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  • loveneetm 3h

    सतर्कता

    अपनें हाथों खड्ग उठाकर,
    करें जगत संहार,
    महामारी के काल में,
    करों उचित व्यवहार।

    गलत धारणा धर्म की,
    गलत भाव विचार,
    लोकाचार के अपवादो से,
    बिखर गया संसार।

    रोगी को ना दवा मिलें,
    ना वैद्य को मिलें उपचार,
    अनियमितता अव्यवस्था से,
    भ्रमित हुआ घर बार।

    मरघट पर मेला लगें,
    जले लाश का ढेर,
    फिर भी जग को समझ नहीं,
    व्यर्थ हृदय में बैर।

    मानवता का अंत निकट,
    निकट पतन का काल,
    परिस्थिति विकट यहाँ,
    सब जन है बेहाल।

    हाथ जोड़ विनती करूँ,
    करों जतन सब लोग,
    नियमों का पालन करों,
    दूर करों यह रोग।
    ©loveneetm

  • loveneetm 3h

    कृष्ण भाव

    गोविंद कहों गोपाल कहो,
    कहों उसे घनश्याम,
    जो जिस भाव से प्रेम करे,
    उस भाव के दाता श्याम ।

    सखा कहों या भ्रात कहों,
    कहों जगत के नाथ,
    नृप कहों,तन प्राण कहों,
    कहों पिता या मात।

    हर रूप में बनवारी,
    सदा निभाएँ साथ,
    भक्ति भाव हृदय रहें,
    तो गोविंद थामें हाथ।

    प्रेम कहों,स्वामी कहों,
    कहों गुरू भगवान,
    पुत्र समझ कर लाड़ करों,
    मेरे भोले है घनश्याम।

    राधे उनकी प्रेयसी,
    यशोदा उनकी मात,
    नंदलाल के राजकुँवर,
    भक्त के रहते साथ।

    मथुरा रहें या द्वारका,
    या रहें प्रभु गोलोक,
    भक्त की खातिर मधुसूदन,
    हर ले संकट रोग।
    ©loveneetm

  • loveneetm 5h

    यशोदा-देवकी

    सुनों देवकी महारानी,
    कहें यशोदा मात,
    मैं ग्वालन वृंदावन की,
    करूँ आज फरियाद।

    जब से जाना कृष्ण मेरा,
    तेरी है संतान,
    तब से मन आहत मेरा,
    लगें कही ना ध्यान।

    कह दो तुम अपने मुख से,
    कि झूठी है यह बात,
    कान्हा मेरा लाला है,
    और मैं ही उसकी मात।

    दंड दो या प्राण हरो,
    सब मुझको मंजूर,
    पर कह दो हे!महारानी,
    यह सत्य करें मजबूर।

    मैंने अपने लाला को,
    किया प्रेम भरपूर,
    तुम ही कहों कैसे उसको,
    कर दूँ खुद से दूर।

    रो रोकर मुर्छित हुई,
    नंदरानी कह बात,
    सुन व्यथा तब देवकी,
    समझे सब हालात।

    कहें देवकी बहन सुनों,
    मैं ही कान्हा की मात,
    पर मुझसे ज्यादा हक तेरा,
    सब जानें यह सच बात।

    मत आहत हो बहन प्रिय,
    मैं समझू तेरी पीड़,
    मैंने भी विरह सहा,
    चुभा काल का तीर।

    इस कारण जग यह कहें,
    कान्हा है नंदलाल,
    उसकी मात यशोदा है,
    और कान्हा उसका गोपाल।
    ©loveneetm

  • loveneetm 9h

    तन्हा ख्वाब

    सिमटते ख्वाब देखें है,
    दबी आँखों से ऐ!हमदम,
    अंधेरा ही अंधेरा था,
    जहान में ऐ! मेरे हमदम।

    तुझे मालूम था सबकुछ,
    कि हम नाकाम है तुम बिन,
    सहारा बनके क्यूँ मेरा,
    छोड़ा साथ ऐ!हमदम।

    ना जी पाएँ,ना मर पाएँ,
    ना कोई आस बाकी है,
    तन्हा ही जीना था,
    तो आएँ पास क्यूँ हमदम।

    रह लेते अंधेरों में,
    बिना तेरे सहारे के,
    अब मुश्किल है जी पाना,
    तेरे बिन ऐ!मेरे हमदम।
    ©loveneetm

  • loveneetm 21h

    कृष्ण अनुरोध

    दो आज्ञा अब राधिका,
    यह अंतिम अपनी भेट,
    कर्तव्यो का बोध है,
    पर जीवन से है खेद।

    हम दोनों एक प्राण है,
    फिर भी ना दोनों साथ,
    कर्मो ने है बदल दिए,
    हम दोनों के हालात।

    वृंदावन की स्मृतियो की,
    मन चला रहा बारात,
    जाने दो हे! राधिका,
    छोड़ दो मेरा हाथ।

