#kritikakiran

32 posts
  • kritikakiran 16w

    तुम,
    जो हाशिये पर खड़े हो,
    मेरी ओर देख रहे हो,
    बताओ, तुम्हें क्या दूँ मैं?

    मेरे पास ना कमाई हुई एक कौड़ी है
    ना ही तुम्हें देने के लिए कुछ और,
    क्या है?
    बस चंद शब्द ही तो हैं..

    हाँ, चंद शब्द हैं
    और वो इतने कर्मठ हैं
    कि वो रहेंगे तुम्हारे साथ
    तब भी जब कोई और ना हो..

    तुम्हारी साँसें
    साथ छोड़ देंगी तुम्हारे शरीर का
    पर ये शब्द, जो अब मेरे नहीं, तुम्हारे हैं,
    थामे रहेंगे तुम्हारा हौसला!

    बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 17w

    वो धर्मनिरपेक्ष है,
    समाजवादी है,
    समता - पसंद,
    और तर्कसंगत है।

    वो बिल्कुल वैसा ही है जैसा
    तुम्हें,
    मुझे,
    या उन्हें होना चाहिए।

    क्या अब भी तुम्हें इसमें कोई संदेह है कि,
    "भूख"
    भारत देश का
    "सर्व - सर्वोच्च" नागरिक है?!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 17w

    किसी संघर्ष के दौरान
    ताप का शिकार हुई ज़मीं पर
    जब ख़ून की छींटें पड़ती हैं
    तब छनछना कर उठता है अराजकता का धुआँ...

    पेड़ों पर गर्दन झुकाए आराम करते गिद्धों के
    सिर उठ जाते हैं;
    और इनका समूचा झुंड, पूरे पंख फैला कर
    आसमाँ में करता है तांडव...
    एकदम बेधड़क!
    वहीं दूसरी तरफ़ एक गौरैया,
    चोंच में धान का बीज दबाए
    भागती है घोंसले की ओर
    और किसी मासूम से बच्चे की तरह
    डर से पंखों में छुपा लेती है मुँह अपना...

    गिद्धों ने हमेशा चाहा है दुनिया को बनाना
    एक मरुस्थल...
    चाहे हैं सिर्फ़ शव ही शव...
    वहीं इन गौरैयों ने चाहा है
    ब्रह्माण्ड भर का प्रेम...
    अन्न से भरे..खिलखिलाते आँगन।

    सालों से मेरे घर की मुंडेर पर
    कोई गौरैया पानी पीने नहीं आई...
    हाँ! गाहे बगाहे, दुनिया भर के
    गिद्ध दिख जाया करते हैं, एक साथ...
    कभी संसद के गलियारों में
    तो कभी टीवी पर....समाचार पढ़ते!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 17w

    जब जब चाहा धरा ने
    प्रेम
    तब तब बरसायी अम्बर ने
    आग़
    और जब जब चाहा अम्बर ने
    सौहार्द
    तब तब भिजवाया धरा ने...
    ख़ाक

    यूँ जो
    हुआ विस्तार
    शून्यता का
    बीच धरा और अम्बर के..
    लगी अटकलें और प्रश्न उठे
    कि "क्या वजह है अलगाव की?"
    कि मुद्दा यहाँ दम्भ का है...
    या बात यहाँ है स्वाभिमान की?

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 31w

    नाम
    तुम्हारा

  • kritikakiran 33w

    मेरी या तुम्हारी दृष्टि से ये कहाँ सोच पाएँगे
    गिद्धों के गुरु हैं जो, हमें तो वो नोच खाएँगे

    क्या मतलब है इनको कि, जनता नाशाद है
    ये तो वो लोग हैं जो चुटकुलों से चोट खाएँगे

    जाओ और लिख दो दीवारों पर : "आज़ादी"
    फिर देखो कैसे कलेजों पर साँप लोट जाएँगे

    ग़लती से भी इनसे क्यों लगा लेते हो उम्मीद
    ज़मीर के सौदागर, मुँह पर चूना पोत जाएँगे

    खूब भौंकेंगे ये उनपर जो दुर्बल हैं, लाचार हैं
    सत्ता के आगे तो पाँव पकड़ कर लोट जाएँगे

    ये तो वो बहादुर हैं जो विपक्ष से माँगेंगे जवाब
    दबाने के लिए सच ये सरकारों से नोट खाएँगे

    क्या दोष देंगे उनको जब ख़ुद बेज़ुबाँ हैं आप
    शिकारी से ज़्यादा यहाँ शिकार में खोट पाएँगे

