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  • dil_k_ahsaas 12h

    " Differentiation "

    Women's are a slave of kitchen where as when men cook something it's called an
    " ART "
    When women cooks whole day then it's called it's her job
    Whatever women do ...it's called it's her
    " DUTY " but at the same time if same work is done by men it's called " WOW ".

    Rekha Khanna
    ©dil_k_ahsaas

  • dil_k_ahsaas 1d

    " जगाया ना करो "

    यूँ कब्र मेरी ठकठका कर हर वक्त मुझे जगाया ना करो
    घने अँधेरों का आदि हो चला हूँ अब अपना रौशन चेहरा दिखाया ना करो।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas

  • dil_k_ahsaas 1d

    " जिद्द "

    एक जिद्द थी खुद को बाँधकर समेट लेने की
    ना सिमट सके, ना खुद को बाँध सके बस बिखरते ही गए।

    एक जिद्द थी तेरे रू-ब-रू ना आने की कभी
    ना जुदा रह सके, ना भूला सके बस आँखो को दगा देते ही गए।

    एक जिद्द थी कि भूला कर सब कुछ जिंदगी संवार लेंगे
    ना संवर सके, ना जी सके बस बेजान दिल लिए जीते ही गए।

    एक जिद्द थी तेरे शहर ना आएँगे फिर कभी
    ना शहर छोड़ जा सके, ना आ सके बस यादों को समेट ज़हन में रखते ही गए।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas

  • dil_k_ahsaas 2d

    " बिखरती ही चली गई "

    सुकून को बाँध कर रखने का हुनर ही नहीं था मेरे पास
    एक बार जो बिखरी तो बस फिर बिखरती ही चली गई।

    चाहतों को बेवजह ही दिल में पाल कर बड़ा करती रही
    चाहतों ने वजूद को घायल किया फिर बिखरती ही चली गई।

    था ऐतबार तेरी मोहब्बत पर कि दगा ना देगी किसी घड़ी
    चोट तूने ही दिल पर जब लगाई तो बिखरती ही चली गई।

    मोहब्बत रूहानी होती है अक्सर यही सुना इस जमाने में
    जब जिस्म से मोहब्बत जताई फिर बिखरती ही चली गई।

    दिल आशना था तुझ पर कि इक सुलौना घरौंदा बनाने लगा
    घरौंदा जब बेहिस, बेरूखी से भरा फिर बिखरती ही चली गई।

    तमाम पत्थरों को समेट रख लिया जो तूने मारे तानों के
    जब दब गई उन पत्थरों के नीचे फिर बिखरती ही चली गई।

    सुकून की बात ना ही करो तो ही अच्छा कि सुकून गुम गया
    थी पानी के बलबुले सी नाज़ुक कि टूटी और बिखरती ही चली गई।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas

  • dil_k_ahsaas 3d

    " विरासत "

    मांँ के हाथ के खाने का स्वाद बेटी के हाथों में आ गया
    बाप की बदसलूकी और बदमिजाजी बेटा विरासत में पा गया।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas

  • dil_k_ahsaas 4d

    तन्हा रातों की क्यूंँ सुबह नहीं होती ?
    परछाई दिखती है पर साथ नहीं चलती।
    जो हाथ थामा वो कभी साथ ना चला
    चली तो सिर्फ दिन-रात की तन्हाई
    फिर कभी रौशन हसँती हुई सुबह ना हुई।

    यादों का काफिला दूर तलक चला
    राह थी मुश्किल पर आँसू ना निकला
    सख्त हुआ दिल पत्थर की तरह
    ना टूटा दिखा ना ही जुड़ा रह सका
    बस दरारों को समेटे खुद में चलता ही गया।

    भाग्य कहता रहा मुझे पढ़ना सीख
    मैं अनपढ़ था और ताउम्र अनपढ़ ही रहा
    किस्मत की लकीरें देखी बारम्बार
    लकीरों की कहानी कभी समझ ना सका
    सोचा हरबार यही गर हाथ ही नहीं किसी के
    तो क्या उसकी किस्मत नहीं उसके साथ।

    पाँव के छाले पूछते रहे मुझ से हर बार
    क्यूंँ दिल के छालों की तरह मुझे रहे हो पाल
    और कितना सफ़र करना लिखा है
    क्यूँ किसी एक मंजिल का सुख नहीं तेरे पास
    पाँव के छाले अब मुझे से नहीं
    दिल के छालों अपना हाल लेते हैं बाँट।

    सुनसान राहों का अकेलापन बाँटने
    अक्सर खींचा हुआ चल पड़ता हूँ मैं
    ऐसे जैसे राहों को भी बस मेरा ही है इंतज़ार
    धूल उड़ाती स्वागत करती लिपटती मुझसे
    ऐसे जैसे शुक्रिया अदा कर रही हो
    सच्चा फिक्रमंद बन गले लगकर हरबार।

