#sadshairi

37 posts
  • ishq_allahabadi 1w

    शेर/ شعر

    لہو رگوں کا مرے آنکھ سے اتر آیا،
    نہ پوچھ ہ سے کہ کیا کیا دکھا گئیں آنکھیں ۔

    लहू रगों का मिरे आँख से उतर आया,
    न पूछ हमसे कि क्या क्या दिखा गईं आँखें।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 1w

    शेर/شعر

    اسکو ہر چیز کا تقاضا تھا،
    پاس دل کے سوا تھا کچھ بھی نہیں-

    اس طرح ختم ہو گیا قصہ،
    اس میں باقی رہا تھا کچھ بھی نہیں ۔

    उसको हर चीज़ का तक़ाज़ा था,
    पास दिल के सिवा था कुछ भी नहीं ।

    इस तरह ख़त्म हो गया क़िस्सा,
    उसमें बाक़ी रहा था कुछ भी नहीं ।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 1w

    कलमा/کلمہ

    میں پڑھ چکا ہوں ترے نام کا کلمہ پھر بھی،
    تو میری زات میں کیوں کر اتر نہیں جاتا۔

    मैं पढ़ चुका हूँ तिरे नाम का कलमा फिर भी,
    तू मेरी ज़ात में क्यूँकर उतर नहीं जाता।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 1w

    ग़म/غم

    تمہارے غم کی شدت کو مجھے محسوس کرنے دو،
    اگر جینا نہیں ممکن تو مجھ کو ساتھ مرنے دو۔

    तुम्हारे ग़म की शिद्दत को मुझे महसूस करने दो,
    अगर जीना नहीं मुमकिन तो मुझको साथ मरने दो।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 2w

    रदीफ़ = गज़ल में बार बार प्रयोग होने वाला शेर की दूसरी पंक्ति का आख़िरी शब्द ।
    क़ाफिया = गज़ल में प्रयोग होने वाला एक ही स्वर वाले शब्द ।
    मतला= गज़ल का पहला शेर ।
    मक़ता = गज़ल का आख़िरी शेर जिसमें शायर अपना नाम लिखता है।
    मिस्ल = एक जैसा ।
    सिफ़ात = ख़ूबियाँ।
    गौहर = आभूषण


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    मिरी

    मिरी ग़ज़ल के हर एक शेर में मिरी जाना,
    रदीफ़ नाम का तेरे ही मैं लगाऊँगा।

    तिरी सिफ़ात जो बिखरी हैं मिस्ल गौहर सी,
    बना के क़ाफिया उसका ग़ज़ल सजाऊँगा।

    हँसी को तेरी चुराकर लिखुँगा मतले में,
    मैं अपने नाम का मक़ता उसे उढ़ाऊँगा।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 3w

    शब-ए-विस्ल =मिलन की रात
    मिस्ल-ए-माह= चाँद की तरह ।
    कुल= पूरी
    हयात = जीवन
    शब= रात

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    शेर/شعر

    چھا جاۓ ساری شب پہ شب وصل مژل ماہ،
    پھر کل حیات میں اسی شب میں گزار دوں۔

    छा जाए सारी शब पे शब-ए-विस्ल मिस्ल-ए-माह,
    फिर कुल हयात मैं उसी शब में गुज़ार दूँ ।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 3w

    ہر پھول سجانے کے لئے ہوتا نہیں ہے،
    ہر زخم دکھانے کے لئے ہوتا نہیں ہے ۔

    کانٹوں سے کیا کرتے ہیں پھولوں کی حفاظت،
    راہوں میں بچھانے کے لئے ہوتا نہیں ہے ۔

    کچھ درد کو سینے میں دباتے ہیں مری جاں،
    ہر درد بتانے کے لئے ہوتا نہیں ہے ۔

    جو شور سے آ جائے بدل تیری خدی میں،
    بس شور مچانے کے لئے ہوتا نہیں ہے ۔

    گر مہ جو اتر جائے لہو میں تو بنے بات،
    بس جام پلانے کے لئے ہوتا نہیں ہے ۔

    ہوتا ہے گماں ان کو جتائنگے کسی روز،
    پر "عشق" جتانے کے لئے ہوتا نہیں ہے ۔

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    नहीं है/ نہیں ہے

    हर फूल सजाने के लिए होता नहीं है,
    हर ज़ख़्म दिखाने के लिए होता नहीं है ।

    काँटों से किया करते हैं फूलों की हिफ़ाज़त,
    राहों में बिछाने के लिए होता नहीं है ।

    कुछ दर्द को सीने में दबाते हैं मिरी जाँ,
    हर दर्द बताने के लिए होता नहीं है ।

    जो शोर से आ जाए बदल तेरी ख़ुदी में,
    बस शोर मचाने के लिए होता नहीं है ।

    गर मय जो उतर जाए लहू में तो बनें बात,
    बस जाम पिलाने के लिए होता नहीं है ।

    होता है गुमां उनको जताएँगे किसी रोज़,
    पर "इश्क़ " जताने के लिए होता नहीं है ।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 4w

