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  • himanshuchaturvedi 5w

    इन मुस्काती हुई आंखों के पीछे
    कुछ हजार खामोशियां हैं
    कभी शून्य अंधेरे से उठ के चले थे हम
    तभी कदमों में हमारे आज
    कई हजार रोशनियां हैं..
    .
    ©himanshuchaturvedi

  • himanshuchaturvedi 6w

    जो अनचाही अनमांगी खुशियां
    आ गिरी थी झोली में कभी
    उनके न होने का अब गम क्यूं है.?
    जितना समय मिला था हमको
    वो तो शायद किस्मत से बहुत था
    पर अब फिर भी लगता वो कम क्यूं है.?
    और जिनसे सदा ही मुस्काती थी आंखे..
    ये आंखे आज उन्ही से नम क्यूं है.?

    ©himanshuchaturvedi

  • himanshuchaturvedi 6w

    कभी कभार जरूर कुछ गिद्ध कोए आ बैठे हैं शिकार देखने के लिए
    उनसे मुझे भी थोड़ा दर लगता है
    बारिश में जब बूंदें मेरे पत्तों से होते हुए ज़मीन
    और फिर जमीन से होते हुए मेरी जड़ों तक पहुंच कर ठंडक पहुंचाती थी
    बड़ा सुकून मिलता था
    पत्तों में जो बारिश बाद कुछ बूंदें जो ठहर जाया करती थी
    हवा के चलने पे उनका मुझ से झरना..अभी तक महसूस होता है
    कभी कभी तो सर्दियों में औंस की नन्हीं नन्हीं बूंदें जो जम जाया करती थीं
    एकदम मोतियों सी लगती थीं
    जैसे हर एक डाल को और हर एक पत्ते को मोतियों से सजा दिया गया हो और जब सूरज की किरण उन पे पड़ती थी तो उनकी चमक किसी को भी रुक के देखने पे मजबूर कर दे
    पर अब ऐसा कुछ नहीं होता..ये सब एहसास और यादें बने रह गए हैं
    पर बदलते वक्त में एक चीज जो सब से खास समझ पाया हूं वो ये की
    जब समय हमारे साथ चलता है तो दुनिया खुद-ब-खुद हमारी और झुकने लगती है
    पर वहीं अगर समय उल्टा पड़ जाए तो साथ वाले भी साथ छोड़ देते हैं
    सब कुछ विपरीत हो जाता है
    आपके अपने भी आपसे दूरियां कर लेते हैं
    देखा है मैने..या देखा तो पहले भी था
    पर महसूस अब करने लगा हूं
    अब जो कुछ लोग मुझे देखते हैं..वो या तो इस इंतजार से
    की अब तक कैसे ये अड़ा हुआ है..खड़ा हुआ है
    या फिर मुझे काट देने की तुक में

    पर ठीक है..कुछ भी दुनिया में स्थाई नहीं है ये
    जान लेना समझ लेना ही अहम है
    ताकि हम अपने किए और कर रहे कामों के प्रति जागरूक हो के निश्चय कर सके ये पहचान सके की हमारा क्या है और कौन है

    "दिन बदलता है
    वक्त बदलता है
    जो साथ हैं वो भी नहीं रुकते
    एक मोड़ पे छोड़ जाते हैं
    खड़े अकेले हम इस इंतजार में है
    बिकता है सब कुछ यहां
    हम ये किस बाज़ार में हैं"
    इतनी खुशियां जब मेरे नाम लिखी थी उसने
    तो ये वक्त भी मेरे नाम ही है..कोई शिकायत नहीं करूंगा ऊपर वाले से
    बस खड़ा रहूंगा..जड़ें अभी भी मजबूत हैं मेरी
    पहले की तरह
    फिर से मौसम बदल जाने की आस लिए
    बाकी जो ये खुदा चाहे

    ©himanshuchaturvedi








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    #stroytelling
    @panchdoot @writersnetwork @miraquill

