#sumit_

82 posts
  • bal_ram_pandey 138w

    #mirakee#hindiwriters
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    #mirakeeworld#naajnaaj#universe

    कभी-कभी मन .......
    उलझन में उलझ जाता है....... और फिर जन्म होता है कविता का।।।।।।।।।।।।

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    ............ (उलझन).............

    उलझन में है मन मेरा
    लिख दूं क्या जीवन का सार
    सुख की गागर भरी है थोड़ी
    दुख का सागर है अपार .........

    चंचल होती नदियों जैसी
    मानव मन की इच्छाएं
    कहां बांध सका है कोई
    अंतर्मन की सीमाएं
    अंतर में पौधा पतझड़ का
    अंतर में ही बसंत बहार

    उलझन में है मन मेरा लिख
    दूं क्या जीवन का सार.........

    परिस्थितियों ने जकड़ा बाहों में
    दिल सपनों का धड़के आहों में
    क्यूं कर्तव्य का कांटा चुभता है
    नेहा के सुकोमल पाओं में
    एक और खड़ा कर्तव्य हँसे
    एक और सिसकता प्यार

    उलझन में है मन मेरा लिख
    दूं क्या जीवन का सार............

    निष्ठुर रिश्तों ने जाल बिछाए
    फैलाकर स्वार्थों के दाने
    इसमें कब कौन फंसा पंछी
    हम तुम तो रहे अनजाने
    संबंधों के उर में तपिश है
    अधरों पर शीतल बयार

    उलझन में है मन मेरा लिख
    दूं क्या जीवन का सार.........

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 139w

    महफूज़ रखा है यादों को फ़ूल सा किताबों में सुकूं न मिला दिल को जहां के शोर-शराबों में

    हवा बनकर छू लेंगे तुझे दीदार कर लेंगे तेरा
    खिल जाएगा पत्थर बनकर फ़ूल बहारों में

    ना रख हमदर्दी की ख्वाहिशें जमाने से कभी
    हो जाएगा गमजदा आकर तू इनकी बातों में

    सूरत बदल रही तेरी आजकल चांद की तरह
    ढ़ल रहा हूं मैं भी आजकल हर हालातों में


    तेज रफ्तार जिंदगी में मुसलसल कहां ढूंढे
    शायद खो गया है तू भी कहीं हजारों में

    घबरा रहा है दिल आज महताब से बिछड़ के
    लगता है मर जाऐंगे ख्वाब आज आंखों में

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 139w

    हम समंदर हो गए, तू किनारा हो गया
    कश्ती को मेरी तूफानों का सहारा हो गया

    नई ग़ज़लें क्या पढ़ी पुराने भूल जाते हो
    गूंगे हो गए ऐहसास क्या नज़ारा हो गया

    खता है क्या बंद क़फ़स में परिंदे की
    क़ैद में उनके सपने क्यों ख़ुदारा हो गया

    मिले रिश्ते नाम के बिखरी मिली ज़िंदगी
    कांटो से मिठास मिली गुल खारा हो गया

    तुझसे है कायनात सौगात खुशियों की
    तू नहीं है तो मां मैं बेसहारा हो गया

    फ़कीर सी हो गई जानां मेरी ज़िंदगी अब
    चंद यादों की फाकाकशी मे गुज़ारा हो गया

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 139w

    ग़म के साए
    घर तक आए

    बिन हवा के
    पत्ते हिलते पाए

    पहरा खुशबू पर
    हवाओं ने बिछाए

    ख्वाब थक गए
    मन रीता जाए

    मन दर्पण रूठा
    सूरत कौन दिखाएं

    बहरी है दुनिया
    मन गूंगा गाये

    तनहा है सफ़र
    रिश्ते कौन निभाए

    समंदर रात का
    क्यूं कश्ती भटकाऐ

    है उदास आईना
    चेहरा ना भाए

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 139w

    बंदीशें हैं , पहरे हैं , और घाव गहरे हैं
    जलते हुए दिल , मुस्कुराते हुए चेहरे हैं

    सपनों के जंगल , बाहों में भर कर
    मुफलिसी का बोझा , सर पर उठा कर
    समस्याओं के अलाव गाते हुए चेहरे हैं

    बंदिशें है पहरें हैं----------

    लड़खड़ाते कंधों पर रिश्तों की लाश लेकर
    नंगे पांव इंसानियत के तपते सड़कों पर
    अधरों से पैमाने, छलकाते हुये चेहरे हैं बंदीशे हैं पहरे हैं ---------

