#Kaurav

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  • ajayamitabh7 5w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav
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    किसी व्यक्ति के चित्त में जब हीनता की भावना आती है तब उसका मन उसके द्वारा किये गए उत्तम कार्यों को याद दिलाकर उसमें वीरता की पुनर्स्थापना करने की कोशिश करता है। कुछ इसी तरह की स्थिति में कृपाचार्य पड़े हुए थे। तब उनको युद्ध स्वयं द्वारा किया गया वो पराक्रम याद आने लगा जब उन्होंने अकेले हीं पांडव महारथियों भीम , युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, द्रुपद, शिखंडी, धृष्टद्युम आदि से भिड़कर उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया था। इस तरह का पराक्रम प्रदर्शित करने के बाद भी वो अस्वत्थामा की तरह दुर्योधन का विश्वास जीत नहीं पाए थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था आखिर किस तरह का पराक्रम दुर्योधन के विश्वास को जीतने के लिए चाहिए था? प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" का इक्कीसवां भाग।
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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:21

    शत्रुदल के जीवन हरते जब निजबाहु खडग विशाल,
    तब जाके कहीं किसी वीर के उन्नत होते गर्वित भाल।
    निज मुख निज प्रशंसा करना है वीरों का काम नहीं,
    कर्म मुख्य परिचय योद्धा का उससे होता नाम कहीं।
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    मैं भी तो निज को उस कोटि का हीं योद्धा कहता हूँ,
    निज शस्त्रों को अरि रक्त से अक्सर धोता रहता हूँ।
    खुद के रचे पराक्रम पर तब निश्चित संशय होता है,
    जब अपना पुरुषार्थ उपेक्षित संचय अपक्षय होता है।
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    विस्मृत हुआ दुर्योधन को हों भीमसेन या युधिष्ठिर,
    किसको घायल ना करते मेरे विष वामन करते तीर।
    भीमसेन के ध्वजा चाप का फलित हुआ था अवखंडन ,
    अपने सत्तर वाणों से किया अति दर्प का परिखंडन।
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    लुप्त हुआ स्मृति पटल से कब चाप की वो टंकार,
    धृष्टद्युम्न को दंडित करते मेरे तरकश के प्रहार।
    द्रुपद घटोत्कच शिखंडी ना जीत सके समरांगण में,
    पांडव सैनिक कोष्ठबद्ध आ टूट पड़े रण प्रांगण में।
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    पर शत्रु को सबक सिखाता एक अकेला जो योद्धा,
    प्रतिरोध का मतलब क्या उनको बतलाता प्रतिरोद्धा।
    हरि कृष्ण का वचन मान जब धारित करता दुर्लेखा,
    दुख तो अतिशय होता हीं जब रह जाता वो अनदेखा।
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    अति पीड़ा मन में होती ना कुरु कुंवर को याद रहा,
    सबके मरने पर जिंदा कृतवर्मा भी ना ज्ञात रहा।
    क्या ऐसा भी पौरुष कतिपय नाकाफी दुर्योधन को?
    एक कृतवर्मा का भीड़ जाना नाकाफी दुर्योधन को?
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    अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 6w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav
    कृपाचार्य और कृतवर्मा के जीवित रहते हुए भी ,जब उन दोनों की उपेक्षा करके दुर्योधन ने अश्वत्थामा को सेनापतित्व का भार सौंपा , तब कृतवर्मा को लगा था कि कुरु कुंवर दुर्योधन उन दोनों का अपमान कर रहे हैं। फिर कृतवर्मा मानवोचित स्वभाव का प्रदर्शन करते हुए अपने चित्त में उठते हुए द्वंद्वात्मक तरंगों को दबाने के लिए विपरीत भाव का परिलक्षण करने लगते हैं। प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" का बीसवां भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:20
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    क्षोभ युक्त बोले कृत वर्मा नासमझी थी बात भला ,
    प्रश्न उठे थे क्या दुर्योधन मुझसे थे से अज्ञात भला?
    नाहक हीं मैंने माना दुर्योधन ने परिहास किया,
    मुझे उपेक्षित करके अश्वत्थामा पे विश्वास किया?
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    सोच सोच के मन में संशय संचय हो कर आते थे,
    दुर्योधन के प्रति निष्ठा में रंध्र क्षय कर जाते थे।
    कभी मित्र अश्वत्थामा के प्रति प्रतिलक्षित द्वेष भाव,
    कभी रोष चित्त में व्यापे कभी निज सम्मान अभाव।
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    सत्यभाष पे जब भी मानव देता रहता अतुलित जोर,
    समझो मिथ्या हुई है हावी और हुआ है सच कमजोर।
    अपरभाव प्रगाढ़ित चित्त पर जग लक्षित अनन्य भाव,
    निजप्रवृत्ति का अनुचर बनता स्वामी है मानव स्वभाव।
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    और पुरुष के अंतर मन की जो करनी हो पहचान,
    कर ज्ञापित उस नर कर्णों में कोई शक्ति महान।
    संशय में हो प्राण मनुज के भयाकान्त हो वो अतिशय,
    छद्म बल साहस का अक्सर देने लगता नर परिचय।
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    उर में नर के गर स्थापित गहन वेदना गूढ़ व्यथा,
    होठ प्रदर्शित करने लगते मिथ्या मुस्कानों की गाथा।
    मैं भी तो एक मानव हीं था मृत्य लोक वासी व्यवहार,
    शंकित होता था मन मेरा जग लक्षित विपरीतअचार।
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    मुदित भाव का ज्ञान नहीं जो बेहतर था पद पाता था,
    किंतु हीन चित्त मैं लेकर हीं अगन द्वेष फल पाता था।
    किस भाँति भी मैं कर पाता अश्वत्थामा को स्वीकार,
    अंतर में तो द्वंद्व फल रहे आंदोलित हो रहे विकार?
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    अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 7w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav

    कृपाचार्य दुर्योधन को बताते है कि हमारे पास दो विकल्प थे, या तो महाकाल से डरकर भाग जाते या उनसे लड़कर मृत्युवर के अधिकारी होते। कृपाचार्य अश्वत्थामा के मामा थे और उसके दु:साहसी प्रवृत्ति को बचपन से हीं जानते थे। अश्वत्थामा द्वारा पुरुषार्थ का मार्ग चुनना उसके दु:साहसी प्रवृत्ति के अनुकूल था, जो कि उसके सेनापतित्व को चरितार्थ हीं करता था। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का उन्नीसवां भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:19
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    विकट विघ्न जब भी आता या तो संबल आ जाता है ,
    या जो सुप्त रहा मानव में ओज प्रबल हो आता है।   
    भयाक्रांत संतप्त धूमिल होने लगते मानव के स्वर ,
    या थर्र थर्र थर्र कम्पित होते डग कुछ ऐसे होते नर ।   
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    विकट विघ्न अनुताप जला हो क्षुधाग्नि संताप फला हो ,
    अति दरिद्रता का जो मारा कितने हीं आवेग सहा हो ।   
    जिसकी माता श्वेत रंग के आंटे में भर देती पानी,
    दूध समझकर जो पी जाता कैसी करता था नादानी ।   
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    गुरु द्रोण का पुत्र वही जिसका जीवन बिता कुछ ऐसे ,
    दुर्दिन से भिड़कर रहना हीं जीवन यापन लगता जैसे।
    पिता द्रोण और द्रुपद मित्र के देख देखकर जीवन गाथा,
    अश्वत्थामा जान गया था कैसी कमती जीवन व्यथा।
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    यही जानकर सुदर्शन हर लेगा ये अपलक्षण रखता ,
    सक्षम न था तन उसका पर मन में तो आकर्षण रखता ।
    गुरु द्रोण का पुत्र वोही क्या विघ्न बाधा से डर जाता ,
    दुर्योधन वो मित्र तुम्हारा क्या भय से फिर भर जाता ?
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    थोड़े रूककर कृपाचार्य फिर हौले दुर्योधन से बोले ,
    अश्वत्थामा के नयनों में दहक रहे अग्नि के शोले ।
    घोर विघ्न को किंचित हीं पुरुषार्थ हेतु अवसर माने ,
    अश्वत्थामा द्रोण  पुत्र ले चला शरासन तत्तपर ताने।   
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    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 8w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav
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    इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् सत्रहवें भाग में दिखाया गया जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा ने देखा कि पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कोई और नहीं , अपितु कालों के काल साक्षात् महाकाल कर रहे हैं तब उनके मन में दुर्योधन को दिए गए अपने वचन के अपूर्ण रह जाने की आशंका होने लगी। कविता के वर्तमान भाग अर्थात अठारहवें भाग में देखिए इन विषम परिस्थितियों में भी अश्वत्थामा ने हार नहीं मानी और निरूत्साहित पड़े कृपाचार्य और कृतवर्मा को प्रोत्साहित करने का हर संभव प्रयास किया। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का अठारहवाँ भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:18
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    अगर धर्म के अर्थ करें तो बात समझ ये आती है,
    फिर मन के अंतरतम में कोई दुविधा रह ना पाती है।
    भान हमें ना लक्ष्य हमारे कोई पुण्य विधायक ध्येय,
    पर अधर्म की राह नहीं हम भी ना मन में है संदेह।
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    बात सत्य है अटल तथ्य ये बाधा अतिशय भीषण है ,
    दर्प होता योद्धा को जिस बल का पर एक परीक्षण है ।
    यही समय है हे कृतवर्मा निज भुज बल के चित्रण का,
    कैसी शिक्षा मिली हुई क्या असर हुआ है शिक्षण का।
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    लक्ष्य समक्ष हो विकट विध्न तो झुक जाते हैं नर अक्सर,
    है स्वयं सिद्ध करने को योद्धा चूको ना स्वर्णिम अवसर।
    आजीवन जो भुज बल का जिह्वा से मात्र पदर्शन करते,
    उचित सर्वथा भू अम्बर भी कुछ तो इनका दर्शन करते।
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    भय करने का समय नहीं ना विकट विघ्न गुणगान का,
    आज अपेक्षित योद्धा तुझसे कठिन लक्ष्य संधान का।
    वचन दिया था जो हमने क्या महा देव से डर जाए?
    रुद्रपति अवरोध बने हो तो क्या डर कर मर जाए?
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    महाकाल के अति सुलभ दर्शन नर को ना ऐसे होते ,
    जन्मों की हो अटल तपस्या तब जाकर अवसर मिलते।
    डर कर मरने से श्रेयकर है टिक पाए हम इक क्षण को,
    दाग नहीं लग पायेगा ना प्रति बद्ध थे निज प्रण को।
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    जो भी वचन दिया मित्र को आमरण प्रयास किया,
    लोग नहीं कह पाएंगे खुद पे नाहक विश्वास किया।
    और शिव के हाथों मरकर भी क्या हम मर पाएंगे?
    महाकाल के हाथों मर अमरत्व पूण्य वर पाएंगे।
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    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 9w

