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  • love_unlimited 1d

    Self discovery, self enlightenment,

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    खुद को जानना

    मनुष्यों में खुद को जानने की ख्वाहिश को जगाने के लिए ही खुदा को इस धराधाम पर अवतरित होना पड़ता है। यह इसलिए होता है क्योंकि मनुष्य खुद की खुदी में नहीं रहकर अपने रूहानी पथ से विलग हो जाता है। सृष्टि चक्र में चलते चलते उसमें यह आकांक्षा पैदा हो गई कि मैं दूसरे लोगों को जानूं और दूसरे लोग मुझे जानें। जरा विचार करें। किसी भी मनुष्य में यह आकांक्षा क्यों पैदा होती है कि दूसरे लोग उसे जानें? इसका केवल और केवल एकमात्र कारण यही है कि मनुष्य खुद के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता है। जिस दिन कोई आत्मा खुद को जान लेती है उसी दिन उसकी यह आकांक्षा कि दूसरे मुझे जानें, तिरोहित हो जाती है। क्योंकि मैं कौन हूं (खुद) को जानना बहुत अद्वितीय प्राप्ति है। इसकी कोई तुलना ही नहीं है।
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  • love_unlimited 4d

    चांद की खूबी

    *क्या कभी आपने रात की एक बहुत विशेषता को समझा और जाना है? रात एक साथ दोनों को स्वीकार करती है। चन्द्रमा को भी और चन्द्रमा के दाग को भी। सूर्य की बात ही मत पूछो। वही तो चन्द्रमा को चांदनी देने के निमित्त बनता है और कभी अपनी विशेषता का बखान तक भी नहीं करता। बल्कि सूर्य तो चांद को स्वतंत्र भी छोड़ देता है उसके अपने स्वतंत्र समय और चांदनी बिखेरने के अहोभाव के साथ। चांद की एक और विशेषता आपने कभी समझी है कि नहीं? सूरज की धूप को भी चांद सौम्य बनाकर चांदनी के रूप में हम तक पहुंचाता है। ओम सूर्याय नमः। ओम चंद्रमाय नमः। ✋*
    ©love_unlimited

  • love_unlimited 4d

    शरद पूर्णिमा

    *शरद पूर्णिमा है आज। आज के दिन चांद का पृथ्वी पर विशेष प्रभाव पड़ता है। आज यदि कोई व्यक्ति चाहे तो विधिपूर्वक पृथ्वी पर चांद के प्रकंपनो के डिफरेंट रेजोनेंस को स्पष्ट अनुभव कर सकता है। इसका प्रभाव ज्योग्राफिकली तो पड़ता ही है। इसके इलावा चन्द्रमा के रेजोनेंस का प्रभाव मनुष्य के मन और शरीर तथा सृष्टि के समस्त प्राणी जगत पर पड़ता है। आज रात इसे अनुभव करने में सहजता होगी। अलर्ट होकर इसे अनुभव करने का पुरुषार्थ करें।*
    ©love_unlimited

