harshvardhan__

सुखार्थिनः कुतो विद्या,विद्यार्थिनः कुतः सुखम। सुखार्थी वा त्यजोत्विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्।। (अमृतम संस्कृतम।।)

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  • harshvardhan__ 26w

    शेर की बात में अरमा मछल आए होंगे
    गम दिखावे की हंसी में उबल आए होंगे
    नाम पर मेरे जब आंसू निकल आए होंगे
    सर ना सहेली के कांधों से उठाया होगा
    होकर मजबूर उसने मुझे भुलाया होगा।।
    ©harshvardhan__

  • harshvardhan__ 26w

    मेरा हाल क्या सुनाऊं तुझे साकि!
    एक थी जिन्दगी जो इस सुखनवर को कश्ती मे ले डूबी।।
    ©harshvardhan__

  • harshvardhan__ 42w

    शायरी

    चांद जमीं पर है और समंदर आसमान में,
    ऐ रूह ऐ जानां अगर कह दे तू,
    तो मैं ये भी मान लूं।।
    © मुसाफिर

  • harshvardhan__ 45w

    चिनू,भाई तू मुझसे बहुत खफा है।भाई मुझे माफ कर दे। मुझे नहीं पता था कि तू मेरे इस छोटे से मज़ाक का इतना बड़ा सिला देगा।भाई तुम तीनों के सिवा मैं एक दम अकेला हूं।भाई मरने तक दोस्ती निभाने का जो वादा तूने किया था वह तू कैसे भुला सकता है। एक दोस्त मुझे पहले ही छोड़कर जा चुकी है अब तू ऐसा मत कर।हाथ जोड़कर बिनती करता हूं वापस आ जा। मुझे यूं छोड़कर मत जा।देख भाई मैं बहुत गरीब आदमी हूं। मैं तुझे मनाने के लिए इन शब्दों और इस कविता के अलावा और कुछ नहीं दे सकता। क्यों कि मेरे पास जो सबसे बड़ी संपत्ति है वह मेरी कलम है।।
    मेरे उस दोस्त के नाम जो मुझसे बहुत खफा बैठा है।।@its_chinmay ,@ady_words07

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    दोस्ती

    लाज़िमी है दुश्मन मिरे
    क्यों ना करेंगे साजिशें
    रंज तो तब है सरल
    जब दोस्त इसे अंजाम दे।

    आज फिर दामन मिरी
    दोस्ती का दागदार हुआ
    आज फिर एक दोस्त मिरा
    रुसवा सारे बाजार हुआ।

    कब तक इस मक्कारी का
    बनता रहूंगा मैं साक्षी
    चाहता हूं मैं कि ये
    सूरत बदलनी चाहिए।

    क्यूं है चंद लोग
    अपने झूठ की चादर लपेटे
    क्यों नहीं कुछ लोग मिरे
    चाहते हैं सच को समझना।

    एक एक कर मिरा कारवां
    सिकुड़ता जा रहा है
    झूठे अहम की खातिर अपने
    एक एक दोस्त बिखरता जा रहा है।।
    © मुसाफिर

  • harshvardhan__ 46w

    बच्चन साहब, पन्तजी (सुमित्रानंदन पंत) की हाज़िर जवाबी का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं :

    एक बार मैं किसी बात पर झुँझलाया हुआ था। किसी बात के सिलसिले में कह गया, 'कवियों की पूछ कहीं नहीं है।' पन्तजी बोले, 'बाबा, जब आदमी के पूँछ नहीं रह जाती तभी वह कवि बनता है।'

    मेरे घर में एक नौकर था। उसने चोरी की। मेरी पत्नी ने उसके वादा करने पर कि फिर वह ऐसा काम न करेगा, उसे घर में रहने दिया। वे बाहर चली गयीं और नौकर ने फिर चोरी की। मैं बहुत झल्लाया, 'देखिए, तेजी को कि चोरों पर विश्वास करती हैं।'
    पन्तजी बोले, 'इस पर तो तुम्हें अपने भाग्य को सराहना चाहिए।'
    मैंने कहा, 'क्यों ?'
    बोले, 'अरे,चोरों पर विश्वास करने की आदत न होती तो वे तुम्हारे साथ पंजाब छोड़कर कैसे आतीं !'

