#rachanaprati124

14 posts
  • anandbarun 7w

    लिबाज़

    वक्त की कैसी है
    ये अजब रिवायत
    ज़ख्म देकर कहे
    न हो कोई बगावत
    लिबाज़ उनकी करे
    जो बरबस शिकायत
    इल्जाम लगाते हैं
    बड़ी ही निहायत
    आह भरती है सांसे
    लिए कोई तरावट
    अंदाज है कि है
    ये करम की इनायत
    बस देख जिसे
    मिट जाए हर हरारत
    सितम ढाए है
    उफ्फ ये नज़ाकत
    शोख़ हँसी की है
    जो हसीन बनावट
    पलट जाए पल में
    न आए क़यामत
    जो आए ना समझ में
    तो कर तु अदावत
    पल भर न गुजरे
    जब हो ना अराधन
    क्या खूब मदमाते
    माँ मेदिनी की सजावट
    ©anandbarun

  • _do_lafj_ 7w

    ��Aap sabne bhi bahut acchaa likha hai...

    @alkatripathi79 dii
    @goldenwrites_jakir sir
    @gannudairy_
    @psprem
    @jigna_a dii
    Pihu_writes dii
    Kashatrani_words
    Anandbarun sir

    Thank you so much for giving me this chace������....
    If i did any mistake please forgive me��...

    #rachanaprati124 #rachanaprati125

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    @anusugandh dii Apka bahut bahut shukriya mujhe ye mauka dene k liye...
    #rachanaprati124 ke liye mai @mamtapoet di aur @loveneetm ko vijeta batati hu...
    Aur #rachanaprati125 ki jimmedari @mamtapoet di ko deti hu❣️....


    ©_do_lafj_

  • kshatrani_words 7w

    21:40
    08 Dec. 2021
    #rachanaprati124

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    वो लिबास

    वो लिबास जो मैंने अरसे पहले
    बन्द अलमारी में धूल जमने छोड़ दी थी,
    आज नए के लिये जगह बनाने को
    उसे कूड़ा-करकट समझ बाहर निकाल
    मैंने उसे दे दिए ।

    ठंडी में , गर्मी के कपड़े देख,
    उसकी आँखें मानों उस बात का प्रतिबिंब दिखा रही थी, कि
    मानो उसे अलाव मिल गयी थी,
    और चेहरे की मुस्कान ये दर्शा रही थी, कि
    मानो वो झूम सी उठी थी,
    मुझे एक पल के लिए ऐसा महसूस हुआ, कि
    मानो उसे मनवता या ऊपरवाले पर फिर से विश्वास हो गया था ।

    और इधर मैं जो सुकूं, खुशी की तलाश में,
    उन पर ख़ुद को फ़ना करती जा रही थी
    जिन्हें मेरे रहने न रहने से कोई फ़र्क़ न था,
    मैंने असल मतलब में आज जाना, कि
    सुकूं और खुशी की परिभाषा ये होती है ।
    उसकी मुस्कान, उसकी ख़ुशी
    मानो जन्मों का मेरा खोया चैन मुझे वापस दे गयी ।

    लिहाज़ा खुद पर गर्व महसूस हुआ
    लेकिन काली छाप के साथ और
    न खत्म होते सवालों के जवाब की तलाश में कि
    आज तो कूड़ा अपना उसे दे दिया
    लेकिन कल को कौन देने आएगा ?
    ऐसे ही दूसरों पर आश्रित रहकर
    सारा जीवन उसका क्या गुज़र जाएगा?

    उसका औऱ उसके जैसों का भविष्य सवार सकूँ,
    किसी के सामने हाथ न फैला सके ऐसा 'लिबास' दूँ,
    हर बला से लड़ने की ताक़त दे सकूँ,
    हे प्रभु ! इतना लायक बना दो मुझे कि इस दुनियां को स्वर्ग बना दूँ,
    बस इन्हीं से आजकल दुआओं का अंत करती हूँ ।


