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  • hindikavyasangam 20w

    @shriradhey_apt ( I AM SORRY)

    LEAVING ..... THE WORLD OF POETRY.

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    यात्रा, सदैव सुखद नहीं होती।
    आज हम हो कर भी नहीं हैं,
    कारण, परिवार के सदस्यों के बीच मतभेद,
    परिवार की रीढ़ उसका मुखिया होता है।
    मैंने एक सपना देखा था,
    उस सपने के साथ एक परिवार बनाया था,
    सपना सच हुआ, परिवार में हर एक सदस्य ख़ुश था,
    फिर, सब ख़त्म हो गया।

    हम आये बार बार पर वो रंगत नहीं ला पाए।

    हिंदी काव्य संगम, ख़त्म हो चुका है।

    मैं सबसे माफ़ी माँगता हूँ कि, मैं अपने किये वादों को पूरा नहीं कर पाया।
    - शेखर शुक्ला
    ©hindikavyasangam

  • hindikavyasangam 46w

    आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
    आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आएगी
    सब उठो, मैं भी उठूँ तुम भी उठो, तुम भी उठो
    कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी

    ये ज़मीं तब भी निगल लेने पे आमादा थी
    पाँव जब टूटती शाख़ों से उतारे हम ने
    उन मकानों को ख़बर है न मकीनों को ख़बर
    उन दिनों की जो गुफाओं में गुज़ारे हम ने

    हाथ ढलते गए साँचे में तो थकते कैसे
    नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हम ने
    की ये दीवार बुलंद, और बुलंद, और बुलंद
    बाम ओ दर और, ज़रा और सँवारे हम ने

    आँधियाँ तोड़ लिया करती थीं शम्ओं की लवें
    जड़ दिए इस लिए बिजली के सितारे हम ने
    बन गया क़स्र तो पहरे पे कोई बैठ गया
    सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिए

    अपनी नस नस में लिए मेहनत-ए-पैहम की थकन
    बंद आँखों में उसी क़स्र की तस्वीर लिए
    दिन पिघलता है उसी तरह सरों पर अब तक
    रात आँखों में खटकती है सियह तीर लिए

    आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
    आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आएगी
    सब उठो, मैं भी उठूँ तुम भी उठो, तुम भी उठो
    कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी
    ©कैफ़ी आज़मी

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    नज़्म

    मकान
    ©कैफ़ी आज़मी

  • hindikavyasangam 46w

    सदाएँ देते हुए और ख़ाक उड़ाते हुए,
    मैं अपने आप से गुज़रा हूँ तुझ तक आते हुए।

    फिर उस के बा'द ज़माने ने मुझ को रौंद दिया,
    मैं गिर पड़ा था किसी और को उठाते हुए।

    कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई,
    कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए।

    फिर उस के बा'द अता हो गई मुझे तासीर,
    मैं रो पड़ा था किसी को ग़ज़ल सुनाते हुए।

    ख़रीदना है तो दिल को ख़रीद ले फ़ौरन,
    खिलौने टूट भी जाते हैं आज़माते हुए।

    तुम्हारा ग़म भी किसी तिफ़्ल-ए-शीर-ख़ार सा है,
    कि ऊँघ जाता हूँ मैं ख़ुद उसे सुलाते हुए।

    अगर मिले भी तो मिलता है राह में 'फ़ारिस',
    कहीं से आते हुए या कहीं को जाते हुए।
    ©रहमान फ़ारिस


    तिफ़्ल-ए-शीर-ख़ार -- छोटा बच्चा जो माँ का दूध पीता हो। (दूधमुँहा)

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    सदाएँ देते हुए और ख़ाक उड़ाते हुए..
    ©रहमान फ़ारिस

  • hindikavyasangam 48w

    कविता, ग़ज़ल लिखने के लिए ईमानदार होना ज़रूरी है।
    जो चोरी, झूठ की आड़ में रहता है, वो ना ख़ुद कभी कुछ सीख पाता है, ना दूसरे उससे कोई प्रेरणा लेते है।

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    मिराकी एक अच्छा प्लेटफार्म है, पिछले 3 सालों में यहाँ से कई लेखकों ने अपना मुक़ाम हासिल करा है। हाँ, बाद में उन्होंने इस प्लेटफार्म को छोड़ दिया, हमारे साथ में अभी भी ऐसे अच्छे लिखने वाले है, जो वास्तव में बेहद अच्छा लिखते है और उन्होंने अपनी इस कला को प्रतिष्ठित मंच से सब तक पहुँचाया है।

    हम आपसे एक विनती करते है कि किसी को प्रोत्साहित करना बुरी बात नहीं है पर, आप अगर एक ही कमेंट को 100 लेखकों की वाल पर पोस्ट करेंगे और ख़ुद की रचनाओं को उन पर थोपने की कोशिश करेंगे तो फिर आप झूठ के उस बालुई टीले पर खड़े हैं जहाँ, सिर्फ एक लहर उस टीले को हमेशा के लिए डूबा देगी, बचे रह जाएंगे कुछ एक अवशेष, उन अवशेषों में शामिल होगा, आपका जज़्बा कविता, ग़ज़ल लिखने का।

