#Kripacharya

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  • ajayamitabh7 2d

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Mahadev #Shiv

    विपरीत परिस्थितियों में एक पुरुष का किंकर्तव्यविमूढ़ होना एक समान्य बात है । मानव यदि चित्तोन्मुख होकर समाधान की ओर अग्रसर हो तो राह दिखाई पड़ हीं जाती है। जब अश्वत्थामा को इस बात की प्रतीति हुई कि शिव जी अपराजेय है, तब हताश तो वो भी हुए थे। परंतु इन भीषण परिस्थितियों में उन्होंने हार नहीं मानी और अंतर मन में झाँका तो निज चित्त द्वारा सुझाए गए मार्ग पर समाधान दृष्टि गोचित होने लगा । प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का छब्बीसवां भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:26
    शिव शम्भू का दर्शन जब हम तीनों को साक्षात हुआ?
    आगे कहने लगे द्रोण के पुत्र हमें तब ज्ञात हुआ,
    महा देव ना ऐसे थे जो रुक जाएं हम तीनों से,
    वो सूरज क्या छुप सकते थे हम तीन मात्र नगीनों से?

    ज्ञात हमें जो कुछ भी था हो सकता था उपाय भला,
    चला लिए थे सब शिव पर पर मसला निरुपाय फला।
    ज्ञात हुआ जो कर्म किये थे उसमें बस अभिमान रहा,
    नर की शक्ति के बाहर हैं महा देव तब भान रहा।

    अग्नि रूप देदिव्यमान दृष्टित पशुपति से थी ज्वाला,
    मैं कृतवर्मा कृपाचार्य के सन्मुख था यम का प्याला।
    हिमपति से लड़ना क्या था कीट दृश जल मरना था ,
    नहीं राह कोई दृष्टि गोचित क्या लड़ना अड़ना था?

    मुझे कदापि क्षोभ नहीं था शिव के हाथों मरने का,
    पर एक चिंता सता रही थी प्रण पूर्ण ना करने का।
    जो भी वचन दिया था मैंने उसको पूर्ण कराऊँ कैसे?
    महादेव प्रति पक्ष अड़े थे उनसे प्राण बचाऊँ कैसे?

    विचलित मन कम्पित बाहर से ध्यान हटा न पाता था,
    हताशा का बादल छलिया प्रकट कभी छुप जाता था।
    निज का भान रहा ना मुझको कि सोचूं कुछ अंदर भी ,
    उत्तर भीतर छुपा हुआ है झांकूँ चित्त समंदर भी।

    कृपाचार्य ने पर रुक कर जो थोड़ा ज्ञान कराया ,
    निजचित्त का अवबोध हुआ दुविधा का भान कराया।
    युद्ध छिड़े थे जो मन में निज चित्त ने मुक्ति दिलाई ,
    विकट विघ्न था पर निस्तारण हेतु युक्ति सुझाई।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 1w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Mahadev #Shiv
    हिमालय पर्वत के बारे में सुनकर या पढ़कर उसके बारे में जानकरी प्राप्त करना एक बात है और हिमालय पर्वत के हिम आच्छादित तुंग शिखर पर चढ़कर साक्षात अनुभूति करना और बात । शिवजी की असीमित शक्ति के बारे में अश्वत्थामा ने सुन तो रखा था परंतु उनकी ताकत का प्रत्यक्ष अनुभव तब हुआ जब उसने जो भी अस्त्र शिव जी पर चलाये सारे के सारे उनमें ही विलुप्त हो गए। ये बात उसकी समझ मे आ हीं गई थी कि महादेव से पार पाना असम्भव था। अब मुद्दा ये था कि इस बात की प्रतीति होने के बाद क्या हो? आईये देखते हैं दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" का पच्चीसवाँ भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:25
    किससे लड़ने चला द्रोण पुत्र थोड़ा तो था अंदेशा,
    तन पे भस्म विभूति जिनके मृत्युमूर्त रूप संदेशा।
    कृपिपुत्र को मालूम तो था मृत्युंजय गणपतिधारी,
    वामदेव विरुपाक्ष भूत पति विष्णु वल्लभ त्रिपुरारी।

