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  • hemlatajain 32w

    चक्र

    छुपके से घड़ी की सूई सरकी
    सरक गया उसी, क्षण पल!
    देखते देखते मिनटों में
    पहर बदल गये एक दो करते करते
    महिनों ने करवट ली,
    दिसम्बर ने दस्तक दी
    लो एक्किस के सामने बाविस खड़ा हुआ!
    कलेण्डर बदलते ही, उमर ढल ग ई
    आंखों में यादे बस गई!
    मौसम ने रंग बदले, समय ने वक्त बदला
    अमावस्या पूर्णीमा गृहों की
    निगरानी में जिंदगी फिसल गई!
    अरमानों की घुटन में
    बादल न जाने कब बुंद बुंद करके अरमा समटे
    नये ऋतु राज में फिर से
    बिखरी फूहारे नया अंकुरण नव जीवन! !
    ©hemlatajain

  • hemlatajain 32w

    नूतनवर्ष

    बीस को झेला निकाल दिया ऐक्किस
    जैसे तैसे निकल गये दो बरस
    कितनों के घर आंगन सूने हूऐ
    कितनों ने जख्मों जख्म सहे
    हफरातफरी का बरस बिताया
    कितनों ने अपनों के जख्म सिये
    दो बरस में, दो शदी को जिया
    अपनी लेखनी से दूआए मागती
    एसे बरस किसी शदी में न आए
    नतमस्तक हो के हाथ जोड़कर अलविदा करती सन् 2021 को!
    कुछ भुल हुई हो क्षमा करना
    नव आस की नयी किरण फूटी
    तेहदिल से सवागत करतीं नव् बरस का
    प्रक्रति खिलती रहे, जगमगाएंगे आसमां
    बागवान सुरक्षित रहे, रहे कलरव का शोरगुल
    है भगवान बरसाओ ऐसी दूआ
    जख्मो के निशान न रहे
    रहेगी तरक्की आने वाले सब सालों की क्या कि
    दो के बाजु में दो बैठ के 22आय है
    नये बरस की नयी कामनाओं के साथ आया है
    करतीं स्वागत नयें बरस 2022 को
    ©hemlatajain

  • hemlatajain 50w

    गोपाल

    चहूँ ओर हुआ अधर्म का बोलबाला
    बना दुष्ट कंस, सात संतानों का किया वध
    कुरता का अंत नही हुआ कारागृह में
    डाला माता देवकी वासुदेव को!
    झंकडा बेडियो, डाल कारावास में
    पार की सभी हदें कंस ने
    भादों सुदि अष्टमी की शुभ घड़ी
    देवकी की कोख से प्रभु जन्में
    पल में टुट पडीं बेडियां जमीं पर
    बंधिगृह से ताले सभी अपने आप खुल गये
    हुए विष्णु अवतरित कान्हा रूप!
    जब वासुदेव चले भगवान को बचाने
    यमुना तट पर प्रभु ने किया अंगुठा बहार
    पानी हुआ नतमस्तक पृभु को देख
    दिया माता यशोदा की गोद में
    हूई धन्य गोद माता यशोदा की!
    देख चाल ठुमक ठुमक, कमर में बंधी कमरबंधी
    अति हृषित हूई माँ यशोदा
    पेरो में पंजनिया नाजनखरे से वारी वारी जाए यशोदा
    छुपके छुपके माखन खाये, आधा जमीं पर ढोरे
    सभी सखा सखीयों को बुला के मटकी फोड़ छूप जाऐ
    नटखट बालक से परेशान सभी माताऐ
    ढूँढ के लाई कान पकड़ कर सभी माताए
    बहाना करे बाल गोपाल तोहरी गईया चरावन जाऐ हम
    सखियों के वस्त्र चुरा के भागे
    बृज की गोपियों संग रास रचाते!
    ले के झुंड खलने यमुना तट गेंद गई यमुना में
    नाग कालिया पर सवार होके नृत्य करे
    मुह खुला तो कमल खिलते हुए प्रभु ने दर्शन दिये
    देख लिला भगवान की नतमस्तक हुए यमुना वासी
    ©hemlatajain

