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  • hinsfn 14w

    तेरे ख़त के खाली लिफ़ाफ़े में
    कुछ खुशबू तेरी भी थी
    उन उंगलियों ने जहां मोड़ी थी चिठ्ठी
    वहा दबी एक अकेली सिसकी भी थी
    बहुत कुछ था तेरी चिठ्ठी में
    ना आने की गमी खाली लिफ़ाफे में थी
    जहाँ होंठो से छुआ था लिफ़ाफे को तूने
    वहा नमी अभी कुछ बाकी सी थी
    कुछ बातें मुझसे से कर गई वो
    जो तुमने खुद, कभी कहीं न थी
    रुक रुक के आंहे भरती रही वो
    मानो, ना जाने कब से वो सफर में थी
    तुम्हारी कही सब बता गई वो मुझे
    जो अनकही थी वो शायद अश्को के निशां में थी
    ज़र्रे-ज़र्रे से लिपट कर कुछ इस कदर रोया फ़िर मैं,
    पता न था इतनी उदासी छुपी मुझ में थी..
    ©hinsfn

  • hinsfn 17w

    Ek shaam bhudhi jehi..
    Ohndi hai yaad menu kade kade..,
    Surme wangu kichdiya likka..
    Aundiya kataara chade chade..,

    Meri karkash jehi awaaz vichu..
    Sun jandiya loriya je jade jade..,
    Luk ke gallan kardiya nahi phir..
    Meriya usadiya rijja palle palle..,

    Rangte mitti suraj taare..
    Jive hikk ch angaar dabbe dabbe..,
    Vekh k muh ohda thand si paindi..
    Jive Shimle manali barf naal kajje kajje..,

    Hikk vich dauda khichiya har baari..
    Jadd v teri auni mainu sune sune..,
    Tur jaandiya raaha jive chad manzilla nu..
    Ohna nahi kade phir hath fade fade..,

    Lehndiya nahi ne mehendiya hatha chu..
    Je rang kismat de ishqaa naalo gudde gudde..,
    Mein padh chadiya kataba saariya..
    Phir v nahi pade tere udde...kudde
    ©hinsfn

  • hinsfn 21w

    बोल लेते हैं वो जमाने भर से
    पर घर में दिल का हाल नहीं खोलते
    मेरे मकाँ के है चार कमरे यारो
    लेकिन आपस में नहीं बोलते

    रख लेते हैं दीवार वो अपनी अपनी
    खिडकियो के लिए तो वो सुरख सुराख भी नहीं छोडते
    कहीं चोखट पे ही न मिलना हो जाए
    वो डर से दरवाजा भी नहीं खोलते

    सांझी कुरसिया मेज़ सजायी थी कभी
    अब तो बैठे उनपे गुठलिया आम की भी नहीं चूस्ते
    फलो के मौसम कई आए और कई गए
    सजायी कुर्सियों की गर्द भी नहीं अब वो पोछते

    ले आते हैं वो गूम की ढ़ेर सारी बातें
    बातों की गूम को पर कभी नहीं टटोलते
    भली बुरी सब बातें की हैं आपस में, ज़ेहन में
    पर उन बातों को कभी लबो पे नहीं उकेरते

    तुम जाना कभी मेरे घर की और
    देखना वहा यादो के कबूतर तो नहीं ठहरते
    उड़ा देना चबूतरो से, घरौंदे तोड़ देना
    सिर्फ चार कमरो से ही तो घर नहीं संजोते
    ©hinsfn

  • hinsfn 49w

    मेरी रबी खरीफ की फसलों में
    मानो फ़ासले बढ़ते जाते है
    इन दाने बोते कबूतरों के
    मानो पेट कटते जाते है
    ऊपजाऊ मेरी भूख को
    बंजर तख्त परोसे जाते है
    अक्सर लूट जाते है मेरे कारवाँ पहले
    फिर मेरे ऊठ काटे जाते है
    मेरी रबी खरीफ की फसलों में
    मानो फ़ासले बढ़ते जाते है
    ©hinsfn

  • hinsfn 51w

    कोई आए तो सिखा जाये मुझे
    की मुझे रोने का ढ़ंग नही आता
    आता है डाकिया हर रोज़ मेरी गली में
    नजाने मेरे नाम का खत क्यों नही आता
    लौट आते है तेरे सभी वाक्या ज़हन में
    कोई मुझ मख़सूस को अकेला छोड़ के नही जाता
    बाकी तोह मसलसल सब आता है मुझे
    बस एक मुझे रोने का ढंग नही आता
    ©hinsfn

