुमने शब्दों की सीमा क्या पार की
    अर्थ ने हमें ,हमारी हदे बता दी।।

  • mamtapoet 1w

    जीवंत थे जो कभी आज बड़े शांत रहने लगे हैं
    मन की पीड़ा सुनो, ये गाँव क्यों अब
    एकांत रहने लगे हैं।

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    नये नये उपचार ढूंढे जा रहे हैं,
    कभी उस तक पहुँचने के लिए सड़क बन रही हैं,
    कभी बिजली, नल की आपूर्ति की जा रही हैं,
    दिल बड़ा कमजोर हो गया है उसका,
    कभी वेंटिलेटर कभी प्लास्टिक का मास्क,
    कभी खुली हवा भी दी जा रही हैं,
    पर न जाने क्यों उसके बचने के आसार कम ही नजर आ रहे हैं
    दिन ब दिन" बूढ़े "होते जा रहे हैं मेरे "गाँव"।

    क्या करे अकेलापन काटने को दौड़ने लगा है,
    आंगन में बिछी खटिया, मिट्टी का चूल्हा,
    सर्दी गर्मी सब मौसम रो रो कर सह रहे हैं,

    बैर के पेड़ ने अपने काँटों को नरम कर लिया,
    तितलीयां धीरे धीरे गुनगुनाती है

    अंबिया के पेड़ की मंजरिया खिल तो खूब रही हैं

    पर आम उदास से आने लगे है,
    बच्चों के पत्थरों की चोट अब उन्हें नहीं लगती,
    कोसते है खुद को, क्यों न प्रेम उनपे बरपाया।

    तालाबों का पानी शांत रहने लगा है
    कमल खूब फैलने लगे हैं,
    तालाब की पाल सूखी ही रहती हैं,
    बदमाश बच्चों की टोली पानी में कुदने नहीं आती।

    बसे अपना फेरा करके संकुचाइ सी चली जाती हैं
    कोई उतरता, चढ़ता नहीं है ना,
    विद्यालय में हुड़दंग कम ही होता है,
    सब मेज कुर्सी समझदार हो गए हैं।

    कुएँ रो रो कर अपने ही नीर से भरे रहते हैं
    मीना, रेणु, कमला, संजू की भोजाई, रत्ना काकी, कोई नहीं है यहाँ,
    अब पनघट हँसता नहीं , बैठा रहता है इंतजार में।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 1w

    देखो!चाय भी है मेरे हाथ में
    और तुम्हारी यादें भी है साथ में,

    बरस रहे है दोनों,
    बादल भी और ये आँखे भी।

  • mamtapoet 1w

    #rachanaprati92
    #rachanaprati93

    @anandbarun sir, @anusugandh didi

    रंग विषय पर आप सभी लेखको की रचनाएँ अत्यंत खूबसूरत और भिन्न भिन्न रंगो से भरी है, जिसमें प्रेम रंग, भक्ति रंग, और नदी, मृत्यु शैय्या पर मांग में सजा लाल रंग, मन हर्ष से भर गया, आप सभी की रचनाएँ पढ़कर।

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    @anandbarun sir की जिंदगी के विभिन्न रंगो को दर्शाती तीन भिन्न भिन्न रचनाएँ, @anusugandh didiकी हास्य, श्रृंगार वीरता और नवरस के रंग से सजी रचना, @greenpeace767 द्वारा प्रियतम के आने से सजे रंग का वर्णन करती हुई रचना, @goldenwrites_jakir ji और @dubeyjii_14 की मोहबत के रंग से सरोबार रचना, @loveneetam ji और@diamond49 जी की कृष्ण भक्ति के सुंदर रंग से सजी रचना ने मन मोह लिया। @gauravs ji ,और@aryaaverma12 की बेरंग जज्बात और मन चाहा रंग न मिलने की टीस, @shayarana_girl ने सपनों की सतरंगी दुनिया पर अपनी कविता में प्रकाश डाला, @piuwrites didi की सपनों एवं कलम की रंगीन दुनिया के रंगो को सजाया। @psprem ji द्वारा प्रेम के रंग को सर्वोपरि बताना, @amateur_skm और@jigna_a दीदी की गजल ने हृदय छू लिया@alkatripathi79 द्वारा मृत्यु शैय्या पर और नदी, पुष्प तितली के द्वारा वर्णित अद्भुत रचनाओ ने भी दिल छू लिया।
    सभी रचनाएँ मेरी नजरों में सर्व श्रेष्ठ है, फिर भी किसी एक को चुनना है सो, मैं उन्हें हार्दिक बधाई देना चाहूँगी जो अभी इस रचनाप्रति में नये सम्मिलित हुए हैं।
    आज के विजेता है @jigna_a didiजी वो इस श्रृंखला को आगे बढ़ाये, मुझसे कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करे।

  • mamtapoet 1w

    रंग

    *सब रंगो के पंछी ,
    उड़ान भरे तेरे भीतर,
    तनिक भी तू बैचैन हुआ,
    हो गए सब रंग तितर बितर ।

