#rachanaprati97

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  • mamtapoet 7w

    #rachanaprati97
    #rachanaprati98

    @anandbarun, @anusugandh, @psprem, @loveneetm, @goldenwrites_jakir, @greenpeace767, @suresh_28 @abr_e_shayari
    आप सभी ने मेरे द्वारा दिये विषय पर बहुत ही खूबसूरती से अपने अपने विचारों के परिंदों को उन्मुक्त उड़ान का अवसर प्रदान किया और मुझे कहते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि सभी की रचनाएँ
    अप्रतिम और मनभावन है। आप सभी एक दूसरें की रचनाओं को पढ़े तो आपको भी लगेगा विजेता घोषित करना सच में बहुत दुविधा का विषय है।

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    मैं आगे मंच संचालन की जिम्मेदारी @psprem ji को सौंपती हूँ। अपना सहयोग अपनी रचनाओं के साथ आप आगे भी सभी को प्रदान करेंगे इसी आशा के साथ, कोई त्रुटि हो तो क्षमा करे ।

  • anusugandh 7w

    #rachanaprati97
    @mamtapoet

    बादलों की ओढ़ चुनर
    तेरी दुल्हन बनूंगी मैं
    चंद्रमा की बिंदी लगाकर
    माथे का श्रृंगार करूं मैं
    सूर्यकिरण से लालिमा लेकर
    होंठ करूं सुर्ख लाल मैं
    धरा से हीरा निकालकर
    पहनूँ अंगूठी तेरे नाम की मैं
    पृथ्वी का सीना चीर कर
    धारण करूं तेरे लिए गहने मैं
    बस जाऊं धड़कन बनकर
    सीप में मोती बन जाऊं मैं
    प्रकृति के फूलों से सराबोर
    जय माल गले में डालूँ मैं
    इंद्रधनुष के रंगों में रंग कर
    पवित्र सात फेरे तेरे साथ लूं मैं
    तारों की पालकी पर बैठकर
    आऊँ तेरे घर अंगना मैं
    यही कामना करती प्रभु से
    सातों जन्म साथ बंध जाऊं मैं

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    मन के भाव

    मन है हीरा मन है मोती
    मन का पारावार नहीं
    इक रुह से तेरी जुड़ जाऊं
    बस दूजा कोई और नहीं

    कैप्शन में मन के भाव-------
    ©anusugandh

  • loveneetm 7w

    मन मयूर

    मन मयूर बन नाच रहा,
    सुन हरि नाम की गुंज,
    एक ही इच्छा अंत तक,
    की भक्ति सुख लूँ लूट।

    नित श्रृंगार गोविंद कँरू,
    सेवा कँरू प्रदान,
    मुझ अधम के भाग्य हरि,
    यह सुख दे दो वरदान।

    राधा भगवती स्वामिनी,
    सबकी रखती लाज,
    उनका चाकर बन फिरू,
    छोड़ जगत के काज।

    अंतर्मन की मनःस्थिति,
    और अंतर्मन का भाव,
    एक ही बाते रोज कहे,
    कि गोविंद ही सुख छाँव।

    और कहो अब तुम सभी,
    क्या माँगू मैं आज,
    माया ठगनी ठग रही,
    और गोविंद करते काज।
    @लवनीत

  • goldenwrites_jakir 7w

    मन की बात

    देखा ज़ब भी आईना बस ज़िस्म ही दिखा
    रूह क़ैद हो जैसे क़ैद खाने में अक्सर ख़ुदसे मैं तन्हा ही मिला
    ढूंढ़ती हर इक और नज़र तुम्हे मेरी ख़ामोश आँखों में दर्द ही मिला
    मन में लिए हजारों सवाल - जवाबो की किताब पर अक्सर कोरा कागज़ ही मिला ,,,,,
    देखता ज़ब ज़ब आसमाँ चाँद के पास तारों का गुलशन ही मिला
    छुपाकर रखता चाँद को कुछ पल बादल अपनी आग़ोश में फिर खुले आसमाँ में रौशन चाँद ही मिला ,,,
    कमी महसूस टूटे तारों की फलक को होती देखकर चाँद भी उदास ही मिला
    दर्द मिलने बिछड़ने का हर इक को होता
    धूप मैं छाँव की तलाश - सर्द मैं गर्मी का एहसास
    सुखी जमीं पर सावन बरसने का इंतज़ार
    रात को सुबह का और ज़िन्दगी को मौत का ड़र
    ये सब हर रोज इक कविता बनकर हमारी ज़िन्दगी में ही मिला
    मिलते कभी किसी के अल्फाज़ हमारे अल्फाज़ से
    तो कभी किसी की ज़िन्दगी का पन्ना कोरा किसी का अधूरा दिखा
    मुकम्मल इश्क़ नही फिर मुकम्मल ज़िन्दगी ये राज़ ए दिल पहेलियों में इतिहास बनकर ही मिला ,,,
    शायद भटक गया मैं राह से - जाना कहीं था और मैं आ गया कहीं
    ज़िन्दगी है मुस्कुराने के लिए - और मैं गम के साय मैं कलम की उंगली पकड़ कर चलता ही मिला ,,,,
    मानकर कागज़ को आईना - अपनी ही परछाई में रंग शब्दो से भरता ही रहा ,,,
    मंजिल बस इक ख़्वाब ही रही - और ज़िन्दगी जुगनू की बनकर इधर उधर ही सिमटती रही ये अफसाना मेरी ज़िन्दगी का मुझे ही मिला
    ... !¡!
    ©goldenwrites_jakir