    एक दिन की ओर बात है, मैं अपनी एक कविता सुना रहा था। पंक्तियाँ आयीं -

    'मैं तो केवल इतना ही सिखला सकता हूँ,
    अपने मन को किस भाँति लुटाया जाता है।'

    पन्तजी बोले, 'इसमें तुमने थोड़ा सा झूठ बोला है।'
    मैंने कहा, 'कैसे ?'
    कहने लगे, 'सच कहते तो तुम्हें इन पंक्तियों को ऐसे लिखना था :

    मैं तो केवल इतना ही सिखला सकता हूँ,
    औरों के मन को कैसे लूटा जाता है।'


    कार्तिकी पूर्णिमा की बात है। गुलाबी-सा जाड़ा पड़ रहा था लेकिन पन्तजी महाराज चमड़े की जैकेट पहने हुए थे। मैं अपने ठण्डे कपड़ों में था। मैंने कहा, 'पन्तजी, अचरज है कि पहाड़ी होने पर भी आपको इतनी सर्दी लगती है, मुझे देखिए पहाड़ी तो मैं हूँ।'
    पन्तजी बोले, 'तुम पहाड़ी नहीं हो, तुम पहाड़ हो; पहाड़ी मैं ही हूँ।'

    ~ हरिवंशराय बच्चन

    बच्चन साहब और पन्तजी बहुत घनिष्ठ मित्र थे।

    ० लेख स्रोत : बच्चन ग्रंथावली भाग 6
    ० चित्र स्रोत : अमर उजाला समूह, चित्र में बायीं ओर बच्चन साहब है और दायीं ओर सुमित्रानंदन पन्त



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    किस्सागोई

  • harshvardhan__ 46w

    आज के प्रसंग में इन चार हिंदी साहित्यकारों का ज़िक्र है। शीर्ष पर निराला जी हैं, एक योगी के भाँति देदीप्यमान, नीचे बायीं ओर से दायीं ओर का क्रम है, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंशराय बच्चन और अमृतलाल नागर।

    यह प्रसंग लिखा है बच्चन साहब ने, जब एक मर्तबा निराला जी उनके यहाँ पंत जी से मिलने अचानक पहुंच जाते हैं क्योंकि उस दौरान पंत जी, बच्चन साहब के यहाँ कुछ दिनों के लिए रहने आए हुए थे। आइए, प्रसंग पढ़ते हैं :

    अप्रैल-मई 1948 की बात है। प्रयाग में जोर की गर्मी पड़ने लगी। पंतजी पहाड़ जाने की तैयारी में थे, अमृतलाल नागर उनसे मिलने आये हुए थे, हम तीनों लगभग चार बजे के आसपास अपने कमरे में चाय पी रहे थे। बरामदे में किसी के पाँवों की आहट सुन पड़ी। मैं पर्दा हटाकर बाहर निकला।
    देखता हूँ एक पहलवान बाहर खड़ा है - अरे ये तो निराला जी हैं ! पाँवों में पंजाबी जूता, ऊपर मटमैली तहमत, शरीर पर लंबा कुर्ता, मुंडे सिर पर छोटी सी साफी बाँधी हुई, गर्दन गाल पर मिट्टी भी लगी हई और आंखों में लाल डोरे उभरे।
    मुझे देखते ही पूछा, 'पंत ?'
    'हैं'
    'मिलूँगा'
    'आइए'

    कमरे में घुसते हुए ही उन्होंने आवेश-भरे स्वर में कहना शुरू किया - "पंत, तुमने कविता तो बहुत अच्छी लिखी, आज हमारी तुम्हारी कुश्ती भी हो जाए, मैं निराला नहीं हूँ, मैं हूँ तुत्तन खान का बेटा मुत्तन खान, मैंने गामा, जुविस्को और टैगोर सबको चित किया हुआ है। आओ आओ...." आदि

    यह सब कहते कहते उन्होंने अपने सारे कपड़े उतार दिए, सिर से साफी उतार कर लंगोट की तरह बांधी और फिर डण्ड पर डण्ड लगाने लगे। फिर ताल ठोंकी।

