#Hindi_Kavita

63 posts
  • sugandh_ankahi 11w

    कर्मयोगी

    वीत राग का भाव लिये
    लक्ष्य भेद की चाह लिए,
    स्व जीवन समर्पित करता है
    कर्मयोगी यूं पथ पे बढ़ता है | (१)

    स्वेद बिन्दु से प्रदीप्त भाल ,
    कर्मठ -जीवट कर प्रयास विशाल ,
    अवरोधो को दूर करता है
    कर्मयोगी  यूं पथ पे बढ़ता है | (२)

    प्रलोभन कोई इसे न डिगा सिका
    क्षणिक सुख भी ध्यान न बंटा सका
    बस मत्स्य-नेत्र संधान को
    गाँडीव इसका तरसता है
    कर्मयोगी  यूं पथ पे बढ़ता है | (३)

    नीरव रात्रि और तम सघन ,
    सोये जीव-जन्तु और विश्राम मे उपवन,
    पर दिन रात्रि के अंतर को इसने कब जाना है,
    एक बार जो ठान लिया, अब बस उसको पाना है,
    हिम वर्षा हो या दावानल  ,कर्मवीर कहाँ ठहरता है,
    कर्मयोगी यूं पथ  पे बढ़ता है || (४)
    -    सुगंध
    ©sugandh_ankahi

  • ajayamitabh7 25w

    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-8 
    शठ शकुनि से कुटिल मंत्रणा करके हरने को तैयार,
    दुर्योधन समझा था उनको एक अकेला नर  लाचार।
    उसकी नजरों में ब्रज नंदन  राज दंड  के अधिकारी,
    भीष्म नहीं कुछ कह पाते थे उनकी अपनी लाचारी।

    धृतराष्ट्र विदुर जो समझाते थे उनका अविश्वास किया,
    दु:शासन का मन भयकम्पित उसको यूँ विश्वास दिया।
    जिन  हाथों  संसार  फला था  उन  हाथों  को हरने को,
    दुर्योधन  ने  सोच  लिया था ब्रज नन्दन  को  धरने को। 

    नभपे लिखने को लकीर कोई लिखना चाहे क्या होगा?
    हरि पे  धरने  को जंजीर कोई रखना  चाहे  क्या होगा?
    दीप्ति जीत  हीं  जाती है वन चाहे कितना भी घन हो,
    शक्ति विजय हीं होता है चाहे कितना भी घन तम हो।

    दुर्योधन जड़ बुद्धि हरि से लड़ कर अब पछताता था,
    रौद्र कृष्ण का रूप देखकर लोमड़  सा भरमाता था।
    राज कक्ष में कृष्ण  खड़े जैसे कोई पर्वत अड़ा हुआ,
    दुर्योधन का व्यूहबद्ध  दल बल अत्यधिक डरा हुआ।

    देहओज से अनल फला आँखों से ज्योति विकट चली,
    जल  जाते सारे शूर कक्ष में ऐसी  द्युति   निकट जली।
    प्रत्यक्ष हो गए अन्धक  तत्क्षण वृशिवंश के सारे  वीर,
    वसुगण सारे उर उपस्थित ले निज बाहू  तरकश तीर। 
    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 26w

    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-7
    राजसभा में जिस दुर्योधन ने सबका अपमान किया,
    वो ही वक्त के पड़ने पर गिरिधर  की ओर प्रस्थान किया।
    था किशन कन्हैया की शक्ति का दुर्योधन को भान कहीं,
    इसीलिए याचक बनकर पहुंचा तज के अभिमान वही।

    अर्जुन ईक्छुक मित्र लाभ को माधव कृपा जरूरी थी,
    पर दुर्योधन याचक बन पहुँचा था क्या मजबूरी  थी?
    शायद केशव को जान रहा तभी तो वो याचन करता था,
    एक तरफ जब पार्थ खड़े थे दुर्योधन भी झुकता था।

    हाँहाँ दुर्योधन ब्रजवल्लभ माधव कृपा काअभिलाषी ,
    जान चुका उनका वैभव यदुनन्दन केशव अविनाशी। 
    पर गोविन्द भी ऐसे ना जो मिल जाए आडम्बर  से,
    किसी झील की काली मिट्टी छुप सकती क्या अम्बर से।