    चिर वैरागी योगनिष्ठ हिमशैल कैलाश के निवासी,
    हाथों में रुद्राक्ष की माला महाकाल है अविनाशी।
    डमरूधारी के डम डम पर सृष्टि का व्यवहार फले,
    और कृपा हो इनकी जीवन नैया भव के पार चले।

    सृष्टि रचयिता सकल जीव प्राणी जंतु के सर्वेश्वर,
    प्रभु राम की बाधा हरकर कहलाये थे रामेश्वर।
    तन पे मृग का चर्म चढाते भूतों के हैं नाथ कहाते,
    चंद्र सुशोभित मस्तक पर जो पर्वत ध्यान लगाते।

    जिनकी सोच के हीं कारण गोचित ये संसार फला,
    त्रिनेत्र जग जाए जब भी तांडव का व्यापार फला।
    अमृत मंथन में कंठों को विष का पान कराए थे,
    तभी देवों के देव महादेव नीलकंठ कहलाए थे।

    वो पर्वत पर रहने वाले हैं सिद्धेश्वर सुखकर्ता,
    किंतु दुष्टों के मान हरण करते रहते जीवन हर्ता।
    त्रिभुवनपति त्रिनेत्री त्रिशूल सुशोभित जिनके हाथ,
    काल मुठ्ठी में धरते जो प्रातिपक्ष खड़े थे गौरीनाथ।

    हो समक्ष सागर तब लड़कर रहना ना उपाय भला,
    लहरों के संग जो बहता है होता ना निरुपाय भला।
    महाकाल से यूँ भिड़ने का ना कोई भी अर्थ रहा,
    प्राप्त हुआ था ये अनुभव शिवसे लड़ना व्यर्थ रहा।

  • ajayamitabh7 2w

    मानव को ये तो ज्ञात है हीं कि शारीरिक रूप से सिंह से लड़ना , पहाड़ को अपने छोटे छोटे कदमों से पार करने की कोशिश करना आदि उसके लिए लगभग असंभव हीं है। फिर भी यदि परिस्थियाँ उसको ऐसी हीं मुश्किलों का सामना करने के लिए मजबूर कर दे तो क्या हो? कम से कम मुसीबतों की गंभीरता के बारे में जानकारी होनी तो चाहिए हीं। कम से कम इतना तो पता होना हीं चाहिए कि आखिर बाधा है किस तरह की? कृतवर्मा दुर्योधन को आगे बताते हैं कि नियति ने अश्वत्थामा और उन दोनों योद्धाओ को महादेव शिव जी के समक्ष ला कर खड़ा कर दिया था। पर क्या उन तीनों को इस बात का स्पष्ट अंदेशा था कि नियति ने उनके सामने किस तरह की परीक्षा पूर्व निश्चित कर रखी थी? क्या अश्वत्थामा और उन दोनों योद्धाओं को अपने मार्ग में आन पड़ी बाधा की भीषणता के बारे में वास्तविक जानकारी थी? आइए देखते हैं इस दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" के चौबीसवें भाग में।
    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:24
    क्या तीव्र था अस्त्र आमंत्रण शस्त्र दीप्ति थी क्या उत्साह,
    जैसे बरस रहा गिरिधर पर तीव्र नीर लिए जलद प्रवाह।
    राजपुत्र दुर्योधन सच में इस योद्धा को जाना हमने,
    क्या इसने दु:साध्य रचे थे उस दिन हीं पहचाना हमने।

    लक्ष्य असंभव दिखता किन्तु निज वचन के फलितार्थ,
    स्वप्नमय था लड़ना शिव से द्रोण पुत्र ने किया यथार्थ।
    जाने कैसे शस्त्र प्रकटित कर क्षण में धार लगाता था,
    शिक्षण उसको प्राप्त हुआ था कैसा ये दिखलाता था।

    पर जो वाण चलाता सारे शिव में हीं खो जाते थे,
    जितने भी आयुध जगाए क्षण में सब सो जाते थे।
    निडर रहो पर निज प्रज्ञा का थोड़ा सा तो ज्ञान रहे ,
    शक्ति सही है साधन का पर थोड़ा तो संज्ञान रहे।

    शिव पुरुष हैं महा काल क्या इसमें भी संदेह भला ,
    जिनके गर्दन विषधर माला और माथे पे चाँद फला।
    भीष्म पितामह माता जिनके सर से झरझर बहती है,
    उज्जवल पावन गंगा जिन मस्तक को धोती रहती है।

