#vishu

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  • lafze_aatish 18w

    हजूम ए खास

    वो जो आवाज़े वो जो शोर था कुछ ही वक़्त के लिए था ,
    हजूम ए खास तो कब का गुज़र गया क़ब्र पर मिटी डाल के!

    नि:शब्द

    ©lafze_aatish

  • lafze_aatish 19w

    नूर´ए चश्म-अम :- मेरी आँखों की रौशनी
    इशग़म :- मेरा प्यार
    अज़ीज़म :- प्रिय
    बोर-ऑनन-मोहब्बत :- प्यार की बारिश
    रोया:- ख़ाब
    अरेज़ू-ए-फिरदौस :- जन्नत की चाहत
    ज़ीबा-ए-मेहताब :- खूबसूरत चाँदनी
    जोन - अम :- मेरी ज़िन्दगी




    आसान लफ़्ज़ों मे अर्थ

    मेरी आँखों की रौशनी मेरा प्यार प्रिये पहली पहली बरसात,
    जन्नत की  चाहत का ख़्वाब  जन्नत का  रास्ता  हो दिलनशीं!

    नि:शब्द

    #nishabd #vishu

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    जोन - अम

    नूर'ए चश्म -अम  इशग़म अज़ीज़म बोर-ऑनन-मोहब्बत,
    रोया-ए-अरेज़ू-ए-फिरदौस   ज़ीबा-ए-मेहताब जोन-अम!

    नि:शब्द


    ©lafze_aatish

  • lafze_aatish 20w

    इतहला

    आओगे तो आ ही  जाना सोचना  बिलकुल नहीं,
    में रास्ता बदल लूंगा तुम इतलहा पहले कर देना!

    नि:शब्द

    ©lafze_aatish

  • lafze_aatish 20w

    ज़िन्दगी

    बार बार एक ही गली को ताकता हूँ,
    ज़िन्दगी अब आएगी बस ये सोचता हूँ!

    मेहरम मेरे नियत पर मेरी शक करते है,
    में आईने से जब जब सवालत करता हूँ!

    नि:शब्द

    ©lafze_aatish

  • drunken_heart 26w

    ग़ज़ल

    अभी‌ ख़ामोशी के ज़ल-ज़ले उठेंगे देखते रहना तुम
    बे-नूर है वो आस्माँ को झलकाएँगे देखते रहना तुम

    मुझे फ़िक्र नहीं निग़ह'बानों की जो बे-दस्त होगें याँ
    क़ाफ़िला ऐ जन्नत'सा वहीं लुटाएँगे देखते रहना तुम

    मंज़र-ए-आम फ़ज़ूल कह आएँगे शान-ओ-शौक़त
    इस्मत से जन'आज़ा मिरा उठाएँगे देखते रहना तुम

    मस'अला! मुसलसल मुस्तक़िल बनाएँगे बा'द मिरा
    नासूर-ए-दिल दीदा-ए-तर से हँसेंगे देखते रहना तुम

    बे-परवाही छुपाने अपनी आय्यारी रखेंगे सोहबत में
    नक़्क़ाब में छुपाए नक़्क़ाब बदलेंगे देखते रहना तुम

    अंजान क़ाँ उन्क़ी अदाकारी से ता-उम्र सफ़र में रहे
    दरिया-ए-ग़म देखते वाँ से गुज़रेंगे देखते रहना तुम

    आरज़ू-ओ-ख़्वाहिश ही क्या अंजानों की बस्ती में
    ख़्वाब-असर कोशिशें कर के टूटेंगे देखते रहना तुम

    तग़ाफ़ूल शुरुआती दौर-ए-वक़्त से ही था निग़ह में
    कैफ़-ए-निग़ह में 'विशू' सब मरेंगे देखते रहना तुम

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 26w

    ग़ज़ल

    जिस रोज़ ब-तसव्वुर दिल-ए-नादाँ सा हुआ
    उसी रोज़ ब-दस्त दस्तक भी जानाँ सा हुआ

    कम्बख़्त मऱज क्या है इश्क़-ओ-उल्फ़त का
    हलचल से इस दिल, गुल-गुलिस्ताँ सा हुआ

    प-ए-जन्नत की ख़ुली निग़ाह से काविश रही
    तो गोया दिल-ए-तन्हा भी आशियाँ सा हुआ

    अँधेरों से वा-बस्ता, रोज़ कर आते अब तो
    कुश्तगान-ए-पस-ओ-पेश, चराग़ाँ सा हुआ

    मौजूद-ओ-मयस्सर ख़्वाब-ओ-ख़्याल उन्के
    वस्ल ना हुआ तो दिल भी, रेग़िस्ताँ सा हुआ