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 33w

    कुछेक राज़ पन्नों पर होते हैं
    और कुछ होते हैं कलम में..
    कुछ ऐसे भी होते हैं
    जो रहते हैं बीच में..
    कलम और काग़ज़ के
    जो ना ही ठहर पाते हैं, ना ही उतर
    बस लटके पड़े रहते हैं...
    जैसे लटके पड़े हैं हम
    फ़िलहाल..
    "हाँ" और "ना" के बीच,
    बीच में!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 33w

    जब जब चाहा धरा ने
    प्रेम
    तब तब बरसायी अम्बर ने
    आग़
    और जब जब चाहा अम्बर ने
    सौहार्द
    तब तब भिजवाया धरा ने...
    ख़ाक

    यूँ जो
    हुआ विस्तार
    शून्यता का
    बीच धरा और अम्बर के..
    लगी अटकलें और प्रश्न उठे
    कि "क्या वजह है अलगाव की?"
    कि मुद्दा यहाँ दम्भ का है...
    या बात यहाँ है स्वाभिमान की?

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 33w

    उसकी आमद होती है
    चुपके से
    दबे पाँव....
    फिर यूँ कि
    पीछे से करता है वो
    एक ज़ोरदार "धप्पा"...

    प्रेम
    यक़ीनन
    एक शरारती बच्चा है!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 34w

    फ़लसफ़ा नहीं कोई, ये हम सब की असलियत है
    सच, झूठ, सही, ग़लत क्या है? सब सहूलियत है

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 35w

    बड़े बड़े शहरों में ये पेड़ रहते हैं तन्हा बहुत
    इन तड़पते बिलखते पेड़ों की दुआ है बारिश

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 36w

    दुनिया की सभी
    सभ्याताओं
    संस्कृतियों
    रीतियों और रीवाज़ों से...
    धर्मों से,
    जातियों से,
    वर्गों और समुदायों से...
    पेड़ - पौधों,
    जानवरों,
    हैवानों और इन्सानों से...
    तुमसे,
    मुझसे,
    "हमसे" और "उनसे"...
    सबसे ...
    बढ़कर है
    प्रेम!

    वो जो ख़ुद को
    अपनी मान्यताओं को
    रस्मों और धारणाओं को
    समझते हैं सर्वश्रेष्ठ..
    तुम्हारी नफ़रत.. हेय दृष्टि...
    तिरस्कार या हँसी के पात्र नहीं..
    प्रेम के पात्र हैं...!
    वो जिसने अपने जीवन में
    ना प्रेम किया, ना जिया
    ना जाना, ना समझा...
    तुम उससे घृणा कैसे कर सकते हो?
    मत भूलो कि, तुम मनुष्य हो..
    और मनुष्यों का कर्तव्य, काम
    धर्म, ईमान..
    सबकुछ प्रेम है,
    सिर्फ़ प्रेम!

    - कृतिका किरण


    ---------------------------------------------
    Happy Valentine's Day, Bajrang Dal ❤
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    #love #riseabovehate #kritikakiran #hindi #kavita

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    // प्रेम //

  • kritikakiran 36w

    .....मुझे नहीं चाहिए तुमसे महँगे तोहफ़े या हीरे की कोई अँगूठी या फिर फ़िल्मी डेट या डिनर। अगर तुम कुछ कर सको, तो लिख लिया करना, कभी कभी, मेरे लिए, सर्द, अकेली रातों में अलाव की तरह जलने वाले, कुछेक प्रेम पत्र!
    इंतज़ार यूँ तो बहुत असहज होता है पर ज़िंदगी में कभी, किसी मोड़ पर, हमसे कोई ऐसा मुसाफ़िर आ टकराता है जिसका इंतज़ार करना भारी नहीं लगता। हमसफ़र के साथ या उसे सोचते हुए बिताया गया एक एक क्षण, पूरे दिन का सबसे सुखद समय होता है, सबसे खूबसूरत। मेरे लिए वो मुसाफ़िर तुम हो और तुम्हारे शब्दों की प्रतीक्षा कर सकती हूँ मैं; उम्र भर नहीं भी तो लम्बे, बहुत लम्बे समय तक!

    - कृतिका किरण



    #love #letter #wait #loveletter #kriti #kritikakiran

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    // छोटे प्रेम पत्र //

  • kritikakiran 36w

    वो
    बाँधना चाहते हैं मुझे..
    लय में
    छंदों में
    बहर में
    ताकि कहला सकूँ मैं
    सभ्य..

    भूल जाते हैं वो कि
    प्रकृति
    बाँधी नहीं जा सकती..
    वो ख़ूबसूरत है क्योंकि
    वो असभ्य है
    अल्हड़ है
    आज़ाद है
    जैसी है यह कविता..

