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  • mamtapoet 28m

    माना जिंदगी के सफ़र की
    आख़िरी मंजिल है मृत्यु
    इस बात से किसी को इंकार नहीं।
    पर ये जो मिल रही हैं आजकल अकाल मृत्यु
    इस के लिए कोई शख्स कभी तैयार नहीं।।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 1d

    नहीं उठाऊ मैं लाज का घूँघट
    याद दिलाये ये तेरे घर की चौखट।

    तेरी पाक नजरों की सीमा भी जरा बता
    मर्यादा पुरुषोत्तम का जमाना भी अब रहा कहाँ।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 2d

    सम विषम परिस्थितियों से ये जीवन पथ सजा
    कभी चुन ले किसी के तु शूल, कभी बिछा दे फूल
    कभी उसकी मुस्कान को अपने लबो पे सजा।
    खुद को माफ कर कभी, गलती कभी औरों की भूल।।

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    गमों की सिलवटे जिंदगी की चादर पर बहुत
    पर माथे पर शिकन न रखती हूँ
    नजरों के आगे सुंदर नज़ारे भी तो बहुत
    उन्हें देख मुस्कुरा लिया करती हूँ।

    क्यों शिकायतें ही करू हर वक़्त
    खुदा को शुक्रिया भी अक्सर कर लेती हूँ
    समय शिक्षक हैं बड़ा ही सख़्त
    गिर पड़ के इंतिहाँ पास कर ही लेती हूँ।

    क्यों लड़ कर औरों से मन में कलेश करू
    खुद ही विचारों के समंदर में गोते लगा लेती हूँ
    हार जीत का किसी से क्यों द्वेष रखूँ
    जीतकर खुद से, कभी हंस और कभी रो लेती हूँ।

    परिस्थितियों पर मात पिता के संस्कारों का
    ताल मेल बिठा ही लेती हूँ
    कभी बेस्वाद हो तो मुँह बना लेती हूँ
    वैसे अक्सर शहद सी मिठास अपने व्यवहार में
    घोल ही लेती हूँ।

    मीन मैख तो बहुत हैं हर शख्स में
    पर नजरों से अक्सर नजारों को ही
    बदल लिया करती हूँ।
    काँटे को न देखकर गुलाब की महक
    से जीवन को सुगंधित कर लिया करती हूँ।

  • mamtapoet 3d

    जब मैं होऊँगी 53 की तुम होगें 55 के
    साथ बैठ के किस्से याद करेंगे बचपन के
    छड़ी होंगी तुम्हारे हाथों में
    ऐनक चढ़ी होगी मेरे कानों पे
    मैं सहारा तुम्हारा बन जाऊंगी
    बोलो तुम नजरें मेरी बनोगे ना।

    दफ्तर की ना तुमको जल्दी होगी
    ना कोई फाइल की चिंता।
    आराम से मैं सारे काम करूँगी
    होगा हर पहर हमारा।

    चुरा के बीते लम्हों को थोड़ा थोड़ा हम हँस लेंगे
    रोने वाले पलों पर कंधे पर तेरे सर रख लेंगे।
    जिम्मेदारी सब हो जायेगी पूरी
    जियेंगे हम फिर से वो दुनिया अधूरी।

    ना वो चहल पहल रहेगी बच्चों की आंगन में
    सावन के बाद पतझड़ का मौसम होगा बागन में।
    शौक मेरे तुम याद दिलाना
    तुम्हारी रुचियों का मैं रखूंगी ख्याल,
    थपकी देकर तुम मुझे सुलाना
    तुम्हारे हर सवाल का मैं बनूँगी जवाब।

    दवा और मरहम एक दूजे के हम बनेंगे
    घाव बहुत हैं मन पर, अब अपने जख्म सिलेंगे।

    चांदी होंगी बालों में,
    सुकूँ के जज़्बात होंगे जुबां पर
    झुर्रियाँ होगी चेहरे पर
    तजुर्बो की दौलत भरी होंगी बैंकों में।

    जब मैं होऊँगी 53 की तुम होगें 55 के
    बोलो पास बैठ के बातें करोगे अपने मन की।।

  • mamtapoet 4d

    काली कलम,
    तुम और हम।
    सफेद कागज,
    और ढेर सारे रंगीन जज्बात।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 4d

    पूनम में भी अँधेरा गनघोर है
    चहुँ ओर अतृप्त आत्माओ का शोर है
    घर में भी और बेचैनी चहु ओर है
    हर मन में अंजाना सा एक खौफ है
    प्रार्थना करे हम एक दूजे के लिए
    वक़्त की यही मांग पुरजोर है
    साथ दे सभी इस मुश्किल घड़ी में
    के मानव जाति ही पड़ी खतरे में
    अपनों से अपने बिछड़ रहे
    शव दाह संस्कार को तरस रहे
    कल जिनसे मुस्कुराकर मिले
    वो आज तस्वीर में हैं बदले
    मन को निराशाओं ने आ घेरा है
    लगता दूर बड़ा सवेरा है।

    ,""बादल ये तमस के भी छट जायेंगे
    राह के कांटे भी हट जाएंगे
    है मानव तू न हो अधीर
    समय सब बदलेगा , रख थोड़ा धीर।। ""

  • mamtapoet 5d

    हवाओं में थोड़ी उथल पुथल है
    थोड़े समझदार हो जाइये।
    तूफां आने का संदेशा है
    थोड़े खबरदार हो जाइये।
    बुझ रहे है बेवक़्त कई
    जलते चिराग इन हवाओं से
    प्रार्थना है सबसे यही कि
    समझदारी से काम कीजिये
    हरने आई ये बंद हवाएं
    चैन सुकूँ जिंदगी का
    सबकुछ छोड़ के पहले
    खुद के पहरेदार हो जाइये
    उड़ने लगी रंगत देखो
    इन सतरंगी फिजाओं की
    कैद करके खुद को घर में
    अपनो के साथ वक़्त बिताइये
    अजब सी जंग छिड़ी है जिंदगी की
    जीत न सकते दौड़ के
    ठहर के अपने मुकाम पर
    जीत के दावेदार हो जाइये।

    अर्थियों को कंधे नसीब न हो रहे
    अपनों के शव अपनों को तरस रहे
    वक़्त नहीं ज्यादा ये विषाणु दे रहा
    मान लीजिये जो है सही कहा
    खेलते, बोलते जो थे कभी
    तस्वीर में वो नज़र आये अभी
    हैं आस पास ही कहीं छुपा
    पर आँखों से ये दुश्मन नज़र न आ रहा
    घात लगाए बैठा ये आठों पहर
    बिजली गिर रही ये सबपे बन कहर।

  • mamtapoet 1w

    जिंदा जिस्म में मुर्दा जज़्बातों सा रहता हूँ
    इंसानों की बस्ती में लाशों के साथ रहता हूँ।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 1w

    अजीब दौर चल रहा है मन की तन्हाइयों ने
    अब बाहर भी इंसा को तन्हा कर दिया है।

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    आजकल सुनना कोई नहीं चाहता है
    पर सुनाना सब चाहते हैं।
    तन्हा मन को संबल कोई नहीं देता हैं
    पर एक दूजे को तन्हा करना सभी जानते हैं।
    ©mamtapoet

  • mamtapoet 1w

    तुम्हारी साँसों के उतार चढ़ाव से,
    तुम्हारे दर्द को महसूस कर लेती हूँ,

    अनपढ़ हूँ पर तेरे चेहरे के भाव से,
    हर शिकन की नस को पढ़ लेती हूँ।।