feelingsbywords

www.amazon.in/dp/B07Q56YJHQ?ref=myi_ti

a poetess,a writer,a painter,a bibliophile

Grid View
List View
Reposts
  • feelingsbywords 5w

    Pleiades form

    प्रेम
    ----

    प्रसार जिसका सम्पूर्ण जगत में
    प्राणों में जिसका विस्तार
    प्रखर है जिसकी तरंग चेतना
    प्रभु मिलन का जो आधार
    प्रबल होती मानवता जिससे
    प्रकाशमयी जिसकी ज्योति है
    प्रकृति में सदा समाहित- प्रेम ही था, प्रेम ही है, प्रेम ही जीवोद्धार।

    -निधि सहगल
    ©feelingsbywords

  • feelingsbywords 5w

    श्याम पट पर निखर के निकले,
    श्वेत रंग की माटी,
    त्यों ही जीवन में दुख पाकर,
    सीखे मन है पाटी,
    जो हो सब दिश श्वेत चाँदनी ,
    रात का क्या हो मोल,
    अंधकार भरे जीवन में
    हिम्मत ही पट खोल,
    रंग दोनों ही भाते मन को,
    श्वेत हो या हो श्याम,
    एक राधा प्यारी लगे,
    एक कान्हा घनश्याम।

    -निधि सहगल
    ©feelingsbywords

  • feelingsbywords 5w

    हर ख़त्म होती कहानी, छोड़ जाती है अपनी निशानियाँ,
    कुछ पैमानों में छलकती है, तो कुछ बन जाती वीरानियाँ।

    -निधि सहगल
    ©feelingsbywords

  • feelingsbywords 16w

    मेरी छत की मुंडेर,
    चिड़ियों की वो टेर,
    इन वातानुकूलित डिब्बों में खो गई,
    बचपन के क़िस्सों संग अकेली ही सो गई,
    होली के बिखरे रंग फीके हैं पड़ गए,
    वो इश्क के निशां, सेल फोन में गढ़ गए।
    सर्दियों की वो धूप, हीटर में बंद है,
    हाय रे, वो स्वेटर सिलाई भी अब दिखती ही चंद है।
    मेरी छत की मुंडेर,
    वो रिश्तों का पूरा ढेर,
    सूना सा हो गया,
    तारों का गिनना भी
    अब लाइक कमैंट्स में खो गया।
    मेरी छत की मुंडेर,रहती है अब खामोश,
    एक सदी सी गुज़री,नहीं आया उसे होश।

    -निधि सहगल
    ©feelingsbywords

  • feelingsbywords 17w

    सिरहाने के कोने जाने,
    भीगी चदरिया भी पहचाने,
    रात भर क्यों बरसा सावन
    क्यों नैना काजल को छाने

    भींची मुट्ठी दर्द को पीकर,
    होंठो की पंखुरियाँ सीकर
    दाँतो में चली याद पिसाने
    इंतज़ार का फर्ज निभाने
    सिरहाने के कोने जाने..

    सूखे पुष्पों की भीनी खुशबू
    गहराती है उम्मीदों का व्यूह
    मन हिंडोला मात न माने
    मृत श्वासों को लगा जगाने
    सिरहाने के कोने जाने,..

    -निधि सहगल
    ©feelingsbywords

  • feelingsbywords 18w

    .

  • feelingsbywords 18w

    संस्कृत गद्यकार बाणभट्ट जी द्वारा रचित संस्कृत उपन्यास "कादम्बरी" का काव्यात्मक रूप में सारांश प्रस्तुत करने का एक छोटा सा प्रयास। थोड़ी लंबी कविता है, किंतु पढियेगा अवश्य और अपनी अमूल्य टिप्पणी अवश्य दीजियेगा।