    दुर्योधन के कुकर्मों का किंचित केशव को भान रहा,
    भरी सभा में पांचाली संग कैसा वो दुष्काम रहा।
    ब्रजवल्लभ को याद रहा कैसा उसने  आदेश  दिया,
    प्रज्ञा लुप्त हुई उसकी कैसा उसने निर्देश  दिया।

    शायद प्रस्फुटित होवे अबतक प्रेमबीज जो गुप्त रहा,
    कृष्ण संधि हेतु हीं आये थे पर दुर्योधन तो सुप्त  रहा।
    वो  दुर्बुद्धि भी कैसा था कि दूत  धर्म का ज्ञान नहीं, 
    अविवेक  जड़ बुद्धि का बस देता रहा  प्रमाण कहीं।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 27w

    #Poetry #Hindi_Kavita #Duryodhana #Bhishma #Karna #Mahabharata #Krishna #Shishupal
    #शिशुपाल #कविता #दुर्योधन #महाभारत #धर्मयुद्ध #श्रीकृष्ण #शिशुपाल #भीष्म #कर्ण

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-6

    ऐसे  शक्ति  पुंज  कृष्ण  जब  शिशुपाल  मस्तक हरते थे,
    जितने  सारे  वीर  सभा में थे सब चुप कुछ ना कहते थे।
    राज    सभा  में  द्रोण, भीष्म थे  कर्ण  तनय  अंशु माली,
    एक तथ्य था  निर्विवादित श्याम  श्रेष्ठ   सर्व  बल शाली।

    वो  व्याप्त  है  नभ  में जल  में  चल में  थल में भूतल में,
    बीत  गया जो   पल   आज जो  आने वाले उस कल में।
    उनसे  हीं  बनता  है  जग ये  वो  हीं तो  बसते हैं जग में,
    जग के डग डग  में शामिल हैं शामिल जग के रग रग में।

    कंस  आदि  जो  नरा  धम  थे  कैसे  क्षण  में    प्राण लिए,
    जान  रहा  था  दुर्योधन  पर  मन  में  था  अभि मान लिए।
    निज दर्प में पागल था उस क्षण क्या कहता था ज्ञान नही,
    दुर्योधन  ना कहता  कुछ भी  कहता था अभिमान  कहीं।

    गिरिधर  में  अतुलित  शक्ति  थी  दुर्योधन  ये  जान  रहा,
    ज्ञात  कृष्ण  से  लड़ने  पर  क्या पूतना का परिणाम रहा?
    श्रीकृष्ण   से  जो  भिड़ता  था  होता  उसका  त्राण  नहीं , 
    पर  दुर्योधन  पर  मद  भारी था   लेता       संज्ञान  नहीं।

    है तथ्य विदित ये क्रोध अगन उर में लेकर हीं जलता था ,
    दुर्योधन  के  अव  चेतन  में  सुविचार कब   फलता  था।
    पर  निज स्वार्थ  सिद्धि  को  तत्तपर रहता कौरव  कुमार,
    वक्त  पड़े   तो  कुटिल   बुद्धि  युक्त   करता  था व्यापार।
    ©ajayamitabh7

  • ajayamitabh7 27w

    #Poetry #Hindi_Kavita #Duryodhana #Mahabharata #Krishna #Radha #कविता #दुर्योधन #महाभारत #धर्मयुद्ध #श्रीकृष्ण #पूतना #शकटासुर #तृणावर्त #राधा

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-5
    जब  कान्हा के होठों पे  मुरली  गैया  मुस्काती थीं,
    गोपी सारी लाज वाज तज कर दौड़े आ जाती थीं।
    किया  प्रेम  इतना  राधा  से कहलाये थे राधेश्याम,
    पर भव  सागर तारण हेतू त्याग  चले थे राधे धाम।

    पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी ,
    कंस आदि  के  मर्दन कर्ता  कृष्ण अति बलशाली।
    वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें,
    जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे।