    आशुतोष हो तुष्ट अगर तो पत्थर को पर्वत करते,
    और अगर हो रुष्ट पहर जो वासी गणपर्वत रहते।
    खेल खेल में बलशाली जो भी आते हो जाते धूल,
    महाकाल के हो समक्ष जो मिट जाते होते निर्मूल।

    क्या सागर क्या नदिया चंदा सूरज जो हरते अंधियारे,
    कृपा आकांक्षी महादेव के जगमग जग करते जो तारे।
    ऐसे शिव से लड़ने भिड़ने के शायद वो काबिल ना था,
    जैसा भी था द्रोण पुत्र पर कायर में वो शामिल ना था।

    अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 3w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata

    मृग मरीचिका की तरह होता है झूठ। माया के आवरण में छिपा हुआ होता है सत्य। जल तो होता नहीं, मात्र जल की प्रतीति हीं होती है। आप जल के जितने करीब जाने की कोशिश करते हैं, जल की प्रतीति उतनी हीं दूर चली जाती है। सत्य की जानकारी सत्य के पास जाने से कतई नहीं, परंतु दृष्टिकोण के बदलने से होता है। मृग मरीचिका जैसी कोई चीज होती तो नहीं फिर भी होती तो है। माया जैसी कोई चीज होती तो नहीं, पर होती तो है। और सारा का सारा ये मन का खेल है। अगर मृग मरीचिका है तो उसका निदान भी है। महत्वपूर्ण बात ये है कि कौन सी घटना एक व्यक्ति के आगे पड़े हुए भ्रम के जाल को हटा पाती है

