anas_saifi

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कागज़, कलम ❤️

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  • anas_saifi 5w

    मोमिन खाँ मोमिन

    कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी
    कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो

    ~मोमिन खाँ मोमिन

  • anas_saifi 7w

    ग़ज़ल

    सितम क्या मुझ पे गुज़रेंगे बिछड़ कर
    मिरा क्या होगा रब जाने बिछड़ कर

    ستم کیا مجھ پے گزریںیگے بچھڑ کر
    میرا کیا ہوگا رب جانے بچھڑ کر

    तिरी शोला बयानी से है ज़ाहिर
    मिलन होगा नहीं अब के बिछड़ कर

    تیری شولہ بیانی سے ہے ظاہر
    ملن ہوگا نہیں اب کے بچھڑ کر

    मुझे इस बात का दुख है कि उसको
    ज़रा भी दुख नहीं मुझ से बिछड़ कर

    مجھے ایس بات کا دکھ ہے کی اُسکو
    ذرا بھی دکھ نہیں مجھ سے بچھڑ کر

    ग़मों से चाहें मर ही क्यूँ न जाऊँ
    कोई अब हाल क्यूँ पूँछे बिछड़ कर

    گموں سے چاہیں مر ہی کیوں نہ  جااوں
    کوئی اب ہال کیوں پوچھے بچھڑ کر

    सुकूँ उम्मीद, क्या सब्रो तहम्मुल
    ये सब लगते हैं अफ़साने बिछड़ कर

    سکوں امید, کیا صبرو حمل
    یہ سب لگاتے ہیں افسانے بچھڑ کر

    अज़ाब उसकी भी होंगी कुछ तो रातें
    फ़कत हम थोड़ी तड़पेंगे बिछड़ कर

    عذاب اُسکی بھی ہوگی کچھ ٹو راتیں
    فقط ہم تھوڑی تڑپیں گے بچھڑ کر

    मकाने दिल में अच्छी यादें रक्खीं
    गिले शिकवे नहीं रक्खे बिछड़ कर

    مکانے دل میں اچھی یادیں رخیں
    گیلے شکوے نہیں رخے بچھڑ کر

    थे चारासाज़ पहले ही परेशां
    हुए ज़ख्म और भी गहरे बिछड़ कर

    تھی چاراساذ پہلے ہی پریشاں
    ہوئے زخم اور بھی گھرے بچھڑ کر

    तू बोझ अश्कों का अपने खुद ही सम्भाल
    सदाएं अब मुझे मत दे बिछड़ कर

    تو بوجھ اشکوں کا اپنے خد ہی سنبھال
    صدائیں اب مجھے مت دے بچھڑ کر

    नहीं होता कोई भी मसअला हल
    बदन में उठते हैं शोले बिछड़ कर

    نہیں ہوتا کوئی بھی مصالحہ حل
    بدن میں اٹھتے ہیں شولے بچھڑ کر

    अभी भी दरमियाँ है कोई तो रब्त
    अभी भी हम नहीं बिछड़े बिछड़ कर

    ابھی بھی درمیاں ہے کوئی ٹو ربط
    ابھی بھی ہم نہیں بچھڑ کر
    ©anas_saifi

  • anas_saifi 12w

    अलहमदुलिल्लाह, मैं ब खैर हूँ
    इस्लाम में ख़ुदकुशी हराम है और एक बड़ा गुनाह भी तो बस उस ही लिहाज़ से ये शेर कहा गया है

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    शेर

    इलाज अपने ग़मों का ख़ुदकुशी है
    मुसलमां हूँ बड़ी ही बेबसी है
    علاج اپنے گموں  کا خودکشی ہے
    مسلماں ہوں بڈی بے بسی ہے
    ©anas_saifi

