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  • himaang 4h

    असमंजस...

    कि समझ उतनी ही थी मेरी और मैं ज़िंदगी उतनी ही जीता था..
    होंगे मायने नए दौर के तो हो सही..मेरा कल तो बस उस दायरे में बीता था..

    कॉफ़ी की चुस्कियों के बीच पीढ़ियों के अंतर को नापने वाले..
    कोई समझाए उन्हें..मौलिक़ ज़रूरतों को पूरा करते मेरा हर पल बीता था..

    मेरे बच्चे मुझसे खींज़ जाते हैं आज़..मेरे रूढ़िवादी विचारों को सुनकर..
    हाँ वही..जिनके परवरिश के स्वार्थ में हर अपमान को मैं बेझिझक़ पीता था..

    शायद उम्र बढ़ती जाती है..और समन्वय बैठ नहीं पाता है..
    याद यह नहीं आता..अपने ज़माने में इन जज़्बातों को मैं कैसे सीता था..

    ख़ैर मैं विकास के ख़िलाफ़ नहीं हूँ और नयी सुबह का स्वागत भी करता हूँ..
    बस भूला न जाए..इस दौर के बीज़ को हमने अपने कल में सींचा था..

    पर समझ यह नहीं आता..कि यह सब मैं आज़ क्यूँ लिख़ रहा हूँ..
    क्या पता कल अपने बुजुर्गों को भी मैंने..इसी ऊहा पोह में कभी घसीटा था..

    ©himaang

  • himaang 34w

    इम्तेहान...

    जब तलक है ज़िंदगी.. इसे खुशहाल हो जीते जाना है..
    कर पाओ जितना बर्दाश्त तुम.. गुस्से को अपने पीते जाना है
    आएंगे ऐसे मुक़ाम और डगमगा देंगे तुम्हारे ठोस इरादों को..
    बस याद रहे.. ये इम्तेहान ए ज़िंदगी तुम्हें ताउम्र लिखते जाना है..

    ©himaang

  • himaang 34w

    एहसास...

    हो हताश और निराश क्यूं.. जब सम्मान तुमने नहीं खोया है?
    क्यूं फ़िक्र करते हो बबूल की.. जब आम तुमने बोया है?
    हो गलतियां ग़र लोगों से.. तो एहसास उनको होना चाहिए..
    क्यूं रोते हो फ़िर तुम.. जब प्यार ही है.. जो तुमने पिरोया है?!

    ©himaang

  • himaang 34w

    माँ...

    पौ फटते ही वो आंगन के द्वार पर खड़ी मिलती है..
    माँ मेरी अपने दिन की शुरुआत कुछ इस तरह करती है..
    हो बारिश या हो चिलचिलाती धूप की रोशनी..
    माँ हर मुश्किल को मुस्कुराते बाहों में भरती है..

    ना दुःख इस जीवन में.. ना शिकवा इस ज़िंदगी से..
    कर्म को सिर आंखों पर रख वो अडिग हो आगे बढ़ती है..
    ऐसा नहीं है कि उसे कभी अपने आप पर तरस नहीं आता..
    वो तो बस बारिश में छिपकर अपनी आहें भरती है..

    ©himaang

  • himaang 34w

    Dhaagaa!

    Some songs move you to the core..so much so that you end up retrofitting every damn scenario that you've been through.. completely ignoring the fitment..!

    And I say that's the enigma of beautifully woven words..!

    I'm madly in love with Dhaagaa#TVFAspirants!

    ©himaang

  • himaang 35w

    कोशिश...

    सोचा है कभी कि.. उलझनों के ठीक उस पार होते हैं समाधानों के समंदर..
    उसी प्रकार जिस तरह काले बादलों के ठीक उस पार होते हैं संभावनाओं के बवंडर..
    ज़रूरत होती है तो बस उस पार देख पाने तक के संयम की..
    पर अफ़सोस.. उम्मीदों के ऊष्णता में भस्म हो कर रह जाते हैं तो बस.. कोशिशों के खंडहर..

    ©himaang

  • himaang 35w

    जिंदगी...

    अक़सर ज़िंदगी के उधेड़ बुन में.. इंसान कहीं यूं खो जाता है..
    यूं ही ख़ूब कमाने वाला भी अक्सर.. भूखे पेट ही सो जाता है..
    तरक्की की ऊंचाइयों पर भी.. उसे सुकून नहीं मिलता..
    हर रात मीठी नींद का तोहफ़ा.. कुछ लोगों को ही नसीब हो पाता है..

    ©himaang

  • himaang 51w

    माँ..

    गहरी यादों के समंदर में भला कौन भींगने आया.. कौन है..
    माथे को सेहराते माँ को बैठे महसूस किया.. बस मौन है..
    वाक़ई.. ममता के इस मूरत के लिए..
    सोंखते तकिए और जागती आंखों के सामने सब.. सब गौण है..

    ©himaang

  • himaang 54w

    गुज़र गई...

    तमन्नाओं की आर में.. ज़िंदगी गुज़र गयी..
    रिश्तों के ऐतबार में.. ख़ुद की ख़ुशियाँ उजड़ गयी..
    अभी ताज़ा ताज़ा दबा ही था दुनियादारी के कर्ज़ तले..
    कि हल्के में सारी उम्र गुज़र गयी..

    ©himaang

  • himaang 73w

    अर्ज़ किया है ...

    जी.. किस्मती या बदक़िस्मती का आँकलन तो हम दिन के अंत में करते हैं..
    कि अकस्मात् कोई गफ़लत ना हो जाए.. इस बात से डरते हैं..

    ©himaang