    अभावों - गुनाहों के रेतीली रेगिस्तान में
    बस थोड़े से नेह, थोड़े से पैसे की चाह में
    सच से बरबस आंखें चुराते हुए चेहरे हैं
    बंदीशें है पहरें हैं ------------

    यादों के मखमली , नर्म बिछौनो पर
    बिरहा की उत्पीड़न नैनो के कोनो पर
    हंसते हुए होंठ , रूलाते हुए चेहरे हैं
    बंदीशें हैं पहरें हैं ----------

    व्यंग की मुस्कान , नैनों की भाषा में
    एक नई चाल , हंसने की परिभाषा में
    स्वार्थ की खातिर, मुँह फैलाते हुए चेहरे हैं
    बंदीशें हैं पहरें हैं ----------

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 139w

    #mirakee#hindiwriters
    #hindilekhan#gazal
    @ahsas_riya_ke#anitya
    #rangkarmi_anuj
    #osr#jhala#naajnaaj
    @naushadtm#odysseus#sumit_
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    @gazal_e_vishal
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    Inspired by ����

    अब किसी से कोई गिला नहीं
    हम फर्ज करते हैं तू कभी मिला नहीं
    @sanawrites_

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    ग़ज़ल

    ज़ख़्म अभी सिला नहीं
    तुझसे कोई गिला नहीं

    पूछते हो मुझसे पता
    ज़िंदगी से मिला नही

    ज़िंदगी है फ़ूल सा
    जो अभी खिला नहीं

    आँसू उलझे पलकों में
    हौंसला अभी गिरा नहीं

    तन्हाइयाँ ख़ामोश है अब
    सांसों का सिलसिला नहीं

    कुछ और इंतज़ार कर
    ज़िंदगी अभी जीया नही

    लड़खड़ा रहे हैं कदम
    मैने कभी पीया नही

    प्यार का कोई रंग नहीं
    वो हरा - पीला नहीं

    अँधेरा अब होने लगा
    मैं जलता हुआ दीया नहीं

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 139w

    सांसों का सफ़र कब तक
    दिन ढल गया शब तक

    आए कितने अल्फ़ाज़ जुबां पे
    नआया नाम ख़ुदा का लब तक

    कहां रहा असर दुआओं में
    कैसे पहुंचेगी‌ बात रब तक

    एक खालिश सी रही सीने में
    ग़म-गुसार ना मिला अब तक

    उड़ता है मन परिंदा मुसलसल
    खुले आसमान में एक हद तक

    मरने के बाद रूह भटकती रही
    ख्वाहिश ज़िंदा रही जब तक

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 141w

    दूर बुराई करना होगा
    हमको अपने हाथों से
    देश नहीं बदलेगा अब
    केवल थोथे बातों से....................

    बेटियां है नहीं सुरक्षित
    गली कूचे गांव शहर
    दानवता का आतंक फैला
    सांप उगलने लगे जहर

    फन कुचलना होगा अब तो
    इनका कानूनी घूंसे लातों से..............

    माता बिलख बिलख कर रोए
    पिता के आंख में आंसू सूख गए
    भाई का खून खौल रहा
    गिद्धों ने बहना के पर नोच लिए

    बिछड़ गए जो कहां है मिलते
    आंदोलन के शोर -शराबों से.................

    अपने ही घर से करें शुरुआत
    बेटों को नारी सम्मान सिखाएं
    भूले बिसरे गाली मां बहन की
    कभी ना जुबां पर इनके आए

    आग लगी कहां बुझती है
    नारों से तेजाबों से....,.........................

    विज्ञापन में व्यर्थ ही
    ना होअब अंग प्रदर्शन
    इंटरनेट के पॉर्न साइट्स
    पर हो सरकारी बंधन

    अश्लील साहित्य को आग लगा दो
    मिले जहां दुकानों में बाजारों से.................

    खामोशी हमारे समाज की
    बुराइयों को है देती हवा
    प्रशासन कमजोर आवाज
    की फाइल देते हैं दबा

    नहीं मिलेगा इंसाफ हमें
    सिर्फ मोमबत्ती और गुलाबों से..................