    - अनुश्रुति /

  • gannudairy_ 7w

    लिबास

    ऐ मौत तू आना जरूर...
    बशर्ते..
    लिबास-ए-कफन तिरंगा हो..!!
    ©gannudairy_

  • mamtapoet 7w

    लिबास

    मन के भावों को जब
    शब्द रूपी लिबास मिल जाता हैं,
    खिल उठता है हर वो शब्द,
    खुशी के अहसास जिन शब्दों में समा जाते हैं
    झूमने लगती है वो पूरी ही पंक्ति,
    और सारी की सारी पंक्तियाँ रंगीन लिबास धारण कर लेती हैं,
    तो सतरंगी, झिलमिल लिबास
    अलग ही पहचान देते हैं उस कविता को,
    श्रोता, पाठक सब उन रंगबिरंगे वस्त्रों से सजे शब्दों में, आह्लादित हो जाते हैं।
    जिन शब्दों को गहरे स्याह रंग का लिबास
    अपने तन को ढकने को मिलता है,
    वो अपने आस पास भी काजल ही फैलाते हैं
    कभी कभी मन कुंठित हो उठता है
    कभी पाठक भी लेखक के दुःख के अंधेरे को
    महसूस कर, गहरे रंग के लिबास को
    ओढ़ लेता है।
    ये शब्दों का लिबास ही तो है
    जो आमंत्रित करता है पाठक को,
    और उन लिबास में अलग ही शक्ति होती हैं
    आकृष्ट करने की और ठुकराए जाने की।

    और मन के जिन कोमल भाव या अहसास को
    कोई लिबास नहीं मिलता है,
    वो सबसे निश्छल और पावन होते हैं,
    क्योंकि वो मन के कोने में ठहर जाते हैं
    ताकि दूसरों को पीड़ा न हो,
    ये भाव बिल्कुल नवजात शिशु के समान होते हैं,
    जिन पर खुशी गम का कोई रंगीन या श्वेत श्याम लिबास नहीं होता।
    वो होते हैं निश्छल और पावन भाव भरी आत्मा का लिबास जिसका कोई कृत्रिम
    लिबास नहीं होता।

    ©mamtapoet

  • loveneetm 7w

    पीत

    पीत वस्त्र मोहन मन भाए,
    अद्भुत लगें स्वरूप,
    क्यूँ ना देखें जगत उन्हे,
    ऐसा मोहक रूप।

    लाल वस्त्र धर लगें कन्हैया,
    प्रथम प्रहर की भोर,
    बंसी की धुन सुनकर नाचे,
    धेनु संग शुक मोर।

    नील पीत पहन मुरारी,
    लगे गगन विशाल,
    सुंदर कोमल नयना उनके,
    सुंदर अधर कपाल।

    हरा रंग राधा मन भाए,
    इस कारण श्रृंगार,
    पहन कन्हैया रंग यह,
    लूटे जग संसार।

    श्वेत वर्ण तन पीत धर,
    कृष्ण लगे सुकुमार,
    नंदराय के लाल को,
    जगत करें दुलार।
    ©loveneetm

  • psprem 7w

    लिबाज़

    किस पर करें यकीन,ना यकीं किसी के लिबाज़ का।
    कितना भरा है छल, ना यकीं किसी के मिजाज का।

    बदल बदल कर लिबाज़,रोज ठग रहे हैं लोग।
    अब कोई भी यकीं ना रह गया,किसी के लिहाज का।
    कौन है दोस्त कौन है दुश्मन ,बिन जाने पता नहीं चलता।

    अजमाने से पहले नहीं ,पता चलता किसी दगाबाज का।
    नए नए लिबाज़ ओढ़कर,बहरूपिए घूम रहे हैं,
    जब तक पर्दाफाश ना हो,ना पता चले किसी के राज का।

    कौन है भूखा कौन है प्यासा,कपड़ो से नहीं पता चलता।
    किसके अंदर दर्द भरा है,ना पता चले किसी मोहताज का।

    क्या एहसास किसी के दिल में, कोई नहीं जानता है।
    बस "प्रेम"से ही लगा सकते हो,पता किसी के मिजाज़ का।
    ©psprem

  • jigna_a 7w

    लिबास

    कहाँ है?,अभी तो यहीं थी!
    शोर, बेचैनी, खुसुरफुसुर
    माँ की आँखें राह पे जड़ी
    बाट निहारे टुकुर टुकुर।

    यहीं तो थी आँगन में
    सातवें साल के बचपन में,
    खेल रही थी मिट्टी में सनी
    जैसे मोम की पुतली कोई।

    कोई तो आया! माँ चिल्लाई
    मुनिया नहीं! ज़रा सकपकाई,
    बाप के रुआँसे दिल दहला रहे थे
    अनहोनी हुई कुछ बतला रहे थे।

    चोकलेट की लालच दी थी उसने,
    अपनी मुनिया को नोंच डाला,
    थोड़ी सी चीख क्या निकली,
    गला दबाकर दबोच डाला।

    गुलाबी घाघरा, पीली थी चुनरी
    छोटी सी मुनिया, क्या थी छिछोरी?,
    कहते औरतें लिबास से उकसाती है,
    फिर मुनिया क्यों मारी जाती है?

