#garibi

39 posts
  • alkatripathi79 2w

    #garibi


    बुरे सपनों से हम डर जाते है
    मगर ये नही क्यूंकि इनकी
    हक़ीक़त कहीं इससे
    भयावह होती है

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    सपने

    फटी चादर ओढ़ कर
    गहरी नींद सो जाते है
    कहीं भी, फुटपाथ पर
    खुले आकाश के नीचे
    फिर भी “सपने"
    इनकी आँखों में नही आते।
    सपनों को भी पता है,
    इनके जीवन का अधूरापन
    ©alkatripathi79

  • alkatripathi79 3w

    मैं हर दर्द को पनाह देती हूँ
    हर हाल में बस मुस्कुरा देती हूँ
    जो कोई समझ जाए मेरे दर्द तो...
    मैं अपनी ख़ुशी बता उसे बहला देती हूँ


    ©alkatripathi79

  • alkatripathi 12w

    #garibi
    @amateur_skm
    सौरभ की रचना ग़रीबी का खेल पढ़ के एक सच्ची घटना याद आई... लिखने में सुविधा के लिए थोड़ा भाषा बदल रही हूँ...
    बात पुरानी है, मैं अपनी माँ के साथ अपने फैमिली डॉ. के पास गई थी.. वहाँ एक औरत बैठ कर रो रही थी और उसकेआठ साल के बेटे को पानी (saline water) चढ़ाया जा रहा था बच्चे को पानी की कमी से पेट में पड़ेशानी हुई थी बच्चा ठीक था पर उसकी माँ रोए जा रही थी,, तो डॉ. ने समझाते हुए पूछा...

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    डॉ.... इतना क्या रो रही हो, पानी की बस कमी से सब पड़ेशानी हुई है,, पानी भी तुमलोग को नही मिलता क्या?
    माँ..... मैं क्या करुँ ये पीता ही नही है कितना भी बोलूं...
    डॉ..... क्यों गोलू? क्यों नही पीते हो पानी.. देखो कितनी रो रही है तुम्हारी माँ...
    गोलू..... डॉ. साब माँ न झूठ बोल रही है... मैं पानी पीता हूँ, और भर पेट पीता हूँ... मैं ही नही मेरी छे महीने की बहन है न उ भी पीती है....
    डॉ. अचंभित हो कर.... तुम क्या बोल रहे हो...
    गोलू... हाँ और क्या,, रोज रात को हम तीनों भर पेट पानी ही पीते है और बाबू दारु......

    वहाँ बैठे सभी चुप थे..
    ©alkatripathi

  • alkatripathi 20w

    जला कर ग़रीबी चूल्हे में, मैं दो रोटी रोज़ पकाता हूँ
    नमक भी भले ना मिले, इसे खुशी ख़ुशी मैं खाता हूँ
    बिछा कर फटी चादर फुटपाथ पे, गहरी नींद सो जाता हूँ
    फिक्र छोड़ कीट पतंगों का, सुनहरे ख़्वाब सजाता हूँ
    लेकर नई चुनौती फिर से अहले सुबह उठ जाता हूँ
    मुझे नाज़ है ग़रीबी पे, क्यूँकि कटोरा नहीं थामता हूँ
    पेट में अन्न, तन पर वस्त्र नहीं, पर ईमान नहीं बेच पाता हूँ
    गरीब कहकर लोग हॅसते है मुझपर........
    गर्व है मुझे अपनी ग़रीबी पर,
    किसी की मज़बूरी पर नहीं हँसता हूँ
    ©didi__alka

  • alkatripathi 21w

    चूल्हे जलते कैसे वहाँ,, जहाँ,
    दिल हरपल सुलगता हो

    भूख कैसे लगती उनको
    जो आँसू हरपल पीता हो

    ठंड भी उनको लगती कहाँ
    चादर गरीबी के, जो ओढ़ता हो

    मंजिल उसको मिले तो कैसे
    जिसका घर हीं सफ़र में पड़ता हो
    ©didi__alka

  • rahat_samrat 27w

    ✍✍

    नापी गयी खुशियाँ जहाँ वहाँ पल भर ठहरे नहीं मंजर,
    मिली अपनों से ही शिकस्त तो फ़िर क्या करे खंजर,

    देखे शौक से सारे नजारे पर हुई तकलीफ़ तब हमको,
    गिरा कर दूसरों को क्या कभी कहलाओगे सिकंदर।

    जाती रही तन्हाई की ना जाने बेरंग हवा किस ओर,
    उसी बयार में जल गए सभी ख़्याल के रेशमी पिंजर।

    बिनते रहे वो पुरानी खाट हर बार पड़ती रही गाँठे,
    दिखाकर चारपाई ठीक सहमते रहते थे वो अंदर।

