kshatrani_words

Vaishnava Jana To, Tene Kahiye Je Peed Paraayi Jaane Re !

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  • kshatrani_words 2d

    मय-ए-इश्क - प्रेम की मदिरा
    आस्ताना-ए-इश्क़ - प्रेम की चौखट
    माज़ी - बीता हुआ कल
    आलम-ए-बेहोश - अज्ञान की स्थिति

    भले ही जान होकर अनजान हूं,
    जर्रा-जर्रा समेट कर आख़िर 'मैं' कौन हूं !

    ©shadowofthoughts_

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    मय-ए-इश्क पिलाकर मदहोश कर दिया,
    आस्ताना-ए-इश्क़ पर लाकर बेहोशी में छोड़ दिया।

    तुम्हारे रंग-ए-महफ़िल पर नाज़ किया करते थे,
    तुम हमारे खुश-रंगों पर बेवफ़ाई की कालिख पोत लाए।

    होश आने पर भी आलम-ए-बेहोश रहना चाहता हूं,
    घूंट-ए-दर्द पीकर कड़वा नहीं होना चाहता हूं।

    मैं आज भी माज़ी के सपनों में डूब जाता हूं,
    निकलते ही, अचानक टूट कर बरस जाता हूं।

    आईना-ए-दिल में देखता हूं तो बिखर जाता हूं,
    समेटता हूं, उठता हूं, फिर से चला जाता हूं।




    -अनुश्रुति || 20.01.2022

  • kshatrani_words 1w

    16.Jan.2022

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    अज़ीब कश्मकश है,
    जुबां पर ख़ामोशी का आलम होता है,
    और खाली पन्नो पर लिखे शब्द शोर करते हैं।


    ©kshatrani_words

  • kshatrani_words 1w

    क्या ही कहूँ !
    मैं भी उस 'बगिया' की मोहताज़ थी
    जिस बगिया मेरा जाना मना था,
    सुबह से शाम जिस 'कली' को यूँ बड़े प्यार से निहारती थी
    उस कली का मेरे लिए खिलना ही मना था।
    मैं भी उस बगिया की...


    ©kshatrani_words

  • kshatrani_words 1w

    पहले तो तुम बरसात से,
    और मैं कली, फूल सी,
    अब तो तुम लू की तेज़ हवा से
    और मैं हरी, सूखी सी ।


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  • kshatrani_words 1w

    'महान' पिता

    पोरबंदर शहर
    गुजरात में जो बसा है,
    वहाँ जन्म लिया
    भारत का 'महान' पिता।

    सत्य, अहिंसा, शांति, देशप्रेम
    उसके लिए उसका जहां,
    जो रग-रग में उसके
    ख़ून के बदले दौड़ता रहा।

    देश की स्वच्छता का
    उसको रहती थी चिंता बड़ी,
    इसलिए, सबको स्वच्छता का महत्त्व समझाया था
    खोल के अस्पताल, स्कूल की नई मिसाल खड़ी।

    वह करता आग्रह जब भी आंदोलन का
    उसमें हिंसा, रक्त नहीं थी,
    गोलों, तोपों, बंदूकों के आगे
    सच की ताकत जीत रही थी।

    हट गया गोरों का राज़
    भारत का तिरंगा लहराया था,
    सत्य, अहिंसा का पाठ सबको पढ़ाया
    तब जाकर उसको सुख-चैन आया था।


    ©kshatrani_words

  • kshatrani_words 1w

    तुझे हराएंगे हम

    टूटी हुई हिम्मत को फिर से जोड़ कर दिखाएंगे हम
    आशाओं की किरणों को फिर से जगायेंगे हम
    खुशियों की लहर फिर से लाएंगे हम
    तू देखना कोरोना तुझे कैसे हरायेंगे हम।


    बिछड़ों को अपनों से मिलाएंगे हम
    हर भूखे को भोजन कराएंगे हम
    सहायता के लिए हाथ बढ़ाएंगे हम
    तू देखना कोरोना तुझे कैसे हरायेंगे हम।


    गलियों में फिर से खेलते हुए बच्चे मुस्करायेंगे
    हर युवा फिर से अपने काम को लौट पाएंगे
    चौराहे पर हर अपने चर्चा करते हुए पाए जाएंगे
    तू देखना कोरोना तुझे कैसे हरायेंगे हम।