    कादम्बरी
    -------
    विदिशा के राजा शूद्रक को देती चाण्डालिनी एक तोता,
    तोता अपनी कथा सुनाता, नाम वैशम्पायन जिसका होता।
    रहता वह विंध्या जंगल में,प्राण बचाकर साधु कुटिया में पहुँचा,
    साधु जाबालि ने तब तोते का पूर्वजन्म था बाँचा।
    देश अवंति में राजा तारापीड थे बलशाली,
    अपनी महारानी विलासवती संग थे सौभाग्यशाली।
    किंतु संतान सुख न था भाग्य में उनके लिखा हुआ,
    इसी चिंता से मन उनका बहुत व्यथित हुआ।
    फिर एक दिन मंत्री शुकनास और राजा को हर्ष हुआ,
    दोनों के गृह पुत्र जन्म का भाग्य सुंदर जगा।
    राजा ने चंद्रपीड और मंत्री ने वैशम्पायन नाम रखा,
    चंद्रपीड को अश्व इन्द्रयुद्ध भेंट किया।
    इन्द्रयुद्ध था उसको प्राणों से भी प्यारा,
    संग जीवन मे आई पत्रलेखा बनकर परिचारिका।
    राजा मंत्री दोनों ने मिलकर एक योजना बनाई,
    विश्व विजयी करने की इच्छा मन मे थी जगाई।
    हिमालय के स्वर्गनपुर में करने को आराम
    गया चंद्र पीड झील किनारे आछोदा था जिसका नाम।
    मीठे स्वर वीणा के जब दिए सुनाई, शिव मंदिर जा पहुँचा,
    देख देवी महाश्वेता को मन प्रश्नों से रचा।
    चंद्र पीड ने देवी को उसकी कथा कहने को कहा,
    रोकर देवी बोली मैं गंधर्व पुत्री जिसे एक सन्यासी पुण्डारीक मिला।
    झील किनारे हम दोनों में प्रेम प्रगाढ़ जागा,
    उसके गले की पुण्य माला पहन मैंने पाप कर डाला।
    पुण्डारीक की मृत्यु हो गई, महाश्वेता हुई निढाल,
    मित्र कपिंजल ने जब पत्र दिया तो प्राण त्यागने को हुई बेहाल,
    दिव्य वाणी ने तब दिया देवी को यह आश्वासन,
    पुण्डारीक को प्राप्त करोगी, धरो झील निकट ही आसन।
    चंद्र पीड ने कथा सुनी और धैर्य धारण करवाया,
    तब महाश्वेता ने चंद्र पीड को कादम्बरी के पास भिजवाया।
    थी वह गंधर्वराज चित्रार्थ व रानी मदिरा की पुत्री,
    महाश्वेता के संग थी उसकी प्रेम भरी मैत्री।

    Read More

    .देख चंद्र पीड को कादम्बरी का मन हर्षाया,
    प्रेमांकुर हृदय में फूटा, किंतु चन्द्र पीड को कर्तव्य ने बुलाया।
    हुई कादम्बरी प्रेम में व्यथित, रोग लगाया भारी,
    पत्रलेखा के संग चंद्र पीड ने कादम्बरी से मिलने की करी तैयारी।
    पत्रलेखा को छोड़ सेवा में, चंद्र पीड सेना के पास आया,
    वैशम्पायन को झील निकट सेना में उसने ओझल पाया।
    महाश्वेता ने तब चंद्र पीड को सारा वृतांत बताया,
    मोहित हो महाश्वेता पर वैशम्पायन ने साधु से श्राप था पाया।
    बना वैशम्पायन तोता, सुनकर चन्द्र पीड ने दिए प्राण त्याग,
    कादम्बरी और पत्रलेखा को बुलवाया और चिता को दी आग।
    किंतु श्रापित चंद्र पीड का तन न जला और उड़ी प्राण की ज्योति,
    दिव्य वाणी ने करी घोषणा, पुण्डारीक को नहीं मिली मिली है मुक्ति।
    इन्द्रयुद्ध संग पत्रलेखा ने झील में त्याग दिए प्राण ,
    तब जल में से निकला कपिंजल, खोले रहस्य के प्रमाण।
    बोला श्वेतकेतू ऋषि ने मुझे अश्व था बनाया,
    और मेरे लिए चंद्र पीड को था सवार दिखाया।
    पुण्डारीक को नियति ने था बनाया वैशम्पायन,
    सुनकर महाश्वेता ने यह किया विलाप और क्रंदन।
    वैशम्पायन बना था तोता होकर के श्रापित
    लेकर जिसको गई चाण्डालिनी, दरबार मे दिया जो अर्पित।
    चाण्डालिनी थी लक्ष्मी जो थी पुण्डारीक की माई,
    तभी महाश्वेता की कुटिया में बसंत ऋतु आ छाई।
    श्राप मुक्त हो गए सभी और प्रेम रंग था छाया,
    पुण्डारीक ने जन्मों उपरांत महाश्वेता को पाया।
    चंद्र पीड जो चंद्र देव थे, कादम्बरी स्पर्श से जीवन था पाया,
    पत्रलेखा थी रोहिणी जो थी चंद्र देव की भार्या।
    चंद्र देव रोहिणी संग अपने धाम पधारे,
    बना पुण्डारीक को राजा और सुख सारे सब दे डाले।
    हुई समाप्त यह प्रेम कथा, जो श्रृंगार रस का भंडार,
    बाणभट्ट की अनुपम यह कृति जिसका नहीं कोई अन्य आधार।

