#loveandlust

74 posts
  • sanjana_bajwa_ 27w

    Nowadays...
    Love is rare,
    And,
    Lust is common..

    ©sanjana_bajwa_

  • yashashwani 28w

    श्री राम चंद्र कृपालु भजमन

  • yashashwani 29w

    उसने मुझे मारा,उसने मुझे हराया, उसने मुझे गाली दी,उसने मुझे लूट लिया । जो कोई व्यक्ति इस प्रकार से हमेशा सोचते हुए क्रोध करता है, तो उसके जीवन में कभी भी वैर का अंत नहीं होता है ।

    (बुद्ध वचन -धम्मपद 1.3)

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    बुद्ध वचन

  • yashashwani 29w

    वसुधैव कुटुम्बकम् सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है[1] जो महा उपनिषद सहित कई ग्रन्थों में लिपिबद्ध है। इसका अर्थ है- धरती ही परिवार है (वसुधा एव कुटुम्बकम्)। यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है।

    अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
    उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ (महोपनिषद्, अध्याय ४, श्‍लोक ७१)
    अर्थ - यह अपना बन्धु है और यह अपना बन्धु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।

    Source of matter - wikipedia
    Picture credit- Pinterest

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    वसुधैव कुटुंबकम ।

  • yashashwani 29w

    इसलिए ये सवाल नहीं है कि कौन देश श्रेष्ठ है,कौन देश अश्रेष्ठ है।सवाल ये है के किस देश में अधिकतम श्रेष्ठ लोगों का निवास है और किस देश में अधिकतम निकृष्ट लोगों का निवास है.............. मैं सारी दुनिया में चक्कर लगा आया हूँ सभी जगह अच्छे लोग हैं और सभी जगह बुरे लोग हैं, लेकिन
    बुरे लोग ताकत में हैं हर जगह और अच्छे लोग शक्तिहीन हैं हर जगह । अच्छाई कि एक मजबूरी है,अच्छाई आक्रामक नहीं होती है, हिसात्मक नहीं होती है । बुराई आक्रामक होती है, हिंसात्मक होती है ।........... अच्छाई को कोई मौका भी नहीं मिलता, दूसरी खूबी अच्छाई को कोई आकांक्षा भी नहीं होती, कि उसे स्वीकार मिले, अच्छाई अपने आप में ऐसा सुखद अनुभव है, कि अब और कुछ और नहीं चाहिए।...... बुरे लोग छाती पे सवार हैं और अच्छे लोग इतने अच्छे हैं कि उनसे ये भी नहीं कहते कि अब उतरो भी ।

    -©osho


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    वसुधैव कुटुंबकम ।

  • yashashwani 29w

    गतसङ्‍गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
    यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ (२३)

    भावार्थ : प्रकृति के गुणों से मुक्त हुआ तथा ब्रह्म-ज्ञान में पूर्ण रूप से स्थित और अच्छी प्रकार से कर्म का आचरण करने वाले मनुष्य के सभी कर्म ज्ञान रूप ब्रह्म में पूर्ण रूप से विलीन हो जाते हैं। (२३)

    दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
    ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ (२५)

    भावार्थ : कुछ मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञों द्वारा देवताओं की भली-भाँति पूजा करते हैं और इस प्रकार कुछ मनुष्य परमात्मा रूपी अग्नि में ध्यान-रूपी यज्ञ द्वारा यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं। (२५)

    श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
    शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ (२६)

    भावार्थ : कुछ मनुष्य सभी ज्ञान-इन्द्रियों के विषयों को संयम-रूपी अग्नि में हवन करते हैं और कुछ मनुष्य इन्द्रियों के विषयों को इन्द्रिय-रूपी अग्नि में हवन करते हैं। (२६)



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    Krishna

  • yashashwani 29w

    त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
    कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥ (२०)

    भावार्थ : जो मनुष्य अपने सभी कर्म-फलों की आसक्ति का त्याग करके सदैव सन्तुष्ट तथा स्वतन्त्र रहकर कार्यों में पूर्ण व्यस्त होते हुए भी वह मनुष्य निश्चित रूप से कुछ भी नहीं करता है। (२०)

    निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
    शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌ ॥ (२१)

    भावार्थ : जिस मनुष्य ने सभी प्रकार के कर्म-फ़लों की आसक्ति और सभी प्रकार की सम्पत्ति के स्वामित्व का त्याग कर दिया है, ऎसा शुद्ध मन तथा स्थिर बुद्धि वाला, केवल शरीर-निर्वाह के लिए कर्म करता हुआ कभी पाप-रूपी फ़लों को प्राप्त नही होता है। (२१)

    यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः ।
    समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ (२२)