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:23
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    कुछ हीं क्षण में ज्ञात हुआ सारे संशय छँट जाते थे,
    जो भी धुँआ पड़ा हुआ सब नयनों से हट जाते थे।
    नाहक हीं दुर्योधन मैंने तुमपे ना विश्वास किया।
    द्रोणपुत्र ने मित्रधर्म का सार्थक एक प्रयास किया।
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    हाँ प्रयास वो किंचित ऐसा ना सपने में कर पाते,
    जो उस नर में दृष्टिगोचित साहस संचय कर पाते।
    बुद्धि प्रज्ञा कुंद पड़ी थी हम दुविधा में थे मजबूर,
    ऐसा दृश्य दिखा नयनों के आगे दोनों हुए विमूढ़।
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    गुरु द्रोण का पुत्र प्रदर्शित अद्भुत तांडव करता था,
    धनुर्विद्या में दक्ष पार्थ के दृश पांडव हीं दिखता था।
    हम जो सोचनहीं सकते थे उसने एक प्रयास किया ,
    महाकाल को हर लेने का खुद पे था विश्वास किया।
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    कैसे कैसे अस्त्र पड़े थे उस उद्भट की बाँहों में ,
    तरकश में जो शस्त्र पड़े सब परिलक्षित निगाहों में।
    उग्र धनुष पर वाण चढ़ाकर और उठा हाथों तलवार,
    मृगशावक एक बढ़ा चलाथा एक सिंह पे करने वार।
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    क्या देखते ताल थोक कर लड़ने का साहस करता,
    महाकाल से अश्वत्थामा अदभुत दु:साहस करता?
    हे दुर्योधन विकट विघ्न को ऐसे हीं ना पार किया ,
    था तो उसके कुछ तोअन्दर महा देव पर वार किया ।
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    पितृप्रशिक्षण का प्रतिफलआज सभीदिखाया उसने,
    अश्वत्थामा महाकाल पर कंटक वाण चलाया उसने।
    शत्रु वंश का सर्व संहर्ता अरिदल जिससे अनजाना,
    हम तीनों में द्रोण पुत्र तब सर्व श्रेष्ठ हैं ये माना।
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  • ajayamitabh7 4w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurava
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    मन की प्रकृति बड़ी विचित्र है। किसी भी छोटी सी समस्या का समाधान न मिलने पर उसको बहुत बढ़ा चढ़ा कर देखने लगता है। यदि निदान नहीं मिलता है तो एक बिगड़ैल घोड़े की तरह मन ऐसी ऐसी दिशाओं में भटकने लगता है जिसका समस्या से कोई लेना देना नहीं होता। कृतवर्मा को भी सच्चाई नहीं दिख रही थी। वो कभी दुर्योधन को , कभी कृष्ण को दोष देते तो कभी प्रारब्ध कर्म और नियति का खेल समझकर अपने प्रश्नों के हल निकालने की कोशिश करते । जब समाधान न मिला तो दुर्योधन के प्रति सहज सहानुभूति का भाव जग गया और अंततोगत्वा स्वयं द्वारा दुर्योधन के प्रति उठाये गए संशयात्मक प्रश्नों पर पछताने भी लगे। प्रस्तुत है दीर्ध कविता "दुर्योधन कब मिट पाया का बाइसवाँ भाग।
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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:22
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    मेरे भुज बल की शक्ति क्या दुर्योधन ने ना देखा?
    कृपाचार्य की शक्ति का कैसे कर सकते अनदेखा?
    दुःख भी होता था हमको और किंचित इर्ष्या होती थी,
    मानवोचित विष अग्नि उर में जलती थी बुझती थी।
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    युद्ध लड़ा था जो दुर्योधन के हित में था प्रतिफल क्या?
    बीज चने के भुने हुए थे क्षेत्र परिश्रम ऋतु फल क्या?
    शायद मुझसे भूल हुई जो ऐसा कटु फल पाता था,
    या विवेक में कमी रही थी कंटक दुख पल पाता था।
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    या समय का रचा हुआ लगता था पूर्व निर्धारित खेल,
    या मेरे प्रारब्ध कर्म का दुचित वक्त प्रवाहित मेल।
    या स्वीकार करूँ दुर्योधन का मतिभ्रम था ये कहकर,
    या दुर्भाग्य हुआ प्रस्फुटण आज देख स्वर्णिम अवसर।
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    मन में शंका के बादल जो उमड़ घुमड़ कर आते थे,
    शेष बची थी जो कुछ प्रज्ञा धुंध घने कर जाते थे ।
    क्यों कर कान्हा ने मुझको दुर्योधन के साथ किया?
    या नाहक का हीं था भ्रम ना केशव ने साथ दिया?
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    या गिरिधर की कोई लीला थी शायद उपाय भला,
    या अल्प बुद्धि अभिमानी पे माया का जाल फला।
    अविवेक नयनों पे इतना सत्य दृष्टि ना फलता था,
    या मैंने स्वकर्म रचे जो उसका हीं फल पलता था?
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    या दुर्बुद्धि फलित हुई थी ना इतना सम्मान किया,
    मृतशैया पर मित्र पड़ा था ना इतना भी ध्यान दिया।
    क्या सोचकर मृतगामी दुर्योधन के विरुद्ध पड़ा ,
    निज मन चितवन घने द्वंद्व में मैं मेरे प्रतिरुद्ध अड़ा।
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    अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 5w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav
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    किसी व्यक्ति के चित्त में जब हीनता की भावना आती है तब उसका मन उसके द्वारा किये गए उत्तम कार्यों को याद दिलाकर उसमें वीरता की पुनर्स्थापना करने की कोशिश करता है। कुछ इसी तरह की स्थिति में कृपाचार्य पड़े हुए थे। तब उनको युद्ध स्वयं द्वारा किया गया वो पराक्रम याद आने लगा जब उन्होंने अकेले हीं पांडव महारथियों भीम , युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, द्रुपद, शिखंडी, धृष्टद्युम आदि से भिड़कर उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया था। इस तरह का पराक्रम प्रदर्शित करने के बाद भी वो अस्वत्थामा की तरह दुर्योधन का विश्वास जीत नहीं पाए थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था आखिर किस तरह का पराक्रम दुर्योधन के विश्वास को जीतने के लिए चाहिए था? प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" का इक्कीसवां भाग।
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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:21

