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  • jigneshpatel 4d

    The inner Peace, (ie an absence of ideological efforts that is an activity)

    When we know, that we are not a doer, (an effort),
    But are an actor that just plays a role accordance the requirement of the referred personality,
    That is the peace within, that manifests.

    Greetings.

    जब हम जानते हैं, कि हम कर्ता (एक प्रयास) नहीं हैं,
    लेकिन एक अभिनेता हैं जो सिर्फ संदर्भित व्यक्तित्व की आवश्यकता के अनुसार भूमिका निभाते हैं,
    वह जो भीतर शांति है, वह प्रकट होती है ।

    नमन।~ {Jignesh,  An identity}

  • jigneshpatel 1w

    We are neither a reflection nor a reflective object within us.

    Each visible division, is the result of all reflections that are already reflected by a false reflective object within us,
    And also that the reflecting object (personality) has considered the self-reflection (external phenomena) to be "the real I am".. !!
    In fact, the reflected object and its reflection both are virtual and only is the essence of learning.

    Greetings~

    प्रत्येक दिखाई दे रहे विभाजन, उन सभी प्रतिबिंबों का परिणाम है जो पहले से ही एक झूठी चिंतनशील वस्तु के द्वारा प्रतिबिंब होते है,
    और यह भी कि प्रतिबिंबित वस्तु (व्यक्तित्व) ने स्वयं के प्रतिबिंब (बाहरी घटनाएं) को "वास्तविक मैं हूं" माना है .. !!
    वास्तव में, प्रतिबिंबित वस्तु और इसके प्रतिबिंब दोनो आभासी है और सीखने के केवल सार है।

    नमन।~ {Jignesh,  An identity}

  • jigneshpatel 2w

    Falsity and its ideological state always dependent on its reflection.(circumstances).

    The "sense of I" realizes changing his age according to external circumstances (according to reflection),
    In fact, there is only the age of the body, our ideological position is not bound to any specific age,
    "The sense of i, does not have its real age during its life.
    As per its ideological status it feels less or more its age.
    In the same way, as the age seems less in front of its father, in spite of being the same son of his father,
    it feels aged as a father in front of its son, etc.

    Greetings.

    "मैं की भावना" बाहरी परिस्थितियों के अनुसार उसकी उम्र को बदलने का एहसास करता है (प्रतिबिंब के अनुसार),
    वास्तव में, केवल शरीर की आयु है, हमारी वैचारिक स्थिति किसी विशिष्ट आयु के लिए बाध्य नहीं है,
    "मैं की भावना, उसके जीवन के दौरान उसकी वास्तविक उम्र नहीं है।
    अपनी वैचारिक स्थिति के अनुसार इसकी आयु कम या अधिक होती है।
    ठीक उसी तरह, जिस तरह उम्र अपने पिता के सामने कम लगती है, उसी तरह अपने पिता के बेटे होने के बावजूद,
    यह अपने बेटे के सामने पिता के रूप में वृद्ध महसूस करता है, आदि।
    नमन।~ {Jignesh,  An identity}

  • jigneshpatel 2w

    "That which is not a fact is only superficial information."

    We can only conclude about the unknown,

    But that which is a Known,
    it never gives the right to tamper with it by lexical activity.
    Only the method of incomplete information or wrong abstractions can be concluded,
    True receptivity of essence is beyond conclusion.

    Greetings.

    "जो तथ्य नही है ये केवल सतही माहिती है।"

    हम केवल अज्ञात के बारे में निष्कर्ष निकाल सकते हैं,

    लेकिन जो एक ज्ञात है,
    यह शाब्दिक गतिविधि द्वारा इसके साथ छेड़छाड़ करने का अधिकार कभी नहीं देता है,
    केवल अधूरी माहिती या गलत सार ग्रहण करने की पद्धति को निस्कर्ष दिया जा सकता है,
    सार की सही ग्रहणशीलता, निष्कर्ष से परे है।

    नमन।~ {Jignesh,  An identity}

  • jigneshpatel 2w

    Being Vs Doing.

    Whatever is literally or ideologically inspiring is "doing", it has not been to be being,
    Name, colour and form are the knowledge acquired by acceptance of the wrong medium after being born on the surface,
    Which is as hollow as the "ideological I", and through that resources (name, colour and form, all the influences of that superficial, medium) we are trying to reveal it, which is beyond all this.. !!

    Greetings.

    जो कुछ भी शाब्दिक या वैचारिक रूप से प्रेरक है वह "करना" है, यह होना नहीं है,
    नाम, रंग और रूप सतह पर पैदा होने के बाद गलत माध्यम की स्वीकृति द्वारा अर्जित ज्ञान हैं,
    जो "वैचारिक मैं" की तरह खोखला है, और इसके संसाधनों (नाम, रंग और रूप, उस सतही, मध्यम के सभी प्रभावों) के माध्यम से हम इसे प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं, जो इस सब से परे है .. !!

    नमन।~ {Jignesh,  An identity}

  • jigneshpatel 2w

    The absence of relation, just creates an image in the mind and image creates its attachments.