    ©jigna_a

  • piu_writes 7w

    हो ना जाए इज़हार मुहब्बत का हमारे दुनियां के सामने कुछ तो लिहाज रखना जब आओ मेरी मैयत पे कुछ यूं मुझ पर तुम कफन का लिबास रखना
    ©piu_writes

  • alkatripathi79 7w

    चिथड़े में जो लिपटी थी,, वो भी थी एक ज़िन्दगी
    दौलत का था जिसका लिबास वो भी थी एक ज़िंदगी

    ©alkatripathi79

  • goldenwrites_jakir 7w

    #लिबाज़ ✍️✍️

    मुफलिसी की चादर ज़िन्दगी पर गरीबी का लिबाज़ उड़ाए हुए है
    कहीं पर लगे पेमन - कहीं पर दिखते निशां पुराने हैं ,,
    मिलजाती कभी इक वक्त की रोटी तो कभी सूनी चूल्हे पर कड़ाई है
    बदल रहा जमाना फैशन का - नए कपड़ो में फटे हुए धागे हैं
    लिबाज़ अब लिबाज़ नही मर्यादा भुल बैठे हम मुसाफिर हैं
    कहने को बहुत कुछ पर समझता यहाँ कोई नही
    इसी लिए बिराम कलम की धारा है .... |
    ©goldenwrites_jakir

  • goldenwrites_jakir 7w

    #लिबाज़ ✍️

    पहन कर फूलों की चादर रूह में उतरने लगी
    बनकर ख़ुसबू साँसो में बसने लगी
    लिबाज़ कितना खूबसूरत - सिरत पर
    उसका एहसास मन मंदिर सा
    लगता दिल को इबादत सा ..... |
    ©goldenwrites_jakir

  • _do_lafj_ 7w

    विषय - लिबाज़, वस्त्र, कपड़ा।।
    वक़्त- कल रात 10 बजे।।


    कहते है रोटी , कपड़ा और मकान सबसे जरूरी होते है एक इंसान के लिए।।
    तो मेरा विषय यही है -कपड़ा।।
    (Second most important thing for human being)

    @anusugandh Thank you so much dii����❤️❣️
    @alkatripathi79 @mamtapoet @goldenwrites_jakir @gannudairy_

    #rachanaprati123 #rachanaprati124

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    ❣️

    धड़कने बढ़ने लगी है,
    पलकें तेरे आगे झुकने लगी है।।
    दिल की सारी कोशिशें,
    नाकाम होने लगी है।।
    कुछ इस तरह तुम,
    मेरी रूह का लिबाज़ बन।।
    मेरी हर साँस में,
    घुलने लगे हो।।


    ©_do_lafj_

  • anusugandh 7w

    #rachanaprati123
    #rachanaprati124

    आप सभी कलम कारों का बहुत-बहुत धन्यवाद जो आपने इंतजार के अलग-अलग रूप दर्शाए। सभी कलमकारों ने एक से एक बढ़कर रचनाएं लिखी।
    ममता जी
    जाकिर भाई
    दो लफ़्ज़
    अबरे शायरी
    गौरव जी
    पीयू जी
    आनंद भाई ने दो रचनाएं लिखी
    आर्यन वर्मा जी
    बलराम पांडे जी
    जिगना जी
    सभी की रचनाएं काबिले तारीफ थी ।निर्णय बहुत कठिन हो जाता है, जब इतनी सुंदर रचनाएं सामने आती हैं ।
    जाकिर भाई ने तो सबसे ज्यादा सात रचनाएं भेजी। मेरे लिए तो सभी विजेता है लेकिन निर्णय तो देना है।������������������������������

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    मैं एक बार फिर गौरव जी@gannudairy_ का धन्यवाद करना चाहती हूं जिन्होंने मुझे रचना प्रति के संचालन का अवसर दिया ।
    #rachanaprati124 के संचालन के लिए मैं@_do_lafj_ को विजेता घोषित करती हूं, उन्होंने कहानी के रूप में इंतजार दर्शाया जो बहुत सुंदर तरीके से दर्शाया गया था ,आपको बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं
    कोई त्रुटि रह गई हो तो क्षमा प्रार्थी हूं

    ©anusugandh