    सारंग  धारी   कृष्ण  हरि  ने वत्सासुर संहार किया ,
    बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया।
    मात्र  तर्जनी  से हीं तो  गिरि धर ने गिरि उठाया था,
    कभी देवाधि पति इंद्र   को घुटनों तले झुकाया था।

    जब पापी  कुचक्र  रचे  तब  हीं  वो चक्र चलाते हैं,
    कुटिल  दर्प सर्वत्र  फले  तब  दृष्टि  वक्र  उठाते हैं।
    उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे,
    इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे।

    एक  हाथ में चक्र हैं  जिनके मुरली मधुर बजाते हैं,
    गोवर्धन  धारी डर  कर  भगने  का खेल दिखातें है।
    जैसे  गज  शिशु से  कोई  डरने का  खेल रचाता है,
    कारक बन कर कर्ता  का कारण से मेल कराता है।
    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • mohit09 28w

    राते

    रात हुई बात हुई ,
    तेरी मेरी कूछ पल बात हुई ,

    चाँद को जरा रोक लो ,
    हमारी बात पूरी कहाँ हुई,

    सूरज को कहो थोड़ा देर से निकले,
    खामोश हुई रात जब तुझे बात हुई ,

    थोड़ा रोक लो इस समय को ,
    अभी तेरे मेरे बात पूरी कहाँ हुई ....
    ©mohit09

  • ajayamitabh7 28w

    भगवान श्रीकृष्ण जैसे व्यक्तित्व का सामना दुर्योधन कर रहा था । दुर्योधन की कथा श्रीकृष्ण के चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन किये बिना अधूरी हीं है । पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त , कंस आदि के साथ कृष्ण ने क्या किया था , ये सर्व विदित है । जरुरत पड़ने पर श्रीकृष्ण राधा का त्याग करने में तनिक भी नहीं सकुचाते हैं, तो कभी माता को मिटटी को मुख में धारण कर पूर्ण ब्रह्मांड दिखाते हैं । ये वो ही श्री कृष्ण है जो दुर्योधन के सामने शांति का प्रस्ताव लेकर प्रस्तुत हुए थे । इन लीलाओं का वर्णन इसलिए भी लाजिमी हो जाता है क्योंकि श्रीकृष्ण की इन लीलाओं के बारे में जानते हुए भी अभिमान वश दुर्योधन ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया। प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" का पंचम भाग।#Poetry #Hindi_Kavita #Duryodhana #Mahabharata #Krishna #Ravana #Govardhan #Kanha #Shyam #Angad

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    दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-4
    कार्य दूत का जो होता है अंगद ने अंजाम दिया ,
    अपने स्वामी रामचंद्र के शक्ति का प्रमाण दिया।
    कार्य दूत का वही कृष्ण ले दुर्योधन के पास गए,
    जैसे कोई अर्णव उदधि खुद प्यासे अन्यास गए।

    जब रावण ने अंगद को वानर जैसा उपहास किया,
    तब कैसे वानर ने बल से रावण का परिहास किया।
    ज्ञानी रावण के विवेक पर दुर्बुद्धि अति भारी थी,
    दुर्योधन भी ज्ञान शून्य था सुबुद्धि मति मारी थी।

    ऐसा न था श्री कृष्ण की शक्ति अजय का ज्ञान नहीं ,
    अभिमानी था मुर्ख नहीं कि हरि से था अंजान नहीं।
    कंस कहानी ज्ञात उसे भी मामा ने क्या काम किया,
    शिशुओं का हन्ता पापी उसने कैसा दुष्काम किया।

    जब पापों का संचय होता धर्म खड़ा होकर रोता था,
    मामा कंस का जय होता सत्य पुण्य क्षय खोता था।
    कृष्ण पक्ष के कृष्ण रात्रि में कृष्ण अति अँधियारे थे ,
    तब विधर्मी कंस संहारक गिरिधर वहीं पधारे थे।

    जग के तारण हार श्याम को माता कैसे बचाती थी ,
    आँखों में काजल का टीका धर आशीष दिलाती थी।
    और कान्हा भी लुकके छिपके माखन दही छुपाते थे ,
    मिटटी को मुख में रखकर संपूर्ण ब्रह्मांड दिखाते थे।

    कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए,
    पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए।
    इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर,
    कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़।
    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 30w

    कोरोना से हार चुके, ईश्वर से क्या कहे बेचारे?