    आलम-ए-बहर में ख़िल-ख़िलाता शज़र सा
    तो बिन उन्के दिल, क़ैद-ए-बाग़बाँ सा हुआ

    दर-ए-दुआ कर दिल, लौटता हरेक बार याँ
    'विशू' दिल तुम्हारा भी तो, रम्ज़-दाँ सा हुआ

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 26w

    ग़ज़ल

    ना-उम्मीद अब दस्तक-ए-दिल को मिलती रही
    हल-ए-उक़्दा-ए-आसाँ से भी रूह जलती रही

    तोबा! उन्से वा-बस्ता रहा आख़िर क्यूँ दिल से
    वक़्त-बे-वक़्त बात दर्द-ए-दिल को ख़लती रही

    आब-ए-आईना चश्म का चश्म में तसव्वुर देता
    हया-ए-रू-ए-निगारीं उन्की सिर्फ़ चमकती रही

    कह आते अलविदा यक़ दफ़ा उन्से हमी दिल
    शब-ए-ग़म सोहबत लिए आरज़ू ये ढ़लती रही

    फ़ख़्र-ए-मुनासिबत आसाँ तो था नहीं निभाना
    हयात-ए-नौ सरगोशियाँ भूल अब चलती रही

    मर्ग-ए-निशाँ तय था सर-ए-मरक़द सज़ा कर
    तामील-ए-वफ़ा के आग़ोश में अब तपती रही

    बा-ख़ुदा रूख़्सत-ए-अंदाज़-ए-रवानी हो जाए
    रूह-ए-'विशू' आब-ए-चश्म बनकर बहती रही

    ©drunken_heart

  • lafze_aatish 27w

    नज़रों की तेरी चर्चे इस क़दर मशहूर हुए,
    वरक पर लिखी ग़ज़ल को अख़बार किया मैंने!

    नि:शब्द


    #nishabd #vishu
    @hindiwriters

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    अहद-ए-वफ़ा

    पैमाने से मय-कदा नाप लिया मैंने,
    पर्दे में  पैक-ए-क़ज़ा साध लिया मैंने!

    क़दमों की आहट हुई दिल ए बेताब में,
    अपनी जान पर खुद अज़ाब खड़ा किया मैंने!

    उदू से खौफ केसा हुस्न ओ जमाल को,
    सीने के तोष-खाने में मेहफ़ूज़ किया मैंने!

    नज़रों की तेरी चर्चे इस क़दर मशहूर हुए,
    वरक पर लिखी ग़ज़ल को अख़बार किया मैंने!

    सुनो अहद-ए-वफ़ा आतिश की ज़बान को,
    निशब्द की सांसो पर सख्त पहरा लगा दिया मैंने!

    नि:शब्द

    ©lafze_aatish

  • drunken_heart 27w

    ग़ज़ल

    कई तो ग़लत हूँ ना मैं... तुम ज़रा बात बताना मुझे
    शोर बहुत है इस जगह...कई लेकर तुम जाना मुझे

    भूला हूँ चाबी मकाँ की, उसे घर मैं कहूँ तो भी कैसे
    ख़ाली चार दीवारों से चिपका, थोड़ा तो हटाना मुझे

    ऐ सुर्ख़ छत उस्की मेंहदी की याद दिलाती हर वक़्त
    ख़ामोशी अंदरूनी जो.. निकलेगी कम पिलाना मुझे

    क़दमों को आदत नहीं जो चलेंगे सिर्फ़ उसकी और
    रास्ते और भी है... इस जहाँ में इतना सिखाना मुझे

    मसरूफ़ कर दो.. मुश्किल पैदा कर मेरे हम-नफ़स
    मंज़र-ए-आम तमाशा कर, ना-लायक कराना मुझे

    हर सुबह नींद खोलना उसके जुल्फ़ों को आदत है
    करवटों में अब शब जाती थोड़ी नींद दिलाना मुझे

