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  • bal_ram_pandey 10w

    गोशा- नगीन था उसे याद आता कैसे
    तल्खी़ ए जीस्त में बारहा मुस्कुराता कैसे

    क़ैद है वजूद मेरा यादों के क़फ़स मे
    अब्र ए बहारा में तसव्वर सजाता कैसे

    पलकों तले महफूज़ है तस्वीर ए यार
    आंखों से अपने आंसू भला गिराता कैसे

    ख्वाहिश थी करना दीदार ए यार लेकिन
    अपने चेहरे से ख़ुद कफ़न हटाता कैसे

    चाह कर भी समंदर दरिया से ना मिला
    राह ए वफ़ा में ‌ नया दस्तूर चलाता कैसे



    *गोशा - नगीन....... एकांतवासी
    *अब्र ए बहारा...... बहारों का बादल
    *तल्खी़ ए जीस्त..... जीवन की कड़वाहट

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 17w

    जीवन-चलचित्र

    चलचित्र सा जीवन दिख रहा
    किरदार कितने आए और गए
    स्मृति पटल पर रहा शेष दृश्य
    बंधन तोड़ पखेरू कितने गए

    जलते पतंगे दीप में देहरी पर
    और आईने में कैद है उदासी
    गगन में उड़ता पंछी थका हारा
    उतर रहा आंगन में लेते उबासी

    सूख गया है मन का कुआं
    उम्र के पत्ते पीपल सम झर गए
    विरह पंछी दूर बैठा डाली पर
    बहती पछुआ हवा मन हर गए

    दिन ढलता है पल पल हर दिन
    सृजन का ओढ़कर नित आवरण
    शूल रहते डालियों पर अक्षय
    फूल झरते महकाते वातावरण

    पारस -स्पर्श सी अनगिनत यादें
    हृदय- लोह- कांचन कर जाती हैं
    आगमन तुम्हारा पाहुन सावन सा
    सूखे अधरों को पावन कर जाती हैं

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 17w

    ख़्वाबों के खिलौनों से दिल बहलता नहीं
    उग आया है चांद मगर दिन ढलता नहीं

    अंदाज़ ए तगाफुल समझ रहे हैं हम भी
    लोग समझाते हैं बहुत दिल समझता नहीं

    दिल के तलातुम में सबक याद किए कई
    अब अहद ए गुल में दिल मचलता नहीं

    शहर की रानाइयों में गुम कांच के इंसान
    आईना ए दिल में ईमान ‌ झलकता नहीं

    सांसों की शाखों से से उड़ गई तितलियां
    आलम ए चमन एक सा हरदम रहता नहीं

    *तगाफुल -गफलत ,ध्यान ना देना
    *तलातुम--बेचैनी ,परेशानी, हंगामा
    *अहद ए गुल -वसंत ऋतु
    *रानाइयां-----सुंदरता

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 52w

    ����

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    बेकरार हूं मैं, अपनी ज़मीर के खेत बचाने के लिए
    तुम बेसब्र हो ,अपनी अना के अब्र बरसाने के लिए

    दर्द बन जाती है दवा,अब मुस्कान बनकर चेहरे पर
    आता नहीं हुनर हमें, रूठे हुए को मनाने के लिए

    गांव की फकीरी ,शहर की अमीरी से अच्छी लगी
    वहां नक़ाब नहीं होते गोया, फितरत छुपाने के लिए

    जिक्र होने लगा है खूब अब ,जन्नत में इंसान
    का
    तोड़ा जा रहा है देश, मंदिर मस्ज़िद बनाने के लिए

    नींद ,खुशियां ,सपने, अपने, यार सब छूट जाते हैं
    लगता है वक्त बहुत, इतने ग़म को भुलाने के लिए

    शायद हो यह ग़ज़ल ,मेरी कलम का सफ़र आख़िरी
    राज़ी नहीं दिल अब, किसी को कुछ सुनाने के लिए