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    बूढ़ा दरखत

    आज अकेला वीराना खड़ा हुआ
    समय गुजरते हुए देखता रहता हूं
    हां... बूढ़ा दरख़्त...मैं ही हूं
    ये जो बड़ा सा ठूंठ सा सुखा खड़ा हुआ
    ये मैं ही हूं
    हालांकि हमेशा से मैं ऐसा नहीं था
    ये अकेलापन, ये बेजान शाखें
    ये सूनापन, ये सब नया नया है मेरे लिए
    अभी ही इन्होंने घेरा है मुझ को
    कुछ साल पहले मैं भी था
    हरा भरा..घने पत्ते..बड़ी बड़ी शाखों पे चहचाहट रहा करती थी
    लोग आते जाते बड़े ही आश्चर्य से देखा करते थे
    कुछ राहगीर कभी थोड़ा रुक के सुस्ता भी लेते थे
    और तरह तरह के पक्षी..उनका तो रोज आना जाना लगा रहता था
    उनके चहचहाने की आवाज तो पूरे दिन भर मुझे सुकून देतीं थी
    कई लोगों की पूरी पूरी उम्र देख चुका हूं मैं
    बचपन से लेकर जवानी..जवानी से बुढ़ापा और
    बुढ़ापे से लेकर खुदा के घर तक का सफर
    कई बार देख चुका हूं
    इसी दौरान काफी कुछ सीखा और देखा भी है मैने
    अच्छा बुरा..बदलते मौसम..बदलते ज़माने और बदलते लोग भी
    बीतते वक्त के साथ हमारी सीख और समझ गहरी होती जाती है
    वही मैने भी अनुभव किया था
    पर अब..या यूं कहूं कुछ साल पहले कुछ इस तरह से पतझड़ आया को उसके बाद से आज तक भी वो मुझे थाम के रुक गया है
    और इन सालों में इतनी तेजी से चीजें बदली हैं जैसा कि मैंने पूरी उम्र नहीं देखा
    न जाने क्यों सब इतना तेजी से बदलने लगा है
    जैसे जैसे मेरे पत्ते झड़ते गए हैं
    वैसे वैसे राहगीरों का आना और रुकना कम होता गया
    न लोग मुझे उस तरह से देखते थे न मेरी खास बातें होती हैं
    जो जानवर भी कभी रुकते थे आराम करने को..वो
    अब आस-पास से भी गुजरते नही हैं
    धीरे धीरे..सब कुछ बदलता गया..
    और मैं बस ठूंठ सा बन के रह गया
    पहले तो मुझे लगता था की शायद इस बार पतझड़ कुछ लंबा रहा होगा इसलिए ऐसा है
    और हर बार की तरह चीज़ें फिर से दुरुस्त हो जाया करेंगी
    पर जब काफी समय तक हालत न बदले तो महसूस हुआ
    की अब शायद मेरा समय हो उठा है
    अब बुढ़ापा आ बैठा है मुझ पर
    जो पक्षी कभी मेरी डालों पे उछाल कूद कर के
    मीठे सुरों में चहचहाते थे..उनका भी आना धीरे धीरे कम
    और फिर अब बंद हो गया है


    (**Contd in Caption**)
    .
    ©himanshuchaturvedi

  • himanshuchaturvedi 6w

    मैंने ख़ुदा को देखा
    और हाथ उठाया
    मेरी निगाहों के सामने
    मगर तेरा चेहरा आया
    आंखें बंद की
    उसको देखने के खा़तिर
    तू वहां भी न रुका
    मेरे ज़ेहन में उतर आया
    मैंने दुआं अता की
    नाम उसका ले कर
    पर इन लबों से
    तेरा नाम बाहर आया
    अब खुदा करूं तो मैं क्या करूं
    मुझे तू ही बचा
    मैं तो अब तेरे दर पे आया
    .
    ©himanshuchaturvedi

  • himanshuchaturvedi 8w

    तन्हाईयां कैसी हैं ये दिलों में हमारे
    हर वक्त हैं भीड़ में फिर भी जीते हैं यादों के सहारे
    नींद बढ़ने लगी हैं मगर ख़्वाब घटने लगे हैं
    बस साल-दर-साल काट रहे हैं..बिन जिए लम्हे..बिन वक्त गुज़ारे
    .
    ©himanshuchaturvedi

