#srv

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  • sramverma 13h

    Date 16/04/2021 Time 7:53 PM #SRV #nadi

    प्यासी अल्हड़ नदी को नमक पीला रहा हूँ मैं ;
    या यूँ कहूं कि उसको समंदर से मिला रहा हूँ मैं !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 1d

    Date 15/04/2021 Time 7:26 PM #SRV #aurat

    एक औरत के दिल की तड़प तो
    सिर्फ़ एक औरत ही समझ सकती है ;

    मर्द तो बस अपनी ख़्वाहिशों को ;
    औरत पर थोप दिया करते है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 2d

    Date 14/04/2021 Time 7:27 PM #SRV #husn

    तुम कैसे कह देते हो एक कविता लिख दो ,
    नहीं पता तुम्हे मुझे ख़ून जलाना पड़ता है ;

    हर्फों से दो दो हाथ करने में ना जाने कब ,
    अपनी नब्ज़ों का धागा कटवाना पड़ता है ;

    पुरानी यादों के नुकीले नश्तरों से बार बार ,
    अपने दिल पर वो नाम गुदवाना पड़ता है ;

    अपने सीने के सियाह हुए काग़ज़ पर ,
    ख़ंजर बन खून से सब मिटाना पड़ता है ;

    कविता गीत नज़्मों ग़ज़लों के झगड़ों से ,
    अपने ज़ख़्मों पर नमक छिड़कवाना पड़ता है ;

    वो गली जहाँ तुम पहले पहल रहा करते थे ,
    उस गली में ना चाहते हुए भी जाना पड़ता है ;

    तुम्हारे किये हर एक झूठे वादे बयाँ करके ,
    फिर उनमें से तुम्हारा नाम हटाना पड़ता है ;

    वो अक्स जिसे अब मैं शायद याद भी नहीं ,
    ना चाहते हुए भी उसे रक़्स दिखाना पड़ता है ;

    अपने तेवर साहूकार के पास गिरवी रखकर ,
    फिर उसे मुँह मांगी कीमत पर छुड़वाना पड़ता है ;

    पहले पागलपन की सारी हदें पार कर के ,
    फिर वापस घर को ही तो आना पड़ता है ;

    सारी की सारी चतुराई तब बिक जाती है ,
    जब जाकर बाहर कुछ कमाना पड़ता है ;

    आतिशबाज़ी आतिशबाज़ी कर कर के,
    उसमें फिर ख़ुद को ही जलाना पड़ता है ;

    तुम जिसे ज़ेवर समझते हो वो ता'वीज़ है ,
    इन्हे आस्तीनों में छुपा कर रखना पड़ता है ;

    तुम कैसे कह देते हो एक कविता लिख दो ;
    नहीं पता तुम्हे मुझे ख़ून जलाना पड़ता है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    तुम कैसे कह देते हो एक कविता लिख दो ,
    नहीं पता तुम्हे मुझे ख़ून जलाना पड़ता है ;

    हर्फों से दो दो हाथ करने में ना जाने कब ,
    अपनी नब्ज़ों का धागा कटवाना पड़ता है ;

    पुरानी यादों के नुकीले नश्तरों से बार बार ,
    अपने दिल पर वो नाम गुदवाना पड़ता है ;

    अपने सीने के सियाह हुए काग़ज़ पर ,
    ख़ंजर बन खून से सब मिटाना पड़ता है ;

    कविता गीत नज़्मों ग़ज़लों के झगड़ों से ,
    अपने ज़ख़्मों पर नमक छिड़कवाना पड़ता है ;

    वो गली जहाँ तुम पहले पहल रहा करते थे ,
    उस गली में ना चाहते हुए भी जाना पड़ता है ;

    तुम्हारे किये हर एक झूठे वादे बयाँ करके ,
    फिर उनमें से तुम्हारा नाम हटाना पड़ता है ;

    वो अक्स जिसे अब मैं शायद याद भी नहीं ,
    ना चाहते हुए भी उसे रक़्स दिखाना पड़ता है ;

