anita_sudhir

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Aakhya student of poetry master of chemistry

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  • anita_sudhir 1w

    छंद-"प्रदीप"
    विधान-29मात्रा 16-13 पर यति।
    समान्त-आर,पदान्त-की।
    #hindinama #nayab_naushad

    #hindilekhan#hindii
    #pod#mirakee#hindi_panktiyaan#writerstolli#hindikavyasangam#writersnetwork#hindiwriters
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    गीतिका

    तपती धरती सम जीवन में,आस लगी जलधार की।
    अंतर्मन को शीतल करने,वर्षा हो अब प्यार की।।

    पंचतत्त्व से बनती काया,काम क्रोध में लिप्त है।
    मार्ग प्रदर्शक पथ दिखला दो,प्रभु से एकाकार की।।

    अपनी संस्कृति मानव भूला,भूल गया संकल्प को।
    पालन हो अब सदाचार का,बातें हों संस्कार की।।

    श्रेष्ठ जन्म मानव का मिलता,बुद्धि सदा सन्मार्ग हो।
    पांच इंद्रियों को जो साधे, नींव पड़े व्यवहार की।।

    ज्ञानी जन अभिमान करें जब,बढ़ा रहें संताप वो
    छोड़ अहम को लक्ष्य रखें ये,सकल जगत उद्धार की।

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 3w

    होलिका दहन

    आज का प्रह्लाद भूला
    वो दहन की रीत अनुपम।।

    पूर्णिमा की फागुनी को
    है प्रतीक्षा बालियों की
    जब फसल रूठी खड़ी है
    आस कैसे थालियों की
    होलिका बैठी उदासी
    ढूँढती वो गीत अनुपम।।

    खिड़कियाँ भी झाँकती है
    काष्ठ चौराहे पड़ा जो
    उबटनों की मैल उजली
    रस्म में रहता गड़ा जो
    आज कहती भस्म खुद से
    थी पुरानी भीत अनुपम।।

    बांबियाँ दीमक कुतरती
    टेसुओं की कालिमा से
    भावना के वृक्ष सूखे
    अग्नि की उस लालिमा से
    सो गया उल्लास थक कर
    याद करके प्रीत अनुपम।।

    अनिता सुधीर
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 3w

    #nayab_naushad#नौशाद#श्रद्धांजलि
    #hindinama

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    0नौशाद

    सरल सहज व्यक्तित्व को,नमन करूँ सौ बार।
    श्रद्धांजलि अर्पित तुम्हें, लिए अश्रु की धार।।

    बड़ी लगन थी आपको,सीखें दोहा छन्द।
    भाव लिए थे गूढ़ता,लिखे अभी थे चन्द।।

    काम अधूरे थे अभी,कहाँ चले नौशाद।
    हृदय विदारक ये खबर,कैसे हों आबाद।।

    *सीप निकालें मोतियाँ*, कहाँ हुई वो लुप्त।
    *धूप छाँव*के खेल में,हृदय पटल अब सुप्त।।

    फिल में आ जाओ सभी,नित्य लगी आवाज।
    सूना है अब काफिया,सूना है आगाज।।

    ग़ज़ल सिखाई प्रेम से,दिया मुझे था मान।
    कौन कमी पूरा करे,टूट गया अभियान।।

    अनदेखे रिश्ते बने,मिला चार दिन साथ।
    भुला न पाएंगे तुम्हें,छोड़ चले तुम हाथ।।

    मेरी गजलों में सदा,साथ रहे नौशाद।
    कैसे कह दूँ अलविदा, सदा रहेंगे याद।


    अनिता सुधीर
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 4w

    कविता

    खुली गाँठ मन पल्लू की जब
    पृष्ठों पर कविता महकी

    बनी प्रेयसी शिल्प छन्द की
    मसि कागद पर वह सोई
    भावों की अभिव्यक्ति में फिर
    कभी पीर सह कर रोई
    देख बिलखती खंडित चूल्हा
    आग काव्य की फिर लहकी।।

    लिखे वीर रस सीमा पर जब
    ये हथियार उठाती है
    युग परिवर्तन की ताकत ले
    बीज सृजन बो जाती है
    आहद अनहद का नाद लिये
    कविता शब्दों में चहकी।।

    शंख नाद कर कर्म क्षेत्र में
    स्वेद बहाती खेतों में
    कभी विरह में लोट लगाती
    नदी किनारे रेतों में
    रही आम के बौरों पर वह
    भौरों जैसी कुछ बहकी।।

    झिलमिल ममता के आँचल में
    छाँव ढूँढती शीतलता
    पर्वत शिखरों पर जा बैठी
    भोर सुहानी सी कविता
    अजर अमर की आस लिए फिर
    युग के आँगन में कुहकी।।