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 37w

    और जब जब भारी होता है मन
    या भीतर भरता है खालीपन..
    कविताएँ लौट आती हैं
    जैसे लौट आते हैं
    बच्चे, बूढ़े माँ बाप के
    या जैसे लौट आती है
    आग, ठंडी राख में...

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 38w

    बोले तो...
    उनको घण्टा फ़र्क़ नहीं पड़ता ��‍♀️��

    #inspired
    #dontcare #attitude #opinion #hindi #poetry #kritikakiran

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    फूल...
    ज़िम्मेदार होते हैं
    अपनी..
    ख़ूशबू के लिए
    रंग-रूप के लिए
    अपने..
    खिलने
    और मुरझाने के लिए

    उनके लिए
    तुम्हारी राय
    उतना ही मायने रखती है
    जितना
    तितली के लिए
    मायने रखती है
    फुटबॉल!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 38w

    आन्दोलन हुआ...
    किसान जुटे, जवान जुटे,
    मुठभेड़ हुई ज़ुबानी..
    चमका कौन? और क्या चला?
    चली नेता जी की कहानी!

    रैली निकाली..
    किसान निकले, जवान निकले,
    हिंसा भड़की भारी..
    कुटाया कौन? और कौन थुराया?
    जवान, किसान बारी बारी!

    - कृतिका किरण


    #satire #sarcasm #kritikakiran #hindi #kavita

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    एक ही नारा, एक ही गान
    "जय जवान, जय किसान"

  • kritikakiran 38w

    हम इन्सान नहीं हैं
    कन्धे हैं...
    वो जिन पर रख कर पाँव
    छुआ जाता है ऊँचाई को;
    और जिन पर रख कर बन्दूकें
    चलायी जाती हैं गोलियाँ...

    हम इन्सान नहीं हैं
    सीढ़ियाँ हैं...
    वो जिन पर चढ़ कर
    बढ़ा जाता है आगे;
    और जिन्हें रौंद कर
    मुड़ा नहीं जाता...

    हम जनता नहीं हैं
    भेड़ें हैं..
    और ये नेता नहीं
    चरवाहे हैं..
    बाक़ी बची सियासत..?
    तो वो ठहरी...कसाई!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 38w

    ....मैंने कब कहा कि, वह दुनिया है?
    नहीं, यह बिल्कुल सच नहीं है। मैं तो यह कहती हूँ कि उसकी अहमियत उतनी ही है जितनी किसी अंधेरे कोने की।
    हाँ, इसमें कोई दो राय नहीं है कि, हर घण्टे में एक ऐसा क्षण होता है जब दुनिया से दूर, उस अंधेरे कोने में भागने का जी करता है। उसके अंधेरे को ग़लत मत समझो, वह इकलौती ऐसी जगह है जहाँ तुम अपने भीतर की रोशनी को महसूस करते हो, या कुछ पल चुप चाप बैठ सकते हो; जहाँ शब्द बेमानी होते हैं और समझने - समझाने के प्रयास बेमतलब; जहाँ तुम, तुम रहते हो और तुम्हारे भीतर बड़े शुक्र से रहती है - शांति, सृजन, अध्यात्म, कल्पनाएँ और कला!
    मेरे पास दुनिया रहे ना रहे, मुझे कुछ ख़ास अंतर नहीं पड़ता। पर बिना इस एक कोने के क्या जीवन का कोई भी पड़ाव, जीने योग्य है?
    प्रेम, यक़ीनन, मेरा सबकुछ नहीं है, पर वास्तविकता यही है कि, प्रेम बहुत कुछ है!

    ©kritikakiran

  • kritikakiran 38w

    मैं करती हूँ दुआ हर रोज़ ख़ुदा से
    कि वो बख़्शे मुझे इनायत
    मोहब्बत की
    ताकि मैं चाह सकूँ तुझे
    तमाम दुनिया से,
    ख़ुद से ज़्यादा...
    ताकि मेरे जिस्म से बहते
    ख़ून के आख़िरी क़तरे से भी
    ख़ुशबू आए तेरी
    और सिर्फ़ तेरी...

    ऐ मेरे मालिक,
    मेरे मुल्क़, मेरे हिंदुस्ताँ..
    मैं आऊँगी इक रोज़ तेरी बाहों में
    अपना सर रखने,
    उस रोज़... एक.... आख़िरी बार...
    करना तू मेरी रूह, मेरी चाहत को आबाद
    मेरे माथे पर लिखा अपना नाम चूम कर...

    ©kritikakiran