    अपने तेवर साहूकार के पास गिरवी रखकर ,
    फिर उसे मुँह मांगी कीमत पर छुड़वाना पड़ता है ;

    पहले पागलपन की सारी हदें पार कर के ,
    फिर वापस घर को ही तो आना पड़ता है ;

    सारी की सारी चतुराई तब बिक जाती है ,
    जब जाकर बाहर कुछ कमाना पड़ता है ;

    आतिशबाज़ी आतिशबाज़ी कर कर के,
    उसमें फिर ख़ुद को ही जलाना पड़ता है ;

    तुम जिसे ज़ेवर समझते हो वो ता'वीज़ है ,
    इन्हे आस्तीनों में छुपा कर रखना पड़ता है ;

    तुम कैसे कह देते हो एक कविता लिख दो ;
    नहीं पता तुम्हे मुझे ख़ून जलाना पड़ता है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

  • sramverma 3d

    Date 13/04/2021 Time 7:27 PM #SRV #husn

    लड़खड़ा जाऊँ तो सँभलना भी जानती हूँ,
    हाँ दुर्घटनाओं से निपटना भी जानती हूँ;

    आइना भी जो देख कर खुद हार मान लें,
    मैं इस कदर सजना सँवरना भी जानती हूँ;

    हाँ मेरी सादगी में भी ऐसा हुस्न छुपा है,
    कि तेरे दिल में कैसे रहना है जानती हूँ;

    तुम बस भरोसा रखना मेरी वफ़ा पर,
    मैं अँगारों पर चलना भी जानती हूँ;

    मैं हरगिज़ ख़ुद-कुशी का शौक नहीं रखती,
    मगर तुझ पर मर मिटना अच्छे से जानती हूँ;

    हाँ मेरी फ़ितरत है हु-ब-हु पानी की तरह,
    मैं हर साँचे में खुद को ढालना जानती हूँ;

    गर कभी बिफर जाऊँ तो लहर बन जाऊँ,
    चटानों को अपने रस्ते से हटाना जानती हूँ;

    जुनूँ बन कर जो टकरा जाऊं दिमाग से तो,
    सारी की सारी हदों से भी गुज़रना जानती हूँ;

    दुआ-ए-सलामत पढ़ती रहती हूँ अक्सर,
    हर तरह की बलाओं से निमटना जानती हूँ;

    मुझे वो सारे के सारे हुनर आते है जानाँ,
    जिन से तेरी क़िस्मत बदलना जानती हूँ;

    सियासत करना चाहती नहीं हूँ मैं वर्ना,
    तेरा ये तख़्त-ओ-ताज पलटना जानती हूँ;

    अक्सर भुला देती हूँ मैं इन रंजिशों को,
    तब ही तो तुझसे मैं लड़ना नहीं जानती हूँ;

    वफ़ा तुम ने नहीं की मुझ से अब तक,
    लेकिन तुझे मैं अब भी अपनाना जानती हूँ;

    तेरे दिल को जो लगा लूँ अपने दिल से,
    तो तेरा दिल भी मैं बदलना जानती हूँ !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    लड़खड़ा जाऊँ तो सँभलना भी जानती हूँ,
    हाँ दुर्घटनाओं से निपटना भी जानती हूँ;

    आइना भी जो देख कर खुद हार मान लें,
    मैं इस कदर सजना सँवरना भी जानती हूँ;

    हाँ मेरी सादगी में भी ऐसा हुस्न छुपा है,
    कि तेरे दिल में कैसे रहना है जानती हूँ;

    तुम बस भरोसा रखना मेरी वफ़ा पर,
    मैं अँगारों पर चलना भी जानती हूँ;

    मैं हरगिज़ ख़ुद-कुशी का शौक नहीं रखती,
    मगर तुझ पर मर मिटना अच्छे से जानती हूँ;

    हाँ मेरी फ़ितरत है हु-ब-हु पानी की तरह,
    मैं हर साँचे में खुद को ढालना जानती हूँ;

