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  • juhigrover 98w

    तेरे साथ काम करते करते ज़िन्दगी नमकीन हो गई है,
    मीठा खा खा कर के हम मधुमेह के मरीज़ हो गये थे,
    ज़िन्दगी थोड़ी जीने के लायक होने के करीब हो गई है,
    कि पहले डूब के मरने के भी क़ाबिल नहीं रह गये थे।
    ©juhigrover

  • juhigrover 101w

    खिचड़ी सी सादगी थी कभी सम्बन्धों में, आज सब खिचड़ी हो गया,
    नया साल भी जाते-जाते पुराना होते नयी कहानी सा उपहार हो गया।

    पुराना सम्भाल के रखना है, नये के आने से पहले नये सपने संजोना है,
    मग़र पुराना जो ज़ख्म था कभी उन्हीं तारीखों का, फिर से हरा हो गया।

    मिटा देनी हैं अब वो रंजिशें पुरानी, यही खुद से वादा करना है हमने,
    नये साल में कुछ तो ऐसा करें कि लगे अब तो बहुत कुछ नया हो गया।

    धर्म, मज़हब के नाम पर होती राजनीति, असली धर्म से भटकाती है,
    नये साल में सीखना यही है कि अब हमारा इन्सानियत ही धर्म हो गया।

    जीने की ख़्वाहिश ले कर अपने मकसद को निभाने का नाम ज़िन्दगी है,
    जीते जी जानवर से भी बदतर हो कर जीने का नाम आज ज़िन्दगी हो गया।

    भगवान्,खुदा,ईशू,वाहेगुरु चाहे कुछ भी कह लो, ऊपर वाला शर्मिन्दा है,
    इन्सान बनाना ही उनके लिए आज तक का सबसे बड़ा गुनाह हो गया।

    आज इन्सान तो क्या, भगवान् भी फरियाद करते हैं, कभी तो सुनो,
    हार गया हूँ इन्सान बना कर, इन्सान इन्सान नहीं, जानवर का नाम हो गया।

    बस यही ख्वाहिश है नये साल में इन्सान की इन्सानियत ज़िन्दा रह पाए,
    जीने की वजह दूसरों की खुशी हो,न कहे कोई कि खुदा भी गुनाहगार हो गया।
    ©juhigrover

  • juhigrover 101w

    ਹੋਰਾਂ ਨੂੰ ਵੇਖ ਅਾਪਣਾ ਅਾਪ ਨਹੀ ਗਵਾੲੀਦਾ,
    ਅਰਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਵੇਖ ਫਰਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਨਹੀ ਭੁੱਲ ਜਾੲੀਦਾ।

    ੳੁਡਾਰੀ ਚਾਹੇ ਕਿੰਨੀ ਦੂਰ ਅਾਸਮਾਨਾਂ 'ਚ ਹੋਵੇ,
    ਸ਼ਾਮਾਂ ਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਘਰਾਂ ਨੂੰ ਹੀ ਪਰਤ ਅਾੲੀਦਾ।

    ਲੰਮੀਅਾਂ ੳੁਡਾਰੀਅਾਂ ਦੂਰੀਅਾਂ ਵਧਾੳੁਂਦੀਅਾਂ ਨੇ,
    ਅਾਪਣਿਅਾਂ ਨੂੰ ੲਿੰਝ ਖੂਨ ਦੇ ਹੰਝੁ ਨਹੀ ਰਵਾੲੀਦਾ।

    ਜ਼ਮੀਨੀ-ਹਕੀਕਤ ਤੋਂ ਵੱਖ ਹੋਣਾ ੲੇ ਮੌਤ ਵਾਂਗਰ,
    ਅਾਪਣੀ ਹੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਤੋਂ ਕਦੀ ਦੂਰ ਨਹੀ ਜਾੲੀਦਾ।

