#gazal_e_vishal

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  • gazal_e_vishal 20w

    अक्सर बातों को दिल से लगा लेता हूँ मैं
    दर्द होता है तो अश्क़ को छुपा लेता हूँ मैं

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    तन्हाई..... अन सुलझे दर्द.... ख़ालीपन में गुज़रती उम्र का... सिला न पूछो मुझे...
    आईना भी दिखाता नहीं अक्स मिरा... किस से... फ़िर हूँ मिला.. न पूछो मुझे...

    ©विशाल

    @bal_ram_pandey @odysseus_2 @succhiii @nidhi_bhavya04 @chandan02
    #gazal_e_vishal #vkp #baat_kalam_ki #tera_mera_ek_safar

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    ख़ुदा अब!

    मैं लौट फ़िर आऊँगा इस तरह, रज़ा देगा न ख़ुदा अब,
    आख़री अलविदा मेरा कहूँ तो, सज़ा देगा न ख़ुदा अब,

    मिट्टी से बना हूँ, कल मिट्टी हो जाऊँगा अहबाब फ़िर से,
    साँसों सोहबत चमकने की यहाँ, दुआ देगा न ख़ुदा अब,

    तुम सलामत होंगे, मेरे दस्तावेज में, मेरे बाद भी हमेशा,
    जहन में रहूँगा ज़िन्दा, क्या?ऐसी हवा देगा न ख़ुदा अब,

    हो जाने दो गुम-शुदा ख़ुदी से, बहुत ऐब कर लिया मैंने,
    सुकूँ के नींद में रहूँ हमेशा ऐसी, दवा देगा न ख़ुदा अब,

    ओझल हो चले है चश्म से, शायद नींद गहरी होगी अब,
    पर कुरेदकर दिल के जख़्म को, भुला देगा न ख़ुदा अब,

    फ़लसफ़ा कहूँ क्या उज्र से, ताल्लुक़ात ख़ुदी से नहीं रहा,
    जिस्म छोड़ना चाहे तो क्या दिल? दगा देगा न ख़ुदा अब,

    'विशू' उलझन में है अनगिनत सवालों में, लाश बन कर,
    रिहाई में रहम कर, हयात से कर ज़ुदा देगा न ख़ुदा अब,


    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    ग़ज़ल

    तुम्हें चाहते है, दिल-ओ-जाँ से हम.. बात झूठी तो नहीं है
    ख़ुली निग़ाहों में, देखते है ख़्वाब.. ऐ रात झूठी तो नहीं है

    अभी फ़ासले हुए है, दरमियान हमारे..... तो क्या हुआ है
    दौर-ए-वक़्त में झाँकना, हुई मुलाक़ातें ख़ठ्ठी तो नहीं है

    हरगिज़ मालूम न गिरेगा.. ख़ामियाँ किस में रही थी यहाँ
    कसम-ए-वादे किए थे जो हमने, वो सारी टूटी तो नहीं है

    ख़ामख़ा मग़्मूम हो जाती तुम...... आते-जाते ख़्यालों में
    वक़्त बहुत है पास हमारे..... अभी साँसें छूटी तो नहीं है

    यूँ ही बीता देंगे उम्र... जाँ-निसार कर... तुम्हारे लिए हम
    बद'दुआ मिले भी कितनी जाँ... किस्मत रूटी तो नहीं है

    आईनों सोहबत रहबर हुआ हूँ 'विशू' किस्सा किसे सुनाए
    बाब वैसी है कल की..... चदर इस पर से उठी तो नहीं है

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    ग़ज़ल

    दिल्लगी दिल को ना मिलती तो अच्छा होता
    जल रही दुनिया, ग़र जलती तो अच्छा होता

    बे-रहम उस ख़ुदा पर, अब ऐतबार ना मिरा
    पत्थर थी रूह, वो पिघलती तो अच्छा होता

    किश्तों में बराबर, दिए जा रहा दर्द-ओ-ग़म
    लेनी है जाँ मिरी, निकलती तो अच्छा होता