    तन्हा सफर की सच्ची साथी बन
    तन्हाई चल पड़ती है अक्सर मेरे साथ
    मैं तन्हाई की तन्हाई बाँटता
    और तन्हाई मुझे दिन-रात संभलाती
    मेरे जाने से कौन रोएगा यही सोचा हरबार
    शायद तन्हाई अकेली रोएगी सोच कर कि
    मेरा साथी क्यूँ मुझे छोड़ चला गया।

    तन्हा रातों की क्यूंँ सुबह नहीं होती ?
    परछाई दिखती है पर साथ नहीं चलती।
    जो हाथ थामा वो कभी साथ ना चला
    चली तो सिर्फ दिन-रात की तन्हाई
    फिर कभी रौशन हसँती हुई सुबह ना हुई।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas

  • dil_k_ahsaas 5d

    " जनाजा "

    मेरे दिल में अरमानों का जनाजा जाने कब से सजा है
    कोई तो ऐसी जगह बताओ जहांँ इसे दफनाया जाए।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas

  • dil_k_ahsaas 5d

    कतरा कतरा मोहब्बत को नशीला मय समझ पीते रहे
    कतरा कतरा दर्द-ए-इश्क के आगोश में सिमटते रहे।

    तेरी जानिब कितने ही दिल तोड कर तुझ पर मरते रहे
    मोहब्बत-ए-मर्ज ऐसा लगा कि तिरी याद में तड़पते रहे।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas

  • dil_k_ahsaas 5d

    ज़िंदगी तो दगा दे जाएगी एक दिन
    सच्चे इश्क का सेहरा मौत के हिस्से आएगा।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas

  • dil_k_ahsaas 1w

    @amateur_skm
    सौरभ जी की रचना से प्रेरित होकर मैंने माँ के लिए ये रचना लिखने की कोशिश की है।
    वैसे तो माँ कोई विषय नहीं है जिस पर लिखा जाए। माँ सिर्फ माँ है।

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    " माँ और शृंगार "


    माँ दो वक्त ही शृंगार करती है। एक बार जब वो दुल्हन बनती है तब अपने मनमुताबिक शृंगार करती है और दूसरी बार तब जब वो अर्थी पर चढ़ती है पर तब उसके मनमुताबिक शृंगार नहीं होता है, तब अर्थी के मुताबिक शृंगार किया जाता है उसका।

    बीच के बाकी दिनों में वो सिर्फ घर और परिवार के कामों में उलझी रहती है। शृंगार और खुद को सजाने-संवारने को दरकिनार कर के सिर्फ परिवार की चिंता में घुलती रहती है।
    कभी खाने की चिंता, कभी कपड़ों के धुलने की और सूखने की चिंता, गर्मी में सर्दियों की तैयारी की चिंता तो सर्दियों में गर्मी की चिंता।

    अगर गौर से देखा जाए तो गृह-प्रवेश के साथ ही जिम्मेदारियों का शृंगार कर लेती है। चाह कर भी इस से उसे मुक्ति नहीं मिलती है। बस अपनी अंतिम घड़ी तक परिवार की चिंता में घुलती ही रहती है।

    माँ वो प्राणी होता है घर का जिसे अक्सर नज़रंदाज़ कर दिया जाता है। कितने सास-ससुर, पति यां बच्चे होंगे जो माँ को कहते होंगे की अपना भी ख्याल रखो। अपनी भी इच्छाओं को पूरा करो, कब तक खुद को भूल कर हमारे पीछे दौड़ती रहोगी। घर के हर सदस्य का ख्याल रखती हो पर अपना ख्याल रखना क्यूँ भूल जाती हो? क्या सच में हम माँ को कभी ऐसा कह पाएंँ है? शायद कभी भी नहीं।

    माँ, पत्नी सब काम करती है चुपचाप बिना किसी सवाल के, क्योंकि उसे पता है कि ये उसकी जिम्मेदारी है पर अक्सर इस काम का श्रेय भी हम उसे नहीं देते हैं। वो तो बस बदले में सारी उम्र यही सुनती है कि घर में ही तो रहती हो सारा दिन, इसके अलावा करती ही क्या हो? पर हम ये ताना मारते हुए भूल जाते हैं कि पका हुआ खाना, धुले हुए बर्तन, साफ घर, साफ और प्रेस किए हुए कपड़े, हमारी जरूरत की हर चीज़ का ध्यान वो घर में रह कर ही करती है।

    हम जैसे मतलबी लोग अपने सुख सुविधाओं के लिए, माँ की तमन्नाओं को देख ही नहीं पाते हैं। कभी उसे कह ही नहीं पाते हैं कि आज आराम करो और अपने मनमुताबिक शृंगार कर के घूमने जाओ, कुछ वक्त खुद को भी दो, कुछ वक्त के लिए खुद को एक बार फिर जिंदा कर लो।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas