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  • kakapahadi 88w

    वर्षा ऋतु में दिल्ली में रहने का अनुभव

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    मॉर्डन इंजीनियरिंग में इतना दम कैसे?

    दिल्ली की सड़कों पर ये पानी कम कैसे?


    मेरे छोटे से घर को रिसॉर्ट बना डाला

    चिंटू चाचा पुरुषार्थ का ये परचम कैसे?


    जल मग्न किताबें दीवारें पानी पी गयीं

    पर मेरी माँ के लोचन अब भी नम कैसे ?

    ©काका पहाड़ी

  • kakapahadi 102w

    एक कविता उन माताओं और बहनों के लिये जो भाव वश या अज्ञान वश अनीति के हाथों एक अंतहीन गर्त में समाहित हो गईं l

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    कविता

    वन उपवन की शोभा थी जो
    घर आँगन सुरभित करती वो
    नव - पल्लव जो चूमे जाते
    घर के बाहर घूरे जाते

    वह किसलय अब इक डाली है
    लगती वह फुसलाई सी है
    जो लतिका झुलसाई सी है

    आज जलाने आये हैं जो
    कल प्रेम प्रसंगों में थे वो
    जिस सुवास से मन भर जाता
    फिर वो पुष्प नहीं घर जाता

    अब उन अधरों की स्मित टूटी
    वो पुनः पुनः सकुचाई सी है
    जो लतिका झुलसाई सी है

    पूजा की थाली में शामिल
    वो वृक्ष राज की प्राण अनिल
    अब दूर - दूर वो रहती है
    बोझिल साँसों को ढ़ोती है

    अंततः ऐसा क्यूँ कहती है?
    वो तम की परछाई सी है
    जो लतिका झुलसाई सी है

    ©काका पहाड़ी

  • kakapahadi 103w

    तोटक छंद में एक कोशिश सगण ×8

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    मुक्तक

    पहचान बनी पहचान यही,उस साहस का इक मान यही

    निज भारतमाँ हित मृत्यु मिले,बस जीवन का अभिमान यही

    जब वीर सभी यह बोल उठे,जब भारत माँ हित शीश कटे

    तब रक्त नदी यह बोल बही,जय भारत माँ जयगान यही

    ©काका पहाड़ी

  • kakapahadi 106w

    नवगीत 16/16

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    नवगीत

    कल ही मानो मैं आया था
    आज यहाँ से मैं जाता हूँ

    इन फूलों से कह दो कोई
    इनकी सूरत मन में सोई
    पूछ रहा हूँ ख़ुद को यूँ मैं
    दिल की धड़कन क्यूँ है खोई
    छोड़ रहा हूँ इस उपवन को
    संग सदी का जो पाया था
    कल ही मानो मैं आया था

    छोटे छोटे हिम खंडों से
    अध्यापक के उन डंडों से
    एक नदी अनुशासित होकर
    सागर सी आभासित होकर
    अनंत अम्बर से मिलने को
    एक बड़ा सा घन छाया था
    कल ही मानो मैं आया था

    सागर की कुछ बूंदें उड़कर
    बादल की गोदी में सोकर
    जागेंगी फिर बरखा बनकर
    नन्हें हाथों से जब छनकर
    झर झर झरती हैं धरती पर
    तब वसुधा ने यह गाया था
    कल ही मानो मैं आया था
    आज यहाँ से मैं जाता हूँ

    ©काका पहाड़ी

  • kakapahadi 108w

    एक और निकली ख़ज़ाने से ये ग़ज़ल पूरी नहीं हो पायी थी, कभी हम office में बैठकर भी लिखा करते थे ����

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    ग़ज़ल

    दुख के सीने से उठकर फिर , सुख के मोती लाया मैं

    हॉस्टल से वापस घर अपने, गुड़िया रोती लाया मैं


    मेरे इस मिट्टी की ख़ुश्बू, खोती जाती है हर दिन

    अंधेरों को रौशन करने, फिर माँ की रोटी लाया मैं


    खलियानों से जाते- जाते,ट्यूशन के इक जंगल तक

    जैसे - तैसे खलियानों तक, वापस पोती लाया मै

    ©काका पहाड़ी

  • kakapahadi 108w

    "रोला छंद" में एक कविता, बहुत पहले की लिखी है आज notepad टटोल रहा था तो ये दिख गईं

