aparna_shambhawi

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सनेहु जानत रावरो ��

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  • aparna_shambhawi 29w

    उन्मत्त हृदय के क्रंदन से निकली प्रेम-ध्वनि
    ढूँढती है तुम्हारी श्रोत्र तक का रास्ता
    जैसे ढूँढती हो अरुण लालिमा
    गंगा का नीरव आँचल खेलने को!

    शिशिर रजनी की अंक में खेलता शिशु
    छिप आता है पेड़ों, टहनियों, डालियों के पीछे
    जैसे यादों की झुरमुट में खेलती तुम्हारी
    हँसती शैशव भंगिमा
    का चित्र!

    फाग की राग में चीर तक जागता मन
    अनायस ही खोल देता दरवाज़े अस्पष्ट स्वप्नों के
    जैसे फूटती हैं पलाश की कलियाँ
    झरे पत्तों के शोक में डूबे वृक्ष की बाँहों में।

    सुना है अनंत पर जा कर अनंत और विशाल हो जाता है
    मैं मानती हूँ अनंत पर जा कर एकाकिकार होते शून्य हो जाता है सब!
    जैसे तुम्हारे आलिंगन की अदृष्ट्य कल्पना में
    अधखुली आँखें बीहड़ को होती हुई, चली जाती हैं नींद की गिरह में।

    मैं अपराधिनी! देती हूँ अर्घ्य तुम गंगा को पंचपात्र से
    कि मेरी अंजुली कलुषित है!
    तुम्हारी चाँदनी से ओतप्रोत खीर पर कोई औचित्य नहीं मेरा, हे शरतचन्द्र!
    आवरण की ओट में मुखराशि छिपाए
    तुम्हें सजल नयनों से देखने की चाहना रखती हूँ बस।
    सफेद वसना को होली खेलना अधिकार्य नहीं,
    स्वप्न के उस पार ही रंग ले आना तुम
    वो जो सफेद और गुलाबी के मध्य कहीं बिखरा-बिखरा सा है तुम्हारी रंगीनी पर, वही!

    ज्यों अब आँखों से बाहर आना तो आना उसी अनंत सा!
    कि पलकें मूँदते ही शून्य के उस पार चली जाऊँ
    और तुम्हारी हृदय-गति बजती रह जाए मेरे कानों में,
    असाध्य स्वर के प्रेम गीत सी!

    ~ अपर्णा

  • aparna_shambhawi 38w

    उत्तरजीविता की होड़ में भागती मैं
    विलीन होती जाती हूँ
    गोधूलि की बयार में।
    मेरी अलक से उलझती टहनी
    झर देतीं रात रानी के फूल
    मेरी झीनी चुनरी में निमेष-पूर्ण आँखों से
    मुस्कुराते हुए,
    मेरी सुवासित चुनरी रात-रानी को समेट
    हो जाती और अधिक सफेद।

    यथार्थ की शोध में समाधिस्थ तुम
    परिणत होते जाते हो
    तिमिराच्छन्न के जल प्रपात में
    जिसकी नीरव प्रवाह से टकराती शशि किरणें
    पहिरा जाती हैं तुम्हें रजत शेखर।
    तुम्हारे कुर्ते की बहोली
    मद्धिम लहरों के टकराव से सरक कर
    कलाई पर आ रुकती है,
    और रोक देती है तुम्हें शोध में आगे बढ़ने से।

    रजनी के भींग जाने से ठीक पहले
    तुम ठहरा देते हो खुद को
    शिलाओं के मध्य उतर कर,
    जिसे देख व्याकुल नभ बुला लेता चँद्र को और करीब
    कि भींगने लगती रजनी और जल्दी!

