dharmi09

अधूरा मत पढ़ना मुझे

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  • dharmi09 152w

    जब भी ख़त लिखूंगा याद वो मंजर आयेगा !!
    इतना प्यासा हूँ मेरे ख्वाबों मे समंदर आयेगा !

    खुदकुशी मे होंठों से लगाकर पी लूंगा जो ज़हर ,
    जिगर से होता हुआ रग रग के अन्दर आयेगा !!

    पहले मिरी इक आहट पे भी मिलने आता था वो,
    अब मैं दूँ आवाज भी तो वो ठहर कर आयेगा !!

    मैं उसके हुस्न की तपिश मे निखर कर आया हूँ,
    देखना वो भी मिरे इश्क़ मे संवर कर आयेगा !!

    पहले उसकी आँखों मे डूबने की हसरत थी मुझे
    लेकिन मजा तो उसके हिज्र मे जलकर आयेगा !!

    यहाँ तिरगी मैं बैठा हूं उसके ख्याल-ए-तन्हाई मे,
    पर क्या वो चाँद की मानिंद निकल कर आयेगा !!

    उसकी गली से मैं रोज़ सौ मर्तबा गुज़रता हूँ,
    किसी दिन वो भी मेरे घर तक चलकर आयेगा !!

    डर मत अश्कों की कहानी मे न होगा जिक्र तेरा,
    हर अश्क मेरी आँख से बाहर छनकर आयेगा !!

    आम की शाख़ पर फल लगने की देर है "धर्मी"
    देखना हर सिम्त से कोई न कोई पत्थर आयेगा !!
    ©dharmi09

  • dharmi09 156w

    प्रकृति मे रहकर मात्र जनहित का लक्ष्य होना,
    हे मानव इतना भी सरल कहाँ है यहाँ वृक्ष होना !!
    मौन खड़े रहकर अपने पर्ण-पल्लवो का त्याग,
    फिर भी सब कुछ सहकर पूर्णतः तटस्थ होना !!

    हे मानव इतना भी सरल कहाँ है यहाँ वृक्ष होना !!

    अपने फलों पर पत्थरों का आघात सहते हुऐ भी,
    सबके लिये एक समान उपयोगी एवम सुयोग्य होना !!
    कुल्हाड़ी से शाखायें तने से अलग भी हो जायें तो,
    किस ने देखा है वन उपवन मे मासूम वृक्षों का रोना!!

    हे मानव इतना भी सरल कहाँ है यहाँ वृक्ष होना !!

    पल दो पल के लिये अपनी श्वास रोक कर देखो !
    वृक्षों के बिना सम्भव कहाँ है जीवन का सत्य होना !!
    वृक्षों के संसार को सहजने मे मावन असमर्थ रहे तो,
    इस धरा पर रहने का अधिकार मानव तुम्हे कभी हो ना !!

    हे मानव इतना भी सरल कहाँ है यहाँ वृक्ष होना !!
    ©dharmi09

  • dharmi09 156w

    जब उससे इश्क़ बरमला हो गया
    गोया इश्क़ न हुआ मसला हो गया !!

    मै कल तक सौदाई लगता था उसे,
    न जाने आज कैसे मै भला हो गया !!

    पहले जो अदब से लेते थे मिरा नाम,
    मै आज उनके लिये ही फलां हो गया !!

    सोचा एक आध बार मिलकर देखूं उसे,
    फिर तो ये रोज का सिलसिला हो गया !!

    हम थककर जब नींद मे सोये पड़े थे ,
    ठीक उसी वक्त हम पर हमला हो गया !!

    जिस बस्ती को जलने से बचाया था मैने,
    मिरी जान का दुश्मन वो मोहल्ला हो गया है !!

    उसकी छुअन का एहसास बराबर वही है,
    बस जहन मे उसका अक्स धुंधला हो गया !!

    मैने उसके नाम से लिखी फिर जो भी ग़ज़ल,
    हर किसी को पसंद उसका मतला हो गया !!
    ©dharmi09

  • dharmi09 156w

    अपनी अपनी ग़ज़ल मे नजीर अपनी अपनी है,
    इस जहाँ मे हर किसी की तकदीर अपनी अपनी है !!

    वो मुझे दिलरूबा लगी और शायद मै उसे बेवफा,
    दोनो के जहन मे इश्क़ की तस्वीर अपनी अपनी है !!

    पहले उसने पर्दा किया फिर मैने बनाई उससे दूरियाँ
    इस बेवफाई की वजह भी आखिर अपनी अपनी है !!

    उसके ख़्वाबों का तर्जुमा मै किस हक से कर देता,
    अपनी आँखों के ख्वाबों की ताबीर अपनी अपनी है !!

    हसरत-ऐ-इश्क के मंका मे एक ही कमरा था दोनो का,
    ग़म-ऐ-इश्क मे सल्तनत और जागीर अपनी अपनी है !!