  • love_unlimited 5d

    No end of knowledge

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    No end of knowledge

    ज्ञान का कोई अन्त नहीं, लेकिन फिर भी है।

    *मन बुद्धि मनुष्य के पास ऐसे यंत्र हैं जिनकी उपयोगिता की गुणवत्ता लगातार बढ़ती ही जाती है। मन बुद्धि के द्वारा निरन्तर नया नया चिंतन प्रगट होता ही रहता है। अतीत में हजारों वर्षों से ऐसा होता ही रहा है। सिर्फ मन बुद्धि को नए नए चिंतन को प्रगट होने की सुविधा मिलनी चाहिए। मन बुद्धि को प्रगट होने की वह सुविधा मिलने का हमारा भावार्थ है कि नई नई परिस्थिति, समय स्थान, भिन्न भिन्न लोगों का मिलना तथा मनुष्य की स्वयं की स्मृतियां और श्रुतियां का मानस पटल पर उभर कर आना। ज्ञान के प्रकार अनेक हैं। मानसिक अवधारणाएं वैरायटी है। ज्ञान का संबंध विचार से है। अभिव्यक्ति का भी सम्बंध विचार से है। विचार का सम्बंध संसार से है। संसार का सम्बंध विचार से है। जब तक संसार है तब तक विचार की प्रक्रिया रहेगी ही। जब तक विचार है तब तक संसार रहेगा ही। विचार का नियंत्रण योग के द्वारा ही हो सकता है। विचार को योग के द्वारा ही विसर्जित किया जा सकता है। दूसरा कोई भी उपाय नहीं है। हां, वह अलग बात है कि जिन आत्माओं के मन बुद्धि का जब एक सैचुरेटेड प्वाइंट (सोखने की आखिरी क्षमता) आ जाता है, या मनमनाभव (योग) की एक अवस्था आ जाती है, तब केवल उन आत्माओं के लिए ही ज्ञान का अंतिम बिंदु आ चुका होता है। वे ज्ञान की अभिव्यक्ति नहीं करती। सैचुरेटेड प्वाइंट वाली आत्माओं की कुछ बोलने या कहने इच्छा नहीं रहती। योग की एक निश्चित अवस्था प्राप्त कर लेने वाली आत्माएं मौन साक्षी हो जाती हैं। अन्यथा तो चिंतनशील आत्माओं के मन बुद्धि से ज्ञान रूपी पत्ते निकलते ही रहते हैं।

  • love_unlimited 5d

    पवित्र स्थिति क्या है। इसके अन्य आयाम क्या है

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    पवित्रता

    "सम्पूर्ण पवित्रता"। मन की पूरी तरह से मनमनाभव: अवस्था ही सम्पूर्ण पवित्रता की स्थिति है। मनमनाभव: का भावार्थ है कि मन-बुद्धि की मर्ज अवस्था। मन अर्थात सोचने चिन्तन करने की योग्यता जब एक निश्चित आयाम में काम करती है उसे ही हमने बुद्धि कह दिया हुआ है। पवित्र स्थिति का अनुपात या परसेंटेज कैसे पढ़ता है? तीन तरह से आत्मा की पवित्र स्थिति में वृद्धि होती है। क्रमश: स्तर इस तरह हैं :- पहली स्थिति है - राजयोग की उच्चतम अवस्था के अनुभवों के द्वारा आत्मा की पवित्र स्थिति सबसे ज्यादा बढ़ती है। दूसरी स्थिति है - अध्यात्म ज्ञान की गहन समझ। चिन्तन मनन और गहन बौद्धिक समझ से भी मन मनमनाभव की स्थिति की ओर उन्मुख होता है। तीसरी स्थिति है - किसी भी प्रकार की भावपूर्ण सेवा के द्वारा भी पवित्र स्थिति बढ़ती है। क्योंकि सेवा से दो बातें होती हैं। एक पारस्परिक कार्मिक हिसाब सेटल होते हैं। दूसरा पॉजिटिव वाइब्रेशन प्राप्त होते हैं जिसे हम दुआएं कहते हैं। हिसाब सेटल होने और दुआओं के अदृश्य प्रभाव से भी आत्मा मनमनाभाव की स्थिति (अंतर्मुखता) की ओर आगे बढ़ती है। आत्मा को मनमनाभव होने में सहजता होती है। चेतना की इन तीन पवित्र स्थितियों को यदि ऊपर से नीचे की ओर क्रमवार कहें तो कह सकते हैं कि सबसे पहला नम्बर है योग। उसके बाद दूसरा नम्बर है ज्ञान की गहन समझ। उसके बाद तीसरा नम्बर है शुद्धतम चित्तदशा से की हुई सेवा से प्राप्त (दुआएं)। हो सकता है कि कई चिंतकों को इस विवेचन को समझने में कठिनाई हो। वे इस पर और अधिक गहरे चिंतन करें। समझ में आ जाएगा। चिंतकों को इतना ध्यान रहे कि आत्मा की पवित्र स्थिति एक मजबूत पृष्ठभूमि और भावभूमि तो अवश्य रूपेण होती है। यह भी स्वयं में बहुत बड़ी महान स्थिति होती है। इसके इलावा भी स्थितियां और भी हैं। इस पवित्र स्थिति के धरातलीय उपयोग भी होते हैं। इसे पृष्ठभूमि बनाकर इसके विभिन्न प्रकार के उपयोग के बाद आत्मा की पवित्र स्थिति का प्रगटीकरण विभिन्न प्रकार से हो सकता है, होता है।

  • love_unlimited 1w

    Food energy, food converts into the chemical energy, chemical energy stimulstes our neurones in the brain. Through our neurones we feel the energy.