    -निधि सहगल
    @feelingsbywords__
    ©feelingsbywords

  • feelingsbywords 18w

    भादो का सूखा मेघ मनस पर घाघ लगाए बैठा है,
    वर्षा की बूंदों से क्षण क्षण बस यही राग ही कहता है ।
    तुम विरह बन बरसो प्रिय, मेरे अंतर को तृप्त करो,
    यूं प्रेम दीवानी बनकर क्यों बस प्रीत का ही रास रचो ।
    वर्षा आँचलफैला हँस दी, रे मूढ़ इतना भी तू न जाने,
    मैं नाचूँ प्रेम प्रिया बनकर, पर अश्रु प्यास ही पहचाने ।
    है प्रेम गली का अंत तू ही, वैराग्य की तू है पूरकता,
    जिस प्रेम में विरह की छींट नहीं, वह क्या जाने है परिपक्वता।

    -निधि सहगल
    ©feelingsbywords

  • feelingsbywords 28w

    @hindiwriters @hindinama @rekhta_

    तुम और मैं, कभी कह क्यों नहीं पाए
    जो भी प्रेम दिल में हैं छुपाए,
    लबों ने जब भी पंख हैं खोले,
    नैन झुक कर कुछ यूं हैं बोले,
    " खामोशी को रहने दो,
    कुछ हमें भी कहने दो,
    भावों के संग हम बोलेंगें
    बिन कह सुन, सब राज़ खोलेंगे"
    लब मुस्कुराकर यूँ सिमट गए
    जैसे नैनों संग लिपट गए
    तुम और मैं, बरसों से खेलते आए हैं
    नैनों का खेल
    नैनों से ही पढ़ लेते हैं, सुख दुख का मेल,
    प्रेम कहाँ शब्दों को जाने
    वो तो बस भाव पहचाने,
    तुम और मैं, नैनों के साथी
    प्रेम हमारा शब्दविहीन पाती।

    -निधि सहगल

    Read More

    तुम और मैं, कभी कह क्यों नहीं पाए
    जो भी प्रेम दिल में हैं छुपाए,
    लबों ने जब भी पंख हैं खोले,
    नैन झुक कर कुछ यूं हैं बोले,
    " खामोशी को रहने दो,
    कुछ हमें भी कहने दो,
    भावों के संग हम बोलेंगें
    बिन कह सुन, सब राज़ खोलेंगे"
    लब मुस्कुराकर यूँ सिमट गए
    जैसे नैनों संग लिपट गए
    तुम और मैं, बरसों से खेलते आए हैं
    नैनों का खेल
    नैनों से ही पढ़ लेते हैं, सुख दुख का मेल,
    प्रेम कहाँ शब्दों को जाने
    वो तो बस भाव पहचाने,
    तुम और मैं, नैनों के साथी
    प्रेम हमारा शब्दविहीन पाती।

    -निधि सहगल
    ©feelingsbywords

  • feelingsbywords 28w

    वक़्त के पिंजरे में कैद है,
    सोन चिरैया सी ज़िंदगी,
    कभी मखमल सा पायदान तो
    कभी कंटीली रेत ज़िंदगी।

    ग़मों की भरी पोटली के संग
    सुख की प्यासी बूंद अंतरंग
    रात का गहरा इंतज़ार बन
    सुबह की खिलती धूप ज़िंदगी,
    कभी मखमल सा पायदान तो
    कभी कंटीली रेत ज़िंदगी।

    मिट्टी के पुतलों को सजाती,
    सपनों के नव किले बनाती,
    आसमान का चाँद ज़िंदगी,
    फिर एक पल में ख़ाक ज़िंदगी
    कभी मखमल सा पायदान तो
    कभी कंटीली रेत ज़िंदगी।

    -निधि सहगल
    ©feelingsbywords