    दिल बहलाने के लिये मुस्कुराते है जब भी मिलते हैं,
    मगर अब भी दोनो के सीने मे पीर अपनी अपनी है !!
    ©dharmi09

  • dharmi09 156w

    इस इश्क़ ने मिरा जीना मुहाल कर रखा है,
    इस दीवानगी ने मिरा क्या हाल कर रखा है !!

    उसने फाड़ कर उडा दिया हर खत टुकड़ों मे,
    मैने ख़त का पुर्जा-पुर्जा सम्भाल कर रखा है !!

    उसकी बेवफाई से तंग आकर उसे भूला न दूं ,
    मैने जुबां पर जिक्र उसका निकाल कर रखा है !!

    यादों की तड़प अश्कों मे बहा ले जाती ही नही,
    मैने ज़िस्म को ये कौन से सांचे मे ढाल कर रखा है !!

    मै अपने लबों को न जाने कब हरकत मे लाऊं,
    इसी तमन्ना मे उसने मिरी तरफ गाल कर रखा है !!

    गुजरे जमाने का आशिक नही कि जुल्म सह जाऊं
    मैने अपने लहू को ज़िस्म मे उबाल कर रखा है !!

    कासिदों ने बताया है कुछ ऐसा जलवा उसका,
    उसकी गली मे हर कदम देख-भाल कर रखा है !!
    ©dharmi09

  • dharmi09 156w

    माँ मुझे कहानी सुनाती रही रात भर
    परियाँ ख़्वाब मे आती रही रात भर !!

    दिन तितलियों और गुलों के साये मे बीता
    बाहर चाँदनी झिलमिलाती रही रात भर !!

    आम की शाख़ पर झूला झूलता बचपन,
    माँ की लोरियाँ दिल लुभाती रही रात भर !!

    कौन सी मुश्किल का सामना कैसे करना है,
    गोद मे बिठाकर माँ समझाती रही रात भर !!

    माँ की तस्वीर से लिपटकर तब खूब रोया,
    जब माँ की हर बात याद आती रही रात भर !!

    मै चाहता था कि मेरा ख़्वाब और लम्बा हो,
    माँ मेरे ख़्वाब मे यूं ही आती रही रात भर !!
    ©dharmi09

  • dharmi09 157w

    अब नारी सशक्तिकरण के नाम पर
    तुम पुरूषों को नीचा दिखना बंद करो
    पहले आधे अधूरे परिधानों की झिल्लियों से
    देवी तुम अपनी पावन देह दिखाना बंद करो !!

    देवी तुल्य नारी का पुरूष सदा उपासक रहा है
    आदि अनादि काल से यूं ही नारी का पूरक रहा है
    किन्तु आज पुरूष के सिर थोपी जाने वाली,
    तमाम झूठी कमियों का उलहाना बंद करो !!

    पहले आधे अधूरे परिधानों की झिल्लियों से,
    देवी तुम अपनी पावन देह दिखाना बंद करो !!

    जिसने गिरिराज गोवर्धन उठाया वो भी एक पुरूष था
    जो द्रोपदी की चीर बचाने आया वो भी एक पुरूष था
    क्यों भूल गये कंस का वध और कुरूक्षेत्र का गीता ज्ञान
    पुरूषों की कमियों की झूठी बंशी बजाना बंद करो !!

    पहले इन आधे अधूरे परिधानों की झिल्लियों से
    देवी तुम अपनी पावन देह दिखाना बंद करो !!

    जनक नंदिनि का वरण हो या द्रोपदी का हो स्वयंवर,
    धनुष तोडने वाला राम और अर्जुन भी तो पुरूष था !
    जो पाषाणों का सेतू बनाकर क्षीर सागर से पार उतरे,
    उनके नाम सीता की अग्निपरीक्षा का उलहना बंद करो !

    पहले इन आधे अधूरे परिधानों की झिल्लियों से
    देवी तुम अपनी पावन देह दिखाना बंद करो !!

    #mirakeeworld #mirakee #Hindiwriters #hindipoem #Hindi no #writers #social #issue #man #woman

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    अब नारी सशक्तिकरण के नाम पर
    तुम पुरूषों को नीचा दिखना बंद करो
    पहले आधे अधूरे परिधानों की झिल्लियों से
    देवी तुम अपनी पावन देह दिखाना बंद करो !!

    देवी तुल्य नारी का पुरूष सदा उपासक रहा है
    आदि अनादि काल से यूं ही नारी का पूरक रहा है
    किन्तु आज पुरूष के सिर थोपी जाने वाली,
    तमाम झूठी कमियों का उलहाना बंद करो !!

    पहले आधे अधूरे परिधानों की झिल्लियों से,
    देवी तुम अपनी पावन देह दिखाना बंद करो !!

    जिसने गिरिराज गोवर्धन उठाया वो भी एक पुरूष था
    जो द्रोपदी की चीर बचाने आया वो भी एक पुरूष था
    क्यों भूल गये कंस का वध और कुरूक्षेत्र का गीता ज्ञान
    पुरूषों की कमियों की झूठी बंशी बजाना बंद करो !!

