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  • drunken_heart 15w

    @bal_ram_pandey @lafze_aatish @succhiii @my_sky_is_falling

    बस याद रह जाती है... बातें रह जाती... नमी और कमी रह जाती है
    कैसे बताऊँ भाई... ज़िंदगी में तुमसे हुई... खाइयाँ रह गई

    बहुत याद आती है "नौशाद भाई" ��
    Miss u bhai jaan

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    ग़ज़ल

    गुज़ार लूँ कैसे पल... ऐ पल तिरी याद दिलाते बहुत है
    छुपाऊँ किस तरह... दीदा-ए-तर झिलमिलाते बहुत है

    रिश्ता कुछ न होकर भी.... इतना दर्द आता क्यों मुझे
    अहबाब मेरे.. हम-नफ़स.. यादों में तेरे रुलाते बहुत है

    इक़ जहान से दुसरे तक का फ़ासला.. होता नहीं अब
    कारवाँ.. मुसलसल, मय्यसर रहे... वो घुमाते बहुत है

    कर आता हूँ... ख़याल-ए-पास... तेरे लिक्खे नग़्मों के
    अज़ाब देके.. मग़्मूम वो लफ़्ज... फ़िर कराते बहुत है

    कमियाँ हुई कितनी.. सत्लनत-ए-दिल में.. क्या बताऊँ
    तलाशें इशरत में..... हर सम्त पर... ऐ चलाते बहुत है

    हमेशा ही थे किताबी... ख़िताबी तुम... हरेक शख़्स के
    शमअ्' जो बुझी... तपिश से मुझे... वो जलाते बहुत है

    सितारा-ए-ख़्वाब... "नौशाद" रहेगा.. 'विशू' का ता-उम्र
    हर्फ़-दर-हर्फ़.... अशआर में.... देख आज़माते बहुत है

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 15w

    कुछ अशआर यूँ ही दिल-ओ-दिमाग़ से निकल कर आए

    @bal_ram_pandey @lafze_aatish @succhiii @my_sky_is_falling

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    ग़ज़ल

    फ़िर जाऊँगा छोड़कर... ऐ रह-ए-सफ़र कहाँ मिरा है
    तुम बे-शक़ मिरे हो हुज़ूर... पर ऐ श'हर कहाँ मिरा है

    ग़रीब-ए-कूचा ग़र होता.... रहता शान-ओ-शौकत से
    शीश्शा-महल में तब्दील दिल में..... घर कहाँ मिरा है

    बू-ए-गुलाब पसंदीदा... किया करती थी जो कभी याँ
    सहरा बना दिया क्यों... बताओ ऐ असर कहाँ मिरा है

    बाम-ए-रौशन रहता था.... ईद-ओ-दिवाली में हमेशा
    शमअ्' बुझी-बुझी क्यों.... दिखता सेहर कहाँ मिरा है

    अहद-ए-मुसाफ़रत... मुनाफ़रत कर जाता हूँ आज़ मैं
    तप-ए-ग़म के जमाने में रहा... दर-ब-दर कहाँ मिरा है

    रुख़-ए-मग़्मूम मुसलसल 'विशू'... बयाँ कर देता है तू
    दिल कहे पर दिमाग़ न माने, लब-ए-तर कहाँ मिरा है

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 15w

    ग़ज़ल

    सुकूँ की नींद मिलती तो हम भी होश में रहते
    जाँ-निसार कर तुम पे तुम्हारी आग़ोश में रहते

    ऊँ निकालते न कभी दिए दर्द-ओ-ग़म से तेरे
    दिल-ए-मुर्दा कर के हमेशा ही ख़मोश में रहते

    ज़ुबानी करते ने गुनाह क़ुबूल जो न हुआ था
    जिसे कहते हो उस में से ही निर्दोश में रहते

    मंज़र-ए-आम करना चाहते नहीं थे वस्ल हम
    हम भी उल्फ़त में जाना गुल-पोश में रहते

    तक़दीर में था मिलना-बिछड़ना सो हुआ अब
    दबाना आता न तो यूँ ही मदहोश में रहते

    जंजीर बन गए हो तुम और क़ैद ख़ुद 'विशू'
    तवज़्जो रहता ग़र हमें तो हम रु-पोश में रहते

