ayushsinghania

trust your script....! Smile and spread :)

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Reposts
  • ayushsinghania 1w

    मैं कम्बल ओढ़े धुंध की शिकायतें करता रहा,
    सड़क किनारे वो नन्ही जान अपनो से लिपट मुस्कुराता सो गया;
    यक़ीन है मुझें,
    ठंड और बदन दोंनो के एक जैसे हैं,
    बस फ़र्क शायद,
    सहुलतो से मिले बहानो का है.....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 1w

    किसी यक़ीन का ऐतबार लगता हैं,
    उसे ख़ुदसे फिऱ से इश्क़ हो रहा है :)
    ©ayushsinghania

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    बहोत हक़ से उसने थामा इन हाथों को मेरे,
    लफ्ज़ बयाँ कर पाए वो एहसास कभी, ऐसा मुमकिन नही लगता....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 5w

    अजीब है,
    इक तरफ़,
    चारदीवारी के अंदर कोई अपनी पीठ पर गढ़े नाखूनों के निशान छुपाना में लगा है;
    कैसे वो कहेगी भी क्या,
    आखिर समाज जिस विवाह को संस्थान का दर्जा देता है,
    वही वो इस बात से मुँह भी मोड़ लेता की,
    "विवाह पश्चात ये सब आम है , क्योंकि वह पुरुष हैं",
    शायद इसीलिए भी वो,
    हर रोज़ साड़ी का पल्लू पीछे करते वक़्त वो चंद सेकंड पीठ पर उन उकेरी गई चीखों को सुन , दो आँसू गिरा ,
    कमरे से बाहर मुस्कुरा कर निकलती है...."

    और कही दूर , या शायद उसी मोहल्ले/इलाके/शहर में,
    दफ्तर को जाता पुरुष मन ही मन सोचता है,
    की क्या विवाह महज़ एक लेन देन है;
    चीजों का, सामानों का , पैसों का;
    क्या पुरुष होने का मतलब अपनी भावनाओं को पी लेना है,
    क्या रिश्ता सिर्फ़ एक पहिये की जिम्मेदारी है,
    क्या शादी या प्यार सिर्फ़ लोगो के सामने दिखावा है,
    क्या ये सिर्फ़ जलसे में तस्वीरों में झूठा मुस्कुराना भर हैं ?
    क्या इस संस्थान का मतलब,
    संवेदना और एक दूसरे को संभालना नही?
    क्या ये रुपयो, जरूरतों और दिखावे पर ख़त्म हो जाता है....?

    *************************************************
    अजीब हैं ना,
    एक ही जात(इंसानियत),
    एक ही शहर,
    पर अलग सोच ?
    ऐसे कितने ही पुरुष और स्त्रियां हर तरफ है,
    पहले भी थी/थे,
    आज भी है और शायद आगे भी रहेंगे/रहेंगी;
    दिक्कत ये है कि हम चश्मा और नज़रिया नही बदलना चाहते,
    या तो सिर्फ़ हुम् पुरुष या सिर्फ़ स्त्री को कटघरे में खड़ा कर देते है।
    जबकि,
    जरूरत ये समझने की है कि उस कटघरे में प्रश्न चिन्ह इंसानी जात पर है , न कि किसी रंग/जात/धर्म/लिंग/ पर

    प्रश्न इंसानियत का है , इंसानियत से.....
    ©ayushsinghania

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    इंसानी चश्मा
    © ayushsinghania

  • ayushsinghania 7w

    मेरे मन का उलझा गीठठा,
    रोज़ उलझता , रोज़ सुलझता;
    सोचो कितना ज़ोर का बांधा,
    तेज उलझता , धीमे खुलता;
    जैसे,
    खुला संमदर और अपनी कश्ती,
    दूर क्षितिज तलक सिर्फ़ अपनी बस्ती;
    थोड़ा थोड़ा रोज़ उलझते,
    थोड़ा थोड़ा रोज़ सुलझते....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 9w

    #random :)
    Hoping the mirakee family and friends which we all have earned here all are doing great.
    Smiles :) ��

