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Reposts
  • i_am_single 67w

    मंजिल के आगे भी एक सफर है "शुभम"
    यूं बिना प्यास के जीने की जीना नहीं कहते।
    ©i_am_single

  • i_am_single 67w

    ये चुनौतियों भरा सफर है इतना भी आसान नहीं
    बहुत मुश्किल होती है खाली हाथ घर की तरफ वापसी
    ©i_am_single

  • i_am_single 70w

    जानता नहीं है इश्क... मजहब, जात-पात की बातों को।
    लगता है वकालत करने वाला कोई अनजान आया है।
    ©i_am_single

  • i_am_single 70w

    बातों में अपनी तुम इश्क का नया दौर रखते हो,
    नजरे मिलाते ही नही और मुलाकातों पर जोर रखते है।
    ©i_am_single

  • i_am_single 71w

    यह सफर कभी-कभी यूं ही रूठ जाता है
    कोई अपना बहुत पीछे जब छूट जाता है..
    होता नहीं चांद का भी, दीदार कभी-कभी रातों में
    नींद आए बगैर ही सपना जब टूट जाता है।
    ©i_am_single

  • i_am_single 71w

    कभी दूर है, कभी पास है,
    मंजिल मिली नहीं......मगर आस है।
    ©i_am_single

  • i_am_single 71w

    यह सन्नाटे की रुखसत कहती है.."फुर्सत में,
    आओ कभी मिलने मुझसे, खुद से मुलाकात करने।"
    ©i_am_single

  • i_am_single 79w

    फुटपाथ

    कितने अफसोस की बात है कि "फुटपाथ" के किनारे बनी सड़कों का अपग्रेडेशन तो अमूमन हर साल हो जाता है मगर फुटपाथ पर बैठे गरीब लोगों को महज कंबल चढ़ाकर ही पुण्य कमा लिया जाता है। जैसे किसी पुरानी सड़क के खड्डों में किसी ने मिट्टी भरकर उसे काम चलाउ बना दिया हो।
    काश कोई इनके अपग्रेडेशन के लिए भी काम करता। "मांगने वाले" से "देने वाला" बनाता।
    ©i_am_single

  • i_am_single 79w

    नकारात्मक नतीजो से नही , बल्कि ...
    नकारात्मक लोगो से बचना ज्यादा जरूरी है ।
    ©i_am_single

  • i_am_single 79w

    मैं लिखता हूं ।

    कभी हवाओं संग बेमतलब बतियाने को
    कभी दिल को बहलाने- फुसलाने को
    कभी यूं ही चह- चहाता हूं मैं पक्षियों के संग
    कल्पनाओं को जीने को.. मैं लिखता हूं ।

    कभी उसकी आंखों में देख मुस्कुराने को
    कभी बहुत पास उसे बुलाने को
    कभी भीगने को उस संग भीगी बरसातों में
    नजदीकियां जीने को ...मैं लिखता हूं।

    कभी देश पर मर मिट जाने को
    दुश्मनों का खून बहने को...
    वीरों की वीर गाथा सुनाने को
    शहादत को सलाम..... मैं लिखता हूं।

    कभी लिखता हूं अपनी परिस्थितियों पर
    सरकार की बदलती नीतियों पर ...
    कभी शब्दों के संग तुकबंदी निभाने को
    दिल-ए दास्तां ....मैं लिखता हूं।
    ©i_am_single