    शत्रुदल के जीवन हरते जब निजबाहु खडग विशाल,
    तब जाके कहीं किसी वीर के उन्नत होते गर्वित भाल।
    निज मुख निज प्रशंसा करना है वीरों का काम नहीं,
    कर्म मुख्य परिचय योद्धा का उससे होता नाम कहीं।
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    मैं भी तो निज को उस कोटि का हीं योद्धा कहता हूँ,
    निज शस्त्रों को अरि रक्त से अक्सर धोता रहता हूँ।
    खुद के रचे पराक्रम पर तब निश्चित संशय होता है,
    जब अपना पुरुषार्थ उपेक्षित संचय अपक्षय होता है।
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    विस्मृत हुआ दुर्योधन को हों भीमसेन या युधिष्ठिर,
    किसको घायल ना करते मेरे विष वामन करते तीर।
    भीमसेन के ध्वजा चाप का फलित हुआ था अवखंडन ,
    अपने सत्तर वाणों से किया अति दर्प का परिखंडन।
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    लुप्त हुआ स्मृति पटल से कब चाप की वो टंकार,
    धृष्टद्युम्न को दंडित करते मेरे तरकश के प्रहार।
    द्रुपद घटोत्कच शिखंडी ना जीत सके समरांगण में,
    पांडव सैनिक कोष्ठबद्ध आ टूट पड़े रण प्रांगण में।
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    पर शत्रु को सबक सिखाता एक अकेला जो योद्धा,
    प्रतिरोध का मतलब क्या उनको बतलाता प्रतिरोद्धा।
    हरि कृष्ण का वचन मान जब धारित करता दुर्लेखा,
    दुख तो अतिशय होता हीं जब रह जाता वो अनदेखा।
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    अति पीड़ा मन में होती ना कुरु कुंवर को याद रहा,
    सबके मरने पर जिंदा कृतवर्मा भी ना ज्ञात रहा।
    क्या ऐसा भी पौरुष कतिपय नाकाफी दुर्योधन को?
    एक कृतवर्मा का भीड़ जाना नाकाफी दुर्योधन को?
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    अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 6w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav
    कृपाचार्य और कृतवर्मा के जीवित रहते हुए भी ,जब उन दोनों की उपेक्षा करके दुर्योधन ने अश्वत्थामा को सेनापतित्व का भार सौंपा , तब कृतवर्मा को लगा था कि कुरु कुंवर दुर्योधन उन दोनों का अपमान कर रहे हैं। फिर कृतवर्मा मानवोचित स्वभाव का प्रदर्शन करते हुए अपने चित्त में उठते हुए द्वंद्वात्मक तरंगों को दबाने के लिए विपरीत भाव का परिलक्षण करने लगते हैं। प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" का बीसवां भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:20
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    क्षोभ युक्त बोले कृत वर्मा नासमझी थी बात भला ,
    प्रश्न उठे थे क्या दुर्योधन मुझसे थे से अज्ञात भला?
    नाहक हीं मैंने माना दुर्योधन ने परिहास किया,
    मुझे उपेक्षित करके अश्वत्थामा पे विश्वास किया?
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    सोच सोच के मन में संशय संचय हो कर आते थे,
    दुर्योधन के प्रति निष्ठा में रंध्र क्षय कर जाते थे।
    कभी मित्र अश्वत्थामा के प्रति प्रतिलक्षित द्वेष भाव,
    कभी रोष चित्त में व्यापे कभी निज सम्मान अभाव।
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    सत्यभाष पे जब भी मानव देता रहता अतुलित जोर,
    समझो मिथ्या हुई है हावी और हुआ है सच कमजोर।
    अपरभाव प्रगाढ़ित चित्त पर जग लक्षित अनन्य भाव,
    निजप्रवृत्ति का अनुचर बनता स्वामी है मानव स्वभाव।
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    और पुरुष के अंतर मन की जो करनी हो पहचान,
    कर ज्ञापित उस नर कर्णों में कोई शक्ति महान।
    संशय में हो प्राण मनुज के भयाकान्त हो वो अतिशय,
    छद्म बल साहस का अक्सर देने लगता नर परिचय।
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    उर में नर के गर स्थापित गहन वेदना गूढ़ व्यथा,
    होठ प्रदर्शित करने लगते मिथ्या मुस्कानों की गाथा।
    मैं भी तो एक मानव हीं था मृत्य लोक वासी व्यवहार,
    शंकित होता था मन मेरा जग लक्षित विपरीतअचार।
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    मुदित भाव का ज्ञान नहीं जो बेहतर था पद पाता था,
    किंतु हीन चित्त मैं लेकर हीं अगन द्वेष फल पाता था।
    किस भाँति भी मैं कर पाता अश्वत्थामा को स्वीकार,
    अंतर में तो द्वंद्व फल रहे आंदोलित हो रहे विकार?
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    अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 7w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav

    कृपाचार्य दुर्योधन को बताते है कि हमारे पास दो विकल्प थे, या तो महाकाल से डरकर भाग जाते या उनसे लड़कर मृत्युवर के अधिकारी होते। कृपाचार्य अश्वत्थामा के मामा थे और उसके दु:साहसी प्रवृत्ति को बचपन से हीं जानते थे। अश्वत्थामा द्वारा पुरुषार्थ का मार्ग चुनना उसके दु:साहसी प्रवृत्ति के अनुकूल था, जो कि उसके सेनापतित्व को चरितार्थ हीं करता था। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का उन्नीसवां भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:19
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    विकट विघ्न जब भी आता या तो संबल आ जाता है ,
    या जो सुप्त रहा मानव में ओज प्रबल हो आता है।   
    भयाक्रांत संतप्त धूमिल होने लगते मानव के स्वर ,
    या थर्र थर्र थर्र कम्पित होते डग कुछ ऐसे होते नर ।   
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    विकट विघ्न अनुताप जला हो क्षुधाग्नि संताप फला हो ,
    अति दरिद्रता का जो मारा कितने हीं आवेग सहा हो ।   
    जिसकी माता श्वेत रंग के आंटे में भर देती पानी,
    दूध समझकर जो पी जाता कैसी करता था नादानी ।   
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    गुरु द्रोण का पुत्र वही जिसका जीवन बिता कुछ ऐसे ,
    दुर्दिन से भिड़कर रहना हीं जीवन यापन लगता जैसे।
    पिता द्रोण और द्रुपद मित्र के देख देखकर जीवन गाथा,
    अश्वत्थामा जान गया था कैसी कमती जीवन व्यथा।
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    यही जानकर सुदर्शन हर लेगा ये अपलक्षण रखता ,
    सक्षम न था तन उसका पर मन में तो आकर्षण रखता ।
    गुरु द्रोण का पुत्र वोही क्या विघ्न बाधा से डर जाता ,
    दुर्योधन वो मित्र तुम्हारा क्या भय से फिर भर जाता ?
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    थोड़े रूककर कृपाचार्य फिर हौले दुर्योधन से बोले ,
    अश्वत्थामा के नयनों में दहक रहे अग्नि के शोले ।
    घोर विघ्न को किंचित हीं पुरुषार्थ हेतु अवसर माने ,
    अश्वत्थामा द्रोण  पुत्र ले चला शरासन तत्तपर ताने।   
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    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 8w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav
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    इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् सत्रहवें भाग में दिखाया गया जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा ने देखा कि पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कोई और नहीं , अपितु कालों के काल साक्षात् महाकाल कर रहे हैं तब उनके मन में दुर्योधन को दिए गए अपने वचन के अपूर्ण रह जाने की आशंका होने लगी। कविता के वर्तमान भाग अर्थात अठारहवें भाग में देखिए इन विषम परिस्थितियों में भी अश्वत्थामा ने हार नहीं मानी और निरूत्साहित पड़े कृपाचार्य और कृतवर्मा को प्रोत्साहित करने का हर संभव प्रयास किया। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का अठारहवाँ भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:18
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    अगर धर्म के अर्थ करें तो बात समझ ये आती है,
    फिर मन के अंतरतम में कोई दुविधा रह ना पाती है।
    भान हमें ना लक्ष्य हमारे कोई पुण्य विधायक ध्येय,
    पर अधर्म की राह नहीं हम भी ना मन में है संदेह।
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    बात सत्य है अटल तथ्य ये बाधा अतिशय भीषण है ,
    दर्प होता योद्धा को जिस बल का पर एक परीक्षण है ।
    यही समय है हे कृतवर्मा निज भुज बल के चित्रण का,
    कैसी शिक्षा मिली हुई क्या असर हुआ है शिक्षण का।
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    लक्ष्य समक्ष हो विकट विध्न तो झुक जाते हैं नर अक्सर,
    है स्वयं सिद्ध करने को योद्धा चूको ना स्वर्णिम अवसर।
    आजीवन जो भुज बल का जिह्वा से मात्र पदर्शन करते,
    उचित सर्वथा भू अम्बर भी कुछ तो इनका दर्शन करते।