    भावार्थ : जो मनुष्य स्वत: प्राप्त होने वाले लाभ से संतुष्ट रहता है, जो सभी द्वन्द्वो से मुक्त और किसी से ईर्ष्या नही करता है, जो सफ़लता और असफ़लता में स्थिर रहता है यधपि सभी प्रकार के कर्म करता हुआ कभी बँधता नही है। (२२)

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    Krishna

  • yashashwani 29w

    कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
    अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ (१७)

    भावार्थ : कर्म को भी समझना चाहिए तथा अकर्म को भी समझना चाहिए और विकर्म को भी समझना चाहिए क्योंकि कर्म की सूक्ष्मता को समझना अत्यन्त कठिन है। (१७)

    कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
    स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌ ॥ (१८)

    भावार्थ : जो मनुष्य कर्म में अकर्म (शरीर को कर्ता न समझकर आत्मा को कर्ता) देखता है और जो मनुष्य अकर्म में कर्म (आत्मा को कर्ता न समझकर प्रकृति को कर्ता) देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह मनुष्य समस्त कर्मों को करते हुये भी सांसारिक कर्मफ़लों से मुक्त रहता है। (१८)

    यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
    ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ॥ (१९)

    भावार्थ : जिस मनुष्य के निश्चय किये हुए सभी कार्य बिना फ़ल की इच्छा के पूरी लगन से सम्पन्न होते हैं तथा जिसके सभी कर्म ज्ञान-रूपी अग्नि में भस्म हो गए हैं, बुद्धिमान लोग उस महापुरुष को पूर्ण-ज्ञानी कहते हैं। (१९)


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    Krishna

  • yashashwani 29w

    एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
    कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌ ॥ (१५)

    भावार्थ : पूर्व समय में भी सभी प्रकार के कर्म-बन्धन से मुक्त होने की इच्छा वाले मनुष्यों ने मेरी इस दिव्य प्रकृति को समझकर कर्तव्य-कर्म करके मोक्ष की प्राप्ति की, इसलिए तू भी उन्ही का अनुसरण करके अपने कर्तव्य का पालन कर। (१५)


    किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
    तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥ (१६)

    भावार्थ : कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में बडे से बडे बुद्धिमान मनुष्य भी मोहग्रस्त रहते हैं, इसलिए उन कर्म को मैं तुझे भली-भाँति समझा कर कहूँगा, जिसे जानकर तू संसार के कर्म-बंधन से मुक्त हो सकेगा। (१६)


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    Krishna

  • yashashwani 29w

    चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
    तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌ ॥ (१३)

    भावार्थ : प्रकृति के तीन गुणों (सत, रज, तम) के आधार पर कर्म को चार विभागों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) में मेरे द्वारा रचा गया, इस प्रकार मानव समाज की कभी न बदलने वाली व्यवस्था का कर्ता होने पर भी तू मुझे अकर्ता ही समझ। (१३)

    न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
    इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ (१४)

    भावार्थ : कर्म के फल में मेरी आसक्ति न होने के कारण कर्म मेरे लिये बन्धन उत्पन्न नहीं कर पाते हैं, इस प्रकार से जो मुझे जान लेता है, उस मनुष्य के कर्म भी उसके लिये कभी बन्धन उत्पन्न नही करते हैं। (१४)


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    Krishna

  • yashashwani 29w

    जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
    त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ (९)

    भावार्थ : हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) हैं, इस प्रकार जो कोई वास्तविक स्वरूप से मुझे जानता है, वह शरीर को त्याग कर इस संसार मे फ़िर से जन्म को प्राप्त नही होता है, बल्कि मुझे अर्थात मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है। (९)

    वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
    बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ (१०)

    भावार्थ : आसक्ति, भय तथा क्रोध से सर्वथा मुक्त होकर, अनन्य-भाव (शुद्द भक्ति-भाव) से मेरी शरणागत होकर बहुत से मनुष्य मेरे इस ज्ञान से पवित्र होकर तप द्वारा मुझे अपने-भाव से मेरे-भाव को प्राप्त कर चुके हैं। (१०)

    ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌ ।
    मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ (११)

    भावार्थ : हे पृथापुत्र! जो मनुष्य जिस भाव से मेरी शरण ग्रहण करता हैं, मैं भी उसी भाव के अनुरुप उनको फ़ल देता हूँ, प्रत्येक मनुष्य सभी प्रकार से मेरे ही पथ का अनुगमन करते हैं। (११)

    काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
    क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ (१२)