    रोजी रोटी के लाले फिर से आई विपदा भारी है,
    आना जाना बन्द हुआ पर ऊपर जाना जारी है।
    लॉक लगा फिर दुकानों में फैक्टरी सारे बन्द पड़े,
    खत्म  हो चले थे जो रुपये  घर में थोड़े चंद पड़े।

    गाँव त्याग के आये कब के शहर हुआ अनजाना,
    फिर आघात करे उठ उठ कर कोरोना कातिलाना,
    पिछली बार हीं पैदल चल कर गर्दन टूट पड़ी सारी,
    अब जो पैदल जाएं फिर से जाने कैसी हो  लाचारी?

    राशन भाषण आश्वासन मन को तो अच्छा लगता है,
    आखिर कितनी बार छले जन वादा कच्चा लगता है।
    तन  टूटा है मन रूठा है पक्ष विपक्ष सब लड़ते है,
    जो सत्ता में लाज बचाते  प्रतिपक्ष  जग  हंसते हैं।

    प्रतिपक्ष का काम नहीं केवल सत्ता पर चोट करे,
    जनता भूखी मरती है कोई कुछ भी तो ओट करे। 
    या गिद्ध बनकर बैठे हीं रहना बस है  काम यही,
    या उल्लू को भय संशय ये हो जाए निदान कहीं?

    लाशों के गिनने से केवल जन  को क्या मिला होगा,
    उल्लू गिद्ध सम लोटेंगे कोई काक दॄष्टि खिला होगा।
    जनता तो मृत सम हीं जीती  बन्द करो दोषारोपण,
    कुछ तो हो उपाय भला कुछ तो कम होअवशोषण।

    घर से बेघर है पहले हीं  काल ग्रास के ये प्यारे,
    जिनसे आस लगी न मिलती घूमे फिरे ये बंजारे।
    जीवन का सुख प्राप्त नहीं मृत्यु के गिरते अंगारे,
    कोरोना से हार चुके क्या ईश्वर से ये कहे बेचारे?
    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • ajayamitabh7 35w

    पश्चाताप

    अक्सर मंदिर के पुजारी व्यक्ति को जीवन के आसक्ति के प्रति पश्चताप का भाव रख कर ईश्वर से क्षमा प्रार्थी होने की सलाह देते हैं। इनके अनुसार यदि वासना के प्रति निरासक्त होकर ईश्वर से क्षमा याचना की जाए तो मरणोपरांत ऊर्ध्व गति प्राप्त होती है। व्यक्ति डरकर दबी जुबान से क्षमा मांग तो लेता है परन्तु उसे अपनी अनगिनत वासनाओं के अतृप्त रहने का अफसोस होता है। वो पश्चाताप जो केवल जुबाँ से किया गया हो क्या एक आत्मा के अध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो सकता हैं?

    तुम कहते हो करूँ पश्चताप,
    कि जीवन के प्रति रहा आकर्षित ,
    वासनाओं से आसक्ति की ,
    मन के पीछे भागा , कभी तन के पीछे भागा ,
    कभी कम की चिंता तो कभी धन की भक्ति की।

    करूँ पश्चाताप कि शक्ति के पीछे रहा आसक्त ,
    कभी अनिरा से दूरी , कभी मदिरा की मज़बूरी ,
    कभी लोभ कभी भोग तो कभी मोह का वियोग ,
    पर योग के प्रति विषय-रोध के प्रति रहा निरासक्त?

    और मैं सोचता हूँ पश्चाताप तो करूँ पर किसका ?
    उन ईक्छाओं की जो कभी तृप्त ना हो सकी?
    वो चाहतें जो मन में तो थी पर तन में खिल ना सकी?