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 15w

    @bal_ram_pandey @lafze_aatish @succhiii @my_sky_is_falling

    अहबाब... हम-नफ़स... दोस्त मेरे
    आपसे हम है... आपसे हम रहेंगे

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    ग़ज़ल

    सल्तनत-ए-दिल में महफ़ूज बऱकरार रख चलता है
    अहबाब कुछ यूँ ही मिरे ख़ातिर प्यार रख चलता है

    क़ुबूल दुआ-ओ-बद'दुआ जो मौज-ए-निगह माँगती
    दौर-ए-मुश्किल यार मिरा जाँ-निसार रख चलता है

    रम्ज़-ओ-राज़ दफ़नाएँ अंदरूनी दरिया-ए-दिल में
    संभाले है कभी से, वो ख़ुदी पतवार रख चलता है

    तवज़्जों लगाऊँ किस तरह, उसका छोर कौनसा है
    मर मिट जाने का, जभी पास ख़ुमार रख चलता है

    आरज़ू-ए-दिल की है कहाँ रही, ख़ुदा तुम्हें पाने की
    ता-उम्र सफ़र संग जब उसका आसार रख चलता है

    मऱज रहता है जिसकी दवा मुझे कह जाता हमेशा
    जिस्म कुछ इस तरह ज़दा वो बिमार रख चलता है

    उक़्दा-ए-आसाँ भी अब मुश्किल लगने लगती यहाँ
    'विशू' ख़ातिर तेरे दिल हमेशा बेक़रार रख चलता है

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 15w

    @bal_ram_pandey @lafze_aatish @succhiii @my_sky_is_falling

    कुछ अशआर दिल के... हक़ीक़त के... कुछ बे-बुनियाद भी

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    ग़ज़ल

    मत दो दुआ.... बद'दुआओं से तिरे....अब काम चल जाएगा
    आमदनी कम है.... सोच लेना मत... कैसे काम चल जाएगा

    सुर्ख़ दीवारें... बे-रंग होकर रही... रंगीन होगी भी कैसे दोस्त
    सोहबत-ए-यार....... रहो न रहो...... तिरा नाम चल जाएगा

    मुफ़लिस कह... ठुकराएगा जमाना.. अच्छा न दिखेगा दोस्त
    दौर-ए-वक़्त की... नज़ाकत में.. क्या ऐ बदनाम चल जाएगा

    ऊँगलीयाँ उठेगी.... मुक़र्रर-ए-जुर्म... दिया जाएगा देखते ही
    शरीक ग़र होगे... तुम अग़र... तो दिया इल्ज़ाम चल जाएगा

    चाहत से ज़दा राहत.... सुकूँ दे जाएगी... मग़्मूम क्यों रहूँ मैं
    बुरा होगा क्या... इस्से ज़दा... होगा जो अंजाम चल जाएगा

    हम-नफ़स... गिला-ओ-शिकवों से मेरे... परेशाँ तो नहीं तुम
    यक़ और लेंगे... कहते हो तो.. ऐ आख़री जाम चल जाएगा

    व्ज़ूद काश होता कोई.. जिस्से रूबरू.. दास्ताँ बताता मैं भी
    हयात-ए-'विशू'..... ग़र न है कोई... तो आवाम चल जाएगा

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 15w

    तय मत कर मिरा ठिकाना कहाँ से कहाँ तक रहा
    अज़ाब फ़रमाऊँ कैसे के, मैं वहाँ से वहाँ तक रहा

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 15w

    ग़ज़ल

    निग़ह की नमी में फैली इशरत देखी
    चमक, झलक में मैंने मुहब्बत देखी

    ऐ पल आम न था कुछ और पलों से
    इसी इक़ पल की यहाँ ज़रूरत देखी

    जभी के वो मौत से दुहाई माँगता था
    जिने की आज उसमें याँ हसरत देखी

    बदनाम करते वहीं जिनको नसीब न
    मुहब्बत की जगह वहाँ नफ़रत देखी

    वहीं मौसक़ी में है दौर-ए-उल्फ़त के
    निग़ह से आज दिल ने ऐ हैरत देखी

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 16w

    @bal_ram_pandey @lafze_aatish @succhiii @my_sky_is_falling

    यक़ और सादी ग़ज़ल....