    ਵਿਛੋੜੇ ਅਾਪਣੇ ਜਰਨੇ ਨਹੀਓਂ ਸੌਖੇ ਬੰਦਿਅਾ,
    ਮੌਤ ਲਾਗੇ ਲੰਘ ਕੇ ਵੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਨੂੰ ਨਿਭਾੲੀਦਾ।
    ©juhigrover

  • juhigrover 105w

    क्या कहें पैदा होती बच्ची को,
    वो पैदा न हो या फिर कोख में ही मर जाए,
    खत्म पैदाइश जब उसकी हो,
    तब दुनिया का ही चक्र कैंसे चल पाए।

    आखिर क्या गलती थी उसकी,
    जो हर बार अपमानित ही हो जाए,
    पैदा होकर क्या गुनाह किया,
    उसका दर्द भी दिलों से फनाह हो जाए।

    अपराधी अपराध करके भी,
    सिर ऊँचा करके बस हमेशा चलता जाए,
    और वो अपराधी न हो कर भी,
    सूली पर बेवजह ही यों चढ़ती जाए।

    हे भगवान् ! अब आप ही न्याय करो,
    ये दर्द अब और सहा न जाए,
    इस कलयुग में कुछ तो उपकार करो,
    बस ये अन्याय अब खत्म हो जाए।

    सुना है तेरे घर में देर है, अन्धेर नहीं,
    बस यहीं बात कुकर्मियों को समझ आ जाए,
    आसमान पे जा बैठे अपराध करके भी,
    सिर से पैर काँपे, अपनी कोख को न लज्जित कर पाए।

    क्या कहें पैदा होती बच्ची को,
    वो पैदा न हो या फिर कोख में ही मर जाए,
    खत्म पैदाइश जब उसकी हो,
    तब दुनिया का ही चक्र कैंसे चल पाए।
    ©juhigrover

  • juhigrover 105w

    मैं आम आदमी हूँ

    मैं आम आदमी हूँ, गुनाहगार सरकार को मानता हूँ,
    अपना स्वार्थ कैंसे पूरा हो, यही तो हमेशा जानता हूँ।

    मैं आम आदमी हूँ, मुझे किसी की परेशानी से क्या,
    एक दिन याद कर हमेशा के लिए भूलना जानता हूँ।

    मैं आम आदमी हूँ, क्यों किसी के लिए समय गँवाऊँ,
    किसी की जलती लाश का तमाशा देखना जानता हूँ।

    मैं आम आदमी हूँ, देखूँ भी क्यों न, मेरा तो कोई नहीं,
    हाँ, बस अपना समय आयेगा, शायद नहीं जानता हूँ।

    मैं आम आदमी हूँ, तमाशा देखना ही मेरी आदत है,
    बिन पैसों के देख बस कैंडल मार्च करना जानता हूँ।

    मैं आम आदमी हूँ,किसी की बहन को बहन नहीं मानता,
    मेरी बहन को कोई अपनी नहीं मानेगा, नहीं जानता हूँ।

    मैं आम आदमी हूँ, मरता भी तो आम आदमी ही है,
    आम आदमी कुछ नहीं कर सकता, यही तो जानता हूँ।

    मैं आम आदमी हूँ, खास कुछ गिने चुने समझता तो हूँ,
    मगर किसी के लिए खुद कुर्बान हो जाना नहीं जानता हूँ।

    तुम आम आदमी हो, मगर इतना क्यों नहीं समझते हो,
    मैं आम आदमी भी खास को कुचलना अच्छे से जानता हूँ।
    ©juhigrover

  • juhigrover 107w

    तन्हाई के आलम में,तेरी यादों ने आ घेरा था,
    तेरी तड़प ने दिल की धड़कनों को बढ़ाया था,
    मेरे आँसुओं ने मेरी कमज़ोरियों को जताया था,
    मग़र मेरे अपने दर्द ने मुझे लिखना सिखाया था।

    मैंने यादों को भुलाने का तरीका खोज लिया है,
    मैंने तुम्हारे बिना ज़ख्मों को सीना सीख लिया है,
    बेवफ़ा ही सही, लिखने का सलीका सिखाया है,
    कि मैंने अब तुम्हारे बिना जीना सीख लिया है।
    ©juhigrover