    हाँ हाँ इसका भी अफ़सोस है मुझे ,
    कि मिल ना सका मुझे वो अतुलित धन ,
    वो आपार संपदा जिन्हें रचना था मुझे ,
    करना था सृजन।

    और और भी वो बहुत सारी शक्तियां,
    वो असीम ताकत ,जिन्हें हासिल करनी थी ,
    जिनका करना था अर्जन।

    मगर अफ़सोस ये कहाँ आकर फंस गया?
    कि सुनना था अपने तन की।
    मोक्ष की की बात तो तू अपने पास हीं रख ,
    करने दे मुझे मेरे मन की।
    ©ajayamitabh7

  • ajayamitabh7 36w

    मिस्टर लेट

    हरेक ऑफिस में कुछ सहकर्मी मिल हीं जाएंगे जो समय पर आ नहीं सकते। इन्हें आप चाहे लाख समझाईये पर इनके पास कोई ना कोई बहाना हमेशा हीं मिल हीं जाएगा। यदि कोई बताने का प्रयास करे भी तो क्या, इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती। लेट लतीफी इनके जीवन का अभिन्न हिस्सा होता है। तिस पर तुर्रा ये कि ये आपको हीं पाठ पढ़ाने लगते हैं । ऐसे हीं महानुभावों के चरण कमलों में आदरपूर्वक सादर नमन है ये कविता , मिस्टर लेटलतीफ ।

    तुम आते हीं रहो देर से हम रोज हीं बतातें है,
    चलो चलो हम अपनी अपनी आदतें दुहराते हैं।
    लेट लतीफी तुझे प्रियकर नहीं समय पर आते हो,
    मैं राही हूँ सही समय का नाहक हीं खिसियाते हो।

    तुम कहते हो नित दिन नित दिन ये क्या ज्ञान बताता हूँ?
    नही समय पर तुम आते हो कह क्यों शोर मचाता हूँ?
    जाओ जिससे कहना सुनना चाहो बात बता देना,
    इसपे कोई असर नही होगा ये ज्ञात करा देना।

    सबको ज्ञात करा देना कि ये ऐसा हीं वैसा है,
    काम सभी तो कर हीं देता फिर क्यों हँसते कैसा है?
    क्या खुजली होती रहती क्यों अंगुल करते रहते हो?
    क्या सृष्टि के सर्व नियंता तुम हीं दुनिया रचते हो?

    भाई मेरे मेरे मित्र मुझको ना समझो आफत है,
    तेरी आदत लेट से आना कहना मेरी आदत है।
    देखो इन मुर्गो को ये तो नित दिन बाँग लगाएंगे,
    जब लालिमा क्षितिज पार होगी ये टाँग अड़ाएंगे।

    मुर्गे की इस आदत में कोई कसर नहीं बाकी होगा,
    फ़िक्र नहीं कि तुझपे कोई असर नहीं बाकी होगा।
    तुम गर मुर्दा तो मैं मुर्गा अपनी रस्म निभाते है,
    मुर्दों पे कोई असर नहीं फिर भी आवाज लगाते है।

    मुर्गों का काम उठाना है वो प्रति दिन बांग लगाएंगे,
    मुर्दों पे कोई असर नहीं होगा जिंदे जग जाएंगे।
    जिसका जो स्वभाव निरंतर वो हीं तो निभाते हैं,
    चलो चलो हम अपनी अपनी आदतें दुहरातें हैं।
    ©ajayamitabh7

  • ajayamitabh7 36w

    #Poetry #Hindi_Kavita #Man_and_Animal #Newspaper


    जानवर और आदमी में अंतर ये है कि आदमी को शारीरिक क्षुधा के साथ साथ बौद्धिक क्षुधा को भी शांत करना होता है। यही कारण है कि आदमी के जीवन में सुबह की चाय और अख़बार अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। अख़बार में आदमी किस तरह की खबर रोज पढ़ता है , इससे जानवर के आदमी होने के छलांग का अंदाजा लगाया जा सकता है । क्या आप जानवर के आदमी होने की छलांग का अंदाजा लगा सकते हैं ? नकारात्मक पत्रकारिता पर चोट करती हुई व्ययंगात्मक रचना।

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    अखबार

    क्या खबर भी छप सकती है फिर तेरे अखबार में,
    काम एक है नाम अलग ना बदलाहट किरदार में।

    अति विशाल हैं वाहन कुछ के रहते महल निवासों में,
    मृदु काया सुंदर आनन सब आकर्षित लिबासों में ।
    ऐसों को सुन कर भी क्या ना सुंदरता आचार में,
    काम एक है नाम अलग ना बदलाहट किरदार में।