    पहले इन आधे अधूरे परिधानों की झिल्लियों से
    देवी तुम अपनी पावन देह दिखाना बंद करो !!

    जनक नंदिनि का वरण हो या द्रोपदी का हो स्वयंवर,
    धनुष तोडने वाला राम और अर्जुन भी तो पुरूष था !
    जो पाषाणों का सेतू बनाकर क्षीर सागर से पार उतरे,
    उनके नाम सीता की अग्निपरीक्षा का उलहना बंद करो !

    पहले इन आधे अधूरे परिधानों की झिल्लियों से
    देवी तुम अपनी पावन देह दिखाना बंद करो !!
    ©dharmi09

  • dharmi09 157w

    बेटे की ज़िन्दगी बन जाये वगर्ना ऐसा करता भी कौन है ?
    माँ बाप के सिवा बेटे की ख़्वाहिशों पे मरता भी कौन है ?

    औरों ने पढ़ा मगर महज माँ ने ही सौ बार चूमा ख़त को ,
    माँ के आलावा ख़त के अहमियत समझता भी कौन है ?

    चाँद तो पूनम के बाद फिर सिमटनेे लगेगा अपने दायरे मे,
    इश्क़ के गम के सिवा दिन ब दिन और बडता भी कौन है ?

    हिज्र तो बस वक्त बेवक्त ले आता है गुजरे लम्हों की याद,
    वस्ल के सिवा नस नस मे इज़्तिराब भरता भी कौन है!?

    सब झूठी वाह वाही करते है मानो ये तमाशे का मंजर हो कोई
    इन पढ़े लिखों के शहर मे धर्मी तेरी ग़ज़ल समझता भी कौन है ?
    ©dharmi09

  • dharmi09 157w

    नारी

    जिसने राम-कृष्ण को पाला ,
    जिसने असुरों का वध कर डाला !!
    जिसका राधा-मीरा सा सुकोमल मन है
    सती-शक्ति सी जो धधकती ज्वाला !!

    जिसके भीतर सृजन-अमृत है,
    जिसके अधरों मे है मधुशाला !!
    जिसके प्रेम मे गंगा-यमुना,
    जिसकी घृणा मे है मृत्यु हाला !!

    सृष्टी का जो सृजन करती है,
    सूर्य रश्मि का भोर उजाला !!
    महादेव की कण्ठ भुजा पर,
    मानो विषधर वासुकि की सर्पमाला !!

    शीतल-धवल सी शोभा इसकी,
    जैसे हिमाच्छादित श्रेष्ठ हिमाला,
    तीनो लोक मे जयघोष है जिसका,
    उस नारी ने संसार सम्भाला !!

    उस नारी ने संसार सम्भाला !!
    ©dharmi09

  • dharmi09 158w

    कल मिरे ख्वाबों मे वो आई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल,
    मैने कोई धुन प्यार की गाई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    उसने प्यार से देखा तो हर्फ़ यूं चूमने लगे मिरी कलम
    वो पलकें झुका कर शरमाई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    राधा ने जब रास रचाया तो शायद बहर मे झूमी होगी,
    फिर कान्हा ने बंसी बजाई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    राम ने दश़्त-ऐ-सहरा घूम कर गाये होगें गीत हिज्र के
    सीता ने प्रीत अनोखी निभाई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    हीर की पीर पर बने है यहाँ न जाने कितने अफसाने,
    रांझे ने ठोकरे दर दर की खाई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल!

    इश्क़ मे लैला का तड़पना याद किया तो मालूम हुआ हमें,
    मजनु ने हिज्र मे जो उम्र बिताई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    आज कई पुराने ख़त हाथ लगे तो जख़्मों से रिसने लगा लहू,
    हाथों मे तिरी तस्वीर पुरानी आई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    #mirakeeworld #mirakee #gazal #Urdu #shayari #writer #Hindiwriters #hindi

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    कल मिरे ख्वाबों मे वो आई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल,
    मैने कोई धुन प्यार की गाई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    उसने प्यार से देखा तो हर्फ़ यूं चूमने लगे मिरी कलम
    वो पलकें झुका कर शरमाई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    राधा ने जब रास रचाया तो शायद बहर मे झूमी होगी,
    फिर कान्हा ने बंसी बजाई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    राम ने दश़्त-ऐ-सहरा घूम कर गाये होगें गीत हिज्र के
    सीता ने प्रीत अनोखी निभाई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    हीर की पीर पर बने है यहाँ न जाने कितने अफसाने,
    रांझे ने ठोकरे दर दर की खाई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल!

    इश्क़ मे लैला का तड़पना याद किया तो मालूम हुआ हमें,
    मजनु ने हिज्र मे जो उम्र बिताई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!

    आज कई पुराने ख़त हाथ लगे तो जख़्मों से रिसने लगा लहू,
    हाथों मे तिरी तस्वीर पुरानी आई तो मुक्कमल हुई है ग़ज़ल !!
    ©dharmi09