    तसल्ली मिले निगह को तो चराग़ बुझा कर जाना
    ख़ामख़ा क्यों जले वो उस जैसा कभी जलाना मुझे

    उसकी आह का अंदाज़ा कैसे लगाऊँ बता देना तू
    ऊँ निकाली न जिस दर्द से उतना ही तड़पाना मुझे

    बे-वजूद है 'विशू' उसके बिना जो अकड़ दिखाता है
    असलियत क्या है बिना उसके बस ऐ दिखाना मुझे

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 27w

    अज़ीब लगा फ़िर एक बार.... पुराने कुछ ख़्याल जो वापिस वाँ ले गए... शायद आज भी बुरा हूँ कसी की नज़र-ए-नज़र में... जिस की सजा... वक़्त-बे-वक़्त वस्ल कर.... मुझे तबाह... बर्बाद कर जाती है...
    मुझे राह छोड़ने को मजबूर कर जाती है...

    या अली-वली रहम-ओ-क़रम बख़्श दे.... यही दरख़्वास्त करता हूँ

    #nishabd #vishu #gazal #hindiurdu

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    ग़ज़ल

    अहबाब मिरे, हम-नफ़स मिरे, हम-दर्द मिरे वो खफ़ा क्यों है
    ग़लत-फ़हमीयाँ बे-वज़ह रखके बताना! मुझ से ज़ुदा क्यों है

    जो गुनाह, जो राह, जो हम-सफ़र किया न कभी सोहबत में
    तासीर-ए-अश्क़-ओ-आह मिलती, आख़िर ऐ सज़ा क्यों है

    तब्दील कर गया हूँ हर य़क, दौर-ए-मुश्किल को गुज़ारने में
    इल्म न है मग़्मूम क्यों, गुमशुदा रहने कि उसकी दुआ क्यों है

    ज़हरीले लब-ओ-लबाब निकले न कभी, ख़ामोशीयाँ लौ बैठा
    तन्हा-ए-दिल मुसलसल कर के, ऐ सुर्ख़ ज़हरीली हवा क्यों है

    सत्ह-ए-ज़ुबानी छोड़ी क़ाँ, जिसे नाराज़गी बढ़ती रही हमेशा
    ज़हन में अब लगे अहबाब, मिली उसे हरेक बद'दुआ क्यों है

    मरक़द-ए-ग़ह चैन-ओ-सुकूँ से गुज़रूँ, तमन्ना 'विशू' करता है
    ऐ मौत कर कभी वस्ल, ज़िंदगी छोड़ तिरी मुझसे वफ़ा क्यों है

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 27w

    ग़ज़ल

    ग़म-ए-हिज्र अंदरूनी ख़ुद बसाके, अब रिहाई वो माँगती है
    तीर-ए-नज़र हुआ न पार, उस जख़्म से ज़ुदाई वो माँगती है

    कम्बख़्त दौर-ए-इश्क़ का, गुज़रा न कभी मिरे कूचे से तो
    मस'अला देके उसीका, हिस्सा दिल का तिहाई वो माँगती है

    ख़ुदा-क़सम हलक से, किया न कभी इज़हार-ए-इश्क़ का
    नाम-ए-वफ़ा ख़ुद को बताकर, मिरे से ख़ुदाई वो माँगती है

    दवा-ए-हक़िम जो अब ना-काम हुई तो, याद आया हूँ उसे
    इशरत-ए-दिल के लिए मिरे से, अभी दवाई वो माँगती है

    सितारा-ए-ख़्वाब हुआ न किसी का, तो ऐ पागल क्यों रही
    नफ़रत जवाँ अंदरूनी जानते हुए भी, वफ़ाई वो माँगती है

    ऊँ भी न निकली देख परी-रुख़, न पलकें उठी देखने को
    आलम-ए-दिल में नहीं मिरे, इसकी सफ़ाई वो माँगती है

    ख़ामोशी से रह-ए-गुज़र हो जाता, 'विशू' छुपाएँ ख़ुद को
    नज़र-ए-नज़र हो जाऊँ तो, ता-उम्र तन्हाई वो माँगती है

    ©drunken_heart

  • lafze_aatish 27w

    पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार,
    ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है!