    बढ़ती आर्द्रता से भारित मेरी चुनरी
    रुक जाती शिलाओं के टेक पर कुछ क्षण विश्राम हेतु
    कि अचानक!
    गिरने लगते रात-रानी के पुष्प
    उन्हीं शिलाओं की गोद में ,
    जैसे तुम्हारे माथे पर थपकी दे
    सार्थक हो जाने को आतुर हो उनका जीवन।

    मैं अमूक, एक टक देखती रहती
    तुम्हारे और पुष्पों की परस्पर क्रीड़ा,
    कि तभी अपनी बाध्यता तोड़ तुम
    घूमने लगते अपनी प्रवाह में पुष्प-माल समेटे
    मेरे इर्द गिर्द।
    सारे दिन की अलसायी मैं,
    मूँद लेती हूँ आँखें तुम्हारी बहती बहोली के सिरहाने,
    उषा की बजती धुँधली सीटी
    जगा जाती मुझे पौ फटने से थोड़ा पहले।


    मैं , नींदाई आँखों से अवाक
    देखती रह जाती हूँ मेरी सफ़ेद चुनरी
    जिसपर रात भर की साधना से
    तुमने गढ़ दिए रानी के उजले पुष्पों को
    रंग-बिरंगी कढ़ाई बना कर!

    हे संगतराश!
    कहो? कल पुनः रुकोगे ,
    मध्य शिलाओं के?


    ~ अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 43w

    अनंत

    हमने बचपन से जाना
    दो समानांतर रेखाएँ
    मिल जाती हैं अनन्त पर जा कर,
    अनंत पर ही रुकती है
    उस वृत्त की त्रिज्या को ढूँढती सुई
    जिसकी परिधि समतल पर आ मिलती हो।

    बिना विलंब हमने भी
    उसी बुद्धिमत्ता से
    बना दिया रेखाओं एवं प्रेमियों को
    परस्पर उपमान-उपमेय,
    हक़ीकत से परे उपरोक्त बताई बातों को सच मानकर।

    अनंत मानव शब्दकोष का सबसे भ्रामक शब्द है।
    इसे गढ़ने वाले ने नहीं बताया था
    कि अनंत पर जा कर भी
    ये रेखाएँ मिलने की प्रतीक्षा करती हैं
    अगले अनंत की!

    विवहोपरांत सिन्दूरी रेखा को ही
    बता दी जाती है वह परिधि
    जिसका केंद्र वास्तव में
    यौतुक में आई वस्त्राभुषणों में निहित होता है।

    हम बिना परखे बातें मान लेने के आदी हैं।
    हमने नहीं की कोशिश अनंत ढूंढने की।

    यदि होती,
    तो अनंत मिलता वृद्ध नदी की तट पर
    जहाँ अपना अस्तित्व त्याग
    मिलती है सरिता सागर के ख़ार से,
    परंतु सागर नहीं मिलता,
    मिलती है उसी नदी की थकी अस्थियाँ
    जो ज्वार सह सह कर धँस चुकी है मिट्टी में।

    ढूंढने पर उस वृत्त के केंद्र को
    मिलती एक पिता की जेब
    जिसकी त्रिज्या पर टिके कुछ स्वप्न समतल ही प्रतीत होते हैं।

    इसीलिए
    तुम आना तो इन विभिन्न भ्रामकों का
    क्षय करते हुए आना,
    कि तुम्हारे आने के बाद
    कुछ भी शेष न बचे मेरी
    काव्य-कुशलता दर्शाने को,
    ताकि बचाए हुए समय में
    मैं ढूँढ सकूँ एक नए अनंत को
    जिसके तट पर बैठी मेरी कविता
    आँखें मूँद, सर टिकाए बैठी हो
    तुम्हारे प्रेम के कंधे पर।

    ~ अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 50w

    रात भर चौखट पर बैठी
    अलख जगाती, अमंगला
    तुम्हारे प्रेम गीत से व्याकुल इस शहर की नदियाँ
    मार्ग बदल लेतीं अपना।
    यहाँ की गलियों में बजती शहनाई,
    नहीं पहुँचती तुम्हारे आँगन ये कह कर
    कि तुम्हारे गीत भ्रामक हैं,
    शोक कभी प्रेम नहीं हो सकता।
    उसे नहीं मालूम कि वास्तव में
    तुम स्वयं ही आँगन हो उस मकान की
    जिसे सभ्यताओं में "अशुभ" कहा जाता है।

