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Reposts
  • bhavti 14w

    गुस्सा, झुंझलाहट, तकलीफ टिकती ही नहीं,
    एक मुस्कान उसकी कुछ यूं गजब ढाती है..

    कुछ कहने की तो जरूरत ही नहीं,
    वो माँ है, सब समझ जाती है।

  • bhavti 18w

    आरज़ू ए दीदार के हाथ,
    फकत नजरंदाजी लगी..

    ना जीत मुमकिन, ना हार मुनासिब,
    ये कैसी ईमान की बाज़ी लगी..

    ©bhavti

  • bhavti 18w

    मैं हंस दूं, तो खुशहाल हो जाती है...
    जो रो दूं तो सारे गम भर लाती है,
    मुझसे ही मुझे मिला जाती है,
    मेरी जिंदगी अक्सर मेरी परछाईं बन जाती है..

    ©bhavti

  • bhavti 19w

    Ever chased a bubble?

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    Why do I end up chasing
    these little spheres of vibrance,
    that rise up from nowhere,
    yet beatify the existence..?

    Why do I fall for them,
    despite being warned?
    Why do I stake for them,
    all that I have earned?

    Atlast when I touch,
    they burst up into troubles..
    Ah! When would I learn,
    they're mere transient bubbles!

    ©bhavti

  • bhavti 20w

    इतने ख्वाब सजाए थे जिसके,
    वो खुद ख्वाब सी निकल गई।
    अब क्या ही बताएं हम, कि
    हमारी बारहवीं कैसी गई…

    सुना फिक्र सभी कर रहे हैं,
    कहो शिकायतें किसे सुनाएं?
    कुछ मुफ्त मिल रहा है कहते हो..
    जो छूट गया, वो कहां से लाएं?

    सबसे रोशन होना था जिसे,
    साल वही सबसे अंधेरा था ।
    याद भी नहीं आखिरी बार,
    यारों ने किस बात पर छेड़ा था…

    क्या पता था वो समोसे, वो मोमोज,
    वो साथी फिर नहीं मिलेंगे,
    उस घास पर फुटबॉल नहीं फिसलेगी,
    वहां ऊंचे छक्के फिर नही लगेंगे..

    हमें भी तो बचपन से,
    टीचर्स डे का खुमार था।
    खोया वो दिन भी है हमने, जो
    सबसे अज़ीजों में शुमार था।

    काश हमारा हक,वो ठहाके,
    वो मस्ती हमें लौटाए कोई….
    काश यादों की अलमारी में,
    न फिर मोबाइल सजाए कोई..

    मत कुरेदो ना जख्म हमारे,
    न पूछो फेयरवेल कैसी रही…
    इस से ज्यादा अब क्या बताएं,
    कि हमारी बारहवीं कैसी गई...

    ©bhavti

  • bhavti 20w

    Jis din skirt aur salwar ek dusre ki izzaj karna seekh jayenge na...
    Us din shirt pant se jhagde ki zarurat hi nahi rahegi.

    ©bhavti

  • bhavti 20w

    कलम कहां कोई कवि बनाती है,
    ये तो हवा है जो फुसफुसाती है,
    सागर की स्थिरता धीरज बंधाती है,
    कलकल नदी उमंग भर जती है,

    कहती है कसूर चाहे ,
    अपना हो या अपनों का,
    गिरना, उठना और थामे
    रखना दामन सपनों का..

    ©bhavti

  • bhavti 20w

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  • bhavti 21w

    ��finally

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    Chaliye aakhir ab hm 12th walo ki naiyya bhi kinare lag hi gayi...

  • bhavti 21w

    To express my gratitude, I wish I had
    words more profound...
    For all that starts with you and
    ends nowhere around...
    ©bhavti