    #nishabd #vishu
    @hindiwriters

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    मुसाफ़िर

    किराएदार हूँ तेरे शहर का.....इन मौसम से बे-वाकिफ़ नहीं हूँ,
    मुसाफ़िर हूँ तेरी रहगुज़र का इन बेजान दीवारों का कायल
    नहीं हूँ!

    निःशब्द

    ©lafze_aatish

  • drunken_heart 27w

    कुछ ख़्वाब... कुछ हक़िक़त.... बयाँ कर चला
    ख़ुद को कर जमीं... तुम्हें याँ आसमाँ कर चला

    ताहिर रहूँ इश्क़ में.... तासीर सिर्फ़ तुम्हारे लिए
    इस्मत हो मिरी... इसलिए.. तुम्हें मकाँ कर चला

    *******

    #nishabd #bal_ram_pandey #succhiii #vishu #parle_g #gazal #hindiurdu

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    ग़ज़ल

    बे-नूर हूँ जान-ए-मन, क़ुबूल-ए-दिल-सादा करो
    आख़री ग़ैर-ए-वस्ल बा'द, न होगा ऐ वादा करो

    सोहबत-ए-शौक़ तुम्हारा, परवाह क्या और करूँ
    ग़र न तक़दीर-ए-इश्क़, फ़िर ख़ुदा बे-मुरादा करो

    सत्ह-ए-ख़्वाब जो, तुम्हारे दिल-ए-नादाँ ने जताई
    उम्मीद-ए-ख़्वाब उन्से, दिल अंदर ज़ियादा करो

    चैन-ओ-सुकूँ तसव्वुर-ए-ज़ुल्फ़-ओ-मिज़ा है तो
    सूरत-ए-ज़ेबा बे-पर्दा कर, इसे नुमू-आमादा करो

    क़ाबिल-ए-इश्क़ रहूँ, तुम्हारे अंदाज-ए-नज़र में
    दौर-ए-वक़्त देख, जान-ए-ज़िगर शहज़ादा करो

    ता-उम्र पियादा बन रहेगा 'विशू', गुल-एज़ार कर
    बे-फ़ना मुहब्बत का दिल से, तुम याँ इरादा करो

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 27w

    हालातों को जो बयाँ किया है.... शायद कोई मंज़र-ए-आम नहीं हुआ होगा... फ़िर भी ख़यालातों में जो उभरा... सादा-ए-पर्चा पर रूबरू.... मिरे हर्फ़-गह से.... ख़ुली निगह से उतारा है....
    ग़र यह ग़लत है तो ग़लत बता दिजिए....
    ग़लती के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ!

    #nishabd #vishu #bal_ram_pandey #succhiii #gazal #indiurdu
    मतलब:-

    अश्क-ए-ख़ूँ - reflection of blood
    सैल- flood
    इस्मत-ए-उन्वाने-हस्ती- protection
    क़ाँ -कहाँ
    रुख़- face
    याँ - यहाँ
    ना-पाक- dirty
    वालिद-ए-मुहतरम- respected father
    नस्ल-ए-शजर- family tree
    आलम-ए-दिल- world of heart
    सम्त- दिशा की और
    अहल-ए-दहर- man of world
    दाग़-ए-तर्क़-ए-मरासिम- spot of renunciation of relationship
    दर्स-ए-अमन - teaching
    ख़ूँ-ए-बशर- character
    अक्स- reflection
    तहज़ीब-ए-नौ- new culture
    मुल्क-ए-तहज़ीब - country of culture
    निगाह-ए-क़हर-परवर- look of fury
    दास्ताँ-ए-गिर्या- sob story
    तख़लीक़ी- creative
    नस्ल-ए-नौ- new generation
    दास्ताँ-ए-सफ़र- story of journey

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    ग़ज़ल

    अश्क-ए-ख़ूँ सैल में तब्दील होकर नहर रुख़ हुआ
    इस्मत-ए-उन्वाने-हस्ती फ़िर क़ाँ ऐ शहर रुख़ हुआ

    ना-पाक हरक़त हक़िक़त में जो छुपाएँ रख चले है
    वालिद-ए-मुहतरम कैसे ऐ नस्ल-ए-शजर रुख़ हुआ

    गंदगी ग़र रही पनपती अंदरूनी आलम-ए-दिल में
    हर सम्त नज़र-ए-नज़र में अहल-ए-दहर रुख़ हुआ