    हरा सावन है क्षेत्र क्रीड़ा मगर जब होती प्रेम पीड़ा,
    तो भादव की दोपहरी सा लगता है ह्रदय खेत बंजर।

    तैर जाते है पत्थर भी जहाँ होता विश्वास का समंदर,
    जहाँ होती नहीं श्रद्धा वहाँ चुभते चप्पल में भी कंकर।

    एक तरफ़ है गरीबी की मार तो दूजे है अमीर व्यापारी,
    दोनों में पिस रही रोटी बीच में तकलीफों का मंदर।

    कहते है नाम का होता असर पर है सच्चाई कम इसमें,
    मैंने देखे है विष घोलते किरदार जिनका नाम है शंकर।

    छीनकर ले गए हिस्से की सारी मज़बूर रोटी बड़े हकदार,,
    राहत अपनी करनी को छुपाने को अब वो लगवा रहे लंगर।
    ©rahat_samrat

  • chahat_samrat 27w



    बदनसीबी की आसमानी बिजली गिरी जिन बच्चियों पर, उन्हे थोड़ा सहारा, खूब सारा हौसला देकर प्रेरणा
    बनाया जा सकता है।
    शिक्षा की दिए से कई उजड़े घर बसाए जा सकते है , वाकई अगर उन्हें मार्गदर्शन मिले!
    ©chahat_samrat

  • woohoo 31w

    गरीबी

    किसी को, नहीं, परवा यहाँ गरीबों की, हर युग में मारा गया है वह ,ये कोनसी नयी बात है! हर बार यही उम्मीद लेके जीते है, कोई तो आएगा, और असल में उनके के भी अच्छे दिन लाएगा!

    ©woohoo

  • soonam 37w

    कुछ मैली-कुचैली कपड़ों में
    आंखों में अपनी..
    मासूमियत और दुखों का संगम लिए
    पढ़ने खेलने की उम्र में
    यूं दूसरों के सामने
    हाथ पसारे देखा है..!!

    भूख और रात में एक छत की तलब में
    दबी- छटपटाती आत्मा को
    कड़कड़ाती सर्दी, गर्मी और बारिशों में
    धीरे धीरे शरीर से यूं
    क्या.. अलग होते देखा है

    मिटती नहीं भूख.. जहां अमीरों की
    ढेरों ख्वाहिशों और शौकों के आगे..
    वहीं दो रोटियां बांटे..
    बिन चिंतन.. सुंकू से
    गरीबों का सड़क पर यूं..
    रात काटते.. देखा है..!!

    जहां बड़ी-बड़ी खुशियों में भी
    कोई अपना मायूस हो कर छूट जाते..
    वहीं दूसरी ओर.. छोटी-सी खुशियों में भी
    किसी मायूस को अपना बनाकर..
    उन गरीबों का..
    अमीरों वाला दिल देखा है..!!
    ©soonam


    @writersnetwork @writerstolli @mirakee
    #garibi #poority #amiri

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    गरीबी

    क्या उन्हें शौक नहीं होती..
    यूं BRANDED कपड़ों की
    Party..pub.. की
    Club.. और pizza.. burgers की..

    होती है ना..!!

    लेकिन फिर भी..
    अपनी तन-मन मार.. हर दूसरे दिन..
    अपनी तलब.. अपने मुस्कानों में छिपाए
    चल पड़ते हैं वे दो रोटियों के तलाश में..!!
    ©soonam

  • narendranayak 54w

    लफ़्ज़

    हे कोई बात जो तुम्हे कहना चाहूं!
    लफ़्ज अटकते है हलक़ में कुछ कह भी ना पाऊं!!

    मेरा जीवन है तुमसे तुम पर ही खत्म!
    तुम्हे पाना भी चाहूं तुम्हे पा भी ना सकूं!!

    मेरे दिल के आंगन मे तूं खिलता हुआ फूल है!
    तुमसे ही महकता हूँ तुम्हे छूं भी ना सकूं!!

    नानी से सुनी थी परियों कि कहानी!
    तूं हूबहू है वैसी, पर तेरे संग उड़ ना पाऊं!!

    मेरे सोच के दायरे मे बस तेरा ही जिक्र होता!
    सबको बताता रहता हूं बस तुमसे कह ना पाऊं!!

    लड़ सकता हूं जमाने से तुझे जीतने की खातिर!
    तुम्हे हार कर सब जीतने अच्छा है मर जाऊं!!

    हूं शांत बहोत मैं मगर अंदर मेरे ईक शोर है!
    रौ भी नही सकता मैं खुलकर तेरे सामने हस ना पाऊं!!
    ©narendranayak

  • ganesh_deo 56w

    .

  • narendranayak 60w

    चुनाव आया है

    आज गांव कि गलियां साफ हो गई, अब नालियो मे पानी नही रूकता है!
    चारो तरफ स्वच्छता अभियान चला है, कई सालो से पड़ा कचरे का ढेर भी आज नही दिख रहा है! !