    काशी की नगर वधू!
    तुम्हारा वैराग्य तुम्हारे देह पर लगे सिगरेट के राख बताते हैं,
    तुम्हें अपवित्रा कहने वाले तुम्हें नहीं जानते
    पर तुम उन सभी को जानती हो,
    तुम्हें पता है उस मोहल्ले के छोटे साहब को बाटियाँ पसंद है,
    तुम्हें पता है कि अगली गली के तीसरे मकां में बंद रहने वाला शख्स
    आत्महत्या से लौट कर आया है,
    और नीले कुर्ते वाले की जेब खाली है नौकरी से।
    तुम्हारे कंधे जो गहनों के भी बोझ न उठा पाते,
    उनपर इस पूरे शहर के दुःखों को कैसे टाँकोगी तुम?

    यहाँ के मानचित्र पर बिखरे लाल रंग
    तुम्हारी सिन्दूर रेखा है,
    पूरे नगर के सुख की कामना करने वाली,
    कई देवता भी तुम्हारे चौखट पर
    प्रेम भिक्षा माँगते हैं।
    तुम्हें ज्ञात है कि प्रेम पाना तुम्हारे अधिकार में नहीं,
    परंतु सभी को समान प्रेम बाँटती तुम, कहाँ से लाती हो इतनी ऊर्जा?

    ये धरती तुम्हारे सौंदर्य का ताप नहीं सह सकती,
    इसलिए भी सभ्यता की आँखों में खटकती हो तुम!

    देखना! तुम्हारी मृत्यु पश्चात
    तुम्हारी अस्थियों से फूल उगेंगे,
    मंदिर की हर मूर्ति को व्याकुलता से भर देने वाले अलौकिक सुगंध वाले,
    और ये शहर,
    दैव प्रतिमा पर अर्पण करने के बदले
    जला देगा उन्हें भी अमंगल कह कर,
    और तुम हँसती हुई चली जाओगी
    यहाँ के सौभाग्य को अपने साथ ले कर,
    हमेशा-हमेशा के लिए।


    ~ अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 51w

    अपनी धुरी पर घूमती पृथ्वी
    लगाती है परिक्रमा सूरज के
    बिना परस्पर स्पर्श के पहुँचा आता है सूरज
    अपना प्रेम धरती तक अपनी ऊष्मा से,

    अपने आसन पर विराजित सूर्य
    बैठा देखता है पृथ्वी को आँगन में नाचती अल्हड़ स्त्री मानकर,
    और अपने सुख-दुःख से अकुलाई धरती
    कराती है अनुभव सूरज को जीवित होने का।

    हे सूर्य मेरे!

    मेरी कविता तुम्हारी धरती है,
    और मैं शशि,
    तुम्हें अपनी पृथ्वी का जीवन-दायक मान,
    प्रणाम करती हूँ!

    ~ अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 52w

    ज़माने की बातें समझने की बातें,
    गाहे-बेगाहे चौराहे की बातें।

    छुपी इन बातों में वे सारी बातें,
    जो छपती नहीं अखबारें की बातें।

    तुम सुनना नहीं और समझना ना जांना,
    ये कस्बे, मुहल्ले, शरीफ़ों की बातें।

    जो की है मोहब्बत तो बातें बनेंगी,
    घबरइयो न सुनकर सखियों की बातें।

    वे रोकेंगी तुमको के कुर्बत न जाना,
    तुम झूठी सुना आना फुर्कत की बातें।

    ये बातें उड़ी हैं आज छत से तुम्हारे,
    जो है मेरे घर की, छतों की बातें।

    फूलों की कलियों की रतियों की बातें,
    सखी! मेरा मन जो ज़माने की बातें।

    तुम चलना अगर तो फिर रुकना न पाकी,
    मोहब्बत में कहाँ है ठहरने की बातें।

    ~ अपर्णा शाम्भवी 'पाकी'

  • aparna_shambhawi 52w

    तितली के निस्पृह पंख
    छू लेते धरती पर बिखरी
    हरसिंगर की पत्तियों को
    जिनका अंत सफल हो जाता,
    स्वर्ग से अज्ञात प्रकाश वर्ष की दूरी पर भी!