    कुछ की बात बड़ी अच्छी पर वो इनपे चलते हैं क्या?
    माना कि उपदेश सुखद हैं पर कहते जो करते क्या ?
    इनको सुनकर ज्ञात हमें ना संवर्द्धन घर बार में,
    काम एक है नाम अलग ना बदलाहट किरदार में।

    क्या देश की खबर आज है क्या राज्य की बातें हैं,
    झगड़े दंगे बात देश की वो हीं राज्य की बातें हैं।
    ऐसी खबरों से सीखूं क्या मिले सीख व्यवहार में,
    काम एक है नाम अलग ना बदलाहट किरदार में।

    सम सामयिक होना भी एक व्यक्ति को आवश्यक है,
    पर जिस ज्ञान से हो उन्नति भौतिक मात्र निरर्थक है ।
    नित्य खबर की चुस्की से है अवनति संस्कार में,
    काम एक है नाम अलग ना बदलाहट किरदार में।

    क्या खबर भी छप सकती है, फिर तेरे अखबार में,
    काम एक है नाम अलग ना बदलाहट किरदार में।
    ©ajayamitabh7

  • purnimaindra 40w

    #अम्मा_
    याद आती हैं #अम्मा

    सुबह सुबह
    धोती के ....
    पल्ले के खूंट में
    चाबी बांधी हुई,
    आंगन बुहारती हुई।
    हम बच्चों को
    आवाज़ लगाती हुई।
    उठो-स्कूल नहीं जाना क्या?
    चूल्हा फुंकनी से फूंक फूंककर,
    सर पर पल्ला ढकती हुई।
    जल्दी से टिफिन देकर,
    बाबा दादी जी को
    पकड़ाकर चाय- नाश्ता
    बाबू को देकर
    स्नान के लिए पानी तौलिया
    जल्दी से खाना
    बनाती हुई।
    दोपहर का समय भी
    कहां उसका अपना?
    फैलाती है कचरी-पापड़
    और अचार
    चना ,दाल, गेहूं,
    खेतों से आया गल्ला,
    यूं ही उसकी शाम हुई।
    सांझ हुई दीपक जले
    बाबू जी की राह देखकर,
    #अम्मा मेरी
    फिर से चले।
    प्यार आंटे में गूंथ कर
    नमक सिल पे बांटकर
    सब्जी बढिया छौंककर,
    खाना सबकी थाली में बांटकर,
    आखिर में खुद खाकर,
    ख्वाबों को अपने
    ताकपर रखकर,
    रोज़ अरमान
    अपने चूल्हे में,
    जलाती हुई।
    बच्चों में अपने
    सारे के सारे
    ख्वाब बुनें।
    सलामती की सबकी
    दुआ बोले,
    चक्करघिन्नी सी डोले,
    अपने लिए कुछ न बोले।
    सिरहाने फिक्रें दबाकर सोती,
    साथ उसके
    कल के कामों की सूची होती।
    ऐसी ही थी हमारी
    #अम्मा
    कितना लिखूं तुम पर #अम्मा
    सब कम है,सब छोटा है #अम्मा।
    तुम हो "अलादीन का चिराग़"
    मेरी.... प्यारी .....#अम्मा
    मेरी....प्यारी ......#अम्मा
    ©purnimaindra

  • dil_k_ahsaas 43w

    " सुलगता ख़त "

    ख़त में कुछ मेरे अरमान सुलग रहें हैं
    तुम्हारे दिल में उतरने को तरस रहें हैं।।
    जज़्बात, दिल के सारे बांध तोड़कर कर लिख दिए हैं
    तुम्हारे दिल की ओर बहाव का रुख मोड़ दिए हैं।।

    ख़त में कुछ मेरे ख्वाब सुलग रहें हैं
    तुम्हें हकीकत बनाने को तरस रहें हैं।।
    सपनों में ही मिलना अब मंजूर नहीं इस दिल को
    हाथ थाम जिंदगी जीने की चाहत करने लगे हैं।।