    पुरे गांव को आज दुल्हन की तरह सजा दिया!
    कई सालो से सो रहे मास्टर जी ने बच्चो को आज सारा ज्ञान सिखा दिया!!

    बुजुर्गो को कम्बल और बच्चो को मिठाई खिलाई जा रही है!
    नशेड़ीयो मे शराब और माताओ मे शोल बाटी जा रही है! !

    फिर गाड़ियों का एक काफ़ीला आता है, चारो ओर हाहाकार मच जाता है!
    यह माताए मेरी यह बहने मेरी यह साथी मेरे यह बुजुर्ग मेरे ऐसे ही झुमले कहकर कोई पुरे गांव को गोद ले जाता है! !

    पता नही ये उजले-उजले वस्त्र पहने गांव का बेटा कौन आया है!
    कोई बड़ा आदमी लगता है, बड़ा आदमी ओर वो भी हाथ जोड़े खड़ा है? लगता है गांव मे चुनाव आया है! !

    जब से कुर्सी मिली गांव का बेटा फिर परदेश चला गया!
    ना जाने कब लौटकर आयेगा, हमे सुनहरे सपने दिखाने वाला कब हकीकत बनकर आयेगा! !

    आज इतने बरसो बाद फिर गांव चमचमा रहा है!
    हमारी मरी हुई उम्मीदो को कोई कंधा देने आ रहा है! !

    फिर से कोई नया शख्स गांव को गोद लेने आ रहा है!
    फिर कोई खड़ा है हाथ जोड़े,लगता है फिर से चुनाव आ रहा है! !
    ©narendranayak

  • shrelos100 62w

    Mein hu.

    Achi baat hai ki hum niche hai ....chaloo.........
    Koi to neche rahega tujhe upad tak pochane mein
    ©shrelos100

  • karigar 71w

    Garibi

    ©suchitra_bharti
    Samaj ko ya sarkar ko
    ya apni es lachari ko
    es berojgari ko
    Ya apni garib jati ko
    Ya afat ban ayi es rog ko
    Ya thapa lagane ki adat ko
    Anpadh hu n
    Samjh nhi hai
    Ye baduva lagau to kise
    Kal to kat liya hane
    Aaj bhukh hai tej lagi
    N kam kahi par milta hai
    Kadam bahar rakhne par rok lagi
    Kal to kat liya hane
    Aaj bhukh bohot hai tej lagi
    Kahte hai vo log
    Dhoye hath 20sec tak
    Vo bhi din me 20 bar
    Ab kon unhe bataye
    Khane ko bhi n jute ye sabun kha se laye
    Suna hai thik hojate log jinko yah rog lagi
    Bas rakhna khane ka dhayan
    Ab kha se lau sabji hari
    jab kal khaya tha nun bhat
    Bas kat jaye aaj ka din yahi soch rat biti

  • nadanperindey 85w

    जिनकी मेहरबानियों से आज ऊंचे मुकाम पर आसीन्द है,,,,,,,(वो भूल गए)

    सुना है बादलों को भी पानी के लिए नीचे आना पड़ता है।।
    ©nadanperindey

  • khoya_shayar 85w

    ©khoya_shayar

  • khoya_shayar 86w

    .
    ©khoya_shayar

  • i_aks_ 87w

    .

  • shayar_erwan 87w

    Garibi

    कोरोना बीमारी है मछली कबाब नहीं खायेंगे
    देहाडी बंद है मेरे बच्चे क्या खायेंगे

    ©shayar_erwan

  • juhigrover 108w

    सुबह उठते ही हमारा ध्यान अखबार पे जाता है,
    और कुछ भी ग़लत होता है,सरकार ही ग़लत है,
    अग़र अपराध ज़्यादा होते हैं,तो सरकार ग़लत है,
    महंगाई, ग़रीबी, बेरोज़गारी, जनसंख्या वृध्दि....,
    कुछ भी हो,कोई हो न हो, सरकार तो ज़िम्मेदार है।
    हम चाहे कभी भी टैक्स न भरें, हम हमेशा सही हैं,
    हम सामान लेते समय छुपा के कम पैसे दें, सही हैं,
    हम कहीं कुछ ग़लत देख आगे चल दें, हम सही हैं,
    हम कुछ ले दे कर चुनाव में हिस्सा लें, हम सही हैं,
    हम अपने माथे पे सही का ठप्पा लगवा कर लाये हैं।
    अग़र बदलाव चाहते हो तो पहले खुद को बदलो,
    पूरा समाज तो बदलेगा, सरकारें भी बदल जायेगी।
    कोई सुबह उठते ही नही कहेगा कि सरकार गलत है,
    सरकार भी हम में से है, मतलब कि हम ही गलत हैं।
    ©juhigrover