    सवेरे की खिड़की पर
    कोहनी टिकाए बैठा लाल सूरज
    झाँकता है भीतर चोरी-चुपके
    और दे जाता है थपकी नन्ही गवरैया के माथे पर।

    किसी सुनसान बियाबान के हृदय में
    छिपा हुआ तालाब
    जिसमें खेलता है हँसों का जोड़ा
    तो पत्ते भर जाते रंगों से और दे जाते नल-दमयन्ती की उपमा।

    रात की फैली चादर में
    चमकता लालटेन चाँद का
    या कहीं जुगनु के जलते दिये से
    देख लेती मैना तोते को!

    मुक्ताकाश में नक्काशी करते बादल
    झुक आते धरती की ओर
    आसमान के प्रेम को थोड़ा और भर कर।

    मैंने सोचा इक बार को यूँ बँटवारा करते हैं
    कि हो जाओ
    तुम तितली, मैं पारिजात!
    तुम गवरैया, मैं सूरज!
    हम-तुम हँस, नल-दमयन्ती,
    तुम तोता, मैं मैना!
    तुम आकाश, मैं धरती!

    तुम यथेष्ट! यथोचित हर रूप शोभायमान तुमपर!

    पर इतने विकल्पों के बाद भी
    मैंने चुना खुद को कविता होना,
    कि फूल मुरझाएँगे,
    सूरज डूबेगा,
    नल भी होगा गिरफ्त में मृत्यु के,
    होगी अमावस कभी न कभी,
    कभी मेघ-विहीन होगा आकाश,
    पर मैं सदैव पूर्ण रहूँगी तुमसे,
    के वियोग मुझे तुमसे दूर लाएगी भी तो यहीं ठहरेगी,
    इसी कविता में!

    ~ अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 53w

    बेला

    विछोह की असीमितता पर बिछी
    श्वासों की चादर
    समेटे हुए है अश्रुओं को
    जैसे हों मोगरे के फूल
    जिसे अभी-अभी तोड़ा गया है
    दैव-मूर्ति को चढ़ाने हेतु!

    जैसे सौंप दिया था सिद्धार्थ ने
    यशोधरा को एक बुद्ध
    बिना आज्ञा
    वैसे ही सौंप दी थी तुमने
    एक उच्च कोटि संबंध
    मुझे, स्वयं से
    बिना यह जाने कि
    हो सकता है इस बार
    बुद्ध ने पुनः सिद्धार्थ बनना चुना हो।

    तुम युद्ध के सैनिक!
    तुम्हारी प्रतीक्षा में मैंने
    नहीं लगाया है साँकल किवाड़ का
    कि मुझे विश्वास है तुम्हारे न लौटने पर
    और मालूम है कि मृत्यु अभी भी जीवित समझती है मुझे-
    या तो तुम आओगे या वो!

    तुम्हारी छायाचित्र धुँधली हो चली है
    मानस-पटल से मेरे,
    तुम संसार के नियम नहीं तोड़ोगे
    यही मान कर छोड़ दिया मैंने
    चित्र को निरंतर पोंछना।

    पर फिर भी तुम कभी आना
    तो लेते आना बेला के फूल
    मैं न कुछ पूछूँगी,
    न तुम कुछ उत्तर देना,
    बस टाँक जाना उन कलियों को मेरे केशों में,
    तुम्हारे स्पर्श से निकली बेला की अलौकिक सुगंध
    मुझे जीवन पर्यंत तुमसे दूर
    तुम्हारे समीप होने के भ्रम में रखेगी,
    उन कलियों को टाँकते हुए
    देख लेना एक बार सामने दर्पण में
    अश्रु पूर्ण मेरे नेत्रों को
    मैं मान लूँगी कि तुमने तोड़ दिए हैं
    संसार के समस्त नियम
    और चले जाना युद्ध में,
    पुनः!