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Mahadev #Kritvarma #Kripacharya #Mahabharata #Pandav #Kaurav
    इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् सोलहवें  भाग में दिखाया गया जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा पांडव पक्ष के बाकी  बचे हुए जीवित योद्धाओं का संहार करने का प्रण लेकर पांडवों के शिविर के पास पहुँचे तो वहाँ उन्हें एक विकराल पुरुष पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा करते हुए दिखाई पड़ा। उस महाकाल सदृश पुरुष की उपस्थिति मात्र हीं कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के मन में भय का संचार उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त थी ।कविता के वर्तमान भाग अर्थात् सत्रहवें भाग में देखिए थोड़ी देर में उन तीनों योद्धाओं  को ये समझ आ गया कि पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कोई और नहीं , अपितु कालों के काल साक्षात् महाकाल कर रहे थे । यह देखकर कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के मन में दुर्योधन को दिए गए अपने वचन के अपूर्ण रह जाने के भाव मंडराने लगते हैं। परन्तु अश्वत्थामा न केवल स्वयं के डर पर विजय प्राप्त करता है अपितु सेंपतित्व के भार का बखूबी संवाहन करते हुए अपने मित्र कृपाचार्य और कृतवर्मा को प्रोत्साहित भी करता है। प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का सत्रहवाँ भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-17
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    वक्त  लगा था अल्प बुद्धि  के कुछ तो जागृत होने में,
    महादेव से  महा काल  से  कुछ  तो  परीचित होने में।
    सोंच पड़े  थे  हम  सारे  उस  प्रण का रक्षण कैसे  हो ?
    आन पड़ी थी विकट विघ्न उसका उपप्रेक्षण कैसे हो?
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    मन में  शंका के बादल सब उमड़ घुमड़ के आते थे ,
    साहस जो भी बचा हुआ था सब के सब खो जाते थे। 
    जिनके  रक्षक महादेव  रण में फिर  भंजन हो कैसे? 
    जयलक्ष्मी की नयनों का आखिर अभिरंजन हो कैसे?
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    वचन दिए थे जो मित्र को निर्वाहन हो पाएगा क्या?
    कृतवर्मा  अब तुम्हीं कहो हमसे ये हो पाएगा क्या?
    किस बल से महा शिव  से लड़ने का  साहस लाएँ?
    वचन दिया जो दुर्योधन को संरक्षण हम कर पाएं?
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    मन  जो  भी  भाव निराशा के क्षण किंचित आये थे ,
    कृतवर्मा  भी हुए निरुत्तर शिव संकट बन आये  थे।
    अश्वत्थामा  हम  दोनों  से  युद्ध  मंत्रणा  करता  था ,  
    उस क्षण जैसे भी संभव था हममें साहस भरता था ।
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    बोला  देखों  पर्वत  आये  तो चींटी  करती है क्या ?
    छोटे छोटे  पग उसके पर वो पर्वत से डरती  क्या ?
    जो  संभव  हो  सकता उससे वो पुरुषार्थ रचाती है ,
    छोटे हीं  पग उसके  पर पर्वत मर्दन कर जाती है।
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    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 10w