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    किसी इश्तेहार में,
    या कभी अशार में,
    विरले, किसी चित्र में,
    कुछ सुराग छोड़ आता है वो;
    धीमी रिसती स्याही
    को अपना यार बना आता है वो;
    मेज के बैठ सामने,
    चश्मों से टकरातीं रौशनी के सामने,
    लफ़्ज़ों को लिहाज़ से सजाते जाता हैं वो,
    बारिश की आवाज़ को अल्फ़ाज़ बनाते जाता है वो;
    रंगों , लफ़्ज़ों को पिरो पिरो कर,
    आवाज़ के बिना भी वो,
    बहोत शोर करा आता है....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 10w

    कितना हसीं हो जाता है ना,
    बारिश के आँखों को मलने के बाद,
    हर नज़ारा,
    जैसे जमी धूल की परत पर,
    नमी को बरसाया गया हो,
    बरसात के होंठो से आंखों को चूमा गया हो,
    नज़रो को नई सोच मिली हो,
    जैसे रेगिस्तान में कोई उम्मीद मिली हो,
    दरिया में डूबे को दरख़्त का सहारा जैसे,
    हरे पत्तों के जिस्म पे ठहरा सफेद नज़ारा जैसे,
    मल्हार , मिट्टी की सुगंध और बदन को सिहराती वो हवा,
    एक मन में कितनी कहानियां दोहराती हो जैसे,
    प्रेम , बचपन , यारी सबकुछ,
    बारिश के अलग अलग से लम्हें हो जैसे....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 10w

    किसी रोज़,
    जब वक़्त माफ़िक हुआ,
    तो शायद पिघली कैफ़ियत से बाहर आ,
    थोड़ी समझ और सीख लेकर,
    इन आँखों का टकराना हो शायद ;
    नही, लफ्ज़ उस रोज भी नही होंगे,
    कोई दुआ सलाम नही,
    न लबो पर कोई लकीर,
    मुसकुराहट या अफ़सोस की,
    बस कुछ देर की गुफ्तगू शायद,
    आंखों के बीच,
    भीड़ से भरे जिस्मों के दरमियाँ;
    कुछ सवाल तुमसे होंगे, कुछ मुझसे,
    जवाब की इक झलक को,
    बिना लफ़्ज़ों के,
    आंखों के आंखों तक,
    फ़िर क़दम बढ़ चलेंगे,
    चौराहें के दूसरे छोरों को,
    इस इत्मीनान के साथ,
    कि शायद उम्र कम रही हो उस कहानी की,
    पर निभाई ईमानदारी से गयी ;
    किसी रोज़, (शायद)
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 11w

    है जानता कहाँ कोई, कहाँ गिरा रुधिर कभी,
    न ज़ख्म और निशां कहीं, कैसे कहे हुई क्षति;
    न धार का इक वार है, न चोट जो दिखे कही,
    बस स्वप्न सी प्रतीत हो, वैसी कथा लगे कोई;
    पर चोट तो फ़िर चोट है, फ़िर चर्म हो या मन कोई,
    पर जो जिया वो जानता, इक थी व्यथा बड़ी पीर सी;
    कहो कहानियाँ गर तो क्या फ़र्क है,
    जो जानता संघर्ष को, अनुमान सिर्फ़ उसे क्षति की;
    न पूछो कहाँ रुधिर गिरा, न पता किसी धार की,
    कुरुक्षेत्र में है जो खड़ा, वो जानता क्या संघर्ष है....!
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 22w

    मालूम पड़ता है, मोहब्बत शायद उसको कहते हो,
    जैसे बारिश धरती को बोसा करता हो;
    ©ayushsinghania

  • ayushsinghania 24w

    रिश्ते में ईमानदारी जरूरी है;
    अगर ऐसा है तो यक़ीनन हर रिश्ता ख़ूबसूरत हो सकता
    #random

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    एक किस्सा,
    दो किरदार,
    चांदी में घुला अंधेरा,
    मूसलाधार बरसात;
    उलझी उंगलियां,
    उलझे हाथ,
    मुस्काता चेहरा,
    बेशकिमती प्यार;
    बूँदों से सजे होंठ,
    गले पर पड़ती नर्म साँस;
    वक़्त का रुकना यूँ तो मुमकिन नही लगता,
    पर शायद प्यार में वो ताकत है;
    ©ayushsinghania