#emaplaryPoetry

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  • hathwalathakur 203w

    वो पौधा

    एक झुके हुए पौधे को जब ,
    घर के भीतर जड़ित किया !
    खिल उठा चेहरा , चमक उठी पत्तियां,
    जब उसने पानी था पिया !

    रोज उसे साहस दिखलाता,
    तू भी वट बन सकता है !
    वो अन्तरउन्माद से भर उठता,
    जब जब उसको स्पर्श किया !

    उस झुके हुए पौधे को तत्पर,
    मैंने उसका अभिमान दिया !
    ‎उन्मुक्त था वो, बढ़ने में मगन,
    ‎पीछे से मैने सहारा था दिया !

    जो कभी निरीह , सहमा सा था,
    उसको मैने प्रबल था किया !

    सोचा बढ़कर मेरा होगा,
    प्रांगड़ मेरा महकाएगा
    छाँव तले अपनी जुल्फों के
    मुझपर भी प्यार दिखाएगा

    जब आया समय ,मेरी उम्मीदों का,
    उसने कुछ दिन ऐसा ही किया !
    शीतलता फैला दी जीवन मे मेरे,
    गम गमाहट का आगाज़ भी किया !

    पर भूल गए थे शायद तुम,
    एक पौधा वृक्ष तो बनता है !
    तू कितना स्नेह जता ले,
    प्रांगड़ में लगाया था न ?
    ये तेरी दीवालों पर ही तनता है !

    जब उस वृक्ष के अंदर 'मैं' आता है ,
    तेरी ही नींव को खनता है !
    खुद को विशालकाय समझकर
    तेरी ही दीवारे चुनता है !

    खून पसीने की मेहनत से,
    जिस वृक्ष को तूने आबाद किया,
    तेरी नींव में जड़े भेदकर
    उसने ही बर्बाद किया !

    'वृक्ष' गया हूँ बन अब मैं ,
    इसलिए स्नेह है मुझसे
    ऐसी गाथा गा गाकर ,
    मेरी सारी कवायदें भुला दिया !
    मेरे अपने उस 'पौधे' ने देखो ,
    मुझको ही क्षण में रुला दिया !

    पड़ चुकी दरारें हैं दीवारों पर,
    पर जड़ अब भी काट नही सकता !
    क्या करूँ ! इस वट को सींचा था मैंने,
    यूँ टुकड़ो में बांट नही सकता !
    अब गिरनी है तो गिरने दो ,
    दूजा घर अपना लेंगे !
    अब पहले से खड़े वृक्ष को ही,
    घर के अंदर करवा लेंगे !

    (बाकी अन्तरे आने वाले हैं)

    #Aps ©आदित्य प्रताप सिंह !
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