    #Kaurav #Duryodhana #Mahabharata

    इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् पन्द्रहवें भाग में दिखाया गया जब अर्जुन के शिष्य सात्यकि और भूरिश्रवा के बीच युद्ध चल रहा था और युद्ध में भूरिश्रवा सात्यकि पर भारी पड़ रहा था तब अपने शिष्य सात्यकि की जान बचाने के लिए अर्जुन ने बिना कोई चेतावनी दिए युद्ध के नियमों की अवहेलना करते हुए अपने तीक्ष्ण वाणों से भूरिश्रवा के हाथ को काट डाला। कविता के वर्तमान भाग अर्थात् सोलहवें भाग में देखिए जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा पांडव पक्ष के सारे बचे हुए योद्धाओं का संहार करने हेतु पांडवों के शिविर के पास पहुँचे तो वहाँ उन्हें एक विकराल पुरुष उन योद्धाओं की रक्षा करते हुए दिखाई पड़ा। उस विकराल पुरुष की आखों से अग्नि समान ज्योति निकल रही थी। वो विकराल पुरुष कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के लक्ष्य के बीच एक भीषण बाधा के रूप में उपस्थित हुआ था, जिसका समाधान उन्हें निकालना हीं था । प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का सोलहवाँ भाग।

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-16
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    हे मित्र पूर्ण करने को तेरे मन की अंतिम अभिलाषा,
    हमसे कुछ पुरुषार्थ फलित हो ले उर में ऐसी आशा।
    यही सोच चले थे कृपाचार्य कृतवर्मा पथ पे मेरे संग,
    किसी विधी डाल सके अरिदल के रागरंग में थोड़े भंग।
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    जय के मद में पागल पांडव कुछ तो उनको भान कराएँ,
    जो कुछ बित रहा था हमपे थोड़ा उनको ज्ञान कराएँ ?
    ऐसा हमसे कृत्य रचित हो लिख पाएं कुछ ऐसी गाथा,
    मित्र तुम्हारी मृत्यु लोक में कुछ तो कम हो पाए व्यथा।
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    मन में ऐसा भाव लिए था कठिन लक्ष्य पर वरने को ,
    थे दृढ प्रतिज्ञ हम तीनों चलते प्रति पक्ष को हरने को।
    जब पहुंचे खेमे अरिदल योद्धा रात्रि पक्ष में सोते थे ,
    पर इससे दुर्भाग्य लिखे जो हमपे कम ना होते थे।
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    प्रतिपक्ष शिविर के आगे काल दीप्त एक दिखता था,
    मानव जैसा ना दिखता यमलोक निवासी दिखता था।
    भस्म लगा था पूरे तन पे सर्प नाग की पहने माला ,
    चन्द्र सुशोभित सर पर जिसके नेत्रों में अग्निज्वाला।
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    कमर रक्त से सना हुआ था व्याघ्र चर्म से लिपटा तन,
    रुद्राक्ष हथेली हाथों में आयुध नानादि तरकश घन।
    निकले पैरों से अंगारे थे दिव्य पुरुष के अग्नि भाल,
    हे देव कौन रक्षण करता था प्रतिपक्ष का वो कराल?
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    कौन आग सा जलता था ये देख भाव मन फलता था,
    गर पांडव रक्षित उस नर से ध्येय असंभव दिखता था।
    प्रतिलक्षित था चित्तमें मनमें शंका भाव था दृष्टित भय,
    कभी आँकते निजबल को और कभी विकराल अभय।
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    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 11w

    इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् चौदहवें भाग में दिखाया गया कि प्रतिशोध की भावना से ग्रस्त होकर अर्जुन द्वारा जयद्रथ का वध इस तरह से किया गया कि उसका सर धड़ से अलग होकर उसके तपस्वी पिता की गोद में गिरा और उसके तपस्या में लीन पिता का सर टुकड़ों में विभक्त हो गया कविता के वर्तमान प्रकरण अर्थात् पन्द्रहवें भाग में देखिए महाभारत युद्ध नियमानुसार अगर दो योद्धा आपस में लड़ रहे हो तो कोई तीसरा योद्धा हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। जब अर्जुन के शिष्य सात्यकि और भूरिश्रवा के बीच युद्ध चल रहा था और युद्ध में भूरिश्रवा सात्यकि पर भारी पड़ रहा था तब अपने शिष्य सात्यकि की जान बचाने के लिए अर्जुन ने बिना कोई चेतावनी दिए अपने तीक्ष्ण बाण से भूरिश्रवा के हाथ को काट डाला। तत्पश्चात सात्यकि ने भूरिश्रवा का सर धड़ से अलग कर दिया। अगर शिष्य मोह में अर्जुन द्वारा युद्ध के नियमों का उल्लंघन करने को पांडव अनुचित नहीं मानते तो धृतराष्ट्र द्वारा पुत्रमोह में किये गए कुकर्म अनुचित कैसे हो सकते थे ? प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का पंद्रहवां भाग।

    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Arjun #Satyki #Bhurishrva #Mahabharata #Pandav #Kaurav

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-15
    महा युद्ध होने से पहले कतिपय नियम बने पड़े थे,
    हरि भीष्म ने खिंची रेखा उसमें योद्धा युद्ध लड़े थे।
    एक योद्धा योद्धा से लड़ता हो प्रतिपक्ष पे गर अड़ता हो,
    हस्तक्षेप वर्जित था बेशक निजपक्ष का योद्धा मरता हो।
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    पर स्वार्थ सिद्धि की बात चले स्व प्रज्ञा चित्त बाहिर था,
    निरपराध का वध करने में पार्थ निपुण जग जाहिर था।
    सव्यसाची का शिष्य सात्यकि एक योद्धा से लड़ता था,
    भूरिश्रवा प्रतिपक्ष प्रहर्ता उसपे हावी पड़ता था।
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    भूरिश्रवा यौधेय विकट था पार्थ शिष्य शीर्ष हरने को,
    दुर्भाग्य प्रतीति परिलक्षित थी पार्थ शिष्य था मरने को।
    बिना चेताए उस योधक पर अर्जुन ने प्रहार किया,
    युद्ध में नियमचार बचे जो उनका सर्व संहार किया।
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    रण के नियमों का उल्लंघन कर अर्जुन ने प्राण लिया ,
    हाथ काटकर उद्भट का कैसा अनुचित दुष्काम किया।
    अर्जुन से दुष्कर्म फलाकर उभयहस्त से हस्त गवांकर,
    बैठ गया था भू पर रण में एक हस्त योद्धा पछताकर।
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    पछताता था नियमों का नाहक उसने सम्मान किया ,
    पछतावा कुछ और बढ़ा जब सात्यकि ने दुष्काम किया।
    जो कुछ बचा हुआ अर्जुन से वो दुष्कर्म रचाया था,
    शस्त्रहीन हस्तहीन योद्धा के सर तलवार चलाया था ।
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    कटा सिर शूर का भू पर विस्मय में था वो पड़ा हुआ,
    ये कैसा दुष्कर्म फला था धर्म पतित हो गड़ा हुआ?
    शिष्य मोह में गर अर्जुन का रचा कर्म ना कलुसित था,
    पुत्र मोह में धृतराष्ट्र का अंधापन कब अनुचित था?
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    कविता के अगले भाग अर्थात् सोलहवें भाग में देखिए अश्वत्थामा ने पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कर रहे महादेव को कैसे प्रसन्न कर प्ररिपक्ष के बचे हुए सारे सैनिकों और योद्धाओं का विनाश किया ।
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    अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 11w

    इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् तेरहवें भाग में अभिमन्यु के गलत तरीके से किये गए वध में जयद्रथ द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका और तदुपरांत केशव और अर्जुन द्वारा अभिमन्यु की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए रचे गए प्रपंच के बारे में चर्चा की गई थी। कविता के वर्तमान प्रकरण अर्थात् चौदहवें भाग में देखिए कैसे प्रतिशोध की भावना से वशीभूत होकर अर्जुन ने जयद्रथ का वध इस तरह से किया कि उसका सर धड़ से अलग होकर उसके तपस्वी पिता की गोद में गिरा और उसके पिता का सर टुकड़ों में विभक्त हो गया। प्रतिशोध की भावना से ग्रस्त होकर अगर अर्जुन जयद्रथ के निर्दोष तपस्वी पिता का वध करने में कोई भी संकोच नहीं करता , तो फिर प्रतिशोध की उसी अग्नि में दहकते हुए अश्वत्थामा से जो कुछ भी दुष्कृत्य रचे गए , भला वो अधर्म कैसे हो सकते थे? प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का चौदहवाँ भाग।
    #Kavita #Duryodhana #Ashvatthama #Jaidratha #Mahabharata #Pandav #Kaurav

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    दुर्योधन कब मिट पाया-भाग-14
    निरपराध थे पिता जयद्रथ के पर वाण चलाता था,
    ध्यान मग्न थे परम तपस्वी पर संधान लगाता था।
    प्रभुलीन के चरणों में गिरा कटा हुआ जयद्रथ का सिर ,
    देख पुत्र का शीर्ष विक्षेपण पिता हुए थे अति अधीर।

    और भाग्य का खेला ऐसा मस्तक फटा तात का ऐसे,
    खरबूजे का फल हाथ से भू पर गिरा हुआ हो जैसे।
    छाल प्रपंच जग जाहिर अर्जुन केशव से बल पाता था ,
    पूर्ण हुआ प्रतिशोध मान कर चित में मान सजाता था।

    गर भ्राता का ह्रदय फाड़ना कृत्य नहीं बुरा होता,
    नरपशु भीम का प्रति शोध रक्त पीकर हीं पूरा होता।
    चिर प्रतिशोध की अग्नि जो पांचाली में थी धधक रही ,
    रक्त पिपासु चित उसका था शोला बनके भड़क रही।

    ऐसी ज्वाला भड़क रही जबतक ना चीत्कार हुआ,
    दु:शासन का रक्त लगाकर जबतक ना श्रृंगार हुआ।
    तबतक केश खुले रखकर शोला बनकर जलती थी ,
    यदि धर्म था अगन चित में ले करके जो फलती थी।

    दु:शासन उर रक्त हरने में, जयद्रथ जनक के वधने में ,
    केशव अर्जुन ना कुकर्मी गर छल प्रपंच के रचने में।
    तो कैसा अधर्म रचा मैंने वो धर्म स्वीकार किया। ,
    प्रतिशोध की वो अग्नि हीं निज चित्त अंगीकार किया?

    गर प्रतिशोध हीं ले लेने का मतलब धर्म विजय होता ,
    चाहे कैसे भी ले लो पर धर्म पुण्य ना क्षय होता।
    गर वैसा दुष्कर्म रचाकर पांडव विजयी कहलाते,
    तो किस मुँह से कपटी सारे मुझको कपटी कह पाते?
    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • udiisingh_ur_day 39w

    कुछ मजबूरियों ने तोड़ रखा है हमें ,
    कुछ खूबसूरत सपनों ने साध रखा है हमें ,
    हम कब के बिखर जाते यूँ मोतियों की तरह,
    बस कुछ हमारे अपनो ने धागों में पिरो रखा है हमें।
    ©udiisingh_ur_day