#deeppoetries

4 posts
  • akthari 11w



    Bahut ache the,
    Bolte hae log
    Jb
    Waqt beet jaata hae.
    Bs yaadein rehti hae.
    Waqt ki qadr karein.

    ©akthari

  • ms_shayara 46w

    Zalim nigaaho ne toh
    maar hi dala tha..
    Agar humne do pal aur ruk kar
    unki taraf dekh lia hota.

    - Nancy Uppal


    ©ms_shayara

  • divs_brahm 153w

    Butterfly's wings

    Please give to me my sweet butterfly 
    A kiss to me upon your gossamer wings 
    And carry me far away to foreign lands 
    To realms of exotic and beautiful things 
    Lift me up and away from this indigo dream 
    Make haste and fly higher into the sky 
    Led by the light of sunsets, tomorrow awaits 
    Where you and I may have a chance to fly 
    This life seems to no longer holds the joys 
    It's time to leave it all behind me 
    The cherished heart is barren still 
    No warmth to sow the seeds from history 
    ©divs_brahm

  • hathwalathakur 197w

    वो पौधा

    एक झुके हुए पौधे को जब ,
    घर के भीतर जड़ित किया !
    खिल उठा चेहरा , चमक उठी पत्तियां,
    जब उसने पानी था पिया !

    रोज उसे साहस दिखलाता,
    तू भी वट बन सकता है !
    वो अन्तरउन्माद से भर उठता,
    जब जब उसको स्पर्श किया !

    उस झुके हुए पौधे को तत्पर,
    मैंने उसका अभिमान दिया !
    ‎उन्मुक्त था वो, बढ़ने में मगन,
    ‎पीछे से मैने सहारा था दिया !

    जो कभी निरीह , सहमा सा था,
    उसको मैने प्रबल था किया !

    सोचा बढ़कर मेरा होगा,
    प्रांगड़ मेरा महकाएगा
    छाँव तले अपनी जुल्फों के
    मुझपर भी प्यार दिखाएगा

    जब आया समय ,मेरी उम्मीदों का,
    उसने कुछ दिन ऐसा ही किया !
    शीतलता फैला दी जीवन मे मेरे,
    गम गमाहट का आगाज़ भी किया !

    पर भूल गए थे शायद तुम,
    एक पौधा वृक्ष तो बनता है !
    तू कितना स्नेह जता ले,
    प्रांगड़ में लगाया था न ?
    ये तेरी दीवालों पर ही तनता है !

    जब उस वृक्ष के अंदर 'मैं' आता है ,
    तेरी ही नींव को खनता है !
    खुद को विशालकाय समझकर
    तेरी ही दीवारे चुनता है !

    खून पसीने की मेहनत से,
    जिस वृक्ष को तूने आबाद किया,
    तेरी नींव में जड़े भेदकर
    उसने ही बर्बाद किया !

    'वृक्ष' गया हूँ बन अब मैं ,
    इसलिए स्नेह है मुझसे
    ऐसी गाथा गा गाकर ,
    मेरी सारी कवायदें भुला दिया !
    मेरे अपने उस 'पौधे' ने देखो ,
    मुझको ही क्षण में रुला दिया !

    पड़ चुकी दरारें हैं दीवारों पर,
    पर जड़ अब भी काट नही सकता !
    क्या करूँ ! इस वट को सींचा था मैंने,
    यूँ टुकड़ो में बांट नही सकता !
    अब गिरनी है तो गिरने दो ,
    दूजा घर अपना लेंगे !
    अब पहले से खड़े वृक्ष को ही,
    घर के अंदर करवा लेंगे !

    (बाकी अन्तरे आने वाले हैं)

    #Aps ©आदित्य प्रताप सिंह !
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