    अमृतलाल जी सतर्क हो गए, मूर्ति हिल सकती थी पंत जी नहीं हिल सकते थे। उन्हें जड़वत देख निराला जी ने मेरी तरफ देखा, कहा "तुम आओ !"
    मैंने कहा, "मैं तो आपका चरण छूने योग्य भी नहीं हूँ, कुश्ती क्या लड़ूँगा !"
    निराला शांत हो गए।
    मैंने कहा "निराला जी चाय पीजिए"
    बोले "निमंत्रित नहीं हूँ, पानी पी सकता हूँ, लोटे में लाना"
    निराला को कौन सरेख कहे ? कौन पागल ? कौन बहोश कहे ? कौन बेहोश ?
    उन्होंने गट गट पानी पिया और झपटकर कमरे से बाहर हो गए।


    ० लेख स्रोत : बच्चन ग्रंथावली भाग -६
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    किस्सागोई

  • harshvardhan__ 47w

    पाकिस्तान में एक बार जोश मलीहाबादी से एक बूढ़े शख़्स ने पूछा कि जोश साहब, 'क्या आप मुझे बता सकते हैं कि लखनउआ सफ़ेदा और जौहरी सफ़ेदे (सफ़ेदा आम की एक प्रजाति है) में क्या अंतर है ?'
    जोश ने जवाब दिया, 'क़िबला आपकी बात पर मुझे पतरस बुखारी का एक लतीफ़ा याद आ गया पहले वो सुन लीजिए। एक बार रेडियो स्टेशन पर बुखारी साहब से मिलने एक ज़ईफ़ शख़्स आए। उन्होंने बातों बातों में बुख़ारी साहब से पूछा। बुख़ारी साहब, तानपूरे और सारंगी में फ़र्क़ वाज़े कर दीजिए। बुख़ारी साहब ने जवाब दिया - गुस्ताख़ी माफ़, लेकिन क्या मैं आपकी उम्र जान सकता हूँ। उन्होंने जवाब दिया। अस्सी बरस। बुख़ारी ने कहा कि जब ज़िंदगी के अस्सी बरस आपने तानपूरे और सारंगी का फ़र्क़ जाने बग़ैर गुज़ार दिए तो बाक़ी के दो चार बरस और सब्र कर लीजिए।'

    इसके बाद जोश ठहाका मारके हँसे। मगर बूढ़ा खिसिया गया। जोश ने उससे माज़रत तलब की और उसे सारे आमों के बारे में तफ़सील से बताया।



    ० लेख स्रोत : राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हिमांशु बाजपेयी की पुस्तक 'क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा'


    ✍️✍️✍️✍️��������(पहले के भाग यहां से पढ़ें।।)
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    किस्सागोई

  • harshvardhan__ 47w

    बिस्तर में लेटे लेटे बस टूक मिलाता चला गया। क्या बना नहीं पता।आप सब पाठकों के नाम। कौनसा मक्ता सबसे ज्यादा पसंद आया जरुर बताएं।
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    ग़ज़ल

    आहट से बिखर जाएंगे पत्थर मकान के,
    इतने पास से ना गुजरो जर्जर मकान के।

    लुढ़कते है इधर उधर दो चार धड़ी दाने,
    कहां चले गए तमाम कनस्तर मकान के।

    अगर नया चाहिए,पुराना तोड़ना पड़ेगा,
    बेशक खुल तो जाएंगे मुकद्दर मकान के।

    आई नहीं है नींद या सोया है बे सलीका,
    सिकुड़े पड़े हैं मुद्दत से बिस्तर मकान के।

    मैं तो गांव से हूं, मुझे मालूम नहीं लेकिन,
    तुम ही सुना दो किस्से बेहतर मकान के।

    मिरी जमींदारी पर कोई सवाल किसलिए,
    अब भी पड़े हैं गांव में खंडहर मकान के।

    इरादा था शहर सी कोठी बनाऊं लेकिन,
    बुजुर्गो ने मना कर दिए दो दर मकान के।

    अभी तो हाथ में आई नहीं रंग की कूंची,
    उधर कांपने भी लगे प्लास्टर मकान के।

    इस कान की खबर उस कान को ना हो,
    इसलिए फासले रखिए दफ्तर मकान के।

    ये मालूम है कि लौटकर आएगी नहीं मां,
    मगर इंतजार में रहते हैं मंजर मकान के।

    "मुंतशिर"हाथ जो छोड़ दिया बूढ़े दरख़्त ने,
    पसीने में तर हुए अस्थिर पंजर मकान के।।
    © मुंतशिर