  • anas_saifi 15w

    निस्फे सफ़र - बीच सफ़र

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    ग़ज़ल/غزل

    तुम गलत वक़्त पर ज़िंदगी में आए
    वर्ना नफ़रत के क़ाबिल नहीं थे हम
    تم غلط وقت پر زندگی میں آئ
    ورنہ نفرت کے کابل نہیں تھے ہم
    हमको निस्फे सफ़र ये पता चला
    एक दूजे की मंज़िल नहीं थे हम
    ہم کو نصفے سفر یہ پتا چلا
    ایک دوجے  کی منزل نہیں تھے  ہم
    जितना तुमने बताया ज़माने को
    जाना उतने भी मुश्किल नहीं थे हम 
    جتنا تم نے بتایا زمانے کو
    جانا اتنے بھی مشکل نہیں تھے ہم
    सबने हमसे लिया काम उम्र भर
    इक फकत खुद को हासिल नहीं थे हम
    سب نے ہم سے لیا کام امر بھر
    اک فکت خود کو حاصل نہیں تھے ہم
    तेरी बातों से इक खुशबू आती थी
    तेरी सूरत के काइल नहीं थी हम
    تیری باتوں سے اک خوشبو آتی تھی
    تیری صورت کے قایل نہیں تھے ہم
    तुमको अपना समझने लगे थे हम
    तुम ही बतलाओ पागल नहीं थे हम?
    تم کو اپنا سمجھنے لگے تھے ہم
    تم ہی طتلاو پاگل نہیں تھے ہم
    इश्क़ ने ना तवाँ कर दिया अनस
    वर्ना किसके मुकाबिल नहीं थे हम
    عشق نے  نا تواں کر دیا انس
    ورنہ کس کے مقابل نہیں تھے ہم
    ©anas_saifi

  • anas_saifi 16w

    नीम रुख - half faced
    शाद ओ खुश - happy
    कुल्फ़त - depression

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    मीर

    हम न कहते था कि नक्श उस का नहीं नक्काश सहल
    चाँद सारा लग गया तब नीम रुख सूरत हुई

    शाद ओ खुश ताला कोई होगा किसू को चाह कर
    मैं तो कुल्फ़त में रहा जब से मुझे उल्फ़त हुई

    ~मीर

  • anas_saifi 17w

    ग़ज़ल/غزل

    फ़िर किसी से इश्क़ करना चाहता हूँ
    मैं दोबारा हाथ मलना चाहता हूँ

    فر کسی سے عشق کرنا چاہتا ہوں
    میں دوبارہ ہاتھ ملنا چاہتا ہوں

    तेरा शौहर बनने के इमकां नहीं है
    बस तिरा हमदर्द बनना चाहता हूँ

    تیرا شوہر بن نے کے امکاں نہیں ہیں
    بس ترا ہمدرد بننا چاہتا ہوں

    है दिले नादान बीमार ए शुजाअत
    इश्क़ से वर्ना मैं डरना चाहता हूँ

    ہے دلے نادان کو بیمارے شجاعت
    عشق سے ورنہ میں ڈرنا چاہتا ہوں

    तू ने कोई भी वजह छोड़ी नहीं है
    फ़िर भी मैं ये रब्त रखना चाहता हूँ

    تو نے کوئی بھی وجہ چھوڈی نہیں ہے
    فر بھی میں یہ ربط رخنا چاہتا ہوں

    मुन्तज़िर हैं ज़ख्म मेरे भी दवा के
    पर मैं तेरे ज़ख्म भरना चाहता हूँ

    منتظر ہیں زخم میرے بھی دوا کے
    پر میں تیرے زخم بھرنا چاہتا ہوں

    अब जो तुमसे बिछड़ा हूँ मैं तो खुला है
    साया मैं फूलों का कितना चाहता हूँ

    اب جو تم سے بچھڑا ہوں میں ٹو کھلا ہے
    سایہ میں پھلوں کا کتنا چاہتا ہوں

    ©anas_saifi

  • anas_saifi 22w

    ग़ज़ल/غزل

    उम्र भर के लिए लहज़े से शोखी चली जाती है
    छोड़ कर जब किसी लड़के को लड़की चली जाती है