    The true relationship, just dissolves all our attachment,
    Because, each attachment is an autonomous result of a relationship to every image in our mind,
    And that image, which is being created by the inability of the relationship to the facts around us.

    Greetings.

    सच्चा रिश्ता, बस हमारे सारे लगाव को भंग कर देता है,
    क्योंकि, प्रत्येक लगाव हमारे मन में हर छवि के लिए रिश्ते का एक स्वायत्त परिणाम है,
    और वो हर छवि, हमारे द्वारा हर तथ्य से बनाई जाती है।

    नमन।~ {Jignesh,  An identity}

  • jigneshpatel 3w

    Fact vs image.

    Our memory so far is a collection through our inner Falsehood (personality),
    Therefore, it again needs to be self-validated only in the absence of memory of intrinsic falsehood,
    And this is only possible through the process of self-verification of our memory and its collection (which is every image created about everything)
    Which is only possible to be revealed through our daily lives, and this is to establish our real relationship with every image that was fact but our own falsehood gave it the form of image,
    And through this process, all the facts gradually appear that what is really in front of us now

    Greetings.

    हमारी स्मृति अब तक हमारे आंतरिक मिथ्यात्व (व्यक्तित्व) के माध्यम से एक संग्रह है,
    इसलिए, इसे फिर से केवल आंतरिक मिथ्यात्व की स्मृति के अभाव में स्वयं सत्यापित करने की आवश्यकता है,
    और यह केवल हमारी मेमोरी और उसके संग्रह (जो कि हर चीज के बारे में बनाई गई हर छवि है) के स्व-सत्यापन की प्रक्रिया के माध्यम से संभव है,
    जिसे केवल हमारे दैनिक जीवन के माध्यम से ही उजागर करना संभव है, और ये हमारा हर उस छवि के साथ वास्तविक संबंध स्थापित करना है, जो कि तथ्य था लेकिन हमारे ही मिथ्यात्व ने इसे छवि का रूप दिया था,
    और इस प्रक्रिया के द्वारा, सभी तथ्य धीरे-धीरे प्रकट होता है कि वास्तव में अभी हमारे सामने क्या है।
    नमन।~ {Jignesh,  An identity}

  • jigneshpatel 3w

    The Absence of a relation = a form of an image, through our memory.

    If the relation is not established correctly then .. !!

    The only difference between a dead human being and a living human being,
    That if someone dies, our memory for that person cannot change and our memory for the living changes according to its behavior,
    In both the circumstances only the form of memory exists,
    But the distinction is simply a change of memory or a permanent static image of memory

    Greetings.

    अगर सही तरह से संबध प्रस्थापित नही होता है तो..!!

    एक मृत मनुष्य और जीवित मनुष्य में केवल इतना ही फर्क है,
    की, अगर किसी का मृत्यु होता है तो, उस मनुष्य के लिए हमारी स्मृति नही बदल सकती और जीवीत के लिए हमारी स्मृति, इसके बर्ताव के अनुसार बदलती रहती है,
    दोनो ही परिस्थिति में स्मृति का रूप ही मौजूद होता है,
    लेकिन भेद, केवल स्मृति का बदलाव होना या स्मृति का एक स्थायी स्थिर छवि का रूप लेना है।

    नमन।~ {Jignesh,  An identity}

  • jigneshpatel 4w

    A Human being Vs Background of its mentality.

    Mostly,
    This is a stagnant background of our referencing mentality,
    Whether it is talking to another background or to the image,
    Or the background of the image is seeing it or feeling it,
    In reality, a human being does not have a relationship with another human being or any other organism or object.

    Greetings.

    ज़्यादातर,
    यह हमारी संदर्भित एक मानसिकता की एक स्थिर पृष्ठभूमि है,
    कि ये दूसरी पृष्ठभूमि से या छवि से बात कर रही है,
    या यही छवि की पृष्ठभूमि इसे देख रही है या इसे महसूस कर रहे,
    वास्तविक तौर पर एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से या कोई भी अन्य जीव या वस्तु से संबंध प्रस्थापित नही होता है।

    नमन।~ {Jignesh,  An identity}

  • jigneshpatel 4w

    The Emotions & Selfishness are interdependent.

    Selfishness is the main source,
    From where every emotion is born, otherwise only neutral observation conditions exist around us,
    The circumstances that we constantly translate into personal experience first and then translate it into personalization and translate it into personalization,
    It is to give continuous support to those virtual thoughts within us (ie our inner person) that this situation exists only for them.

    Greetings~

    स्वार्थ ही मुख्य स्रोत है,
    जहाँ से हर भावनाओं का जन्म संभव है अन्यथा हमारे आसपास केवल तटस्थ निरीक्षण की परिस्थितियों मौजूद है,
    जिस परिस्थितियों का हम सतत अनुवाद, पहले वैयक्तिक अनुभव में करते है और इसके बाद भावनाओं में अनुवाद करके इसका निजीकरण में रूपांतरण कर रहे है,
    ये हमारे भीतर के उन आभासी विचार (यानी हमारे भीतर के व्यक्त्वि) को सतत समर्थन देना है कि ये परिस्थिति केवल इनके लिए ही अस्तित्व में है।

    नमन।~ {Jignesh,  An identity}