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    जागो

    जागो जागो आज, भारती माँ के वीरों
    शत्रु नहीं है दूर, उठो अब मारो मारो

    रणचंडी को देख, बना शमशान धरा को
    है अधरों में प्यास, रक्त की नदी बहा दो

    अब शोणित की चाह, करती है माँ भारती
    इस युद्ध में भुज -बल -दल न मांगू न सारथी

    जाग्रत होकर खोल, चेतना के तारों को
    गिद्धों के इस रक्त, में डुबा अख़बारों को

    प्रेम गीत को भूल, स्वाभिमानी छंद पढ़ो
    तक्षशिला के खंडहर, से वो युग पुनः गढ़ो

    बनकर रक्त पिपासु, रहो प्रतीक्षा में सभी
    इस कलियुग में धर्म युद्ध नहीं होगा कभी

    ज्ञान ध्यान की खड्ग, पर संयम की धार दो
    चाहे अपनी खोज, में प्राणों को वार दो

    जागो जागो आज, भारती माँ के वीरों
    शत्रु नहीं है दूर, उठो अब मारो मारो

    ©काका पहाड़ी

  • kakapahadi 108w

    दोहे

    ब्रह्म नित्य आधार है, चेतन का संसार

    चेतन की स्मृति है तहाँ,अवचेतन व्यवहार


    बहती विशुद्ध चेतना, रहती कालातीत

    अवचेतन संस्कार में, जीवन करे व्यतीत


    कर्मयोग पुरुषार्थ से, रखना तठस्त भाव

    चित्त और संस्कार में, ठहरेगा बिखराव


    मूल तत्त्व है चेतना , रहती नित्य नवीन

    क्षय होकर संस्कार सब, चेतना में विलीन

    ©काका पहाड़ी

  • kakapahadi 109w

    नाज़बरदार -ए - दिलबरां - प्रेमिका के नखरे उठाने वाला

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    रुबाई

    नाज़बरदार -ए - दिलबरां मैं कभी था ही नहीं
    सो दिल -ए -कू से आजतक कोई गुज़रा ही नहीं

    सादा दिल इंसां ढूंढ़ता ही रहा मैं उम्र भर जो तराशे भगवां थे इंसां कहीं था ही नहीं

    ©काका पहाड़ी

  • kakapahadi 110w

    नवगीत

    आज हिमालय देख रहा है

    गंगा जमुना तट पर बैठा
    एक पथिक है घर को लौटा
    पतझड़ के सब पत्ते छोड़े
    मधुमासों के हिस्से जोड़े

    आज प्रकृति दुल्हन सी लगती?
    यूँ मस्तक पर मुकुट सजा है
    आज हिमालय देख रहा है

    एक अवधूत सबके भीतर
    संग उसी के चंचल तीतर
    शांत तनिक तू कर दे उसको
    मिल जायेगा तेरा तुझको

    खोज रहा हूँ जाने किसको
    सबने उसको प्राण कहा है
    आज हिमालय देख रहा है

    एक हवा का झोंका कहता
    अन्दर बाहर मैं ही रहता
    कौन जगह जो मेरे बिन है?
    तुझको अब भी किसकी धुन है?

    जन्मों से जो खोज रहा हूँ
    क्या है जो हिम पार रखा है
    आज हिमालय देख रहा है

    ©काका पहाड़ी

  • kakapahadi 111w

    आज चाय पीते पीते

    आज चाय पीते - पीते मैंने देखा प्याले की ओर तो भाप उठ रही थी I

    भाप - "चलो अब मैं चलता हूँ "

    चाय - "तुम कितने भाग्यशाली हो जा रहे हो "

    भाप - "इसमें भाग्यशाली वाली क्या बात है एक दिन तुमको भी भाप बनना है "

    चाय - "हाँ मगर तुमको देख कर मुझे ईर्ष्या होती है तुम स्वच्छ आकाश में पहुँच कर बादलों पर विराजमान हो जाओगे और मैं किसी इंसान के शरीर से होते हुए पेशाब बन जाऊँगा "

    भाप - "अच्छा अगर ऐसी ही बात है तो आओ मेरे साथ मगर उसके लिये तुम्हें अपना ये अस्तित्व मिटाना होगा "

    चाय - "नहीं ये तो मेरी पहचान है मैं अपनी पहचान कैसे मिटा सकता हूँ "

    भाप (मुस्कुराते हुए ) - "देखो समय रहते अपनी सूक्ष्म पहचान को प्राप्त कर लेना ही ठीक है
    वरना समय कब निकलेगा मालूम ही नहीं होगा
    ऐसा सोचो आज अंतिम आज है इसके बाद ना तो कोई आज होगा ओर नहीं कोई कल "

    भाप - "चलो मैं चलता हूँ" "हम फिर मिलेंगे "

    मैं अभी तक उस चाय के प्याले को एक टक देख रहा था जैसे मैं कहीं खो गया किसी शून्य में जहाँ मुझे समय का आभास ही नहीं हुआ l
    अब तक चाय ठंडी हो गयी थी सो भाप भी नहीं थी

    ©काका पहाड़ी