baat_kalam_ki

२३m Vishal pandhare

Grid View
List View
Reposts
  • baat_kalam_ki 84w

    ✍️

    पिरो देते है हर नाम को, कितने काबिल है,
    देखूं तो लगे उनको, जैसे सब ही हासिल है,

    साझा क्या करें वरक पर, हर्फ और स्याही से,
    बात कलम की देखे तो खुद का ही दिल है,

    शोर भी है, चोर भी है, है बड़ा दिलदार वो,
    चले तो लगे, वो ही आखरी मेरी मंजिल है,

    बिना देखे सूरज डूबा नहीं, ना चांद उभर आया,
    टिमटिमाती चांदनी में, एक वो ही साहिल है,

    मेरे लफ्ज़ से रुसवा, मुसलसल वो होती रही,
    मेरे अल्फ़ाज़ आज लगे मुझे फाजिल है,

    ©baat_kalam_ki

  • baat_kalam_ki 141w

    ✍️

    बात क़लम की गिरवी रही, इक वादा निभाने के लिए,
    ताल्लुक़ नहीं था जिसका, वहीं सजा ए जुर्म काटने के लिए!

    ©baat_kalam_ki

  • baat_kalam_ki 141w

    ✍️

    काश खुद के साथ रहता तो आज महफूज़ रह जाता,
    पर करें भी क्या करें, यहां बिखरना मुकद्दर में लिखा है!

    ©baat_kalam_ki

  • baat_kalam_ki 141w

    ✍️

    सामने आकर नफ़रत वो बेइंतहा कर ले,
    इसी बहाने से नज़र दीदार उसका कर ले,

    ©baat_kalam_ki

  • baat_kalam_ki 141w

    ✍️

    चाहत क्या मर रही है पता नहीं चल रहा है,
    हम तुम में दरमियान दूरियां क्यों बढ़ रही है?

    ©baat_kalam_ki

  • baat_kalam_ki 141w

    ✍️

    बेशक कोई नहीं जानता वो कहां से आया है,
    क्या उसने खोकर क्या उसने वहां से पाया है,

    लूटा खुद को प्यादों पे अपने शान आे शौकत से
    आज फ़कीर राजा, जो तनहाई वहां से लाया है!

    ©baat_kalam_ki

  • baat_kalam_ki 141w

    ✍️

    लिखूं भी मैं कितना तुझे मेरी बातों में
    कमी सी रह जाती है मेरे जज्बातों में

    देख कर गुजरता था वक़्त कभी मेरा
    आज सिर्फ आ जाता है मेरी यादों में

    ©baat_kalam_ki

  • baat_kalam_ki 141w

    ✍️

    हुआ क्या है उसे जो आज मुझसे खामोश रही है,
    गलती कि हर सजा कबूल, जो जाने अनजाने में हुई है!

    ©baat_kalam_ki

  • baat_kalam_ki 141w

    ✍️

    कशिश जाग उठी है दिल में मेरे, तेरी याद आ रही है,
    पुराने यादों में हुई सामने फिर से, वो बात आ रही है,

    ध्यान कहीं खो गया है, काम में मन लगता नहीं आज,
    करने दिल को धड़कन से, मन में शरारत आ रही है,

    काट लेता हूं गुजरता हुआ हरेक पल बड़ी मुश्किल से,
    घड़ी रुख़ बदलकर जैसे रूबरू मुलाक़ात आ रही है,

    बेचैन हूं इस पल में, साझा करता हूं हाल ए दिल को,
    भूली बिसरी यादें कुछ दिल से फिर याद आ रही है,

    दूर क्यों हूं इस पल मैं तुम से पता नहीं मुझे आज भी,
    काश! नजदीकियां और करीब ये सौगात ला रही है,

    फिर रूबरू हो जाए बात, यूं ही उस वक़्त जैसे,
    दिल में है कशिश यही, यहीं वो बात आ रही है

    ©baat_kalam_ki

  • baat_kalam_ki 141w

    ✍️

    ना चल साथ मेरे तू यूं तनहा राहों में
    क्या हासिल होगा मेरी इन बाहों में

    खुदगर्ज हूं इश्क़ में, न भरोसे के काबिल
    क्यों फिर जागता रहता है, तेरी यादों में

    बस अब लौट जा तू मुसाफ़िर रह गुज़र में
    सफ़र ए ज़िन्दगी ख़त्म अब इन राहों में,

    छोड़ दे मुझे हालातों में, जो खत्म ना होंगे,
    क्यों मुड़कर आते हो, लने अपने पनाहों में,

    मान लिया सबने अब तुम भी मान जाओना,
    मतलबी रहा हूं, निभाए किए हर वादों में!

    ©baat_kalam_ki