    यूँ जीकर भी बार-बार, ख़ुद में ग़र है मरना
    जिस्म में लगी प्यास, मरती तो अच्छा होता

    बदनाम ना होता, गिरेबाँ में कभी अपने ही
    सरत झुकी जो, झुकी रहती तो अच्छा होता

    ना-कारा, ना-काम का बना दिया क्यों यहाँ
    नफ़रत सर-ए-आम, करती तो अच्छा होता

    किस ओर देख लूँ, नूर-ए-उम्मीद अँधेरे में
    नूर-ए-ख़ुदा की ही, बुझती तो अच्छा होता

    तसल्ली के ख़ातिर जिंदा हूँ, बस यहाँ पर
    इसे बेहतर मौत को तरसती तो अच्छा होता

    पुछो मत पाया क्या है दिल्लगी में मुसाफ़िर
    मंजिलों की ओर ना चलती तो अच्छा होता

    अब तो हर सम्त भी सत्ह-ए-बहर लगता है
    साहीलों पे कश्ती फिसलती तो अच्छा होता

    ना पता रहता छोर 'विशाल' कभी भी यहाँ
    ज़ीस्त तैरने से पहले डुबती तो अच्छा होता

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    मुहाफ़ज़ाह भर रहा हूँ हरक़त का अपना
    अभी समझा क्या है! जरूरत का अपना

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    ग़ज़ल

    बद'दुआ थी ही उसकी क़ाबिल के घर तक आ गई
    श'हर छोड़ने के बा'द भी वापिस श'हर तक आ गई

    रम्ज़ ज़ीस्त की जो भी दफ़न थी अंदरूनी अर्से से
    कल सोचा क्या दिल ने तो बात ख़बर तक आ गई

    गुमनामी कर गए थे जिसे मंजिल से देखते-देखते
    रहबर होकर वहीं बद'दुआ फ़िर सफ़र तक आ गई

    शायद ख़ुदा ही फ़ितूर हुआ जो यूँ कुछ हो रहा यहाँ
    इबादत में दुआ पलट बद'दुआ नज़र तक आ गई

    हरग़िज फ़र्क गिरेगा न गिरेबान को कट भी जाए
    इल्म न है किसी को मौत अब ज़हर तक आ गई

    टूटे रहे शिशे के तरह अब आईना न बनना 'विशू'
    दीदा-ए-तर की ख़्वाहिश भी नहर तक आ गई


    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    दास्ताँ-ए-हयात

    लगाए बैठे है दिल किसी से, जिसे आसार नहीं मिलता
    हम निसार हुए जान-ए-मन, हमें वो प्यार नहीं मिलता

    तुम्हें ऐब था ख़ुदी पर, मालूम हमें वो फ़रेब तो नही था
    तुम गवाही दे न सके, हमें हमारा गुनाहगार नहीं मिलता

    ज़रा सी खरोंच भी हमारी देख, लबों से आह निकलती
    जमाना बिता बात को, तुम में वो दिलदार नहीं मिलता

    रूह का क़ैद-खाना लिए, हम भी शौक़ से चलते है अब
    फ़िर कोई लगा दे बोली, हमें वो भी बाज़ार नहीं मिलता

    मुरझाए जाते है गुलों की तरह, जो ताज़ा था कभी यहाँ
    क़ुर्बान करते जान हम भी, पर कोई मिनार नहीं मिलता

    तुम मसरूफ़ श'हर-ए-दिल्ली में, दिल लगाए किसी से
    यहीं सोचकर बार-बार, दिल को मेरे करार नहीं मिलता

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    यारों...

