Grid View
List View
Reposts
  • gunjit_jain 1w

    कई दिनों बाद ग़ज़ल का प्रयास।

    Read More

    सफ़र के दरमियाँ ही एक मंज़िल हार जाता हूँ,
    मैं अक़्सर बंद कमरे में ही महफ़िल हार जाता हूँ।

    निगाहों को झपकने का सुनो जब खेल होता है,
    वो मुझसे हारती है और मैं दिल हार जाता हूँ।

    मिरे हर्फ़ों, ग़ज़ल, शेरों में वो जब साथ होती है,
    ज़हन में दब रही हर एक मुश्किल हार जाता हूँ।

    किनारे से मिरी महबूब जब सजकर गुज़रती है,
    ज़मीं होकर भी कश्ती से, मैं साहिल हार जाता हूँ।

    खुली ज़ुल्फ़ों के आगे और "गुंजित" कुछ नहीं बचता,
    वो मुझको जीत लेती है, मैं क़ामिल हार जाता हूँ।
    ©गुंजित जैन

  • gunjit_jain 2w

    एक शेर...

    Read More

    और कैसे दर्द तुमको चाहिए,
    इश्क़ ये काफ़ी नहीं क्या अब तुम्हें।
    ~ गुंजित

  • gunjit_jain 2w

    कई दिनों बाद कुछ लिखा है...
    क्षमा चाहूंगा, परीक्षाओं के कारण एक्टिव नहीं हूँ...��

    Read More

    नज़्म

    मैं तुम्हें जब देखता हूँ,
    इन निगाहों को उठाकर,
    चाहता तब दिल मेरा बस,
    रख सकूं तुमको छुपाकर।

    मखमली माथे के ऊपर,
    मांगटीका इक सजा है,
    खूबसूरत एक आलम,
    चंद गहनों का लगा है।

    मांगटीके के किनारे,
    चंद गेसू हैं उलझते,
    इक नहीं सुनते वो मेरी,
    क्या भला ख़ुदको समझते।

    इन उलझते गेसुओं में,
    जब उलझता हूँ कहीं पर,
    बारिशों की बूंद सा मैं,
    आ ठहरता हूँ तुम्हीं पर।

    ज़ुल्फ़ के साये के पीछे,
    ये निगाहें छुप रहीं हैं,
    बोलती आँखों के आगे,
    बात मेरी चुप रहीं हैं।

    मुस्कुराहट में कहीं पर,
    है सुकूँ पूरे जहाँ का,
    देख इसको भूल बैठा,
    कौन हूँ मैं, हूँ कहाँ का।

    कागज़ों से हाथ नाज़ुक,
    ओढ़नी सरका रहे हैं,
    रेशमी रेशे दिलों में,
    आग सी भड़का रहे हैं।

    कुछ गुलाबी फूल सुंदर,
    इस दुपट्टे पर लगे हैं,
    देखने तुमको वो शायद,
    रात भर थोड़ा जगे हैं।

    चल रही हो रास्तों पर,
    दो हसीं झुमके लगाती,
    साथ ही चलती हवाएं,
    और पायल खनखनाती।

    पायलों की इन धुनों पर,
    हर फसल लहरा रही है,
    दिलकशी खुशबू तुम्हारी,
    ये समां महका रही है।

    यूँ महकते इस जहां में,
    सुरमई उल्फ़त है सजती,
    देख तुमको दिल में मेरे,
    मंदिरों सी राग बजती।

    मंदिरों के भी अलावा,
    मैं कहीं रब देखता हूँ,
    इन निगाहों को उठाकर,
    मैं तुम्हें जब देखता हूँ।
    ©गुंजित जैन

  • gunjit_jain 4w

    होशवालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है,
    इश्क़ कीजिये फ़िर समझिए ज़िन्दगी क्या चीज़ है...
    ©निदा फ़ाज़ली


    जगजीत सिंह जी द्वारा गाई निदा फ़ाज़ली जी की ग़ज़ल को सुनते हुए एक शेर...

    Read More

    आपको ही उम्र भर हम यूँ सनम पढ़ते रहें,
    क्या रखा है हर्फ़ में, ये शायरी क्या चीज़ है।
    ©गुंजित जैन

  • gunjit_jain 4w

    बोतल में रेत भरते बच्चे...

    Read More

    छोटे बच्चे,
    एक छोर से आधी दबी दबी सी
    प्लास्टिक की बोतल में,
    एक एक कण इकठ्ठा करके
    रेत भर रहे हैं।

    बढ़ते तापमान
    और तपती रेत में भी,
    न जाने उन्हें
    किस शीतलता ने ढक रखा है?
    शायद, गरीबी की शीतलता।
    वही शीतलता,
    जो हमेशा से उनके जीवन में
    खुशियों की बहार को,
    और मुस्कुराहट की बारिश को
    आने से रोक रही है।
    इस शीतलता ने
    मौसम के हर बदलाव को
    अपने भीतर कहीं थामे रखा है,
    जैसे रेत के कण बोतल में थम रहे हैं,
    आहिस्ते आहिस्ते,
    ठीक वैसे ही।

    मगर,
    क्या वो बच्चे
    वाकई रेत भर रहे हैं?