    राधा सुन पत्थर भई,
    हृदय उठे जज्बात,
    क्या बोलें श्री कृष्ण अभी,
    समझ ना आएँ बात।

    गर चाहें तो प्राण ले,
    पर ना छोड़े हाथ,
    विरह का ही सोचकर,
    काँप रहा मन आज।

    दोनों के मन रो रहें,
    जैसें बरसे बरसात,
    इस युग में हे!राधिका,
    इतना ही था यह साथ।

    कल्पना कर दृश्य वो,
    रोए मन दिन रात,
    सृष्टि के दो सकल रूप,
    राधा वल्लभ श्री नाथ।
    ©loveneetm

  • loveneetm 22h

    इंतजार

    हर गुजरते वक्त के साथ,
    गुजरता है एक पल इंतजार का,
    ना जाने क्यूँ, किसलिए,
    बेइंतिहा मोहब्बत करता है दिल तुमको,
    कि ना कटते दिन है सुकून से,
    ना चैन रातों को है,
    अलग ही माहौल है आजकल,
    फुर्सत मिलें तो सोचने बैठूँ,
    मेरे जहन से तो तू कभी,
    गया ही नहीं,
    संभल जाती हूँ खुद बा खुद,
    हर गुजरते वक्त के साथ,
    गुजरता है एक पल इंतजार का।
    @लवनीत मिश्र

  • loveneetm 1d

    मन पंछी

    मैं पंछी बन उड़ रही,
    चली गगन की ओर,
    खुला गगन बोलें मुझसे,
    दुःख व्याधि सब छोड़।

    पंख लगाकर सपनों के,
    घूम रहीं हर ओर,
    मंजिल की बस चाह हृदय,
    जो बंधन दे सब तोड़।

    खुला गगन अविरल धारा,
    दिखे कहीं ना छोर,
    थके पंख तो सोचे मन,
    कहाँ है इसका ठौर।

    तभी हृदय द्रवित होकर,
    मुडे धरा की ओर,
    अपनों का संग डाल है,
    जैसे रजनी भौर।

    सपनों का आदर करों,
    पर दो मत अपने छोड़,
    सबको लेकर संग चलो,
    नवजीवन की ओर।
    ©loveneetm

  • loveneetm 1d

    गोवर्धन

    दानघाटी से अनुमति लेकर,
    चलें भक्त गोवर्धन को,
    परिक्रमा कर गिरिराज का,
    सब जन चाहें मोक्ष मिलें।

    अनयोर में पहुँच श्रद्धालु,
    गोविंद सुरभि कुण्ड गए,
    गोवर्धन के आराधन से,
    मन आनंद संतोष जगे।

    ऐरावत नारद अप्सरा कुण्ड,
    प्रतिक है भक्ति के,
    कृष्ण प्रेम लीला सुनकर ही,
    वैष्णव तन को प्राण मिलें।

    पुछरी के लोठा मे हनुमंत,
    लिखें हाजिरी आने का,
    मुखारविंद के दर्शन से ही,
    जीवन को आनंद मिलें।

    श्रीनाथ की पावन भूमि,
    अद्भुत रूप श्रृंगार वहाँ,
    जतीपुरा से राधाकुण्ड तक,
    मन के भीतर प्रेम खिले।

    राधाकुण्ड से मानसी गंगा,
    चल श्रद्धालु नमन करें,
    पूरी कर के फिर परिक्रमा,
    भक्तो को आनंद मिलें।
    ©loveneetm

  • loveneetm 1d

    काली माँ

    माँ काली तेरे उग्र रूप में,
    मुझको दिखता प्यार है,
    बच्चो के लिए मात भवानी,
    तू ही तो संसार है।

    सौम्य रूप धर ममता करती,
    उग्र से करें संहार है,
    हे! जगजननी मात भवानी,
    करती बेड़ा पार है।

    कृष्ण वर्ण गले मुण्ड माला,
    हाथ खड्ग तलवार है,
    सुनों अर्ज जगदम्ब भवानी,
    विनती बारम्बार है।

    रक्त रंजित नयन विशाला,
    अधर पर गरज पुकार है,
    नमन करों स्वीकार भवानी,
    तू ही तो संसार है।।
    @लवनीत मिश्र
    ©loveneetm

  • loveneetm 1d

    चैत्र नवरात्रि

    हृदय कमल पर बैठी माता,
    हे!जगजननी दया करों,
    कृपासिंधु देवी भवतारिणी,
    कमल आसिनी दया करों।

    चैत्र मास का यह नवरात्रा,
    नव दुर्गा को अति प्रिय,
    नमन करों स्वीकार भवानी,
    हे!दुःख हारिणी दया करों।

    कलश कलवा रोली मोली,
    नव कन्या का रूप धरो,
    नवमी के दिन हे!जगतारिणी,
    भक्तो के दुःख दूर करों।

    देव ऋषि यहाँ सब जन गाए,
    महिमा तेरी अति प्रिय,
    माँ तुम हो ममता की मूर्त,
    हे!भव मोचिनी दया करों।
    @लवनीत मिश्र