    गर कभी बिफर जाऊँ तो लहर बन जाऊँ,
    चटानों को अपने रस्ते से हटाना जानती हूँ;

    जुनूँ बन कर जो टकरा जाऊं दिमाग से तो,
    सारी की सारी हदों से भी गुज़रना जानती हूँ;

    दुआ-ए-सलामत पढ़ती रहती हूँ अक्सर,
    हर तरह की बलाओं से निमटना जानती हूँ;

    मुझे वो सारे के सारे हुनर आते है जानाँ,
    जिन से तेरी क़िस्मत बदलना जानती हूँ;

    सियासत करना चाहती नहीं हूँ मैं वर्ना,
    तेरा ये तख़्त-ओ-ताज पलटना जानती हूँ;

    अक्सर भुला देती हूँ मैं इन रंजिशों को,
    तब ही तो तुझसे मैं लड़ना नहीं जानती हूँ;

    वफ़ा तुम ने नहीं की मुझ से अब तक,
    लेकिन तुझे मैं अब भी अपनाना जानती हूँ;

    तेरे दिल को जो लगा लूँ अपने दिल से,
    तो तेरा दिल भी मैं बदलना जानती हूँ !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

  • sramverma 4d

    Date 12/04/2021 Time 8:30 PM #SRV #wazood

    वजूद के जो हिस्से
    वजूद की तलाश में
    खो जाते हैं ,
    उन का इंदिराज
    ज़िंदगी की किताब
    के किसी भी पन्ने
    पर नहीं मिलता ,
    हाँ उन कविताओं
    नज़्मों शे'रोँ में जरूर
    मिलता है जो आँसुओं
    की रौशनाई में
    लिखी गई हों ,
    लेकिन फिर हमें
    तारीकी को अपना
    नशेमन बनाना पड़ता है ,
    इस राज़ से ज़िंदगी
    नहीं वजूद वाक़िफ़ है ,
    और हम वजूद नहीं
    ज़िंदगी जीते हैं !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 5d

    Date 11/04/2021 Time 8:00 PM #SRV #nariwad

    मेरी हकलाहट
    उस क़लम की ज़बान है

    जिस को तुम्हारी
    अना ने तराशा है

    और ये जो गूँज है
    मेरे वजूद के टूटने
    की आवाज़ है

    ये कोई नारीवाद
    नहीं बस
    बे-हैसियती है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 1w

    Date 10/04/2021 Time 8:08 PM #SRV #man

    काश यूँ होता
    कि वफ़ा
    मन का फ़िरन
    चाक कर के
    फ़रार पाती;

    बख़िये उधेड़ कर
    ऊधम जोत के
    मन को छोड़ जाती;

    इंतिज़ार तमाम
    कट जाते और मन
    की आँख लग जाती !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 1w

    Date 9/04/2021 Time 8:52 PM #SRV #saya

    जब तुम्हारे सानिध्य
    से मैं लौटकर चला
    आया था,

    तब यूँ लगा जैसे खुद
    को तुम्हारे पास ही
    छोड़ आया था ;

    इसलिए रूह को
    अपनी कुछ ढूँढते
    पाया था,

    पर कुछ था जो
    दिन रात मेरी पलकों
    में समाया था ,

    हाँ वो तुम्हारा ही
    तो साया था जो
    मेरे साथ चला
    आया था।

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 1w

    Date 8/04/2021 Time 8:07 PM #SRV #yaad

    चश्म-ए-नम भी मेरी मुस्कुराने लगती है ;
    जब याद तुम्हारी बेसबब सताने लगती है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 1w

    Date 7/04/2021 Time 10:34 PM #SRV #ishq

    सुनो इश्क़ को संजीदगी से लो "राम" ,
    यूँ इश्क़ में बचपना दिखाना ठीक नहीं ;

    माना की जीतना मुश्किल है हिज्र से ,
    पर मुसलसल हार मानना ठीक नहीं !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 1w

    Date 6/04/2021 Time 10:46 PM #SRV #hawa

    सर्द रातों में भटकती हुई हवा की तरह ,
    मैं साथ तेरे चली आई पुरवाई की तरह ;

