#amar61090

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  • amar61090 27w

    रात

    आँशु आँख में चिंता याद में,
    अकेले कमरे में गुमशुम,
    कहा होता हैं कोई औऱ साथ में,
    जीवन के संघर्ष में,
    युवा की हर रात ही बीतती हैं काली रात में

    सब सुना जाते हैं शिक़ायत अपनी,
    कोई कहां समझता हैं उसकी बात,
    एक तरफ़ माँ के आँशु दिखते हैं उसे,
    तो एक तरफ़ आती हैं प्यार की याद,

    पिता का सहारा बन न पाया अभी,
    भाई-बहन का मान न बढ़ाया अभी,
    परिवार के खर्चे में हिस्सेदारी दे न पाया अभी,
    लोग समझतें हैं जिम्म्मेदार वो बन न पाया अभी,

    क़भी रात अकेले कमरे में उसे रोते देखे हो क्या,
    क़भी उसके उदास मन से उसकी ख़्वाहिशें पूछे हो क्या,
    उसे भी चिंता हैं अपने परिवार की,
    उसे भी चाहत हैं अपने प्यार की,
    पर जमाने की नियम में जाने क्यु वो बंधा रहता हैं,
    उसकी मुस्कान नक़ली होतीं हैं यारों,
    वो हमेशा किसी न किसी उलझन में ही फंसा होता हैं।

    वो महफिलों में भी तन्हा पड़ा रहता हैं,
    कितने भी ज़ख्म पड़े हो पीठ पीछे,
    युवा चेहरे से मुस्कुराते खड़ा रहता हैं,
    ©amar61090

  • amar61090 27w

    एक

    एक बारिश की याद हैं,
    एक तन्हाई का साथ हैं,
    एक पीले शूट में धुंधली सी तस्वीर हैं,
    औऱ एक हमारी बेकार सी तकदीर हैं,
    एक तोहफ़े की अंगूठी हैं,
    औऱ एक जिंदगी जो हमशे जाने क्यु रूठी हैं,
    एक मोहब्ब्त हैं उसी से मेरी इबादत हैं,
    उसी को लेकर हज़ार मेरी शिक़ायत हैं,
    उसे पता नहीं एक भी,
    शायद यहीं मेरी शराफ़त हैं।
    ©amar61090

  • amar61090 27w

    आतंकवाद

    किसी को मारकर,
    जन्नत मिलतीं नहीं,
    ये बात तुम भी जानते हो,
    कितने बड़े ज़ाहिल हो सब,
    जो क़साब को अपना मानते हो,

    बैर रखना कोई मज़हब शिखाता नहीं,
    किसी को दुःख भी पहूँचाना,
    शीख नहीं किसी गीता या कुरान का,
    बस एक मानव जाती हैं,
    एक इंसानियत ही धर्म हर इंसान का,

    अगर प्यार हैं आतंकवाद से,
    तो जहाँ इनकी पनप हैं,
    वहीं जाकर बस जाओ न,
    यहीं का खाकर इसी को झूठा बतलाओ न,

    तुमको अलक़ायदा जैसो से लगाव हैं,
    पसंद करतें हो मासूमों को मारने वाले हैवान को,
    अपनों गैरों का फ़र्क़ नहीं,
    जाने कैसे नादाँ तुम इंसान हो,

    किसी भी धर्म को मानो,
    इस बात से कोई मनाही नहीं हैं,
    पर धर्म के नाम पर आतंकवाद,
    ये पाप है कोई बेगुनाही नहीं हैं,

    मुझें बुरे लगते हैं आतंकवाद लोग,
    औऱ उन जैसे विचार रखने वाले,
    क्योंकि मुझें,
    इंसानियत औऱ हैवानियत का फ़र्क़ पता हैं,
    तुम्हें अच्छे लगतें होंगे,
    क्योंकि,
    सच समझ न पाना तुम्हारी इकलौती ख़ता हैं।
    ©amar61090

  • amar61090 27w

    मैं गुज़र रहा हूँ उस दौर से,
    जहाँ,
    ख़ुद से रास्ता पूछता हूँ हर मोड़ पे,
    जाना किधर हैं ख़ुद को पता नहीं,
    बस उसको अपनाते चला,
    जो दिल को जचा सही,

    जाने कब जाकर रुकूँगा,
    हा पहुँच चुका मुक़ाम पर,
    ये ख़ुद से कहूँगा,

    मंज़िल मेरी एक हैं,
    बस मैं रास्तों में उलझा हूँ,
    ऊपर से दिखता ठीक हूँ,
    अंदर से थोड़ा भी न सुलझा हूँ,
    ©amar61090

  • amar61090 28w

    अगर प्यार हैं आतंकवाद से,
    तो जहाँ इनकी पनप हैं,
    वहीं जाकर बस जाओ न,
    यहीं का खाकर इसी को झूठा बतलाओ न,
    ©amar61090

  • amar61090 28w

    माँ पिता

    कुछ लोग आज कर युग में अपने को ज्ञानी ख़ूब बताते हैं,
    पर उम्र ढलते ही माँ-पिता को बाहर का रास्ता दिखाते हैं,
    ©amar61090

  • amar61090 28w

    अगर

    अग़र आज तुम साथ होते,
    शायद ऐसे न मेरे हालात होते,
    हम भी ख़ुश होते अपने प्यार संग,
    यू अकेले न हम उदास होते,
    सारे गम मुझें आसान लगतें,
    बस अग़र तुम मेरे साथ होते ।
    ©amar61090

  • amar61090 29w

    बारिश की याद

    एक बारिश की याद हैं,
    एक तन्हाई का साथ हैं,
    एक पीले सूट में धुंधली सी तस्वीर हैं,
    औऱ एक हमारी बेकार सी तकदीर हैं,
    एक तोहफ़े की अंगूठी हैं,
    औऱ एक जिंदगी जो हमसे जाने क्यु रूठी हैं,
    एक मोहब्ब्त हैं उसी से मेरी इबादत हैं,
    उसी को लेकर हज़ार मेरी शिक़ायत हैं,
    उसे पता नहीं एक भी,
    शायद यहीं मेरी शराफ़त हैं।

    एक मेरी मोहब्ब्त हैं,
    उससे हज़ार मेरी शिकायत हैं,
    पर उसको पता नहीं एक भी,
    शायद यहीं मेरी शराफ़त हैं,

    वो पूछी की,
    तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता है मेरे दुःखी होने से,
    वो पूछी मतलब,
    उसे पता हैं मुझें फ़र्क़ पड़ता हैं।
    ©amar61090

  • amar61090 29w

    First poetry

    दिल दुःखता हैं मेरा भी,
    जब कोई प्यार हमकों सिखाता हैं,
    निभाना कैसे हैं प्यार किसी से,
    ये सब हमकों बतलाता हैं,
    अरे समझाओ इन नादानों को,
    मैं ख़ुद
    इश्क़ समझने में, बेहिसाब हूँ,
    अगर हैं ये मोहब्बत के पन्ने,
    तो फ़िर मैं, पूरी की पूरी क़िताब हूँ।
    ©amar61090