    धूप में रेत के चमकते
    उन बारीक कणों के ठीक पीछे,
    मुझे उनका बचपन
    साफ़ नज़र आ रहा है,
    मगर इन कणों से थोड़ा कम चमकता।
    जाने कहाँ गुम हो गयी उस बचपन की चमक!
    क्या उन छोटे घुँघराले बालों में कहीं?
    या सिकुड़े बदन पर लिपटे
    मैले कपड़ों पर लगी धूल में कहीं?
    या फ़िर,
    इन्हीं रेत के कणों में?
    शायद हां।

    प्लास्टिक की दबी बोतल में
    रेत नहीं, मगर रेत सा बिखरा,
    अपना बचपन भर रहे हैं
    आहिस्ते आहिस्ते,
    वो छोटे बच्चे।

    ©गुंजित जैन

  • gunjit_jain 4w

    कई दिनों बाद ग़ज़ल...

    Read More

    आशिक़ी का गुल खिलाओ तो ज़रा,
    दो दिलों को अब मिलाओ तो ज़रा।

    हम अधूरी शायरी के हर्फ़ हैं,
    इक ग़ज़ल पूरी बनाओ तो ज़रा।

    दर्द की ग़ज़लें लुभाती अब नहीं,
    इश्क़ के नग़में सुनाओ तो ज़रा।

    आशिक़ी में तोड़ देंगे हर हदें,
    इश्क़ हमसे अब निभाओ तो ज़रा।

    हम क़िताबें छाप देंगे आप पर,
    आप थोड़ा मुस्कुराओ तो ज़रा।

    रोज़ सजदे में झुकी होंगी नज़र
    आप मेरे साथ आओ तो ज़रा।

    आपके बिन कुछ यहाँ "गुंजित" नहीं,
    अब पता दिल का बताओ तो ज़रा।
    ©गुंजित जैन

  • gunjit_jain 5w

    बस आज का हो गया��शायरी पढ़ते पढ़ते भी जान नहीं छोड़ती, एक आध आ ही जाती है��

    Read More

    रास्तों पर चल रहे नाशाद मसलों की तरह
    हूँ ज़रा सा मैं अधूरा चंद मतलों की तरह।
    ©गुंजित जैन

  • gunjit_jain 5w

    यूँ ही।

    पर वाकई, गुम सा रहने लगा हूँ❤️ मिलेंगे फुर्सत से किसी दिन❤️

    Read More

    रहता हूँ इस सिलसिले में गुम कहीं,
    मिल न जाओ रास्तों पर तुम कहीं।
    ~ गुंजित जैन

  • gunjit_jain 6w

    Hehe. Yuhi

    Read More

    "वफ़ा करते नहीं मुझसे" कहा मुझसे कभी जिसने,
    उन्हीं की महफ़िलों में इश्क़ के हम शेर पढ़ते हैं।
    ~G.J.

  • gunjit_jain 6w

    मिश्रितगीतिका।
    गागालगा/ललगालगा की 4 आवृत्ति।

    हिंदी दिवस की शुभकामनाएं��❤️

    Read More

    *हिंदी*

    लेखन-पठन का सार है, हिंदी समसि की धार है,
    आषाढ़ की बौछार है, नित ज्ञान का भंडार है,
    हर वेदनाएं यातनाएं शब्द में भरती सदा,
    छंदों अलंकारों रसों का सौम्य सा संसार है।

    हिंदी सरल स्पष्ट भावों से सजी भाषा प्रचुर,
    यह भक्ति का सद्मार्ग है, हिंदी समूचा देव-पुर,
    कविता कहानी कथ्य हैं, सुंदर सुशोभित शब्द हैं,
    साहित्य के सौंदर्य की, है एक परिभाषा मधुर।
    माँ भारती की प्रीत सी, हिंदी सुखद संगीत सी,
    चहुँ ओर ही दिखता तिमिर, हिंदी सबल उजियार है।

    मृदुभाषिनी मनभावनी, अभिव्यक्ति का माध्यम बनी,
    हर दुक्ख पीड़ा के समय साथी सदा उत्तम बनी,
    हिंदी समसि से जा मिली, नव कोंपलें बनकर खिली,
    जब भी धरा यह शुष्क थी, जल वृष्टि की छम छम बनी।
    पहचान हिंदुस्तान की मनहर कथा यशगान की,
    हिंदी जगत में भारतीयों का सहज विस्तार है।

    सागर-सरोवर सी अगन, हिंदी असीमित सा गगन,
    संदेश केवल नेह का, उपदेश से करती अमन,
    माधुर्य में सब लीन हैं, ज्यों पोखरों में मीन हैं,
    मस्तक झुका, यह कर मिला, हिंदी तुझे करता नमन।
    आराधना, हर भावना, हिंदी हृदय की साधना,
    गुंजित तिहारे प्राण में, नित श्वास का संचार है।



    ©गुंजित जैन