    ख़त में कुछ मेरी चाहते सुलग रही है
    चाहतें, धुंओ में बदल, बादल बन रहें हैं।।
    बादलों को बरसने के लिए मेरी आंँखों के रस्ते भा रहें हैं
    आंँखो के गहरे समंदर में ज़ज्बातों की लहरें उठा रहें हैं।।

    ख़त में कुछ मेरे ख्याल सुलग रहें हैं
    ख्यालों संग मेरा दिल पिघला रहें हैं ।।
    पिघलते हुए दिल की कहानी मोहब्बत पर जा टिकी है
    तुम से मोहब्बत हो रही है, यही मेरे शब्द, खत में कह रहें हैं।।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas

  • purnimaindra 43w

    गुलाब कुदरत का उपहार निराला,
    कभी सजाया कभी गले में डाला।
    कभी चढ़ाया गया देवी- देवो पर ,
    कभी लड़ियां बन सेजों में डाला।
    इसे देख प्यार उमड़ा प्रेमी पर,
    देकर इसे सारा मन कह डाला।
    लाल रंग है विजय तिलक सा,
    कुछ न कहकर सब कह डाला।
    ©️ Purnima Indra
    ©purnimaindra

  • dil_k_ahsaas 44w

    " तुम कभी नहीं समझ पाओगे "

    मुझे तुम से कितनी मोहब्बत है
    ये तुम कभी नहीं समझ पाओगे
    क्योंकि तुम समझना ही नहीं चाहते हो
    क्योंकि तुम्हें लगता है कहीं
    मेरे प्यार के सामने
    तुम्हारा प्यार कम ना पड़ जाए....

    मेरे जज़्बात तुम कभी नहीं समझोगे
    क्योंकि तुम्हें डर है कि
    मेरे जज़्बातों की
    तेज लहरों में तुम डूब जाओगे
    तुम मुझमें डूब कर फिर
    कभी उभर ना पाओगे
    क्योंकि तुम्हें लगता है कहीं
    मेरे प्यार के सामने
    तुम्हारा प्यार कम ना पड़ जाए.....

    मेरे दिल की अनन्त गहराइयों को
    तुम कभी ना समझ पाओगे
    क्योंकि तुम्हें पता हैं
    तुमने कितनी गहराई तक अपनी
    जड़ें मजबूत कर रखी है
    तुम, तुम डरते हो मेरे दिल में
    झांँक कर अपना वजूद और
    मोहब्बत देखने को
    क्योंकि तुम्हें लगता है कहीं
    मेरे प्यार के सामने
    तुम्हारा प्यार कम ना पड़ जाए.....

    मेरे एहसासों को तुम कभी नहीं
    समझ पाओगे
    शायद तुम समझना ही नहीं चाहते
    इसलिए दूरियांँ बनाकर
    हरपल दूर रहने की कोशिश करते हो
    क्योंकि तुम्हें डर है कि कहीं
    मेरे एहसास तुम्हारे अंदर ठहर कर
    तुम्हें कभी किसी और का ना होने देंगे
    क्योंकि तुम्हें लगता है कहीं
    मेरे प्यार के सामने तुम्हारा
    प्यार कम ना पड़ जाए.....

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas

  • purnimaindra 45w

    दुल्हन

    सजी संवरी दुल्हन
    पलकें शरमाई सी,
    दिल बेकरार है
    धड़कनें सकुचाई सी।
    आज की रात है
    पिया से मिलन की।
    सखी मैं अलबेली
    पलकें बिछाऊं नयनन की।
    कोई आने को है,
    कोई नया मिलने को है
    कई अपने बिछुड़ने को हैं।
    नयी डगर है नये स्वप्न सजे
    नयी कहानी नये रिश्ते सजे।
    मेरा मन क्यूं अकेला है
    अरे! आई मिलन की बेला है।

    ©purnimaindra

  • ajayamitabh7 46w

    जात आदमी के

    आसाँ   नहीं   समझना  हर  बात आदमी के,
    कि  हँसने  पे  हो  जाते वारदात आदमी  के।
    सीने   में  जल रहे है  अगन  दफ़न  दफ़न से ,
    बुझे   हैं  ना   कफ़न  से अलात आदमी   के?