    * पहला रंग बड़ा पवित्र था,
    जो चढ़ा था माँ के प्रेम का,
    धीरे धीरे इतना रंग चढ़ा दुनियादारी का,
    पुतला बनके रह गया है अब तू
    मिले जुले सब रंगों की हिस्सेदारी का।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 1w

    सर्वप्रथम आप सभी लेखको को नवरात्रि स्थापना की हार्दिक शुभकामनाएं,माँ अम्बे आप सभी को सुख,समृद्धि एवम अपना आशीर्वाद प्रदान करे।
    @anandbarun sir का हार्दिक आभार जो उन्होंने इस श्रृंखला को आगे बढ़ाने हेतु मुझे अवसर प्रदान किया। प्रकृति ने हमें कई रंगों की सौग़ात दी है, रंगीन फूल, रंगीन नज़ारे, इंद्रधनुष के रंग और हाँ कलम के भिन्न भिन्न रंग, स्याही का रंग तो एक ही होता है पर लेखक उस स्याही में अपनी कलम को डुबोकर अलग अलग रंग के शब्दों का एक रंगीन संसार रचा देता हैं अपनी कविता में, कहानी में।
    " रंग " यही आज का विषय है, आप सभी अपने मन के रंगो को अपनी रचना में उतारे और सभी को अलग अलग रंग देखने को मिले, पुन: अपनी शुभकामनाओ के साथ आप सभी से अनुरोध है कल साँझ तक की बेला तक अपनी रचनाएँ भेजे।

  • mamtapoet 1w

    पानी( नीर)

    नीर भरे नैनन से एक बाप करे गुहार
    अगले जनम जो बेटी दीजो,
    तो तुम भी लिजों अवतार।

    पिछले माह की बीस को छ बरस की
    हुई थी बिटिया,
    हमरी गुड़िया को दिलावत ही लाये थे
    हम नीली आँखों वाली गुड़िया।

    डेढ़ बरस बाद अब ही हंसती हुई स्कूल थी जावत,
    खून से लथपथ, झाड़ियों में मिली औरन आवत।

    हिम सा होई गया हृदय, जड़ हो गए पाँव,
    कुछ पहर में ही वीरान हुई गवा, मेरा हँसता पूरा गाँव।

    बादल भी गरज गरज के बरसा,
    नीर चहुँ ओर,पर किसी के नैनन एक बूंद दया को तरसा।

    आज कहे पुलिस पिये हुए था वो छोरा भी रंगीन ही पानी,
    काहे लोगन की अँखियों से निकल कर बोतल में
    समा गया पानी।

    बंजर हो गये सबके मनवा, मर गया आँखों का पानी,
    ओंस की बूंद थी मेरी गुड़िया, आज गंगा में
    मिल गया उस बूंद का पानी।।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 2w

    बहुत खूबसूरती से तुम बयां कर लेते हो,
    मुझे और मेरे रूप को।
    मेरे रूप श्रृंगार के एक एक मनके को,
    शब्दों में पिरोकर माला बना लेते हो।
    और बन जाती हैं उपमा, अलंकारों से सुसज्जित श्रृंगार रस की कविता।
    और पूरा हो जाता हैं तुम्हारा फर्ज,
    मेरे अधरों पर मुस्कान लाने का।
    हाँ खिल जाती है मेरे चेहरे पर हंसी,
    पर बस क्षणिक ही होती हैं वो,
    चाहकर भी ज्यादा देर नही मुस्कुरा पाती हूँ,
    क्योंकि मेरा रोम रोम खिल उठता यदि तुम,
    मेरे नैनों को मृगनयनी न लिखकर,
    सूक्ष्म, पारखी, लिखते जो अदृश्य बाधा को भी भांप कर उससे निपटने का रास्ता खोज लेते हैं।

    अपनों के चेहरे की मुस्कान को ही मेरे लबों की सच्ची मुस्कान बताते।
    पीड़ा, दुःख उदासी को दूर करके, अपने मर्म
    को बिना व्यक्त किये, निश्छल भाव से भरे मेरे "हृदय "
    को लिखते तुम कोमल।
    बाहरी चर्म के वर्ण के बजाय मेरे भीतरी उज्जवल सोच और विचारो के वर्ण को तुम गौर वर्ण लिखते।
    काश के तुम बिना मेरे बताये मेरे अधूरे छूटे अल्फ़ाज को पूरा पढ़ पाते।
    कोमलांगी ही नहीं मेरे विपदा के समय के शांत गंभीर भाव और जरूरत पड़ने पर लिए मेरे रौद्र रूप को अपनी कविता मे जगह देते।
    क्योंकि वही होतीं मेरी सच्ची पहचान एक स्त्री के रूप में,वास्तविक श्रृंगार स्त्री के आंतरिक गुणों में ही निहित हैं,जो उसे सु सज्जित करते है।
    तुम्हारा लिखना सार्थक हो जाता और मेरा पढ़ना, और खिलखिलाकर हंसती तुम्हारी कविता।
    क्योंकि कविता भी तो एक स्त्री ही है ना।।
    ©mamtapoet