    अपनों के दर्द से दिल ए जला था यारों
    किसी हम-दर्द से फ़िर पिघला था यारों

    टूटते देखे है कितनी बार 'दिल' शीशों से
    ख़ामोशी में शोरों का ज़लजला था यारों

    यूँ कौन बे-क़ुसूर है सितमगर हमीं ठहरे
    रम्ज़-ओ-राज़ दिल जो निगला था यारों

    बद'दुआओं की किश्त रोज़ाना लेते अब
    टूट कर जो फ़िर शख़्स संभला था यारों

    दु दिलों की कश्मकश समझा ना पाया
    दु दिलों के लिए कभी ए पगला था यारों

    भटकता है अब तलाश-ए-ख़ुदी के लिए
    अभी आख़री जो कभी पहला था यारों

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    लौट लाया हूँ गुज़रे जमाने को फ़िर से
    जा रहे थे बनके हरेक उस मुसाफ़िर से

    जो कहते थे क़ाबिल कभी हर किसी से
    कौन बताएँगा हमी थे तभी क़ाफ़िर से

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    झलकते है

    हँसी में भी उसके अब साफ़ ग़म झलकते है
    कुछ दर्द ज़ियादा है तो कुछ कम झलकते है

    ख़ामोशियाँ तोड़ी न जाती लब-ओ-लबाब से
    गहराई से दर्द उठते तो चश्म नम झलकते है

    रम्ज़-ओ-राज़ हरगिज़ बयाँ करते कहाँ हम
    फ़ाएदा यहीं होता है जब क़लम झलकते है

    गेसूँओं से उसके परि-रुख़ तक ठहरते जभी
    निग़ाह में बस तभी दिलबर बलम झलकते है

    उन्हें तो छुपाएँ रखे है दिमाग़ से दिल में कहीं
    कैसे करें रू-ब-रू के उन्के कसम झलकते है

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    ख़ुश'मिज़ाज रहता हूँ आज़कल, कुछ नग़्में पुराने मिलते है
    बिछड़े दिलों के तार जुड़ते तो, बे सबर अब तराने मिलते है

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    बस बदल जाते है, क्यों सवाल नहीं करते,
    रो देते है ज़रूर हम, पर मलाल नहीं करते,

    उठाते क़लम को, भर देते सादा-ए-पर्चे को,
    दर्द तो दर्द है ना, उसे और बेहाल नहीं करते,

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    हर किसी की मंज़िल, रह-ए-गुज़र अलग है
    अपनों के दरमियाँ देखे, चले सफ़र अलग है

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    ख़ुश हूँ मैं!

    मैं ख़ुश हूँ तुम्हारी ख़ुशियाँ देख कर
    परि-रुख़ सा तेरा आशियाँ देख कर

    इस सहरा में इशरतों की बारिश है
    सितारिस्ताँ है तेरा आस्माँ देख कर

    चैन-ओ-सुकूँ लिए नींद आएगी अब
    नूर-ए-हू से मिलती अयाँ देख कर

    दुआओं का माहौल रहा अंदरूनी
    हर सम्त तबस्सुम का समाँ देख कर

    तुम वैसी ही रहना हमेशा मेरी जाँ
    मैं ख़ुश हूँ सच तुम्हारा जहाँ देख कर

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    तुम सोहबत थी तो दिल को सुकूँ था
    आलम-ए-मिराकी में याँ तब जुनूँ था

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    ग़ज़ल

    ज़रूरी न था के हम मुलाक़ात हर दफ़ा करेंगे
    जभी करेंगे सच्चे दिल के साथ हर दफ़ा करेंगे

    इक़ महल है दिल में जो अधूरा है तुम्हारे बग़ैर
    बयाँ हम-तुम हश्र-ओ-हालात हर दफ़ा करेंगे

    उक़्दा-ए-आसाँ नहीं था हाल-ए-दिल का इस
    कैसे कहें के किसे हम सौग़ात हर दफ़ा करेंगे

    इक़ तुम ही तो हो साहिल हरेक मुश्किल यहाँ
    बग़ैर तुम्हारे हम क्या मिज़ाज हर दफ़ा करेंगे

    माना के गलतियाँ हमीं से हुई थी हर दफ़ा याँ
    मुआफ़ी के लिए हम ऐ हिसाब हर दफ़ा करेंगे

    बस लौट आना है फ़िर से तुम्हें यहाँ मेरे लिए
    पुरानी रिश्तेदारी की वारदात हर दफ़ा करेंगे