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    World Food Day

    आहार को जितना ज्यादा हम शुद्ध और सूक्ष्म करते जाते हैं उतना ही ज्यादा इससे प्राप्त ऊर्जा हमे सूक्ष्म अनुभव कराने में सहयोगी होती है। इसलिए अन्न (भोजन) "ब्रह्म" की संज्ञा दी हुई है। अध्यात्म के अनुरागी को आत्मिक जगत के अनुभवों की यात्रा को आरम्भ तो करना होता ही है तो कहीं से तो शुरू करना ही पड़ेगा। यदि आहार की शुद्धतम सूक्ष्मतम ऊर्जा के उपयोग और प्रयोग से शुरू करें तो ज्यादा सहजता से अलौकिक अनुभवों में प्रवेश किया जा सकता है। अलौकिक अनुभवों में प्रवेश करने के लिए ऐसी भी विधियां होती हैं जिनमें आहार की सूक्ष्म ऊर्जा के संतुलन की बात नहीं होती। उनमें तो सीधे सीधे ही छलांग लगाई जा सकती है। लेकिन वे प्रक्रियायें कठिन जटिल होती है। वे विधियां श्रमसाध्य हैं। इसलिए वे विधियां सबके लिए नहीं हो सकती है। कुल मिलाकर विषय का मर्म इतना है कि आहार की शुद्ध और सूक्ष्म ऊर्जा अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। यह हर क्षेत्र में उपयोगी है। विवेक कहता है कि इसे हर हालत में संतुलित बनाकर ही रखना चाहिए। इसको सम्यक संतुलित रखने के लिए क्या करें? आहार के विषय में आयुर्वेदिक आधारभूत ज्ञान का होना जरूरी है। आवश्यक और उपयोगी आहार का स्वयं पर प्रयोग करना जरूरी है। अनासक्त भाव से आहार का उपयोग उपभोग करने से इसे संतुलित बनाकर रखा जा सकता है।
    ©love_unlimited

  • love_unlimited 1w

    Accept adapt the newness. Life is a flux.

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    Accept adapt newness

    Always believe in forgetting the past and accepting the new. Remembering the past means depriving yourself from the goodness of present moments. Remembering past means missing the divine experiences happen in the new dimension of life. We must always believe in our inner self. Listening to the real and right voice of our conscience within is also most important. Whatsoever it is, it will definitely make us more lightest, more experienced, more wise, more confident and more contented.

    It is the universal law that everyone has to welcome the new experiences at every step. Scientifically it has been proven that the metamorphosis happens invisibly. But by the way, we can't see the newness moment to moment happens within and without?

    Whatever was there yesterday is not the same today as it was yesterday. Whatsoever it is as on today will not be tomorrow the same as it was. The changes happen moment to moment but we can't experience because of our limited capacity of physical senses and narrow attitudinal mind sets. We must accept this scientific reality.

    We must remember the principle theory of evolution. It recommends that there is no halt in the flow of consciousness as well as the universe. The consciousness keeps on moving. It keeps on evolving from downwards to upwards, from lower frequency levels to higher frequency levels. Therefore never bother about the past. Never get stuck in the past. It has already been the history. Future has not yet come. It is the mystery. Just think of the Divine and divine experiences. Life is a flux. The flux is actually the law of nature. Just follow the law of Nature.*
    ©love_unlimited

  • love_unlimited 1w

    Positive Personality, Be positive, The essence of life, Go beyond positive and be enlightened