    عمر بھر کی لئے لحظے سے شوخیِ چلی جاتی ہے
    چھوڑ کر جب کسی لڈکے کو لڈکی چلی جاتی ہے

    ऐसे हालातों में वो छोड़ कर के गयी है मुझे
    गर्मी की दोपहर में जैसे बिजली चली जाती है

    ایسے حالاتوں می وہ چھوڑ کر  کے گئ بے مجھے
    گرمے کے دوپہر میں جیسے بجلی چلی جاتی ہے

    ख्वाब अक्सर फ़लक पे घर बनाने के बुनते हैं लोग
    पर नशेमन में अक़्सर ज़िन्दगानी चली जाती है

    خواب اکثر فلک پے گھر بنانے کے بنتے ہیں لوگ
    پر نشیمن میں اکثر زندگانی چلی جاتی ہے

    हो रहे हैं हमारी फ़ीस के पैसे ज़ाया तमाम
    आजकल रोज़ ट्यूशन से वो जल्दी चली जाती है

    ہو رہے ہیں ہماری فیس کے پیسے ضائع تمام
    آجکل روز ٹیوشن سی وہ جلدی چلی جاتی ہے

    कुछ दवा कर ए चारागर मेरी इस परेशानी की
    ये हँसी मेरे चेहरे से कभी भी चली जाती है

    کچھ دوا کر اے چارہ گر میری اس پریشانی کی
    یہ ہنسی میرے چہرے سی کبھی بھی چلی جاتی ہے

    आख़िरश सीख ही जाते हैं जीना बिछड़ कर सभी
    कौन मरता है ? जाँ फुर्कत में किसकी चली जाती है?

    آخرش سیکھ ہی جاتے ہیں جینا بچھڈ کر سبھی
    کون مرتا ہے جاں فرقت میں کسکی چلی جاتی ہے

    कब यहां पर किसीकी चलती है आगे जिबरील के
    चीख़ता है बदन पर जाँ निकलती चली जाती है

    کب یہاں پے کیسی کی چلتی ہے آگے جبریل کے
    چیختا ہے بدن پر جاں نکلتی چلے جاتی ہے

    ~अनस सैफ़ी/انس سیفی
    ©anas_saifi

  • anas_saifi 26w

    है नहीं कोई भी राहबर खुद-अज़ाबी का
    फ़िर भी है खूबसूरत सफ़र खुद-अज़ाबी का
    ہے نہیں کوئی بھی راہبر خود عذابی کا
    فر بھی ہے خوبصورت سفر خود عذابی کا
    आप ही कर दें हमको मुक़र्रर कोई सज़ा
    वर्ना आता है हमको हुनर खुद-अज़ाबी का
    آپ ہی کر دیں ہم کو مقرر کوئی سزا
    ورنہ آتا ہے ہم کو ہنر خود عذابی کا
    कर दिया बुर्दबार इन्तहा खुद-अज़ाबी ने
    अब नहीं होता मुझ पे असर खुद-अज़ाबी का
    کر دیا بردبار انتہا خود اذابی نے
    اب نہیں ہوتا مجھ پے اسر جود ازابی کا
    क्यूँ खुदा ने दे के मुख्तसर ज़िंदगी मुझे
    कर दिया है समय मुख्तसर खुद-अज़ाबी का
    مکیوں خدا نے دے کے مختصر زندگی مجھے
    کر دیا بے سمے مختصرخود عذابی کا
    तुम सज़ा दे के कर देतीं मुझको रिहा, असीर
    क्यूँ मुझे कर दिया सर ब सर खुद-अज़ाबी का
    تم سزا دے کے کر دیتی مجھکو رہا، اسیر
    کیوں مجھے کر دیا سر بہ سر خود عذابی کا
    आप रोकेंगी तो ही रुकेगा ये सिलसिला
    वर्ना चलता रहेगा सफ़र खुद-अज़ाबी का
    آپ روکیںگی تو ہی رکیگا یہ سلسلہ
    ورنہ چلتا رہیگا سفر خود عذابی کا
    फ़ासला रखना ग़र है मलाल आपको कोई
    जल पड़ोगे कि मैं हूँ शरर खुद-अज़ाबी का
    فاصلہ رخنہ گر ہے ملال آپکو کوئی
    جل پروئے کی میں ہوں شرر خود عذابی کا
    टांग कर उसकी तस्वीरें दीवार पे हर इक
    कर दिया मैं ने तामीर घर खुद-अज़ाबी का
    ٹاںگ کر اسکی تصویریں دیوار پے ہر اک
    کر دیا میں نے تعمیر گھر خود عذابی کا
    इस क़दर ढ़ा रहा हूँ सितम खुद पे इन दिनों
    झुक गया है मिरे आगे सर खुद-अज़ाबी का
    ایس قدر ڈھا رہا ہوں ستم خود پے ان دنوں
    جھک گیا ہے میرے آگے سر خود عذابی کا