  • hindikavyasangam 51w

    वस्तुतः
    मैं जो हूँ
    मुझे वहीं रहना चाहिए
    यानी
    वन का वृक्ष
    खेत की मेड़
    नदी की लहर
    दूर का गीत
    व्यतीत
    वर्तमान में
    उपस्थित भविष्य में
    मैं जो हूँ मुझे वहीं रहना चाहिए
    तेज गर्मी
    मूसलाधार वर्षा
    कड़ाके की सर्दी
    खून की लाली
    दूब का हरापन
    फूल की जर्दी
    मैं जो हूँ
    मुझे अपना होना
    ठीक ठीक सहना चाहिए
    तपना चाहिए
    अगर लोहा हूँ
    हल बनने के लिए
    बीज हूँ
    तो गड़ना चाहिए
    फल बनने के लिए
    मैं जो हूँ
    मुझे वह बनना चाहिए
    धारा हूँ अन्तः सलिला
    तो मुझे कुएँ के रूप में
    खनना चाहिए
    ठीक जरूरतमंद हाथों से
    गान फैलाना चाहिए मुझे
    अगर मैं आसमान हूँ
    मगर मैं
    कब से ऐसा नहीं
    कर रहा हूँ
    जो हूँ
    वही होने से डर रहा हूँ।
    -भवानीप्रसाद मिश्र

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  • hindikavyasangam 51w

    तुमसे अलग होकर लगता है
    अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं,
    और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में
    गिरता जा रहा हूँ।
    अब कहीं कोई यात्रा नहीं है,
    न अर्थमय, न अर्थहीन;
    गिरने और उठने के बीच कोई अंतर नहीं।

    तुमसे अलग होकर
    हर चीज़ में कुछ खोजने का बोध
    हर चीज़ में कुछ पाने की
    अभिलाषा जाती रही
    सारा अस्तित्व रेल की पटरी-सा बिछा है
    हर क्षण धड़धड़ाता हुआ निकल जाता है।

    तुमसे अलग होकर
    घास की पत्तियाँ तक इतनी बड़ी लगती हैं
    कि मेरा सिर उनकी जड़ों से
    टकरा जाता है,
    नदियाँ सूत की डोरियाँ हैं
    पैर उलझ जाते हैं,
    आकाश उलट गया है
    चाँद-तारे नहीं दिखाई देते,
    मैं धरती पर नहीं, कहीं उसके भीतर
    उसका सारा बोझ सिर पर लिए रेंगता हूँ।

    तुमसे अलग होकर लगता है
    सिवा आकारों के कहीं कुछ नहीं है,
    हर चीज़ टकराती है
    और बिना चोट किये चली जाती है।


    तुमसे अलग होकर लगता है
    मैं इतनी तेज़ी से घूम रहा हूँ
    कि हर चीज़ का आकार
    और रंग खो गया है,
    हर चीज़ के लिए
    मैं भी अपना आकार और रंग खो चुका हूँ,
    धब्बों के एक दायरे में
    एक धब्बे-सा हूँ,
    निरंतर हूँ
    और रहूँगा
    प्रतीक्षा के लिए
    मृत्यु भी नहीं है।
    -सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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  • hindikavyasangam 52w

    तुम्हारे साथ रहकर
    अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है
    कि दिशाएँ पास आ गयी हैं,
    हर रास्ता छोटा हो गया है,
    दुनिया सिमटकर
    एक आँगन-सी बन गयी है
    जो खचाखच भरा है,
    कहीं भी एकान्त नहीं
    न बाहर, न भीतर।

    हर चीज़ का आकार घट गया है,
    पेड़ इतने छोटे हो गये हैं
    कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
    आशीष दे सकता हूँ,
    आकाश छाती से टकराता है,
    मैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ।

    तुम्हारे साथ रहकर
    अक्सर मुझे महसूस हुआ है
    कि हर बात का एक मतलब होता है,
    यहाँ तक की घास के हिलने का भी,
    हवा का खिड़की से आने का,
    और धूप का दीवार पर
    चढ़कर चले जाने का।

    तुम्हारे साथ रहकर
    अक्सर मुझे लगा है
    कि हम असमर्थताओं से नहीं
    सम्भावनाओं से घिरे हैं,
    हर दिवार में द्वार बन सकता है
    और हर द्वार से पूरा का पूरा
    पहाड़ गुज़र सकता है।

    शक्ति अगर सीमित है
    तो हर चीज़ अशक्त भी है,
    भुजाएँ अगर छोटी हैं,
    तो सागर भी सिमटा हुआ है,
    सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है,
    जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
    वह नियति की नहीं मेरी है।
    -सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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