    दुनिया/دنیا

    بڑی عجیب ہے دنیا ،عجیب دنیا ہے،
    جو خون سچ کرے ،سچا اس ہی مانتی ہے،

    बड़ी अजीब है दुनिया, अजीब दुनिया है,
    जो ख़ून-ए-सच करे सच्चा उसे ही मानती है।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 4w

    अब/اب

    اب عشق میں پہلے سے وہ جذبات نہیں ہے،
    اب درد میں یاروں وہ مگر بات نہیں ہے۔

    अब इश्क़ में पहले से वो जज़्बात नहीं है,
    अब दर्द में यारो वो मगर बात नहीं है ।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 5w

    रुसवाई/رسوائی

    بہانے اور بھی رسوائی کے تھے ،
    محبت کو مگر اس نے چنا تھا۔

    बहाने और भी रुसवाई के थे,
    मुहब्बत को मगर उसने चुना था।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 5w

    شراب حسن سے بہتر ہے کوئی جام بھی اور؟
    بتاؤں ساتھ تمہارے کہ کوئی شام بھی اور۔

    پکارتا ہوں بہت منہ سے پر نکلتا ہی نہیں،
    تمھارے نام کے الاوہ کوئی نام بھی اور۔

    تمہیں کو چاہتے رہنا یہ کیا مصیبت ہے،
    خدایا کیسے کریں ہم کہ کوئی کام بھی اور ۔

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    और

    शराब-ए-हुस्न से बेहतर है कोई जाम भी और?
    बिताऊँ साथ तुम्हारे के कोई शाम भी और।

    पुकारता हूँ बहुत मुहँ से पर निकलता नहीं,
    तुम्हारे नाम के अलावा कोई नाम भी और।

    तुम्ही को चाहते रहना ये क्या मुसीबत है,
    ख़ुदाया कैसे करें हम के कोई काम भी और।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 5w

    नेज़ा = कटारिया
    रन्ज = ग़म
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    दर्द/درد

    درد و فریاد کو سینے میں دبا رکھا ہے،
    ایک نیزا ہے جسے دل میں چبھا رکھا ہے،
    میرے چھرے کی ہنسی رنج میں لپٹی مورت،
    اس ہینسی سے ہاں مگر سبکو ہنسا رکھا ہے-

    दर्द-ओ-फ़र्याद को सीने में दबा रखा है,
    एक नेज़ा है जिसे दिल में चुभा रखा है,
    मिरे चेहरे की हँसी रन्ज में लिपटी मूरत,
    इस हँसी से हाँ मगर सबको हँसा रखा है।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 6w

    जाएँ/جائیں

    تمہارے ہجر سے بہتر ہے ہم کی مر جائیں،
    کچھ اس طرح سے محبت میں ہم گزر جائیں،
    یہ روز و شب کا تسلسل بڑا ہی مشکل ہے،
    سمجھ میں آتا نہیں ہم کہ کیا ہی کر جائیں ۔

    तुम्हारे हिज्र से बेहतर है हम के मर जाएँ,
    कुछ इस तरह से मुहब्बत में हम गुज़र जाएँ।
    ये रोज़-ओ-शब का तसलसुल बड़ा ही मुश्किल है,
    समझ में आता नहीं हम के क्या ही कर जाएँ।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 6w

    हुस्न

    तिरा हुस्न पैकर-ए-शबाब में लिपटा हुआ एक मुजस्सिमा,
    जो ख़ूँ में उतरे शराब सा, है अजब नहीं के ले ले जाँ।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 7w

    तकरार

    मिरि हर बात पर मुझसे वो अब तकरार करता,
    मुझे लगता नहीं है अब वो मुझसे प्यार करता है।

    है उसका तल्ख़ जो लहजा मिरे दिल पर न पूछो क्या,
    असर हो कम या फिर ज़्यादा मगर हर बार करता है ।

    ख़ुदी को कर दिया सदक़ा सलामत वो रहे ताकी,
    मिरी कु़र्बानियों का वो मगर इन्कार करता है ।

    वो जिसको कद्र ही न हो मिरे एहसास की कुछ भी,
    मुहब्बत उसको मेरे दिल तू फिर बेकार करता है ।

    छुपाऊँ चाहे जितना भी मिरे सीने में ग़म सारा,
    मिरा चेहरा मगर फिर भी उसे इज़हार करता है।

    मिरी आँखों के आँसू दास्तान मेरी सुनाते है,
    मुहब्बत दास्तान में बस मिरा किरदार करता है।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 7w

    दिल/دل

    عجیب شخص ہے وہ دل کی بات کرتا ہے،
    جسے خبر ہی نہین دل کے ٹوٹ جانے کی۔
    وہ جس نے توڑا ہو اکثر دلوں کو ٹھکرا کے،
    اسے بتاؤ کے دل ہے کوئی کھلونا نہیں ۔

    अजीब शख़्स है वो दिल की बात करता है,
    जिसे ख़बर ही नहीं दिल के टूट जाने की।
    वो जिसने तोड़ा हो अकसर दिलों को ठुकरा कर,
    उसे बताओ के दिल है कोई खिलौना नहीं ।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 10w