  • hemlatajain 51w

    तमन्ना

    छू ली बुलंदी जी लिया बहुत
    ऐसों शोहरत आराम की जिंदगी
    बहुत होने पर सुकू नहीं
    चारों ओर रस्साकशी सी जिंदगी
    होडाहोडी से हूँ पस्त
    अब बचपन की गोद ढूँढ रहीं!
    जिंदगी की तपन को जी लिया,
    बहुतअनगिनत राहों की राह पर चलती रहीं
    मिलीं कटिली राह बहुत
    चोराहो का अंसमजस्य?
    के साथ मिलीं सफलताओं का अंबार
    राह में मिल जाए
    अब सुकूँ गाँव की सकरीं सड़क!
    पहचान खुब बढ़ा ली, हुई बहुतों से पहचान
    मिले आईनों में अनेक चहरे
    खुद से रहीं अपरिचित भागती रहीं
    परछाई की तरह अब खुद को
    आईने के सामने संवार लू!
    खिलें फुल ,पेड़ पौधे
    खलायानोकी हरियाली दूर दूर तक
    इसी बिच घर का आंगन ढूँढ रही!
    चहके पक्षी अनेक महके बागवान
    मौसम बना ,बिगडा़ बहुत
    तपिश के बिच बादलों का शोर बहुत सहा,
    अब सुकूँ की छाव ढुँढ रहीं
    मिल जाए बुढे बरगद की छाव यहाँ!
    खेले मुकद्दर के खेल अनेक
    देख लिए बहुत शिखर के चहरे
    बहुत भाग लिए चहरे के पिछे
    अब आईना ढूँढ रही!
    शीतलता में भी साजिश बहुत
    देख लिए बहते झरने यहाँ
    नदियाँ भी समंदर को मिलने को आतुर
    कहीं मिल जाए पास में
    कुएँ की शीतलता मिल जाए
    पी सुकूँ का अमृत जल!
    ©hemlatajain

  • hemlatajain 51w

    रक्षाबंधन

    नयन बिछाये बैठा भाई आज के दिन
    तकती नजरिया ढूँढे बहनां को!
    ब्याही बहनां उतावली भागी माईके को ओर
    जिसकी कलाई सुनी उसे पुछो क्या है बंधन??
    बंद लिफाफे में निभा रहा डाकिया अपना धरम
    पवित्र बंधन का अनुपम उपहार
    रेशमी धागे का रक्षा सुत्र बंधन है!
    कब से बैठीं लिएऐ थाली, अक्षत ,रोली दिप की
    एक थाली सजी उपहार मिस्ठ्ठान की
    आता था बचपन में देर रात तक
    नींद की मारी हो जाती लाल पीली
    देख भाई का अनमोल उपहार छूमंतर हो जाता गुस्सा ओर नींद पल में मुस्का के गले लगती!
    बस यूँ ही खिलता रहे भाई बहन का प्यार
    है पवित्र बंधन ये रक्षाबंधन का त्यौहार
    हर रोज चिढाता, हूँ राजकुमार मैं इस घर का
    एक दिन तुझे हकाल के राज करूँगा
    जब विदाई की घड़ी आई मेरी
    किसी कोने में जा छूप बैठा
    गई तो, ढूंढ निकाला कोने में दुबककर रो रहा था
    उसके लिए कठिन घड़ी थी बहन की विदाई
    दिनरात की नोकझोक ये बड़ी सताती .
    चुनरी फाड़ दृपती बंधन की डोर बांधी थी
    आई संकट की घड़ी कृष्ण ने चीर बढ़ाया!
    ©hemlatajain

  • hemlatajain 51w

    सात समंदर पार जीते सात सात मेंडल
    विश्व विजय बने सात संतान
    प्रंतिधुंधी को चखा दिया जीत का स्वाद
    लाये लाडली लाडला रजत कास्य पदक
    डटे रहे मैदान में पहलवान
    हाकी में परचम लहराया गगन में
    है सोने की चिड़िया का देश
    सातों जन थे खरा सोना!
    ©hemlatajain

  • hemlatajain 51w

    आगमन नन्ही(जान)