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 4w

    नवगीत

    गूँजता अम्बर निहारे
    रक्त शोणित वीर पाकर
    राष्ट्र का निर्माण कर्त्ता,
    चल पड़ा अब शौर्य गाकर।।

    भाव जागें देशहित में
    गीत वंदेमातरम से
    वंदना के श्लोक कहते
    कर्म करिये फिर धरम से
    ज्ञान दो माँ भारती अब
    नींद से हमको उठाकर।।

    कंठ गाते जोश को जब
    नित नया बलिदान लिखते
    प्राण फूँके पीढ़ियों ने
    भारती गुणगान लिखते
    प्रज्ज्वलित है यज्ञ वेदी
    भूमि रज माथे चढ़ाकर।।

    शस्य श्यामल हो धरा ये
    स्वप्न पलते कोटि दृग में
    फिर अमरता चाहती है
    लक्ष्य लिखना सत्य पग में
    सूर्य शशि वंदन करें फिर
    मंत्र सुफलां का सुनाकर।।

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 5w

    मुँदरी /अँगूठी

    प्रेम चिन्ह संचित किये,लिए सुहानी याद।
    मुँदरी की अब वेदना,सहती नित्य विवाद।।

    मुँदरी में सजते रतन, बदलें नौ ग्रह चाल।
    नीलम,पन्ना मूँगिया,टालें विपदा काल।।

    बाँधे बंधन नेह के,ले हाथों में हाथ।
    अनामिका मुँदरी सजा,चली पिया के साथ।।

    हठ करती है प्रेयसी,मुँदरी दे दो नव्य।
    त्रिया चरित को जानिए,खर्च करें फिर द्रव्य।।

    नीर थाल में हो रहा,हार जीत का खेल।
    मुँदरी की फिर हार में ,बढ़ा दिलों का मेल।।

    अनिता सुधीर आख्या

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    मुँदरी

    हठ करती है प्रेयसी,मुँदरी दे दो नव्य।
    त्रिया चरित को जानिए,खर्च करें फिर द्रव्य।।

    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 5w

    शिवरात्रि

    दोहा छन्द आधारित गीतिका

    **

    फाग कृष्ण चौदस मने,महापर्व शिवरात्रि।
    शक्ति मिलन अध्यात्म से,महापर्व शिवरात्रि।।

    शिव गौरा के ब्याह का,आया शुभ दिन आज
    मंदिर मंदिर सज गए ,महापर्व शिवरात्रि ।।

    चाँद विराजे शीश पर,गले सांप का हार
    नीलकंठ को पूजते,महापर्व शिवरात्रि।।

    दैहिक भौतिक ताप को,भोले करते नाश
    बिल्वपत्र अक्षत चढ़े ,महापर्व शिवरात्रि।।

    पंच तत्व का संतुलन,है शिवत्व आधार ,
    वैरागी को साधिए ,महापर्व शिवरात्रि।।

    आदि अंत अज्ञात है,अविरामी शिव नाथ।
    कैलाशी उर में  बसे ,महापर्व शिवरात्रि।।

    भस्म चिता की गात पर,औगढ़ भोलेनाथ
    रूप निराला पूजिए ,महापर्व शिवरात्रि ।।


    अनिता सुधीर "आख्या"
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 5w

    घूँघट

    रहती मन की शून्यता,लेकर भाव प्रपात।
    मर्यादा घूँघट लिए,सहे कुटिल आघात।।

    अनिता सुधीर
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 6w

    आधार छंद- वाचिक मदलेखा[मात्रिक]
    मापनी-2221 122
    समान्त- आर
    पदांत- नहीं है
    [गीतिका]

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    स्त्री

    स्त्री बाजार नहीं है।
    वो व्यापार नहीं है।।

    क्यों उपभोग किया है
    वो लाचार नहीं है।।

    नर से श्रेष्ठ सदा से
    ये तकरार नहीं है।।

    उसने मौन सहा जो
    कोई हार नहीं है ।।

    है परिवार अधूरा
    जग आधार नहीं है

    आँगन रिक्त रहे जब
    फिर संसार नहीं है।

    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir

  • anita_sudhir 6w

    गजल

    **
    बशर की लालसा बढ़ती नशे में चूर होता है
    समय की शाख पर बैठा सदा मगरूर होता है

    मशक़्क़त से कमा कर फिर निभा जो प्रीत को लेते
    इनायत तब ख़ुदा करता वही मशहूर होता है

    समय के फेर में उलझे नियम क्यों भूल जाते सब
    बहारें लौट आती हैं यही दस्तूर होता है

    रिहा अब ख्वाहिशें कर दो बड़ा है बोझ भारी ये
    छुपा कर दर्द क्या जीना यही नासूर होता है

    नसीबों से मिले जो भी वही दिल से लगा लेना
    हो उसकी रहमतें जीवन बशर पुरनूर होता है


    अनिता सुधीर आख्या
    ©anita_sudhir