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 142w

    पहन के निकला है आज भी नक़ाब कोई बबूल की शाख़ों पे खिल गया ग़ुलाब कोई

    बड़ी मुद्दत बाद लबों पर आई है हंसी
    दिल के ज़ख्मों का दे गया हिसाब कोई

    फूल सा सवाल किया हमने तुझसे ज़िंदगी
    हाथ में पत्थर लेकर आया है ज़वाब कोई

    बात में साफगोई है उसके लहजे में आज
    लगता है पीकर आया है आज शराब कोई

    साथ उसके रहने से महक जाता मेरा घर
    काश मिलता मुझे भी ऐसा अहबाब कोई

    मां के चेहरे पर हंसी अच्छी लगती है मुझे
    मेरी नेकी का है शायद या खुदा सवाब कोई

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 142w

    थोड़ी सी धूप आंखों में लेकर चल
    यादों की चांदनी हाथों में लेकर चल

    सियाह रात है आगे सफ़र है तन्हा
    सब्र के जुगनू बाहों में लेकर चल

    लौट जाएगा वक्त बुरा हंस कर
    सबका भला दुआओं मे लेकर चल

    कोई इंतजार कर रहा है उस पार तेरा
    ख़ुद को ज़रा उजालों में लेकर चल

    मंज़िल यूं ही कहां मिलती है जानां
    कदम हालातों के कांटों में लेकर चल

    ज़ख्म अपनों का और वक्त का मरहम
    छुपा के चेहरे नकाबों में लेकर चल

    तिजारत हो गई हैं सारी बातें इश्क़ की
    अल्फाजों को अख़बारों में लेकर चल
    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 143w

    मैं तेरे सामने,आईना बनकर आ गया
    क्यों दोस्तों के हाथ में, पत्थर आ गया

    मुंतजीर आंखें ,अब ना- आशना शब से
    सारे ख्वाब, वक्ते दरिया में बहाकर आ गया

    थक गया परिंदा, गला सूख सा गया
    बिछा देखा दाना, ज़मीं पर उड़कर आ गया

    बूंदें शबनम की, ढ़लकर आंखों से गिरी
    घर, दरिया के, समंदर चलकर आ गया

    रहा भटकता जिंदगी भर, ख्वाहिशें अधूरी रही
    बंदा शहर से गांव अब लौटकर आ गया

    औलादों ने बांट लिए, बूढ़े मां -बाप
    रोने लगे बच्चे जब बुढ़ापा सरपर आ गया

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 144w

    आलम जो आज है साथ, कल रहेगा नहीं
    आंख को कर ले पत्थर ,आंसू बहेगा नहीं

    तितलियां क्या पकड़ता है,यादों के पगले
    बहारों में भी कभी सूखा फूल खिलेगा नहीं

    इतनी चिंगारियां हैं क्यूं, शक की इश्क़ में
    लकड़िया गीली है जानां,चुल्हा जलेगा नहीं

    आओ बैठ जाते हैं इस दरख़्त की छांव तले
    तन्हा धूप में चलने से मौसम बदलेगा नहीं

    ज़िंदगी गुजरी है फिक्र ए आलम में जनाब
    ज़माने से कोई खिताब पता है मिलेगा नहीं

    चंद लम्हों के इम्तिहान से डरकर ना भाग
    वतन से गया दूर तो वजूद भी बचेगा नहीं

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 145w

    दिन ......रात में ढल गया
    सूरज .........चांद में बदल गया

    करम हुआ तेरी खुदाई का कुछ ऐसा
    खोटा सिक्का भी चल गया

    रुख़ से नक़ाब क्या उठा
    दिल ऐ फ़कीर भी मचल गया

    सौदा किया जब से मैंने सच का
    मैं अपनों से बिछड़ गया

    ख़ुश था गुलाब कांटो के बीच
    हुआ जुदा शाखों से तो कुचल गया

    छूने का तेरे हुआ कुछ असर ऐसा
    बुझा........ हुआ चिराग़ भी जल गया

    ज़मीन घर रिश्ते छूट गए पीछे
    एक बार वो गांव से जो शहर गया

    मां की आंखों के अश्क का एक क़तरा
    जब गिरा मन....... समंदर भर गया
    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 145w

    इस देह दीए में तुम नेहा की बाती हो
    घनघोर अंधेरे में मेरी जीवन साथी हो

    चल रहा कौन मेरे सांसों में अनवरत
    हृदय में बनकर धड़कन शोर मचाती हो

    मन उलझ रहा अनसुलझे प्रश्नों में
    कैसे बिन मेरे आह तुम रह पाती हो


    अंतर्मन के मन कानन के तुम जीवनधन
    जीवन की राहों में तुम मेरी थाती हो

    तुम पावन मंत्र ऋचा सी मन प्रांगण में
    कुंठित हिय में आस सृजन कर जाती हो

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 146w

    तबस्सुम हर एक ग़म का ज़वाब है क्या
    ज़िंदगी गमतलब एक ख़्वाब है क्या

    ताउम्र देता रहा इम्तिहान तुझे ऐ ज़िंदगी
    मेरे नाम पर बेवजह इतना बवाल है क्या

    किताब ए ज़ख्म रख दिए सब तेरे रूबरू
    मांगते हो मेरे दर्द का हिसाब है क्या

    पैसा, शोहरत,वक्त आज मेरे अहबाब हैं
    कर दिल से बयां अब तेरे खयाल हैं क्या

    चेहरा उदास , लब ख़ामोश , आंखे नम
    तबीयत तुम्हारी इतनी ख़राब है क्या

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 146w

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    एक लघु प्रयास
    दिवाली नए आयामों अथवा
    प्रारूपों के माध्यम से मनाने का

