jigna_a

ab tum koi aur nhi, ab mai hi tum ho, ab koi aas hi nhi jb, to koi nirash bhi nhi.

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  • jigna_a 10m

    शहीद जवान

    अंतिम चुंबन
    उसके सुर्ख़ होठों ने किया,
    रग रग में दाह उठा,
    शक्ति संचार के चरम तक,
    उसके हाथों ने
    रिपुदमन किया,
    खुरदुरी मिट्टी लगी थी
    जो होठों पे,
    उसे रेशम का आँचल लगती,
    जिसमें लिपट,
    अंतिम श्वास लिया,
    नहीं भूलेगी माँ भारती,
    रक्तरंजित बोसा अपने शिशु का,
    मिट्टी के कण कण में घुलकर,
    तेज़ चाल पवन से मिलकर,
    बन गया जैसे बवंडर,
    बाल बाल तेरा गाएगा गुणगान,
    माँ भारती के प्यारे संतान,
    मरता नहीं शहीद होता,
    देश का अमर जवान।
    ©jigna_a

  • jigna_a 1d

    "वो"

    इतनी लंबी ज़िंदगी
    यूँ देखो तो कितने किस्से,
    पर करने बैठोगे इसकी दास्तानगोई
    कुछ लम्हों के लंबे हिस्से।

    कुछेक "वो" में;
    सिमटी कहानी,
    ठहरा सा सहरा
    बहता सा पानी।

    रिश्तों के धागे
    उलझे उलझे से,
    अनमना कोई अपना
    और जो मन के, वो सपने।

    "वो" कोई सूरज सा
    दूर से दिखता,
    पर उसकी गर्मी से
    अपना जीवन पनपता।

    "वो" कोई जवाकुसुम
    खिलता, खिलखिलाता,
    "वो" कोई नागफनी सा
    चुभ के जीना सिखाता।

    "वो" लम्हों की फेहरिस्त
    सिमटी सी जिसमें जीस्त,
    कोई अधूरा मुकम्मल
    कहीं दिखती पूरी सी कहानी
    पर, पर
    समझ में ना आनी,

    एक "वो" कोई लम्हा
    एक "वो" शख़्स कोई,
    एक "वो" तेरा, तू ही
    आग़ाज़ से अंजाम तलक
    देगा साथ "वो" ही
    देगा साथ वो ही।
    ©jigna_a

  • jigna_a 2d

    सबने अगर को बहुत खूबसूरती से परिभाषित किया। फिर वो अल्का जी हो या अनु दी, आनंद जी, ज़ाकिर भाई, सोनालिका, प्रेम जी, सबने खूबसूरत लिखा।

    परंतु आज की विजयी कृति है ममता जी की। बहुत बधाई @mamtapoet

  • jigna_a 3d

    जो ख़्वाब मुकम्मल नहीं हो पाते,
    अश्क़ों के मोती बन निगाहों का नूर बन जाते हैं।
    ©jigna_a

  • jigna_a 3d

    ख़्वाहिशों का क्या है लहरों सी उठती रहती,
    तभी तो मन समंदर बनता है।
    ©jigna_a

  • jigna_a 3d

    #rachanaprati116 का संचालन मुझे सौंपने हेतु @psprem जी का धन्यवाद।

    तो दोस्तों आज का विषय/शब्द है "अगर'..

    अगर शब्द कितनी ही शक्यताएँ दर्शाता है। तो चलिए अपनी कल्पनाओं के पंख खोलिए और भरिए एक ऊँची उड़ान। तैयार है ना?

    समय सीमा... कल रात 10 बजे तक।
    ©jigna_a

  • jigna_a 3d

    इतनी हदें थी,
    कि मुहब्बत का दम घूँट गया,

    और दोस्ती मर गई।

    बेहद नहीं थे हम,
    पर प्यार हदें नहीं जानता,
    कोई एक मिले तो दिखाना,
    जिसे गिन गिन के मुहब्बत करनी आई हो।

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    फर्क़ बस इतना था,
    हम बेहद थे,
    वो सरहद से।
    ©jigna_a

  • jigna_a 4d

    नामुमकिन था कि मैं तेरी राह ना तकती रहूँ,
    दरवाज़ा आज भी खुला रख छोड़ा है
    बस, अब मैं वहाँ ना बसती हूँ।
    ©Jignaa

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    ये निगाहें जहाँ पथराई रहती थी,
    बस तुम्हारे इंतज़ार में,
    हमने उस राह से मुँह फेर लिया,
    तुम कहते हो मुश्किल है,
    देखो, हमनें कितनी आसानी से
    खुद को ही बदल दिया।
    ©jigna_a

  • jigna_a 4d

    घर ही स्वर्ग

    साढ़े आठसौ स्क्वायर फीट में
    तीन कमरें, रसोई और बाल्कनी,
    रोज़ बिस्तर की सिलवटें ठीक करने में
    उसे अपने बाल बनाना याद नहीं आता।

    कपड़े धोते धोते
    डिटर्जेंट के बुलबुलों में पार होती रोशनी
    और उससे रचते इंद्रधनुष के संग संग,
    परिवार के मंगल भविष्य के सतरंगी सपने सजाती।

    रोटियाँ बनाते वक़्त
    ऊँगलियाँ जल जाती
    पर सबके भरे पेट की सुर्खी
    चेहरों पे देख,
    वो आत्मसंतोष से भर जाती।

    जब भी गृहलक्ष्मी को कहा तीर्थयात्रा पे चलो
    स्वर्ग मिलेगा,
    उसने परमानंद सह अपने घर को देखा
    और बोली मैं स्वर्ग में ही तो हूँ!
    ©jigna_a

  • jigna_a 4d

    @anandbarun sir ��

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    हर रात निपटती रही तुझे याद कर,
    और दिन भी गुज़रता उसकी फरियाद कर।
    ©jigna_a