    ~अनस सैफ़ी

    ( खुद-अज़ाबी - self punishment
    बुर्दबार - सहनशील
    शरर - चिंगारी)

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    ग़ज़ल (in caption)

    आप ही कर दें हमको मुक़र्रर कोई सज़ा
    वर्ना आता है हमको हुनर खुद-अज़ाबी का
    آپ ہی کر دیں ہم کو مقرر کوئی سزا
    ورنہ آتا ہے ہم کو ہنر خود عذابی کا
    ©anas_saifi

  • anas_saifi 30w

    शेर/شیر

    ऐसे हालातों में वो छोड़ कर के गयी है मुझे
    गर्मी की दोपहर में जैसे बिजली चली जाती है
    ایسے حالاتوں میں چھوڑ کر کے گئ بے مجھے
    گرمے کے دوپہر میں جیسے بجلی چلی جاتی ہے
    ©anas_saifi

  • anas_saifi 30w

    नज़्म

    कफ़स ए अफ़्सुर्दगी में
    चादर ए तीरगी ओढ़
    एक ख्वाब सिसक सिसक कर रोता है
    अश्कों से बालिश ए उम्मीद इस कदर भीगता है
    ग़र निचोड़ा जाए तो सेहराओं कि प्यास बुझ जाए

    वो रोता है कि आज फिर
    वक़्त ने उसको शिकस्त दे दी
    वो रोता है कि आज फिर, ज़िम्मेदारी
    के हथोड़े ने उसकी कमर तोड़ दी
    वो रोता है कि आज फिर लोगों की बातों ने
    उसके साथ सारा दिन इस्मत दरी करी
    वो रोता है कि आज फिर
    वो हंसते हंसते रोने लगा

    ना मालूम ये ख्वाब रात कैसे गुज़ारेगा
    पर तुलू ए आफताब होते ही ये ख्वाब
    घायल परों से उड़ेगा
    बादलों को चीरते हुए
    सूरज की आँखों में आँख डाल कर कहेगा
    ए शम्स, तू जिस जहां का आफताब है
    उस जहां को इत्तिला कर की
    मेरा इस हाल में उड़ना
    अलामत ए आज़ादी है
    बर्बादियों के लिए
    अलामत ए बर्बादी है

    मैं बड़े बड़े ख्वाबों के आँगन में
    खेलता हुआ एक छोटा सा ख्वाब हूँ
    मैं हिकायत ए शुजाअत का लब्बोलुआब हूँ
    मुझे टूटना नहीं आता
    मुझे बिखरना नहीं आता
    जो अगर टूट भी जाऊँ तो नायाब हूँ
    मैं अनस का देखा हुआ ख्वाब हूँ
    मैं अनस का देखा हुआ ख्वाब हूँ
    ©anas_saifi