kaavyanshi

लेखिका है, काफ़ी है!

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  • kaavyanshi 76w

    कब?

    बेटी जब कोख से निकली, वह कितनी नादान थी,
    विचारों की अभिव्यक्ति तक से वह अभी अंजान थी।
    शूरवीर सा लड़ते-लड़ते जीवन का बलिदान दिया,
    ओरी! बिटिया क्यों ना तूने दुष्कर्मियों को पहचान लियाॽ
    छीनी माई की ममता, और छीना बाबा का संसार,
    न्याय को भटकी दर–दर बिटिया,हुआ ना पापियों का संहार!
    आज भले असमर्थ है, न्याय व्यवस्था व्यर्थ है।
    परी जो नन्ही हार चुकी संघर्षों से अब सोयी है।
    इंसाफ करेंगे उसका कब? वह खून के आँसू रोयी है!
    © काव्यांशी

  • kaavyanshi 109w

    महक

    आज उनकी गली कुछ गुलज़ार सी है,
    एक आहट की चली बयार सी है,
    खुशबुओं से तो नाता ज्यादा नहीं है हमारा
    .
    .
    खुशबुओं से तो नाता ज्यादा नहीं है हमारा
    पर हवा की महक कुछ-कुछ मेरे दिलदार सी है।
    ©_kaavyanshi_

  • kaavyanshi 114w

    संक्षिप्त पंक्ति सी मैं,
    तू कविता के सार सा।

    छोटी छोटी कंकड़ सी मैं,
    तू महलों के आधार सा।

    बचपन की एक जिद् सी मैं,
    तू वयस्क अधिकार सा।

    एक नाकामी नींद सी मैं,
    तू स्वपन मेरा साकार सा।
    ©_kaavyanshi_

  • kaavyanshi 116w

    शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षकों के लिए एक छोटी सी भेंट
    @drinderjeet9 @raahi_roshan @73mishrasanju @ayush_tanharaahi @vijay_rangvani

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    गुरु - एक दर्पण

    जो शिष्यों के लिए अर्पण है,
    गुरु ऐसे ही एक दर्पण है।

    जो सच्चाई दिखलाते है,
    जो अच्छाई सिखलाते है।

    जब जीवन पथ की दुविधा से,
    हो दूर अकेले सुविधा से,
    तो शिक्षा देती है युक्ति
    वो शिक्षक देते हैं मुक्ति।

    वत्सल मन से जो हो उत्पन्न,
    विचारों से हम डरते हैं,
    डर को भुला करके प्रसन्न,
    शिक्षक ही उससे लड़ते है।

    किसी देश के विकास में,
    अवरोधों के निकास में,
    शिक्षक का आशीर्वाद है,
    ये सत्य निर्विवाद है।

    हम भागाभागी दुनिया के जब,
    अनुगामी बन जाते हैं
    गुरु प्रदत्त शिक्षा से ही जब,
    कही स्वामी बन जाते हैं,
    जब अति अभिमानी बन के हम
    उन्हें कृतघ्नता दर्शाते हैं,
    जाने अनजाने में तब हम
    अपनी पशुता को बरसाते हैं।

    जहाँ भी गुरुओं को उनका
    अपना स्थान प्रदान हुआ,
    सच है वहां जीवन की सभी
    बेड़ियों का समाधान हुआ।

    है सर्वविदित जिनका जीवन
    समाज को अर्पण है
    गुरु ऐसे एक समर्पण है।
    गुरु ऐसे ही एक दर्पण है।
    ©_kaavyanshi_

  • kaavyanshi 119w

    Guts

    Few wires of amiss can't lose us or cut,
    Few fences can't lead the door to shut,
    Few aegir with each seconds torque my hands, but
    the few aches, you gave for which i lost the guts.
    ©_kaavyanshi_

  • kaavyanshi 124w

    The warmest one

    Across my rusty face
    Sun gazes with a rage,
    Your memories at a pace
    Shut sharp in my cage.

    But,
    My heart is not beating
    Soul just stopped breathing,
    Peach, your absence is so dark and dense,
    I feel abolish from the warmth so intense.

    Sun's gaze, sun's rage
    Too furious and loud,
    Cuz from some days
    Apart is its dear cloud.

    Suddenly, she rushed here, in my eyes
    In sort of the tears did she roll and rise.
    I meshed* the window and said to the sun
    You wait for your cloud and me for my
    warmest one.
    ©_kaavyanshi_

  • kaavyanshi 133w

    "मूरत"

    मेरे जीवन के अंधेरे में, माँ तुम लाली बन जाती हो।
    जब सुबह नींद नहीं खुलती है, माँ तुम प्याली बन जाती हो।
    मेर उलझन की परतों में माँ, तुम जवाब बन जाती हो।
    मेरी माँगे पूरी करने को, माँ तुम नवाब बन जाती हो।
    जब कोई मुझे रूलाता है, माँ तुम आंच बन जाती हो।
    मेरी बिखरी बिखरी दुनिया की, माँ तुम सांच बन जाती हो।
    जब गलती कभी मैं करती हूँ, डंडा लेकर दौड़ाती हो।
    एक खरोंच भी लगे मुझे, तुम सजदे में दोहराती हो।
    कष्ट मुझे जो कभी हुए,तुम रात रात भर जगती हो।
    इंसानों में मुझे तुम माँ, ईश्वर की "मूरत" लगती हो।
    ©_kaavyanshi_

  • kaavyanshi 140w

    लक्ष्य

    जीवन के कोरे कागज़ पर
    परिश्रम कुछ इतना सारा हो

    कि थम भी जाए धरती तो
    अंबर तिरपाल हमारा हो

    हर जख्म हमें गवारा हो
    कुछ ऐसी लक्ष्य की धारा हो


    ©_kaavyanshi_

  • kaavyanshi 170w

    दर्द हरा था।
    घात बड़ा था।
    पथिक फिर से उठ खड़ा था।
    हारना नहीं मानता था।
    कर्म करना जानता था।
    हर विघ्न बाधा फानता था
    जब एक बार वो ठानता था।
    ©_kaavyanshi_

  • kaavyanshi 171w

    देशद्रोही

    अपने बम हथियारों से मानवता को तुमने नोचा
    चीख पुकारों पर भी परहित का ना तुमने सोचा।

    चंद सिक्कों के खातिर बेच दिया अपना इमान
    मातृभूमि का कुछ तो सोचा होता तूने बेइमान।

    क्यों साज भारत माँ की तुझको रास नहीं आयी
    बोल ना रे उद्दंड तुझे क्या लाज नहीं आयी।
    ©_kaavyanshi_