    ज़ेरे नज़र = नज़र के नीचे
    साजिद = सजदा करने वाला
    चारागर = इलाज करने वाला।

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    ग़ज़ल

    सौ हाल ज़िन्दगी के हैं तुमको सुनाएँ क्या,
    हम कितना मर चुके हैं ये तुमको बताएँ क्या ।

    दिल को जला के राख़ किया और धुआं किया,
    अब क्या बचा है पास के अब हम जलाएँ क्या ।

    ज़ेर-ए-नज़र हुआ जो तिरा शहर तो पाया,
    साजिद नहीं है कोई तो मूरत बनाएँ क्या ।

    गर आती है दरार तो फिर फ़ायदा नहीं ,
    दिल टूट अगर जाए तो उसको मिलाएँ क्या ।

    इस हाल पर हँसी है मिरे ज़िन्दगी बहुत,
    हम रो चुके हैं इतना कि ख़ुद को हसाएँ क्या।

    होता नहीं दवा का असर "इश्क़ " में तो फिर,
    ऐ चारागर बता कि दवा हम ये खाँए क्या ।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 10w

    اب ہو رہی ہے مجھ سے محبت بھلا ہی کیوں،
    خوش ہو رہی بد تھی جو قسمت بھلا ہی کیوں ۔

    وہ دور پرانا تھا شکایت کا نہ رہا،
    تم کر ہو مجھ سے شکایت بھلا ہی کیوں-

    کیوں آۓ ہو مکان پہ ٹوٹے ہوئے مرے،
    اب کیا بچا ہے پاس یہ زحمت بھلا ہی کیوں ۔

    تم چھوڑ کر گۓ تھے مجھے جان طمنا،
    اب مجھ سے کر رہے ہو یہ الفت بھلا ہی کیوں ۔

    اب تو ہر ایک یاد تری زخم کا سبب ،
    اس کی پرانی یاد سے قربت بھلا ہی کیوں-

    جو تم کو چھوڑ جاۓ اسے تم بھی چھوڑ دو،
    اس کو بناۓ "عشق" کے عادت بھلا ہی کیوں ۔

    #mirakee #ghazal #writersnote #hindinama #lekhni #urdupoetry #urdu #sadshairi #mirakeewriters

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    गज़ल

    अब हो रही है मुझसे मुहब्बत भला ही क्यों,
    ख़ुश हो रही है बद थी जो क़िस्मत भला ही क्यों ।

    वो दौर पुराना था शिकायत का न रहा,
    तुम कर रहे हो मुझसे शिकायत भला ही क्यों ।

    क्यों आए हो मकान पे टोटे हुए मिरे,
    अब क्या रहा है पास ये ज़हमत भला ही क्यों ।

    तुम छोड़ कर गए थे मुझे जान-ए-तमन्ना,
    अब मुझसे कर रहे हो ये उल्फ़त भला ही क्यों ।

    अब तो हर एक याद तिरि ज़ख़्म का सबब,
    उसकी पुरानी याद से क़ुर्बत भला ही क्यों ।

    जो तुमको छोड़ जाए उसे तुम भी छोड़ दो,
    उसको बनाए "इश्क़ " के आदत भला ही क्यों ।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 12w

    सरापा= सर से पाँव तक
    सरूर = नशा
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    सरापा/سراپا

    سراپا حسن ہے کیا جانئے وہ مہ کا سرور،
    وہ جام عشق ہے ،آتش بھی اور آنکھ کا نور،
    وہ جس کے پاس ہو کیوں کر نہ خود پہ غرور،
    جو اس کو دیکھے جو مر جائے تو ہے کیا ہی قصور،

    کھلے جو بال تو شب کی مثال ہو جائے،
    جھکے نظر جو خدا اک بوال ہو جائے-


    सरापा हुस्न है क्या जानिए वो मय का सरूर,
    वो जाम-ए-इश्क़ है,आतिश भी और आँख का नूर,
    वो जिसके पास हो क्योंकर न करे ख़ुद में ग़ुरूर,
    जो उसको देखे जो मर जाए तो है क्या ही क़ुसूर,

    खुले जो बाल तो शब की मिसाल हो जाए,
    झुके नज़र तो ख़ुदा इक बवाल हो जाए ।
    ©ishq_allahabadi

  • ishq_allahabadi 13w

    Dears readers,
    After so long I am here again to write something which I wish will be blessed by your readings...

    मसाएब = दुख
    गरीबाँ = क़मीज़ का गला
    अहल-ए-इज़्ज़त = इज़्ज़त वाला

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    बाद/بعد

    کیا ہی اب باس بچا ہے مرا اس شام کے بعد،
    کون رہتا ہے کبھی ہوش میں اک جام کے بعد،
    ہے گریباں یہ مرا چاک مصائب سے مرے،
    اہل عزت کہاں جیت ہے پھر الزام کے بعد۔

    क्या ही अब पास बचा है मिरा उस शाम के बाद,
    कौन रहता है कभी होश में इक जाम के बाद,
    है गरीबाँ ये मिरा चाक मसाएब से मिरे ,
    अहल-ए-इज़्ज़त कहाँ जीता है फिर इलज़ाम के बाद
    ©ishq_allahabadi