    ख़ामोश है दाग़-ए-तर्क़-ए-मरासिम से जो हुआ याँ
    दर्स-ए-अमन में ना-पाक याँ ख़ूँ-ए-बशर रुख़ हुआ

    अक्स बे-ईमानी तहज़ीब-ए-नौ के कदम लौ चली
    मुल्क-ए-तहज़ीब निगाह-ए-क़हर-परवर रुख़ हुआ

    किस अंदाज़े ज़ुबानी दास्ताँ-ए-गिर्या तख़लीक़ी देगा
    'विशू' नस्ल-ए-नौ क्यों यूँ दास्ताँ-ए-सफ़र रूख़ हुआ

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 27w

    ग़ज़ल

    जान-पहचान का हूँ तो... सख़्ती को रखना ना छोड़ना
    हूँ ग़र क़ुसूरवार तो.... बा-इज्जत यूँ खुला ना छोड़ना

    साबित होते ग़र जुर्म मेरे... तुम मुकर ना जाना उसे
    होगी ना सजा-ए-मौत तब तक.... पिछा ना छोड़ना

    सुना है कबूल-ए-मुराद होती है.. पास ख़ुदा के... तेरी
    मेरे हरेक गुनाह का... मिले सुराग.. हौसला ना छोड़ना

    दलीलें पेश करना... इस तरह बे-गुनाह ना दिखूँ.... मैं
    करना नफ़रत मुझसे... बीच में तुम फ़ासला ना छोड़ना

    अभी नासूर-ए-दिल... अंदर ज़िंदा है... समझौते के साथ
    कर यक़ीं बातों पर... उसके..... तुम यूँ वफ़ा ना छोड़ना

    ठोकर, दगा देकर... ज़लील कर जाएगा... बीच बाज़ार
    भूल जा 'विशू' को...पर तुम उसका..... पीछा ना छोड़ना

    ©drunken_heart

  • lafze_aatish 27w

    नीम-शब :- आधी रात
    इशग़म :-मेरा प्यार
    अज़ीज़म :- प्रिय
    फ़िरदौस :- जन्नत

    #nishabd #vishu @drunken_heart भाई जी
    @hindiwriters

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    इशग़म

    नीम-शब का ख़ाब..... ख़ाब मे सिर्फ़ तुम,
    इशग़म अज़ीज़म मेरी फ़िरदौस हो सिर्फ़ तुम!

    नि:शब्द

    ©lafze_aatish

  • drunken_heart 27w

    ग़ज़ल

    संभल रहा हूँ ख़ुद में साथ लिए पैमानों में
    गिनती और एक बढ़ गई, यार दीवानों में

    अक्सर मिलते रहे जिसे हम, ख्वाबों में
    वो आज रही पास यारा, उन अनजानों में

    सोच के भी न मुकम्मल, बात आगे बढ़ी
    सोचते ही रह गए ग़म, अब मय-ख़ानों में

    नफ़रत से रुख़सत अब वो ख़्वाबों की परी
    बसाए जहाँ अपना ही, अब परीबानों में

    आब-ए-चश्म से, न सूखे कभी मिरे इधर
    लूटा है मुझे देखो अब मेरे ही दिलदारों ने

    उल्फ़त से अब कभी, न गुज़र जाऊँ कई
    राह तकते है देखो, वो ताबूत कब्र स्थानों में

    हारी उल्फ़त कुछ ऐसे के बताएँ क्या 'विशू'
    भटक रही है यारा, यादों के रेगिस्तानों में

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 27w

    निशब्द रहता हूँ... जभी मंज़र-ए-आम यूँ हालातों को देखता हूँ...
    तो लगता है ख़ुदा... क्यों उनके नसीबी... ऐ प-ए-हू नहीं...
    जिसके लिए तड़पते है... तरसते है दिल... जिनके पास नूर-ए-हू होकर भी बे-परवाही करते है.... या-ख़ुदा रहमो करम फ़रमा उन्हीं पर... उनके दिल को तब्दील कर... नेक ख़्याल भर दे....
    बस यही दरख़्वास्त-ए-दिल तिरे दर-ब-दर करता है
    आमीन!!!