    एक दूसरे के लिए एक साथ लड़ कर दिखाएंगे हम
    एक साथ मिलकर तुझे हरायेंगे हम
    मिलकर तुझसे सामना करके दिखाएंगे हम
    तू देखना कोरोना तुझे कैसे हरायेंगे हम।



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  • kshatrani_words 1w

    बेचारा

    भरी हुई सड़कें कभी
    आज वीरान पड़ी थी
    कौतूहल से गूंजती राहें कभी
    आज सुनसान पड़ी थी।

    अचानक कुछ दिखा ऐसा
    पैदल निकल पड़े थे कुछ सरफिरे
    घर अपने पहुँचने के लिए,
    के शायद
    मिल जाएगी सुकून की
    दो वक्त की रोटी उन्हें भी,
    इसी सोच में वो आगे
    की ओर अग्रसर हो रहे थे।

    कड़कती धूप में
    न जाने कितनी मीलों को तय किये
    न जाने कितने अभी बाकी रहे ,
    काँधे पर अपने सामान लिए
    हाथों से खुद को संभालते हुए,
    पैरों में भी थे जैसे पहिये लगे
    थकने या खुद रुकने का नाम नहीं,
    आंखों में झलकती आशा यही
    कि घर पहुँचना है कैसे भी ।

    हो गयी मैं भी स्तब्ध सी
    आंखों में हो गयी नमी सी
    जब देखा काफ़िले का अंतिम पुरुष
    था वो पंगु आरुष
    चला जा रहा था
    अपने ही धुन में
    मज़ाल न थी कि
    कह सके उसे 'बेचारा' कोई भी।


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  • kshatrani_words 1w

    मन बैठा-बैठा हारा जाए !


    एक पल में ये सही लगे,
    दूजे में कछु और
    फ़िर चल दे कहूँ ओर
    अंत में जब न छोर मिले,
    मन (बैठा-बैठा) हारा जाये।

    जग आँख में
    चहुँ ओर आस लिए
    पग एक धरत है
    परिणाम तुरंत न मिले,
    मन (बैठा-बैठा) हारा जाये।

    बिन प्रयोग किये
    कहाँ होत है आविष्कार ?
    बिन पगडंडी चले
    कैसे पता चलत है हाल ?
    फ़िर कैसे मन (बैठा-बैठा) हारा जाये ?

    धीरज रखत, पग धरत
    विश्वास बोये, स्थिरता होए
    गलत भी सही होए जात,
    तब मन पर जीत होत
    न फ़िर कभी हारा जाए।


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  • kshatrani_words 1w

    जीत कर जाओगे या फिर सीख कर जाओगे
    डरते क्यों हो, फिर से खड़े नहीं हो पाओगे?

    एक कदम बढ़ाओ, आगे बढ़ते जाओगे
    गिर जाओगे क्या, फिर से उठ नहीं पाओगे?


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  • kshatrani_words 1w

    संविधान

    मैं भारत का विधान हूँ
    मैं इसका कल और आज हूँ,
    मैं औरों की गलतियों का सुधार हूँ
    हाँ, मैं विशाल हूँ,
    मैं न खत्म होने वाला सुझाव हूँ
    मैं अमिट लोगों का विश्वास हूँ,
    मैं परिवर्तन के लिए सदैव तैयार हूँ
    हाँ, मैं भारत का पवित्र संविधान हूँ।

    मैं 26 नवम्बर 1949 को अपनाया गया एक महत्वपूर्ण उल्लेख हूँ
    मैं भारत को एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष,
    लोकतांत्रिक और गणतंत्र राष्ट्र का लिखित घोष हूँ,
    मैं 'इसके' नागरिकों के लिए न्याय,
    स्वतंत्रता, समानता को सुरक्षित करता अभिषेक हूँ
    मैं राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए
    भाईचारे को बढ़ावा देता एक संदेश हूँ,
    हाँ, मैं भारत का पवित्र संविधान हूँ।

    मैं भारत के लोगों का आस हूँ
    मैं उनका विश्वास हूँ,
    मैं सुव्यवस्था बनाये रखने में बेमिसाल हूँ
    मैं नियमों का भंडार भी हूँ
    मैं भारत का विधान हूँ
    मैं इसका कल और आज हूँ,
    मैं परिवर्तन के लिए सदैव तैयार हूँ
    हाँ, मैं भारत का पवित्र संविधान हूँ।


    ©kshatrani_words