  • anandbarun 7w

    वाह्याडंबर

    निश्छल शिशु है कहाँ
    सोया अंतर सपनों का
    कैसे जागूँ रूप नन्हा
    तोड़ बंधन सारे जो खुद बुना
    कैसे पनप गई इतनी व्यथा
    सिसकियों में सुबक रहा
    हर अनसुलझा लम्हा
    क्यूँ बुनता रहा इतनी बेड़ियाँ
    शिराऐं तनती और जन्म लेता
    फन्दों का अकड़ता पंजा
    बढ़ता अहं स्थूलाकार महा
    भरती गई है कितनी रिक्तता
    चलना दूभर हो रहा
    और सामने है पर्वत श्रृंखला
    मेरी प्रियतमा
    मूक प्रणय होता गया
    कैसे करूँ तुम्हारा सामना
    अभ्यर्थना का सजल सोता
    वाष्प बन घन घोर घिरा
    वितृष्णा का सूना
    शोक यह कैसा छाया
    सोच के भँवर में धँसा
    कैसे उबारूँ वो सिरा
    जिससे हूँ कहीं अब भी जुड़ा
    आओ मिटा दें जो है सीखा
    उलीच दें वो हलाहल सारा
    ढ़ोकर इसे सब खो रहा
    जागृति का पल है सिहरा
    उतार आएँ वो नश्वर जो पहना
    उजागर करें जो है शाश्वत सच्चा
    ©anandbarun

  • greenpeace767 7w

    लगता है ...

    सोच रही हूं कहां से ,
    प्यार की इकरार शुरू करूं ?
    मैं तो चाहती हूं ,
    बस आपको ही प्यार करु ।

    आपके बातों से मेरी मोहब्बत को ,
    नया होते हुए देख रही हूं ।
    हां , एहीं से मैं शुरुआत करूं ।

    आपकी नजरों से ऐसे हमें देखें की,
    __ मानव सूरज की पहली किरण ,
    पहली बार मुझ पर गिरी ।
    क्यों ना मैं इस बात को ,
    आपके सामने इजहार करू ?

    प्यार के रंगों में आप मुझ में ,
    __रंग चुके हैं ।
    लगता है जैसे ,
    प्यार के रंग से मेरी मांग सजाए हैं ।
    और खुद में मुझे रंग लिए हैं ।
    क्यों ना मैं इस बात से खुश होकर ,
    ख्वाबों ख्यालों में डूबी रहूं ?

    प्यार के बंधन में कैद हो गई हूं मैं ।
    लगता है जैसे ,
    आपका सातों जन्म का सजनी हूं मैं ।
    क्यों ना इस बातों पर ,
    __ प्यार का दासता लिखूं मैं ??
    ©greenpeace767

  • abr_e_shayari 7w

    यूं लह लह बहते कुंतल मेरे,
    प्रियस तुम्हारे स्कंध पे जैसे,
    सलिला कल कल बहती देखो
    महीधर तेरे स्कंध पे जैसे!

    मेहंदी मेरे हाथ की पीली
    हंसता दलहन आषाढ़ का जैसे,
    ऐसा टेसू लगता मुझको,
    माथे सजा सुहाग हो जैसे!

    ये हंसता रितेश, ये गाती पुर्वा
    ये सब तुम बिन शेष हो जैसे,
    तुम संग देखूं तो लगता है,
    शून्य भी अति विनेश हो जैसे!
    -श्रुति
    #rachanaprati97 @mamtapoet

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    प्रियस

    ममता दी ज्यादा कुछ अच्छा नहीं लिख पाई माफ करीएगा , अगली बार पूरा प्रयास करूंगी

  • psprem 7w

    नदियां

    नदियां बीमार हैं।
    लाचार हैं।
    कुछ मर चुकी हैं,
    कुछ मरने को तैयार हैं।
    देख नदी की हालत,,,,
    रोते खेत,बावड़ी,पोखर।
    जिनसे कभी मिलता था जल।
    लहलहाते खेत थे,बगीचे थे।
    भरे हुए पोखर थे।
    ढोते ढोते,कचरा और मल।
    रो रहा नदियों का जल।
    यमुना,हिंडन,सरस्वती,काली।
    जो कभी बहती थी मतवाली।
    अब नष्ट हो गई आभा,,,,,
    बदल गया सब रूप।
    अब जल नहीं रेत की ,,,,,
    हो गई नदियां।
    योजनाएं बनती रही,,,
    साफ और सफाई की।
    केवल कागजों पर,,,,,
    अमल कुछ न हुआ।
    भेंट चढ़ गई ।
    भ्रष्टाचार की,,,
    करोड़ों रुपए खर्च किए।
    पर आज बह रही हैं।
    कागजों पर।
    केवल कागजों पर।
    ©psprem