    भावार्थ : इस संसार में मनुष्य फल की इच्छा से (सकाम-कर्म) यज्ञ करते है और फ़ल की प्राप्ति के लिये वह देवताओं की पूजा करते हैं, उन मनुष्यों को उन कर्मों का फ़ल इसी संसार में निश्चित रूप से शीघ्र प्राप्त हो जाता है। (१२)




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    Krishna

  • yashashwani 29w

    अर्जुन उवाच
    अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
    कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ (४)

    भावार्थ : अर्जुन ने कहा - सूर्य देव का जन्म तो सृष्टि के प्रारम्भ हुआ है और आपका जन्म तो अब हुआ है, तो फ़िर मैं कैसे समूझँ कि सृष्टि के आरम्भ में आपने ही इस योग का उपदेश दिया था? (४)

    श्रीभगवानुवाच
    बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
    तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ (५)

    भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं, मुझे तो वह सभी जन्म याद है लेकिन तुझे कुछ भी याद नही है। (५)

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    Krishna

    Krishna

  • lovelyrics 54w

    Falling For Him Was Like Falling From Grace!!

  • the_messy_heart 65w

    He beguiled her with love and dumped her after his lust was fulfilled.
    ©the_messy_heart

  • prishiv 74w

    Love always demands attention and affection...
    Wherever lust ask for attraction....
    There's no connection with your soul....
    Lustful eyes always make you fall...
    Love seeks for truth and your supports in every
    situation...
    Always leads you to new beautiful creations....

  • rantings_of_a_distressed_soul 80w

    I bare myself to you
    In the hope
    That apart from my breasts
    Someday, you'll hear the voice of my heart
    Lying beneath it too

    When you carve the marks of your passion
    On my body
    I hope someday,
    Instead of just your fingerprints and the marks of your perfectly aligned teeth,
    You will touch me with your love too

    I bare myself to you
    In the hope
    That someday, instead of your tongue,
    Your words will keep me awake too
    And instead of the sound of
    The clinking of our bottles of beer
    We will squeal together in laughter,
    As we high five each other too.

    I bare myself to you
    In the hope
    That someday, when we make love,
    Instead of crying over the persons we lost,
    We will moan each other's names too.




    #somedaywewillfallinlovetoo
    #loveandlust

    @writersnetwork @readwriteunite @mirakeeworld @mirakee @mirakee_assistant

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    BARE

    When you carve the marks of your passion
    On my body
    I hope someday,
    Instead of just your fingerprints and the marks of your perfectly aligned teeth,
    You will touch me with your love too

    ©rantings_of_a_distressed_soul

  • arabindapalai 87w

    Sensual

    ©arabindapalai

  • _syaah 94w

    A week long love had passed away
    The love flourished is now dead
    The roses are bruised
    And thorns are dissipate.
    The hands are down my esteem
    To my bottoms under the gown
    Teeths were biting the nipples
    I was sobbing and the love was dying
    Lusts awaken and beasts are growing.
    Chocolate which makes me feel overwhelmed
    Are now forcefully penetrated in me
    In the sake of love he was tearing to bits
    The Valentine's was dead
    And beasts are awake.

    ©_syaah

  • myspilledink 95w

    The bodies are exchanging the fragrance of sweat
    Let's not sleep tonight for our souls crave
    To be lost in each other, I crave for your touch
    Don't leave me wanting more
    It's winter night and I wish to wrap you
    Like the cold bodies wrap the warm blanket
    Heat you with my desires, burn you in lusty fire
    Let's not waste this night talking
    And get drenched together in the nocturnal fantasies.

    ©soni_ss

  • michaelnene7 97w

    RENDEZVOUS

    In this  very arms I dined, 
    Where my desires became my nightmare. 
    In open air we lay basking in the sunset, 
    As I stare irresistibly to his good looking body. 
    Wishing to have a feel of him in me. 

    For a young virgin,
    I was seeking for too much.
    Judging from what books and
     the clichés of first time experiences. 
    I still wanted to rip his shorts off. 

    He seemed lost to other thoughts, 
    I could tell his mind wasn't as dirty as mine. 
    All he wanted was to share good times, 
    But my mind wanted more, 
    I wanted a ride on his Pinnacle. 

    I succeeded in veering his wandering mind to me,
    Without hesitation, I pounced on him like 
     a soldier drilling a cadet in the barrack. 
    Putting to practice what movies, books 
    and endless nights of net-surfing has taught me. 

    When I finally had my way, he drove into me. 
    With all gentility,care and passion he made 
    Love to this new road. 
    I was Lost in this ride I didn't notice the 
    Sunset turn to moon. 
    Now my insatiable fire has been put off,
    What is next? 
     I wouldn't mind risking my sanity for another cum ride. 

    MICHAEL NENE
    @michaelnene7 ©2020 ♥.