    ईमां   नहीं   है जग   पे  ना खुद पे  है  भरोसा,
    रुके  कहाँ   रुके  हैं  सवालात   आदमी  के?
    दिन   में   हैं    बेचैनी  और रातों को  उलझन,
    संभले    नहीं     संभलते   हयात  आदमी के।

    दो   गज    जमीं      तक   के छोड़े ना अवसर,
    ख्वाहिशें    बहुत     हैं  दिन  रात  आदमी  के।
    बना  रहा था  कुछ भी जो काम कुछ  न आते,    
    जब मौत आती मुश्किल  हालात आदमी  के।

    खुदा   भी   इससे  हारा  इसे चाहिए जग सारा,
    अजीब   सी  है फितरत  खयालात आदमी के।
    वक्त   बदलने   पे   वक़्त  भी  तो    बदलता  है,
    पर  एक   नहीं   बदलता  ये  जात  आदमी के।
    ©ajayamitabh7

  • purnimaindra 48w

    #आंसू_
    आंसू ही अब बन चुके हैं ज़िन्दगी,
    देखे न लोग आंखों में मेरे कभी।
    क्यूं कि यह वो निशान हैं,
    थरथराती ग़मगीन शाम से।
    जो मिटाए न मिट सके हैं,
    दिल के जज़्बाती आसमान से।
    अब भी कसक बाकी है दिल में,
    कभी-कभी तड़पाती है बड़ी शान से।
    तड़पाने,झुलसाने,रूलाने पर भी,
    मंजिल की तसल्ली देते हैं रमज़ान से।
    पलकों पर आकर बैठ जाते हैं,
    कभी-कभी बिल्कुल अनजान से।
    लौट फेरकर इन्ही आंखों में,
    आ बसते हैं कभी-कभी नादान से।
    अठखेलियां करते घूमते हैं,
    बच्चों की तरह शैतान से।
    मैं लपकती हूं इन्हें पकड़ने को,
    और ये गुम हो जाते हैं दालान में।
    ढूंढती फिरती हूं मैं इन्हें,
    बहकर गुम हो जाते हैं समन्दर की गहराइयों में।
    हार थककर मायूस हो बैठ जाती हूं,
    कभी न कभी फिर आएंगे मेरी इन आंखों में।
    ©purnimaindra

  • purnimaindra 48w

    जाओ करोना बिदा हो जाओ,
    दु:स्वप्न सा सब भूल जाओ ।
    स्वागत करो सब नव-वर्ष का,
    धुंध ,अंधेरा मिटे सारे जग का।
    आओ हर्षोल्लास में सब गाएं,
    बुराइयों का दहन कर जाएं।
    मित्र,बंधु-बांधव सब मिल गाओ,
    नूतन-वर्ष का मंगल गीत गाओ।
    हिल -मिल सब खुशियां मनाओ,
    भुला दो ग़म सब दर्द भूल जाओ।
    प्रभु!कर जोड़ कर रहे तेरा वंदन,
    नूतन-वर्ष तेरा हो नया अभिनंदन।
    ©purnimaindra

  • smartsam 63w

    ये क्या कर गया वो?

    दिल चुरा गया वो फिर दर्द दे गया वो।
    पलटकर ना देखा फिर ऐसे चला गया वो।

    कमसिन से फूल को चुरस गया वो।
    बस अपनी यादें मुझमें ऐसे छोड़ गया वो!

    ऐसे सिमट लिया उसने
    बस पिघला दिया मुझे।
    जो चाही लालसा उसने सच
    हर हद पर कर गया वो!

    रातों के अंधेरों में जलाई उसने
    हवस की यू आग!
    हर क्रीड़ा काम की करता रहा
    दिन हो या चाहे रात!!

    ऐसी आग लगाई उसने
    उमर भी कम, समझ भी कम!
    होता रहा सब कुछ
    समझ ना पाए हम!

    वक्त निकाल गया
    वक्त निकाल गया
    एक और जान बना गया वो।

    सब दिया उसे मैंने ओर मुझे
    और मुझे छोड़ गया वो!
    बेजान कर गया वो!
    मुझे बेजान कर गया वो!!

    ©SmartSam