  • himanshuchaturvedi 9w

    जब चलोगे अकेले तुम
    उस राह पे
    साथ तुम्हारे कोई न होगा
    बस कुछ सितारे होंगे
    और कुछ अंधेरा होगा
    कुछ तन्हाई साथ चलेगी
    और इक उम्मीदों का झोला होगा
    कदम लड़खड़ाएंगे कई बार
    तो खुद ही को खुद संभलना होगा
    गर जो कोई हाथ मिल भी गया तो
    उसका दूर तक न चलना होगा
    थकन होगी
    पर कदम रुक न सकेंगे
    मंजिल भले दूर होगी
    पर फिर भी चलते रहेंगे
    सफर में हौसले कुछ पस्त भी होंगे
    और कई सूरज सामने हमारे अस्त भी होंगे
    पर जो ढल गया..वो फ़िर उगेगा तो सही
    ये एक पूरा चक्कर है यार
    आज नहीं तो कल..बदलेगा तो सही
    देर ही सही...चाहा है वो मिलेगा तो सही
    हम तो यकीन माने बैठे हैं
    ये साया जो है वो कभी छटेगा तो सही
    सूरज न होगा तो क्या
    हम खुद ही जलेंगे
    चांद ना भी आया तो क्या
    हम रात भर जुगनू बन के चलेंगे
    फिर जब भी कभी नया सवेरा होगा
    सच मानो..दिल को सुकून और भी कुछ गहरा होगा
    और जो रात अकेला छोड़ गए थे
    उन ही लोगों का फ़िर से..पास हमारे बसेरा होगा
    बस कुछ जो हिम्मत है वो दिल से मांग के
    हमको अभी तो बढ़ना होगा
    जब इतना आगे निकल आए हैं
    पीछे क्या खोया पाया
    अब और न उसमे पड़ना होगा
    बस वक्त कुछ और..समझाते बुझाते खुद को
    अभी चलना है...और थोड़ा चलना होगा
    .
    ©himanshuchaturvedi

  • himanshuchaturvedi 9w

    एक फूल तोड़ा गया
    किसी की गुल-ए-मुस्कान के लिए
    उस गुलशन के सारे भंवरे
    जैसे रूठ गए मानो
    एक आशिक इंसान के लिए
    सिर्फ़ फूल रहा होगा वो
    हम तुम से इंसान के लिए
    पर उस पल की वो रौनक था..
    पूरे गुलिस्तान के लिए
    .
    ©himanshuchaturvedi

  • himanshuchaturvedi 9w

    ये मुस्कान ही देखी है तुमने सदा
    तो उनका दर्द कहां देख पाओगे
    हस्ते हैं जहां भर में वो
    उनके आंसू कहां पहचान पाओगे
    ज़ख्म उनको भी हैं... वैसे ही
    जैसे हमने-तुमने दिल पे खाए हुए हैं
    पर तुम तो तौफे में भर भर नमक लाते हो
    तो फिर उनकी आह.. कहां जान पाओगे
    .
    ©himanshuchaturvedi

  • himanshuchaturvedi 9w

    तुम्हे देख आसमा..कुछ खिलखिलाया
    चांद भी कुछ थोड़ा मुस्कुराया
    चांदनी शर्मा उठी होगी
    सितारों ने कहा होगा...
    ..देखो हमारा यार आया
    .
    ©himanshuchaturvedi
    .

  • himanshuchaturvedi 9w

    मुस्कुराहट बनी तुम सदा ही
    आज तुम्हारे नाम से आंखों में ये पानी क्यूं है
    जिंदगी खिलखिलाती थी तुमसे तो मेरी
    आज वही जिंदगानी इतनी बेगानी क्यूं है
    बदला ही क्या है
    तुम्हारे न होने के अलावा इस सफ़र में
    तो ख़ुद को आज ख़ुद देख के
    मुझे इतनी हैरानी क्यूं है...

    ©himanshuchaturvedi