    भरे बाजार में
    किड वियरस किचन वियर
    नजर दौडी जाऐ!
    खिलोने की दुकान पर
    समझ न आए
    ऐरोप्लेन या सुंदर डोली!
    दोनों हाथों में
    भर लाई खिलोनो का ढेर!
    उतावला मन पगला जाऐ
    घर में नयें सदस्य का
    आवागमन में
    मेरी माँ ने दियें
    थर्मश बोटल ढूढे किसी दराज़ में!
    आहट है बस किलकारी की
    गूँज कानों में
    ऊन की बोल से
    भीड़ रहे करूसिये
    लडका नहीं लड़की
    लडते भिडते
    न जाने कब गले मिल के फंदे
    घटते बढते फंदों में
    टोपी चढी कानों तक
    अब बारी आई
    छज्जा या वानर टोपी? ??
    नाना को भाऐ
    छज्जा नानी को वानर
    फिर से खुशी की लड़ाई छाई
    शोर मचा घर आंगन में!
    इसी बिच दादीनानी चिल्लाई
    भई छज्जा
    ,वानर जो भी बनाओं??
    कान पर फंदे बढा लेना
    ,थोड़ी ढिली रखना
    कानमे घुस जाऐगी
    ठंडी ठंडी हवा
    नन्नु ढिढूरा जायेगा
    और काम आऐगी आते साल!
    बुनने लगीं
    टोपी मन ही मन मुस्काऊ ह्रदय गुदगुदाये
    घर में कौतूहल का मौसमआया
    , मामा मुस्कानमुस्कान ने भरी
    इस खिचातानी
    लो बुन गई बाबा टोपी
    आखें बिछाई बैठे घर के हर जन
    जल्दी से आ जा घर के चिराग जी!
    ©hemlatajain

  • hemlatajain 71w

    हिस्से की हिस्सेदारी
    रण में उतरेगा उसी खेल
    नहीं तो मुख दर्शक है!
    अंतर्मन का दुंद है
    बस हार जीत का खेल
    खेल अंतर्मन से हारा ही जीता है
    क्योंकि वह सिख से जीता
    धैर्य संतोष का बाधा!
    जीतने वाला सिर्फ रेंस के लिए भागा
    उसके जीत के जश्न में शोरगुल है
    यहाँ किसी हार नहीं
    भाग लेगा वही भागीदारी है
    अपने माईने में दोनों की जीत
    मन हारे हार मन जीते जीत ही जीत
    ©hemlatajain

  • hemlatajain 72w

    माईना

    खुद को कभी निहारा नहीं
    न ही कभी खुद के लिए निखरी
    खुद ही खुद में खोई रही, ओरो के लिए
    कभी खुद की ओर नजर ही नहीं गई कंहा निखारते
    आँखों के घेरों छाये,अपने कितने सपने धूंधले किये
    खुद को गला के लचके गाल भिचके होठ
    हाथों की लकीरें मिटी है पेरों की बवाई से
    माथे की उभरी लकीरें ही किस्मत बयां कर लेती
    हालत के अनुभवों में निखरे सुनहरी सफेदी
    घर बुनने में लगे रहे ख्याल ही नहीं रहा तन की ओर
    तुमहे आंचल में समेटने में लगे रहें फटे मटमैले हाल
    आज आईने के खड़े हो कर पाया
    बहाल हुए हाल अनुभवों का झखिरा लिए है?
    दोडते कदमों को दो पल ठहरे कहाँ?
    नजर गईं आईने की ओर कहा पाया खुद को??
    कितनी दौड़ लगाईं जीवन के खेल में आज कहा खड़े
    जितना बटोरना था बटोर लिया हाथ न लगा कुछ?
    अभी बहुत कुछ बाकी?
    न थके न हारे अभी तो मंझधार में!
    ओर नईया खैनी है आधी
    मन जिंदा पार लग़ा लेगें आधी!
    ©hemlatajain

  • hemlatajain 72w

    होली

    घर आंगन आई रंगिलो की टोली
    संग लाये भरी थाली अबीर गुलाल
    लाल हरा कथई रंग रंगे सखा सखियाँ
    पिचकारी भर भर गहरे रंग छोडे
    तन मन भिगा ,भिगी कोरी चुनरियां
    अंग अंग में बरसीं बदरिया
    आंख ही आंखों में खेल होली
    होली के रंग उडाये रंग दियो संग मन
    भंग के संग झूमे सखा सखियाँ
    मस्ती में झूमे गाये मदहोशी का आलम
    दुख दर्द भूले भूले गिले सिकवा
    याद न रहीं जात पात की
    न रहे छोटे बड़े सब खेले अबीर गुलाब
    फागुन की मस्ती चढी मदहोशी माहौल
    गहरे रंग रंग गईं , पायल, कौधनी गुम गई
    मेहक छिडी घर घर गुजिंया पुरणपोली, रस गोले रसगुल्ले
    अधर पर मुस्कान खिली छिटक दियो गहरो रंग
    छूडाये ना छुटे बदन पर गहरो रंग चढो गयो जीवन में
    ©hemlatajain