    #nishabd #vishu #succhiii #bal_ram_pandey #gazal #hindiurdu

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    ग़ज़ल

    "माँ"

    इंतजार में रहती आंखों में कई दर्द देखे है
    आस लगाए बैठी उसके पास मर्ज़ देखे है

    भूला दिया सबने फिर भी फ़िक्र जिंदा रही
    बहते आब-ए-चश्म में मिलने के अर्ज़ देखे है

    बाद उनके ना था कोई इम्तिहान परवरिश की
    हरेक गुज़रे हुए लम्हों में उसके फ़र्ज़ देखे है

    जगह वो थी उसकी जिसे खुदाया घर कहा
    मिलता ना कहीं पास उसके वो गर्ज़ देखे है

    जिसके इंतजार में रोई शब-ए-गम में वो
    जान लिया तो ना जाने कितने कर्ज़ देखे है

    कौन करेगा बराबरी उस शख्सियत की
    दिया खुदाने ममता का ऐसे अल-कर्ज़ देखे है

    दफन अभी उन अलमारियों में पास उसके
    ना मिलने आऊंगा कभी जमाएं लेटर्ज़ देखे है

    इक जिंदा रही रूह इंतजार में साथ 'विशाल'
    उस माँ की आब-ए-चश्म से बहते दर्द देखे है!

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 27w

    यक़ साधी ग़ज़ल... जो दिले नादाँ से रूबरू हुई... कुछ एहसास बाँध रखे थे.... मुकम्मल... जो न हुए.... न ब-दस्त हुए... न बे-दस्त हुए... बस जलते रहे.... जलाते रही.... धीमी तपिश में... दर्द उठता रहा... मरहम-ए-इश्क़... न कोई.... ताकता रहा.... देखता रहा... यक़ अंजान बन... हर्फ़-गह से वऱक... फ़क़त... भरता रहा

    #nishabd #vishu #succhiii #gazal #hindiurdu #bal_ram_pandey

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    ग़ज़ल

    मेरा नाम कभी मेरी पहचान नहीं हुई
    जो हुई वो मुझ पर मेहरबान नहीं हुई

    कोई भी राह चली मैंने सच कहूँ तो
    कभी वो पेश मुझे आसान नहीं हुई

    तकलीफ़ और चुनौती तो कुछ ऐसे
    कुचल गए पर पूरी क़दरदान नहीं हुई

    जब भी अपनाया किसी को दिल से
    बस दूर हुई मुझसे मेरी जान नहीं हुई

    मैं डूबा रहा ख़्यालों में पाने के लिए
    मिलकर बिछड़ी पर अरमान नहीं हुई

    बार-बार चलता रहा तलाश में मंजिल के
    पाकर खोया जो मुकम्मल अंज़ाम नहीं हुई

    बस लगता रहा इल्ज़ाम मेरे ही चरित्र पर
    पाक कर दूँ पर मुझे भी आसान नहीं हुई

    अब खुद में दफ़न एक रूह सा बचा सिर्फ़
    जैसे देखूँ तो ज़िन्दगी की, कोई शाम नहीं हुई

    पर फिर भी एक रेग़िस्तान सी फ़ैली है
    'विशू' को ख़ाक करें ऐसी मेज़बान नहीं हुई

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 27w

    ग़ज़ल

    तख़य्युल भी अब तिरे अंदाज-ए-नज़र आते है
    गुम'नाम हो भी जाऊँ लौट उसी श'हर आते है

    सुर्ख़ियों को निहारता हूँ गुज़रे कल कि है पास
    महफ़ूज है इतने के बनके ताज़ा ख़बर आते है

    सुर्ख़ स्याही से हर्फ़-दर-हर्फ़ लिख जाता जभी
    उमड़ कर फ़िर निग़ह में आब-ए-नहर आते है

    ताल्लुक़'आत इक सिर्फ़ तुम से है अहबाब मिरे
    वग़र्ना न जाने कितने पास में हम-सफ़र आते है

    फ़ासले कट गए इंतिज़ार में तिरे कैसे समझाऊँ
    बस समझ ले इतना के वाँ हो दर-ब-दर आते है

    अंदाज-ए-ज़ुबानी तिरे क़ायनात में न देखी कभी
    'विशू' को पागल कराने कज़ा-ओ-क़दर आते है

    ©drunken_heart