  • juhigrover 109w

    सुबह उठते ही हमारा ध्यान अखबार पे जाता है,
    और कुछ भी ग़लत होता है,सरकार ही ग़लत है,
    अग़र अपराध ज़्यादा होते हैं,तो सरकार ग़लत है,
    महंगाई, ग़रीबी, बेरोज़गारी, जनसंख्या वृध्दि....,
    कुछ भी हो,कोई हो न हो, सरकार तो ज़िम्मेदार है।
    हम चाहे कभी भी टैक्स न भरें, हम हमेशा सही हैं,
    हम सामान लेते समय छुपा के कम पैसे दें, सही हैं,
    हम कहीं कुछ ग़लत देख आगे चल दें, हम सही हैं,
    हम कुछ ले दे कर चुनाव में हिस्सा लें, हम सही हैं,
    हम अपने माथे पे सही का ठप्पा लगवा कर लाये हैं।
    अग़र बदलाव चाहते हो तो पहले खुद को बदलो,
    पूरा समाज तो बदलेगा, सरकारें भी बदल जायेगी।
    कोई सुबह उठते ही नही कहेगा कि सरकार गलत है,
    सरकार भी हम में से है, मतलब कि हम ही गलत हैं।
    ©juhigrover

  • juhigrover 110w

    तन उजला मन में मैल, दीप कैसे जलाए,
    चमक दमक सब आडम्बर, मैल दिल का न जाए।
    ©juhigrover

  • juhigrover 110w

    दीपावली है दीपों का त्यौहार,
    मगर हर मन में अन्धेरा क्यों है?
    दीप जले हैं घर आंगन में,
    फिर भी उजाला क्यों नहीं है?

    कैंसी है ये अंधी दौड़ पैरों की,
    जो गाँव छोड़ शहरों की ओर,
    घरों में ये रोशनी कैंसी ही है,
    अपनों से दूर, दिल में अन्धेर।

    रोशन घर, सजी दीवारें चारदीवारी,
    मगर बेकार अपनों की आस में,
    कहाँ है खुशी जहाँ हम अकेले,
    तुम अकेले चमक दमक में,भीड़ में।

    चलो आज कुछ नया ही करते हैं,
    घर आंगन सजाते हैं, रोशनी में,
    एक चराग़ दिल का भी जलाते हैं,
    अपनों के पास या घर बुलाते हैं।

    रोशन कर के दिल की खुशियाँ,
    आज यों ही दीपावली मनाते हैं,
    सजाते हैं दिल का कोना कोना,
    अपनों के साथ दीपावली मनाते हैं।
    ©juhigrover

  • juhigrover 111w

    मुझे पता है,
    ढूँढ रही हैं ख़ामोश नज़रें तेरी मुझे रोकने के लिए,
    मैं भी कहाँ कहाँ नहीं छुपा तुझसे दूर होने के लिए,
    तुमने मुझे हर बार ढूँढ निकाला है कहीं न कहीं से,
    आैर मैंने हर बार नई जगह खोजी है छुपने के लिए।

    मुझे पता है,
    तुम दूर होना नहीं चाहती, रोकती हो मेरे ही लिए,
    मैं दूर जाना चाहता हूँ तुझसे,छुपता हूँ तेरे ही लिए,
    मगर हमारी ये कैसी चाहत है,मिल जाते हैं हर बार,
    हम बस जीना चाहते हैं, तेरी मेरी हसरतों के लिए।

    मुझे पता है,
    तू भी ज़िद्द पे है, मैं भी ज़िद्द पे हूँ,एक दूजे के लिए,
    हमने ये नही देखना कौन जीतता है, किस के लिए,
    ज़िन्दगी कोई लुका छुपी का खेल नहीं कि ढूँढते रहें,
    ये तो एक एहसास है,उम्र भर साथ निभाने के लिए।
    ©juhigrover