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    Positive Personality

    "सार को ही ग्रहण करें"
    संसार का दूसरा नाम है "द्वैत"। हर कदम पर द्वैत छाया हुआ है। इस द्वैत को हम विभिन्न प्रकार से समझ और अनुभव कर सकते हैं। ऊर्जा की दृष्टि से देखें तो ऊर्जा का विपरीत तत्व मौजूद है। पॉजिटिव है तो नेगेटिव भी है। ऋणात्मक है तो धनात्मक भी है। समय की दृष्टि से देखें तो दिन है तो रात भी है। परिस्थिति की दृष्टि से देखें तो सुखद परिस्थितियां भी है तो दुखद परिस्थितियां भी हैं। ज्ञान की दृष्टि से देखें तो ज्ञान भी है तो अज्ञान भी है। चेतना की दृष्टि से देखें तो आत्म चेतना भी है तो दैहिक चेतना भी है। ऋतुओं की दृष्टि से देखें तो सर्दी भी है तो गर्मी भी है। चेतना की अवस्थाओं की दृष्टि से देखें तो चेतना का उत्थान भी है तो चेतना का पतन भी है। नैतिकता और व्यवहार की दृष्टि से देखें तो अच्छाई भी है तो बुराई भी है। पृथ्वी जिन दो अवस्थाओं से गुजरती है उसकी दृष्टि से देखें तो शुक्ल पक्ष भी है तो कृष्ण पक्ष भी है।
    परमात्मा ही वह परम सत्ता हैं जो इस द्वैत से मुक्त हैं। इसलिए वह परम है। इसलिए वह परम स्वतंत्र है।इसलिए ही वह हर प्रकार से श्रेष्ठ और शक्तिशाली है। आत्माएं चूंकि प्रकृति की ऊर्जा से आबद्ध हैं इसलिए आत्माओं की वह द्वैत से मुक्त अवस्था नहीं है। संसार में जो भी द्वैत है उसमें विधायक (पॉज़िटिव) पक्ष को ही देखें। मनुष्य की चेतना के पतन के पीछे मनुष्य ने एक यही मूल में भूल की हुई है। उसकी देखने समझने की वृत्ति जीवन के नकारात्मक पक्षों (कृष्ण पक्षों) को देखने की बन गई है। भावार्थ यह है मनुष्य असार को ज्यादा देखता है, सार को नहीं देखता।

    चेतना को बदलने का केवल एक ही उपाय है कि मनुष्य पूरी तरह से अपनी विधायक दृष्टि को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाते हुए अपने मन बुद्धि का रुख अपने आत्मस्वरुप की ओर करता चले। इसलिए ही कहा गया है कि :-
    'साधुता ऐसी चाहिए जैसे सूप सुभाय। सार सार को गही करै, थोथा देई उड़ाय। ' "साधुता" का यहां भावार्थ है कि मनुष्य की मनोवृत्ति के विधायक होने, दिव्य होने, भव्य होने और जीवन जीने की कला से है।*

  • love_unlimited 1w

    Desires Free Stage is the highly spiritual enlightened stage. It comes in the process of.....

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    Desires Free Stage

    इच्छा मात्रम अविद्या स्थिति

    Highly spiritual enlightened stage of the soul it is. Religiously, the good is always good. The bad is always bad.

    But...if we expand our description we find, in other sense of understanding and in some other situations, the good can also be a bad and the bad can also be a good.

    That which has to be happened in future, why are we worrying about it, that it should be happened today itself. No , that is the wrong idea. This stage of free from all desires (इच्छा मात्रम अविद्या) will be manifested in future after attaining the qualifying marks of spiritual growth. At present just live a normal life and keep on intensifying your spiritual efforts. Making spiritual efforts is the matter of hidden secret growth of the soul. Even desire of exposing something is the hindrance in spiritual growth. If suppose, the exposure may happen naturally, it happens. So to be freed from all desire is the highest spiritual stage and it will be happening in the process tomorrow in future. Just live a normal life with your normal basic needs in a detached state of mind. If you abandon your basic needs before reaching that highest stage, then it will be a kind of ignorance. So think wisely before you abandon the basics of life.
    ©love_unlimited

  • love_unlimited 2w

    मौन संगीत

    जब कोई इंसान अपने नक्स पर फतह पाता है। जो गीत गाती है फितरत किसी को क्या मालूम।
    *चेतना जब प्रकृति से स्वयं को अलग अनुभव करते हुए आल्हादित होती है तब प्रकृति भी खुशी से गीत गाती है। लेकिन प्रकृति की खुशी के गीत को सुनने के लिए मौन में डूबना पड़ता है। ऐसा मौन (साइलेंस) जिस स्थिति से ही प्रकृति के गीत संगीत को सुना जा सकता है। *
    ©love_unlimited