  • hinsfn 94w

    कश्तियाँ दूर छोड़ आया हूँ
    ये कह कर सूरज फिर समन्दर में डूब गया
    वो बुझा गया सारी बत्तियां कमरें की
    सिमटा के बिखरीं किरणे अपनी वो क्या खूब गया
    मख़मली कोयलें-सी उढा गया तश्तरी वो
    मखाने ईद के जड वो अम्बर में, कुछ इस तरह गया
    के मालूम लगे देखने वालो को,
    नजाने कौन मोगरे घने गेसुओं में यू गूंध गया
    ©hinsfn

  • hinsfn 101w

    बेबस बहुत है इंसा
    घर की दीवारों और दरवाज़ों के बीच
    ढूंढता हु दर दर मैं गुम को
    शोर बहुत है मेरे कानो के बीच
    कट-ती है नब्ज़ और बिखरते है बाल
    चलती सुई के काँटों के बीच
    अब आलम है, थक-सा जाता है बदन मेरा
    सुबह और रात की करवटों के बीच
    मायूसी का हल्का-हल्का आलम
    उतर आया है दोनो बोहो के बीच
    चला लेता हू कुछ कदम दिल को
    अकसर बैठा मिलता है भीड़ में, सन्नाटों के बीच
    ©hinsfn

  • hinsfn 104w

    लिख के जो बयान हो जाये
    कोई एसा दर्द मैं काश पालू
    जो अल्फाज़ो में सिमट न पाए
    ऐसे क्यों मर्ज़ मेरे पास है
    उतारे उतरते नही है ये
    तू ही बता किस हिस्से तेरे एहसान डालू
    यादो का सूद जो चढ़ा रहे है मुझ पे
    ऐसे क्यों क़र्ज़ मेरे पास है

    हम बिस्तर हुई तेरी बातो को
    किस तरह अपने आप को फिर सुनालू
    वो जो प्यार से तुम मुझे देखती थी
    सब नज़रे दर्ज मेरे पास है
    सुबह तुम्हारी नज़रे भीड़ में मुझे जो ढूढती थी
    कैसे वो पल में एक दम ही भुलालू
    उन सुबहो की तुम्हारी आंखों की ललाहट
    बैठी आज भी मेरे पास है

    मेरा हाथ पकड कर वो बैठाती है
    अब तुम ही बताओ कैसे उससे मुह फिरालू
    इतने वादों के बाद तुम न रही संग मेरे
    बिन वादों के भी तुम्हारी याद मेरे पास है
    ©hinsfn

  • hinsfn 105w

    एक हथेली और बढ़ा लेती है
    और मांग लेती है कायनात सारी
    वो बूढ़ी है, उसे सुबह उठना है,
    दफ्तर जाते लोगो से मांगनी है खैरात सारी

    रेज़गारी का ही तो बचा है भार सारा
    ज़िन्दगी तो हो गयी है हल्की सारी
    जब कोई थमा जाता है नोट गलती से हाथ में
    उंगलियो को कागज़ की खा जाती है कशमकश सारी

    मरहम भूख लगा देती होगी
    आने ना देती होगी दुख की याद सारी
    वो भी क्या घर होता होगा
    जिसकी सुबह, पानी मिटाता होगा भूख सारी

    मुझे उठना है, मुझे चलना है,
    हर किसी की ज़िन्दगी की यही होगी कहानी सारी
    बूढ़ी का वक़्त थमा है,
    बस अब इंतज़ार अगले निवाले का, की कब रसीद हो
    या फिर कब रुके ये नब्ज़ सारी की सारी
    ©hinsfn

  • hinsfn 114w

    कभी ना लिखने का भी दिल करता है
    जो पिघला के लोहा भर दी है सांस ज़िन्दगी ने,
    उसे हाफ के एक बार भरने को दिल करता है

    कसूरवार ही हो मेरे लम्हे ये ज़रूरी तोह नही,
    बिना गुनाहों के भी इनपे कभी इल्ज़ाम धरने को दिल करता है

    कुछ सांसे तंग सा महसूस करने लगी है अब,
    शायद भर गया है इनका मन तभी ना कुछ करने को दिल करता है

    मेरी तमन्नाओं की मुनियाद अब पूरी जान पड़ती है
    लटकते इनके पैर कबरगाहो में प्रतीत दिल करता है
    ©hinsfn