    कृपया आरंभ से अंत तक पढ़ें
    आप सभी को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं����

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    (एक कविता)

    ओ मेरे हृदय के मीत
    गए एक साल अब बीत
    आ गई दिवाली फिर से
    लेकर लबों पर नए गीत
    दिल का दिल से रिश्ता निभाऐं..............
    आओ एक ऐसी दीवाली मनाएं............

    जिस की राहें तकती हैं
    नवयौवना घर में
    मां की आंखें रोती रहती
    बेटा गया है रण में
    एक दीया जवानों के लिए जलाएं......
    आओ एक दिवाली ऐसे भी मनाएं.....

    भूखे परिजन रोते बच्चे
    रोटी नहीं है थाली में
    रईसजादे फेंक रहे अन्न
    कूड़े-कचरे और नाली में
    आओ निवाले गरीबों को खिलाएं........
    आओ एक ऐसी दीवाली मनाएं..........

    कितने कन्यायें कुंवारी
    बैठी है बाबुल के घर
    राक्षस निकल रहा दहेज का
    नवविवाहिताओं के बली ले कर
    आज दहेज के रावण को जलाएं.........
    आओ एक ऐसी दीवाली मनाएं..........

    थिरक रहे हैं नौजवान
    पीकर मय मयखाने में
    सूने पड़े प्रभु के मंदिर
    आती शरम भजन गाने में
    एक दीया संस्कारों का जगमगाएं......
    आओ एक ऐसी दीवाली भी मनाए.....
    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 146w

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    धनतेरस और दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं मेरे अपने प्यारे मीराकी परिवार को ����������

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    एक दीया मुसलसल, जलता रहा रात भर
    अंधेरे से अकेले ,लड़ता रहा रात भर

    पिघलने लगी मोम , जलती रही बाती
    दीदा ए अश्क , बहता रहा रात भर

    सुब्ह की रोशनी में थे, हमसफ़र सारे
    शब ए तन्हाई में, हाथ मलता रहा रात भर

    तुमने की खता, क्यों मैंने सजा पाई
    ज़माने से मिन्नतें, करता रहा रात भर

    जल गए पंख, इश्क़ ए चराग़ में
    धीरे-धीरे पतंगा, मरता रहा रात भर

    रहना सब खुश ,लिए दुआएं लबों पर
    ज़ुल्म ए हवा , सहता रहा रात भर
    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 146w

    न नज़र बदली
    न नज़रिया बदला
    न ज़िंदगी बदली
    न जीने का जरिया बदला

    डूबी कई बार कश्ती
    उनकी निग़ाहों में
    न हमने कश्ती बदली
    न दरिया बदला

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 147w

    सबक ज़िंदगी के याद हो जाते
    सारे चेहरे काश बेनकाब हो जाते

    सूख जाता ये ग़म का दरिया तो
    हम चलकर उस पार हो जाते

    मुंतज़िर है कब से ये आंखें मेरी
    तुम मिलते अच्छे हालात हो जाते

    दुआओं में मुझे शामिल कर‌ लेते
    गुनाह भी मेरे सारे सवाब हो जाते

    रूबरू मुलाक़ात ज़रूरी है एक
    सारे मसले खुली किताब हो जाते

    गिले-शिकवे रंजोगम सब भुला कर
    क्यूं न हम फिर से अहबाब हो जाते
    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 147w

    आंखों में मैंने अब तन्हाई रख ली है
    तेरी यादों से अब रिहाई रख ली है

    क़ैद थे सपने जो रिहा कर दिए सारे
    अदालते दिल में सुनवाई रख ली है

    अब हम हैं नाराज़ ए ज़िंदगी तुझसे
    हमने अब दिल तमाशाई रख ली है

    हम बेखबर हैं अब खिल्वत ए ग़म से
    हमसाए से भी हमने जुदाई रख ली है

    शबे-हिज़्र अब है सफ़र मुसलसल मेरा
    आंख में सब्र की रोशनाई रख ली है

    ©bal_ram_pandey