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 20w

    दुआओं का मौसम चालू है इबादत ज़रूर करना
    हैसियत रहे जितनी उतनी मुहब्बत ज़रूर करना

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 28w

    ग़ज़ल

    फ़ाएदा देखकर मैंने इश्क़ निभाया तो नहीं था
    हाल-ए-दिल तुम्हें इसलिए बताया तो नहीं था

    रम्ज़-ओ-राज़ रखे थे कुछ बे-ख़बर कर तुमसे
    आएँगे दीदा-ए-तर सोचकर सुनाया तो नहीं था

    मेले थे गहरे दर्द के साहिल पर ठहरे हुए कब के
    दूरियों में रख क़ैद तुमें उन्हें दिखाया तो नहीं था

    हाँ! थी गलतियाँ जो देरी से थी बताई तुम्हें हरेक
    मतलबी न था मैं न मैंने कुछ छुपाया तो नहीं था

    रंगीन थे ख़्वाब जो हद से पार हो चले थे मेरे भी
    कमियाँ रही थी ज़रूर उनको जताया तो नहीं था

    माना के‌ अब मैं नक़ाबी हूँ तुम से हर-पल सनम
    मेरे दिल ने इश्क़ को यहाँ से हटाया तो नहीं था

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 44w

    @bal_ram_pandey @lafze_aatish @succhiii @my_sky_is_falling

    कुछ यूँ ही चंद अशआर लिखे है

    #gazal_e_vishal

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    ग़ज़ल

    उज्र कर मिल जाना कभी चाहते है दिल-ओ-जाँ से
    वाक़िफ थे बात से तुम भी माँगते है दिल-ओ-जाँ से

    मत दो यक़ी झूठा के तुम जी पाओगे मेरे बग़ैर यहाँ
    मैं जी पाऊँगा कैसे जभी समझते है दिल-ओ-जाँ से

    मिलगें हज़ारों में तुम्हें पर कमीयों में दिखूँगा मैं ही मैं
    धुँआ-धुँआ रहे इर्द-गर्द तो सुलगते है दिल-ओ-जाँ से

    उक़्दा-ए-आसाँ न होगा तुम से न मुझसे कभी जाना
    दर-ब-दर आस लिए देखो सहमते है दिल-ओ-जाँ से

    दौर-ए-मुश्किल बित जाएगा हिज्र में तेरा भी मेरा भी
    सुकूँ की तलाश में जानलो भागते है दिल-ओ-जाँ से

    सम्त जो मिलाए महबूब हमको क्या हश्र हो तब मेरा
    ख़ुली निग़ह ख़्वाब 'विशू' के ताकते है दिल-ओ-जाँ से

    ©gazal_e_vishal

  • gazal_e_vishal 56w

    गझल

    पुन्हतः नव्याने तुझ्यासाठी लिहणे आता जमेल का माहीत नाही
    ती नशा काही वेगळीच होती आता परत होईल का माहीत नाही

    विसरण होत होतं माझ मलाच का हा एक प्रश्न सतावतो नेहमी
    उत्तरे मी शोधत नाही कधीच अन् ती सापडेल का माहीत नाही

    तु शहराकडे धाव घेतली अन् मी कुंपणाला धरून बसलो या येथे
    तु शोधते निष्भम्र आकाश, मी तेथे केव्हा जाईल का माहीत नाही

    मी थबकून बसलो आहे त्या जुण्याच, आपले शाळेच्या अंगणात
    सकाळ, दुपार, संध्याकाळ.. पण, तु तेथे येईल का माहित नाही

    मग आठवत राहतो नशेचा खुमार मेंदूच्या पार होत नाहीं तोपर्यंत
    अन् निस्तब्ध होतो आहारी गेल्यावर, तुला पटेल का माहीत नाही

    मग कशाला हट्टहास माझा तुला शोधण्याचा, कविता लिहण्याचा
    जे तुझ्यापर्यंत कधीच येणार नाही, जे तु वाचेल का माहीत नाही

    ©gazal_e_vishal