    ~ अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 53w

    सप्तवर्णी के रंग
    निब से पोर तक
    अभी भी उफ़ान भरते हैं कलम में
    कि लिख पाएँ कई वर्णों में बिखरे हमारे प्रेम को,
    पर एक बूँद स्याही की
    अटक चुकी है निब पर
    जिसने मेरे सूखते आँसुओं को सहोदर मान
    उड़ने दिया खुद को मुक्ताकाश में,
    और विराम लगा दिया
    समस्त भाव-तरंगों पर!

    पुरानी डायरी के दिसम्बर के पर्ण
    जिन्हें बचा रखा था मैंने तुम्हारे लिए
    उनका श्वेत वर्ण वृद्ध हो चुका है
    हमारे मौन में घुली रिक्तता लिखते-लिखते।

    वो बस्ता जो उस डायरी का
    सबसे सुरक्षित स्थान था
    उसने त्याग दी है अपनी निजता चेन तोड़कर,
    उसे विश्वास है कि उसकी प्रदत्त गोपनियता हेतु
    अब कोई गोपनीय छंद नहीं।

    वह घड़ी जिसने तुम्हारी प्रतीक्षा में
    हर क्षण मेरा साथ दिया था,
    आज रुक गई है प्रतीक्षा से थक कर,
    आठ से नौ के बीच अटकती उसकी सूई
    जैसे विनती करती है
    कि नई बैट्री लगाने के बजाय
    उसे अब विश्राम करने दिया जाए।

    वस्तुतः हर चीज़ यहाँ की
    ऊब चुकी है मुझसे
    या शायद मेरी निरसता से।

    तुमसे दूर मैं वह खिड़की हूँ
    जो हर सुबह सूरज की प्रतीक्षा में जागती है
    और सो जाती है सुनकर कि ढल चुका है सूरज।
    वर्षों से बंद पड़ी वह खिड़की
    एक रोज़
    तोड़ देती है अपना दम एकांत के आलिंगन में,
    उस टूटी हुई खिड़की से चला आता है
    सूरज मचलते हुए उस बंद कमरे में
    और उग आता है इक नन्हा पौधा
    सैकड़ों सिगरेट की राख से!

    ~ अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 57w

    निशा की बिखरी धुँध
    तुम्हारे चेहरे पर तुम्हें दुलारते हुए
    करती है प्रतिद्वंद्विता बादलों से
    जिसने एक माँ की भाँति
    ढक लिया है चाँद को
    ताकि गुज़रते हुए धूमकेतु
    सेंध न लगा जाएँ
    उसके दुलारे की निद्रा में!

    मेरी खगोल विद्या के तुम चँद्र!
    न जाने कितने ही निमेष
    हर रात तुम्हारी आँखों की गहराई मापने के होड़ में
    ले जाते हैं तुम्हें स्वप्न देश
    जहाँ तुम कर सको निःसंकोच
    अपनी वांछाएँ पूरी
    और तुम्हारी पलकें देती रहती हैं पहरा
    जैसे नक्षत्र देते हो
    आश्वासन बादलों को
    चाँद की नींद का
    कि वे रोक देंगे हर उल्का को
    गति से परे
    पर नहीं टूटने देंगे दुलारे की निद्रा।

    हे चँद्र! जब तुम स्वप्न के आलिंगन में
    सिकोड़ते हो भवें
    तो एक ध्रुव पर बैठे चकोर की भाँति
    मेरा मन हो उठता आह्लादित,
    भावों के इन्द्रधनुष कर जाते
    मेरे अंतस की रिक्तता को प्रतिस्थापित!
    परिणामस्वरूप,
    होता मन लालायित कि चूम लूँ तुम्हारे बिम्ब फल से अधरों को
    या सहला जाऊँ केशों को
    ताकि स्वप्न देश में मिल जाए तुम्हें एक ठंडा झोंका हवा का!

    तुम्हारी प्रतीक्षा में
    मेरे हृदय से प्रति क्षण उठता ज्वार
    हो जाता फिर शांत
    जब बादलें हटा लेती अपनी लटें
    तुम्हारे मुख से
    और तुमसे आलिंगन की कल्पना में
    बीत जाती निशा
    और रवि-किरणें लिख देती
    एक लघु वियोग हमारी नियति में,
    पुनः एक बार!

    ~ अपर्णा शाम्भवी