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    भय करने का समय नहीं ना विकट विघ्न गुणगान का,
    आज अपेक्षित योद्धा तुझसे कठिन लक्ष्य संधान का।
    वचन दिया था जो हमने क्या महा देव से डर जाए?
    रुद्रपति अवरोध बने हो तो क्या डर कर मर जाए?
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    महाकाल के अति सुलभ दर्शन नर को ना ऐसे होते ,
    जन्मों की हो अटल तपस्या तब जाकर अवसर मिलते।
    डर कर मरने से श्रेयकर है टिक पाए हम इक क्षण को,
    दाग नहीं लग पायेगा ना प्रति बद्ध थे निज प्रण को।
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    जो भी वचन दिया मित्र को आमरण प्रयास किया,
    लोग नहीं कह पाएंगे खुद पे नाहक विश्वास किया।
    और शिव के हाथों मरकर भी क्या हम मर पाएंगे?
    महाकाल के हाथों मर अमरत्व पूण्य वर पाएंगे।
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    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 9w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav
    इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् सोलहवें  भाग में दिखाया गया जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा पांडव पक्ष के बाकी  बचे हुए जीवित योद्धाओं का संहार करने का प्रण लेकर पांडवों के शिविर के पास पहुँचे तो वहाँ उन्हें एक विकराल पुरुष पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा करते हुए दिखाई पड़ा। उस महाकाल सदृश पुरुष की उपस्थिति मात्र हीं कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के मन में भय का संचार उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त थी ।कविता के वर्तमान भाग अर्थात् सत्रहवें भाग में देखिए थोड़ी देर में उन तीनों योद्धाओं  को ये समझ आ गया कि पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कोई और नहीं , अपितु कालों के काल साक्षात् महाकाल कर रहे थे । यह देखकर कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के मन में दुर्योधन को दिए गए अपने वचन के अपूर्ण रह जाने के भाव मंडराने लगते हैं। परन्तु अश्वत्थामा न केवल स्वयं के डर पर विजय प्राप्त करता है अपितु सेंपतित्व के भार का बखूबी संवाहन करते हुए अपने मित्र कृपाचार्य और कृतवर्मा को प्रोत्साहित भी करता है। प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का सत्रहवाँ भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-17
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    वक्त  लगा था अल्प बुद्धि  के कुछ तो जागृत होने में,
    महादेव से  महा काल  से  कुछ  तो  परीचित होने में।
    सोंच पड़े  थे  हम  सारे  उस  प्रण का रक्षण कैसे  हो ?
    आन पड़ी थी विकट विघ्न उसका उपप्रेक्षण कैसे हो?
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    मन में  शंका के बादल सब उमड़ घुमड़ के आते थे ,
    साहस जो भी बचा हुआ था सब के सब खो जाते थे। 
    जिनके  रक्षक महादेव  रण में फिर  भंजन हो कैसे? 
    जयलक्ष्मी की नयनों का आखिर अभिरंजन हो कैसे?
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    वचन दिए थे जो मित्र को निर्वाहन हो पाएगा क्या?
    कृतवर्मा  अब तुम्हीं कहो हमसे ये हो पाएगा क्या?
    किस बल से महा शिव  से लड़ने का  साहस लाएँ?
    वचन दिया जो दुर्योधन को संरक्षण हम कर पाएं?
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    मन  जो  भी  भाव निराशा के क्षण किंचित आये थे ,
    कृतवर्मा  भी हुए निरुत्तर शिव संकट बन आये  थे।
    अश्वत्थामा  हम  दोनों  से  युद्ध  मंत्रणा  करता  था ,  
    उस क्षण जैसे भी संभव था हममें साहस भरता था ।
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    बोला  देखों  पर्वत  आये  तो चींटी  करती है क्या ?
    छोटे छोटे  पग उसके पर वो पर्वत से डरती  क्या ?
    जो  संभव  हो  सकता उससे वो पुरुषार्थ रचाती है ,
    छोटे हीं  पग उसके  पर पर्वत मर्दन कर जाती है।
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