  • anusugandh 7w

    #rachanaprati97
    @mamtapoet

    मन की उड़ान का
    कोई ओर ना छोर,,
    माने ना बात किसी की
    भागे चारों ओर ,,,,
    काश ऐसा कुछ हो जाए
    नभ की नभचर हो जाऊं,
    बादलों पर हो घर मेरा,
    खुले वातावरण में खो जाऊं
    बन पक्षी फिर उड़ान भरूं
    पूरे नभ मे पंख फैलाकर
    घने बादलों के बीच
    सारे नभ में घूम आऊँ
    फिर बारिश बनकर
    नन्ही नन्ही बूंदे बरसाऊँ��️
    प्यासी धरती पर बरस कर
    सब की प्यास बुझा आऊं
    कभी जी चाहे मेरा ,,,,
    सूरज बन करूं उजाला ��
    धरा पर किरणों का
    उजाला फैलाऊँ ----
    फिर निशा में चंद्र बनकर ��
    शीतल किरणें बिखराऊं
    कभी दादी मां की छवि
    कभी चरखे की छवि दिखलाऊं
    किसी जन्म राधा बनकर
    श्याम प्यारी हो जाऊं
    कभी चाहूं मीरा बनकर
    श्याम में सदैव बस जाऊं!!��

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    मन

    मन की उड़ान को पंख मिले तो,
    श्याम की राधा बन जाऊं ,
    जीवन संगिनी चाहे ना बनूँ,
    पर सदा ही उसकी कहलाऊँ!

    कैप्शन में देखें------
    ©anusugandh

  • suresh_28 7w

    सब तुमसे है

    वो आये, कि जमाना आ गया है,
    हँस दे अगर, कि ये जहाँ मुस्कुरा रहा है।
    ©suresh_28

  • anandbarun 7w

    @mamtapoet #rachanaprati97

    अब झेलो,..…. कल्पना की उड़ान!

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    आह्नान

    परे है इक जहाँ..
    धरातल पर जिसके
    उगने कि कश्मकश मे
    आतुर है कितनी मोतियाँ।
    अंतर है पंकिल, चिपचिपा
    उबती-डूबती,
    उतराती-तैरती, तुम।
    आलिंगन है तेरी
    असंख्य कसती बाहुओं का
    रोकने को हरपल
    भावनाओं की
    ये मायावी दुनियाँ।
    आ जाओ, तुम, अब
    तोड़कर वो हर
    हद की दीवार
    हर ताने-बाने सी बुनी
    उलझी, उलझनों के
    जालों का अंबार।
    कबसे खड़ा हूँ
    अंजुरी मे धरे
    तुम्हारा अमल सत
    जिसका तुम हो
    बस,बिंब मात्र,
    वो सच्चा मासूम
    निर्लिप्त, अजस्र पारावार।
    ©anandbarun

  • mamtapoet 7w

    #rachanaprati97
    @alkatripathi79, @anusugandh,@jigna_a @anandbarun, @loveneetam,

    सर्वप्रथम @alkatripathi79जी का हार्दिक आभार उन्होंने मंच संचालन की जिम्मेदारी पुन: एक बार मुझे प्रदान की। मेरा विषय है वो मानव मन की सुप्त इच्छाएं जो उन्हें कभी प्रकृति को देख कर आती हैं तो कभी किसी तितली को देखकर, अपनी कल्पना के पंख फैलाये और अधिक से अधिक रचनाएँ प्रस्तुत करे, जिन्हें tag नहीं किया हो उनका भी अभिनंदन है। ��������

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    उदासियों का वजन जरा ज्यादा होने लगा है
    सोचते हैं ख्वाहिशों को थोड़ा सा हवा में
    बिखेर दे।

    दिल के तहखाने में बिछी थी जो मखमली चादर,
    फटी भी नहीं पर कमजोर हो गई
    सोचते हैं, विचारों के धागे से पैबंद लगा दे।

    खर पतवार से भर गई बंजर जमीं यादों की,
    सोचते हैं, एक एक कर नया हसरतों का गुलिस्ता उगा दे।

    बरस बरस के सब बह गया खारा पानी, खाली हो गई है पलकें,
    सोचते हैं,खुशियों की चमक से आँखों में नये बादल बना दे।

    फूल फूल पर लहराके थक गई तितली
    , सोचते हैं
    पूरी धरती पर रंग बिरंगे कुसुम सजा दे।

    काली रातों में न कोई तारों को निहारे,
    सोचते हैं छोटे छोटे आशियाँ जादू से सब के बना दे।
    ©mamtapoet