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 52w

    हुलसित चेहरा
    झुलसित मन

    बोझिल सपने
    निष्प्राण तन

    पीली पाती
    सूखा वन

    गुंजित सांसे
    ठिठका‌ जीवन

    बुझे दीप
    हंसता ‌‌ तम

    अनचिन्हित मग
    कैसा ‌ श्रम

    वंचित भाग्य
    संचित यौवन

    कंटक पथ
    सुवासित उपवन

    जन्म मरण
    अनूठा बंधन

    हे प्राणसखे
    तव शरणम्

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 53w

    ज़हर दिल में लबों पर दुआ कैसे
    ज़ुबां में कांटे हाथों में दवा कैसे

    न तुम किराएदार न वफादार मेरे
    मकां ए दिल में रहते हो भला कैसे

    मुझसे न कर इतना प्यार ए जिंदगी
    निभा पाऊंगा तुझसे मैं वफ़ा कैसे

    फुरकत के लम्हे और मुस्कुराना तेरा
    दे रहे हो मुझको यह सजा कैसे

    मेरे चेहरे में कोई और नज़र आया
    आईना हो कर दे रहे हो दगा कैसे

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 53w

    मां के आंचल तले मेरा सर रहे
    अनजान बलाओं से दिल बेखबर रहे

    हर तरफ़ है अंधेरा गिले-शिकवों का
    एक चिराग़ हर- पल मेरे घर रहे

    तू आसमां है भला ‌भूलूं यह कैसे
    हर हरकत पर मेरी तेरी नज़र रहे

    मां है नगीना ‌ आंखों का नूर मेरे
    दुआओं से आबाद तेरे घर दफ़्तर रहे

    हर ख्वाबों की तासीर ही तुझसे है
    बावस्ता तुझसे सांसो का सफ़र रहे

    आरती अज़ान हो जाती कबूल मेरी
    मौजूद सामने तेरा वजूद अगर रहे

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 55w

    रिश्तों के दीवारों में दरार है
    फकत पैसे से लोगों को प्यार है

    सच की हाथों में फूलों के गुच्छे
    झूठ के हाथों में तलवार है

    गांव के लोगों की उम्र लंबी
    शहर में हर शख़्स बीमार है

    क्यों करें खुशामद बूतों की
    ख़ुदा मेरा बड़ा खता गफ्फार है

    रिक्शे वाले से पूछा हाले दिल
    कहा उसने मेरा चेहरा अखबार है

    तबीयत देश की क्यों नाशाद है
    यूं तो बदलती रही सरकार है

    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 55w

    जीवन एक संघर्ष है ����

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    जीवन के तप में फल ,
    कब निष्फल होता है ,
    कष्ट देखकर मानव ,
    किंचित क्यों रोता है ...........।।

    चीर संघर्ष से माटी ,
    है बन जाती सोना ,
    स्वेद सिंचित खेतों में ,
    लहललाये फसल सलोना,
    कर्म के पंख दिए दाता ने ,
    क्यों उम्मीदें खोता है ,
    कष्ट देखकर मानव ,
    किंचित क्यों रोता है..............।।

    जीवन है स्वप्न सरोवर ,
    इसमें क्या रोना - धोना ,
    शेष है जीवन ,अवरुद्ध परंतु
    गांठ लगा मन में क्या सोना ,
    बंजर उम्मीदों की छाती पर ,
    क्यों आशा के सूरज न ब़ोता है ,
    कष्ट देखकर मानव
    किंचित क्यों रोता है...............।।
    ©bal_ram_pandey

  • bal_ram_pandey 55w

    इतनी भीड़ मैं ए ज़िंदगी,तुझको पहचाने कैसे
    तुझे देख कर भी रहें ख़ामोश, अनजाने कैसे

    "दिल" नहीं सुनता है आज, मेरे दिल की बात
    अश्क से अनजान आंखें, आ गए जमाने कैसे

    साकी , शराब , और मैखाने का वजूद कैसा
    प्यासे लबों तक न पहुंचे , अब पैमाने कैसे

    लगता है बिगाड़ दी आदत हवाओं ने चराग की
    वगरना चला है आज यह घर जलाने कैसे

    सवाब की खातिर इमदाद है ज़रूरी जनाब
    कजा आएगी तो , ले जाओगे ख़ज़ाने कैसे
    ©bal_ram_pandey