    यही देख के तज्दीद-ए-मोहब्बत कर ली ;
    दिल टूटेगा तो वो भी रोयेगा मेरी ही तरह !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 1w

    Date 5/04/2021 Time 8:24 PM #SRV #umra

    नादाँ उम्र के
    कच्चे ख़्वाबों की
    क़ीमत ;
    नादाँ उम्र के
    ख़ूबसूरत जज़्बों की
    क़ीमत ;
    इतनी महँगी होती है ,
    कि वो उम्र गुज़र जाने
    के बा'द भी ,
    उनकी क़ीमत
    ता उम्र चुकानी
    पड़ती है क्युकी ;
    वो कच्चे ख़्वाब
    वो ख़ूबसूरत जज़्बे
    हम-सफ़र हो हमारे
    साथ साथ चलते हैं !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 2w

    Date 4/04/2021 Time 8:34 PM #SRV #haya

    आँखों में हया जब जब उस के आई ,
    पलकों पर पलक तब उस ने गिराई ;

    आलम सुपुर्दगी का जब उस ने देखा ;
    अपना देह देख फिर वो खुद मुस्कुराई !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 2w

    Date 2/04/2021 Time 11:29 PM #SRV #shringaar

    मैं उस का इंतिज़ार कर के रोई ,
    रात ढली तो श्रृंगार कर के रोई ,

    सुबह जब गगन में तारे छुप गए ;
    तब वो श्रृंगार उतार कर के रोई !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 2w

    Date 1/04/2021 Time 11:03 AM #SRV #nishar

    अब शाम हुई चल श्रृंगार करना है ,
    फिर रात का इंतज़ार भी करना है ;

    तन मेरा चाँदी का मन सोने का हो ;
    साजन पर तो सब निसार करना है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 2w

    Date 31/03/2021 Time 10:56 AM #SRV #gulal

    तज्वीज़-plan, proposal

    ख़ामोशी भी एक इबादत है ,
    तुम मुझे ये तज्वीज़ देते हो ;

    काँटा जो ख़ुद को चुभता है ;
    फिर शोर क्यूँ तुम मचाते हो !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 2w

    Date 30/03/2021 Time 10:36 AM #SRV #kritya

    हम प्राय ही अपने
    कृत्यों की पुनरावृत्ति
    करते रहते हैं;
    जैसे शब्दों की
    भावनाओं की
    अभिव्यक्तियों की
    और इसी पुनरावृत्ति
    में हम गढ़ते हैं;
    कई नई कविताएँ
    भरे पूरे उत्साह से
    जो लिए होती है;
    नए नए आकर्षण
    नए नए रिश्ते
    नए नए संसाधन
    नए नए प्रयोजन;
    ऐसा भी नहीं कि
    पुनरावृत्ति नीरस
    और उबाऊ नहीं होती
    कई बार होती है परन्तु
    तब तक नहीं लगती
    जब तक उनमें से नवीनता
    जन्मती रहती है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 3w

    Date 29/03/2021 Time 11:39 AM #SRV #gulal

    होली आई देखकर सब का मन हुआ निहाल ;
    प्रिया के तन पर लेपता पिय केसर और गुलाल !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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    ,

  • sramverma 3w

    Date 28/03/2021 Time 1:52 AM #SRV #julf

    मैंने पूछा की रात को आँचल में कौन था ,
    उसने कहा के ज़ुल्फ़ से शबनम गिरा था ;

    मैंने पूछा की हिज्र की शाख़ों पर फूल कैसे ;
    उसने कहा के दीद की ख़ुश्बू से खिला था !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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  • sramverma 3w

    Date 27/03/2021 Time 11:14 AM #SRV #gulab

    वो एहसास हु-ब-हु
    गुलाब के फूलों जैसे है ;

    जब भी महकते है हु-ब-हु
    तुम्हारी सी खुशबू आती है !

    शब्दांकन © एस आर वर्मा

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