  • harshvardhan__ 47w

    बहुत दिनों बाद ग़ज़ल लिख रहा हूं। पता नहीं कैसा हुआ है। फिलहाल बिस्तर पर हूं। हालही में मेरा कल ओप्रेशन हुआ है।
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    ग़ज़ल

    कभी अपना भी सुंदर जमाना रहा है,
    टूटे दिल का भी कोई फसाना रहा है।

    कोई हंसी से ना तौले मिरे किरदार को,
    दर्द से दिल का रिश्ता पुराना रहा है।

    मुझे लगता नहीं डर तुफानों से अब तो,
    एक भंवर से मुद्दत में आशियाना रहा है।

    तिरी यादों से दिल ने साफ़ तौबा किया,
    हम भूल गए कभी तुझसे याराना रहा है।

    "मुसाफिर" सीढ़ियां उनकी उन्ही को मुबारक,
    जिनका मकसद ही हरदम ही गिराना रहा है।।
    © मुसाफिर

  • harshvardhan__ 47w

    मुम्बई आकर मनोज कई दिन फूटपाथ पर रहे।आते समय उनके पिता ने उन्हें ३०० रुपए की जगह ट्रेन के टिकट के लिए ६०० रुपए दिए। बता दूं कि उस समय गौरीगंज से मुम्बई के लिए एक ट्रेन चलती थी पुष्पक एक्सप्रेस,जिसका किराया ३०० रुपए था। उनके पिता ने उनसे कहा बेटे तीन सौ रुपए की जगह छह सौ रुपए ही रख ले। क्यों कि जिस तरह तू जा रहा है वैसे ही तुझे एक दिन बापस लौटना पड़ेगा। लेकिन एक बार जो मनोज घर से गए तो कामयाब होकर ही लौटे।उनकी शादी भी उनके सपने के कारण ही टूटी।और दिन बताऊंगा यह कहानी। मनोज उस वक्त गर्मियों की छुट्टियों में अपने घर आए थे।

    अचानक एक दिन उनके घर के टेलीफोन नंबर पर उस लड़की का कॉल आया। इस बार उन्होंने सीधे सीधे उससे पूछा कि तुमने क्यों किया ऐसा मेरे साथ? क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करती थी?
    लड़की ने कहा नहीं मनोज मैं आज़ भी तुमसे प्यार करती हूं। लेकिन मेरे पापा को तुम पसंद नहीं हो।लोग प्रोफेसर, डाक्टर बनने का सपना देखते हैं और तुम सिर्फ एक मामूली गीतकार! इस रिश्ते को यही खत्म करो। मेरे तस्वीर और खत मुझे लौटा दो। मनोज ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह नहीं मानी। एक वक्त मनोज को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कहा ये तस्वीरें, ये खत मेरे हैं। मैं तुम्हें यह वापस नहीं करूंगा। ये खत मुझे दस चिट्ठियां लिखने के बाद बहुत मेहनत से हासिल हुई है, तुम्हारे एक जवाब के रूप में। Chemistry period में लैब में प्रेक्टिकल पर ध्यान देने से ज्यादा मैं उस मौके का इंतजार करता था कि कब टीचर की नजर थोड़ी देर के लिए मेरे ऊपर से हटे और मैं फटाक से तुम्हारी एक तस्वीर ले लूं। ऐसे हासिल की है यह तस्वीर। मैं तुम्हें यह वापस नहीं करूंगा।
    उन्होंने लड़की को बोलने का मौका ही नहीं दिया। और जोर से फोन पटक दिया। और उन्होंने उसी दिन लिखी अपनी वह रचना जो आज हम जैसे हर नाकाम आशिकों की anthem बन चुकी है।
    आंखों की चमक जीने की लहक सांसों की रवानी वापस दे,
    मै तेरे खत लौटा दूंगा, तू मेरी जवानी वापस दे।
    #ansunekh ��������✍️✍️✍️✍️

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    किस्सागोई