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    ग़ज़ल

    ख़त्म हो जाता रह-ए-सफ़र, श'हर ग़र वो मिल जाता
    ख़त्म करता ज़िंदगी हँसी से, ज़हर ग़र वो मिल जाता

    आदतों से दूर रहता, भूलता मयक़दे का आना-जाना
    शराब से मिलती नश्शा जो, असर ग़र वो मिल जाता

    तिश्नगी से तरसता न कभी, न ऊँ! निकल कर आती
    तिश्नगी थी जिसकी, ढूँढ़ कर नहर ग़र वो मिल जाता

    यूँ मंज़र-ए-आम तन्हाई, बसेरा न करती दिल पर याँ
    जाँ-निसार करते हम भी याँ, सफ़र ग़र वो मिल जाता

    आब-ए-चश्म से अब्र की, न बनती मौसम-ए-बारिश
    हिज्र-ए-ग़म महबूब बन, रह-गुज़र ग़र वो मिल जाता

    ख़्वाहिशें सादी थी, दिल-ए-नादाँ समझता कौन फ़िर
    समझाते तसव्वुर दिखा कर, कहर ग़र वो मिल जाता

    ठोकरों से वा-बस्ता है, फ़लसफ़ा-ए-हयात कहो मेरी
    'विशू' मंजिल को तुम्हारे, चाहा घर ग़र वो मिल जाता

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 16w

    यक़ साधी ग़ज़ल...
    @bal_ram_pandey @lafze_aatish @succhiii

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    ग़ज़ल

    बस तुम हो सोहबत तो कमी बताऊँगा कैसे मैं
    जानती सब कुछ तो मग़्मूम दिखाऊँगा कैसे मैं

    सब रम्ज़-ओ-राज़ समेटे रहती हो इर्दगिर्द मिरे
    तुम ही हो दिल तो तुम्से बात छुपाऊँगा कैसे मैं

    हाल-ए-दिल भी तुम्से बयाँ, हरेक दर्द भी हुआ
    इशरतों की बरसात से दूर फ़िर जाऊँगा कैसे मैं

    तुम्से शिकवा-ओ-शिकायते, मन्नते, उल्फ़ते है
    लक़िरें, किस्मतें रही तो भला मिटाऊँगा कैसे मैं

    तुम दवा, दुआ, आस्माँ-जमीं, क्या बताऊँ और
    इबादत, हसरत हो तो, बता! ऐ पाऊँगा कैसे मैं

    तुम आस हो, आशा हो, हर सम्त पर ज़िंदगी के
    दौलत-ओ-शोहरत तुम, इसे लुटाऊँगा कैसे मैं

    तुम मौसक़ी, तुम आशिक़ी, तुम ज़िंदगी हो तो
    दास्ताँ-ए-'विशू' की फ़िर, याँ सुनाऊँगा कैसे मैं

    ©drunken_heart

  • drunken_heart 16w

    ग़ज़ल

    भूल तुम गए थे पर निग़ह में मिरे आब मय्यसर रहा
    छू नहीं सका जिसको, हाँ! वहीं ख़्वाब मय्यसर रहा

    मकाँ कि कनारे भी सुनसान, ख़ुदी में मशगुल रहती
    गुल-दाँ मुरझाया.. ऐ शमअ्!' संग बाब मय्यसर रहा

    शब-ए-गुल बन मुहब्बत लुटाते रहे नूर-ए-हू पर हम
    अभी मौसम-ए-हिज्र आया तो आज़ाब मय्यसर रहा

    धुँधली निग़ह से निकले कूचे-दर-कूचे से हम यूँ ही
    तलाश-ए-यार में तन्हा, कहाँ अहबाब मय्यसर रहा

    चराग़ो का जलना, शबनम का बिख़रना ग़मी होके
    दर्द-ए-दिल में हरेक लम्हें का, तेज़ाब मय्यसर रहा

    भुल जाऊँ भी किस तरहा, हम-नफ़स, दिलबर याँ
    बाग़-ए-उल्फ़त से मिला, ताज़ा गुलाब मय्यसर रहा

    जिसके लिए चला रह-ए-सफ़र पे, दिल-ओ-जाँ से
    'विशू' उसके इन्कार का, पास जवाब मय्यसर रहा

    ©drunken_heart